डॉ. आंबेडकर की ज़िंदगी की भुला या मिटा दी गईं अथवा नज़रअंदाज़ कर दी गईं घटनाओं पर लेखों की मेरी शृंखला का यह चौथा लेख है। ऐसी घटनाओं के बारे में जानकारी हासिल करने का जरिया हैं नए सिरे से खोजबीन, अभिलेखागारों को खंगालना और ऐसे बेहतर प्राथमिक स्रोतों को ढूंढ़ना जो निष्पक्ष हों और कई मामलों में जिनका आंबेडकर से कोई संबंध ही न हो। मेरी यह पक्की मान्यता है कि आंबेडकर के बारे में अभी काफी कुछ पता लगाया जाना और लिखा जाना बाकी है। यह छोटा–सा लेख एक ऐसे घटनाक्रम के बारे में है जो 2 जून, 1915[1] को आंबेडकर के कोलंबिया विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के तुरंत बाद समाचारों में था। उस समय आंबेडकर केवल 24 साल के थे।

भारत के आंतरिक व अंतर्राष्ट्रीय व्यापार-वाणिज्य के बारे में आंबेडकर के विचार जगजाहिर हैं। एक अर्थशास्त्री बतौर कोलंबिया विश्वविद्यालय में उन्होंने जो सीखा था वही उनके विचारों का आधार था। इसी तरह, जिन सिद्धांतों के वे झंडाबरदार थे उनके बारे में भी सब जानते हैं। इन सिद्धांतों को हम उनकी कृतियों और भारतीय संविधान में उन्होंने जो प्रावधान किए उनके ज़रिए समझ सकते हैं।[2] संविधान का एक पूरा भाग (भाग 13) व्यापार-वाणिज्य के बारे में है जिसमें अनुच्छेद 301 से लेकर 307 तक शामिल हैं। आंबेडकर मानते थे कि मुद्रा, श्रम अधिकारों, केंद्रीय बैंक की अवधारणा और औद्योगीकरण आदि के ज़रिए अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान की जा सकती है। व्यापार-वाणिज्य उनके बहुत प्रिय विषय थे। उन्होंने बड़ौदा के महाराज सयाजीराव गायकवाड़ से इन विषयों का अध्ययन करने के लिए मदद मांगी थी। आगे चलकर उन्होंने इन विषयों पर अनेक पुस्तकें और इनसे संबंधित अन्य लेखकों की पुस्तकों की भूमिकाएं और प्रस्तावनाएं भी लिखीं। अपनी व्यस्तताओं के बावजूद भी वे समय-समय पर अपनी कृतियों में सुधार करते रहते थे। भारत लौटने के बाद इन विषयों पर बंबई में उन्होंने जो व्याख्यान दिए, उनका कोई विवरण अब उपलब्ध नहीं है।[3] स्नातकोत्तर डिग्री की अपनी पढ़ाई के दौरान डॉ. आंबेडकर ने जो शोधप्रबंध लिखा था उसका विषय भी प्राचीन भारत में वाणिज्य था। डॉ. आंबेडकर ने अर्थशास्त्र और इसी तरह के अन्य विषयों की पढ़ाई इसलिए नहीं की थी ताकि वे विलक्षण व्याख्यान दे सकें। उन्होंने ये विषय इसलिए पढ़े थे ताकि वे यह तय कर सकें कि सरकारों को कौन-से सार्थक और जनहितकारी कदम उठाने चाहिए। केवल बातें करने में उनका भरोसा नहीं था। सोच-समझकर और सिद्धांतों की आधार पर काम करना उनका ध्येय था। यह जानना उपयोगी होगा कि विदेश से अपनी पहली डिग्री हासिल करने के बाद और एमए के लिए अपना शोधप्रबंध लिखने के पहले उन्होंने क्या किया। दुखद यह कि “नेशनल डिविडेंड ऑफ़ इंडिया : ए हिस्टोरिक एंड एनालिटिकल स्टडी” शीर्षक उनका शोधप्रबंध अब उपलब्ध नहीं है। ये नए अभिलेखीय दस्तावेज़ उनके विदेश प्रवास के उस पहलू से संबंधित हैं जिनके बारे में हम बहुत कम जानते हैं। जाहिर है कि ये बहुत महत्वपूर्ण हैं।
बीसवीं सदी के पहले दशक के शुरुआती सालों में अमरीकी अर्थव्यवस्था बहुत मज़बूत थी। मगर बीच-बीच में वह अस्थिर हो जाया करती थी। यूएस स्टील, एनाकोंडा कॉपर और तब तक बंद हो चुकी स्टैण्डर्ड आयल जैसी विशाल कंपनियों के चलते अर्थव्यस्था में क्रांतिकारी बदलाव आ चुके थे। सन् 1907 में अमरीकी अर्थव्यवस्था को कुछ समय के लिए ही सही, मगर गंभीर संकट ने घेर लिया। जनता द्वारा बड़े पैमाने पर अपना जमा धन निकाल लेने के कारण कई ट्रस्ट कंपनियों का दिवाला निकल गया। प्रसिद्ध बैंकर जे.पी. मॉर्गन, जो उस समय 70 साल के थे, ने अर्थव्यवस्था को संकट से उबारा। उन्होंने सभी बैंकरों की एक बैठक अपनी लाइब्रेरी में रखी जहां उन्होंने उनसे परस्पर समझौतों पर दस्तखत करवाए, उनके पास उपलब्ध धन एक जगह इकट्ठा किया और आपातकालीन कर्जों की व्यवस्था की। उन्होंने ऐसी वित्तीय संस्थानों के कामकाज पर स्वयं नज़र रखी, जिन्हें बचाना उनकी दृष्टि में ज़रूरी था और अन्यों में ताले डलवा दिए। इससे बाज़ार में विश्वास का वातावरण बना। हम कह सकते हैं कि इसी घटनाक्रम के नतीजे में अंततः फ़ेडरल रिज़र्व अस्तित्व में आया। अधिकांश लोगों के लिए अर्थव्यवस्था फिर से मज़बूत हो गई। फिर 1914 में पहला विश्वयुद्ध शुरू हुआ। इसी समय एक वित्तीय संकट भी खड़ा हो गया। मगर युद्ध के कारण उस पर बहुत कम चर्चा हुई। सन् 1915 के मध्य में फ़ेडरल रिज़र्व केवल दो साल का था और अपने पैरों पर खड़ा होना सीख ही रहा था। जाहिर है कि बैंकिंग प्रणाली का विनियमन तब बहुत मज़बूत नहीं था।
इस पृष्ठभूमि में सन् 1915 के जून महीने में अमरीका से व्यापारिक रिश्ते बेहतर बनाने के लिए ‘हिन्दू सौदागरों और बैंकरों’ का एक प्रतिनिधिमंडल न्यूयॉर्क पहुंचा। प्रतिनिधिमंडल ने ब्यूरो ऑफ़ कामर्शियल इकोनॉमिक्स के साथ पत्रव्यवहार किया। ब्यूरो के अनुसार वह “इस देश (अमरीका) और अन्य देशों के अग्रणी वित्तीय संस्थानों, कारखानेदारों और परिवहन कंपनियों का संगठन है जो देश के शीर्ष शिक्षाविदों की सिफारिश पर फिल्मों के सजीव माध्यम से औद्योगिक और व्यावसायिक सूचनाओं और जानकारियों के प्रचार-प्रसार में रत है।”[4]
इस परोपकारी, गैर-शासकीय और गैर लाभकारी संस्था का गठन सन् 1913 में एक लगभग अंधे इंजीनियर ने एक अर्थशास्त्री की मदद से किया था। यह संस्था बिना एक पैसा लिए काम करती थी (वह अपने काम का पैसा नहीं लेगी, यह उसकी पहली और एकमात्र पूर्वशर्त हुआ करती थी) और उसका खर्च केवल चंदे और विभिन्न बंदोबस्ती निधियों और एन्यूटीज़ के ज़रिये चलता था। शुरुआत में इसका मुख्यालय पेनसिलवेनिया राज्य में स्थित फिलाडेल्फिया था, जो बाद में वाशिंगटन चला गया। इस संस्थान को पूर्वी तट से लेकर पश्चिमी तट तक के कई विश्वविद्यालयों सहित अनेक कंपनियों जैसे जॉन रॉकफेलर की स्टैण्डर्ड आयल (अब एक्सानमोबिल), ड्यूपॉट, ईस्टमैन कोडक, हडसन मोटर्स (बाद में क्राइजलर), लिप्टन और फोर्ड मोटर्स का सहयोग हासिल था, जो मोनोग्राफ या स्लाइडों के ज़रिए इस शैक्षणिक अभियान में सहयोग करती थीं।[5]
कथित ‘हिंदू व्यापारियों और बैंकरों’ के इस समूह में डॉ. आंबेडकर भी शामिल थे। उन्होंने और समूह के अन्य सदस्यों ने निम्नलिखित ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए, जिसे ‘द ईवनिंग स्टार’ ने शायद शब्दशः प्रकाशित किया। इस ज्ञापन में अमरीका और भारत के बीच व्यापारिक रिश्ते कायम करने का अनुरोध किया गया था। “हम भारत के प्रतिनिधि और इंडियन सोसाइटी फॉर द प्रमोशन ऑफ़ कॉमर्स के सदस्य, ब्यूरो ऑफ़ कामर्शियल इकोनॉमिक्स के अत्यंत मेधावी अधिकारियों से अनुरोध करते हैं कि हम इस देश और भारत के बीच परस्पर समझ विकसित करने, मित्रता का अटूट बंधन स्थापित करने और नजदीकी व्यापारिक रिश्ते कायम करने में गहन रूचि रखते हैं।”
ज्ञापन में यह भी बताया गया था कि भारत में व्यापार की बहुत संभावनाएं हैं और वह कच्चे माल के उत्पादन और वाणिज्य में काफी आगे है। ज्ञापन में यह अनुरोध किया गया था कि भारत की जनता को अमरीकी उद्योग जगत के बारे में बताने के लिए फिल्में उपलब्ध करवाई जाएं।
“भारत पश्चिमी दुनिया को लिए व्यापार के सर्वश्रेष्ठ अवसर उपलब्ध करवाता है। भारत कच्चे माल के उत्पादन में दुनिया में चौथे और वाणिज्य में पांचवें स्थान पर है।”
“हम आपके और कारखाना मालिकों के असीम सौजन्य एवं अमूल्य सहायता के लिए आभारी होंगे यदि आप हमें इस संगठन के लिए औद्योगिक फिल्में और स्लाइडें उपलब्ध करवा सकें। इनसे एक अत्यंत उपयोगी उद्देश्य पूरा होगा और वह यह कि फिल्मों, स्लाइडों इत्यादि की मदद से अमरीका के उद्योगों, कारखानों और उसकी असली ताकत के बारे में भारत की जनता जान सकेगी।”

“ज्ञापन पर निम्नांकित लोगों के हस्ताक्षर हैं– भीमराव आर. आंबेडकर, बड़ौदा, भारत; आर.सी. नाग, ढाका (पूर्वी बंगाल); विश्वनाथ एन. बनावल्कर, पुणे, भारत; अब्दुल अजीज, लाहौर (पंजाब); आर.आर. पवार, तसगांव, भारत; दलीप सिंह गिल, पटियाला, भारत’’
यद्यपि इस अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज के बारे में बहुत कम जानकारियां उपलब्ध हैं। लेकिन जो हमें मालूम है उससे भी हम काफी कुछ जान सकते हैं। आंबेडकर के अलावा ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने वाले अन्य लोग कौन थे? वे ऐसे लोग नहीं थे जो जाने-माने हों और जिन्हें आसानी से पहचाना जा सके। यह संगठन क्या था? इस ज्ञापन का क्या हुआ? मैं इस लेख में इनमें से कुछ प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास करूंगा और फिर हम इंग्लैंड की बेविन योजना के बारे में थोड़ी बात करेंगे।
सबसे पहले हम हस्ताक्षर करने वाले लोगों के बारे में बात करें और वह भी उसी क्रम में जिस क्रम में अखबार में छपे समाचार में उनके नाम हैं। सबसे पहले हैं पूर्वी बंगाल के ढाका के आर.सी. नाग। वे रोबीन्द्रचन्द्र नाग थे जो समकालीन दस्तावेजों के अनुसार थोड़े ही समय पहले (1913) नोबेल पुरस्कार जीतने वाले रवींद्रनाथ टैगोर के मित्र थे। उन्होंने सन् 1918 में कोलंबिया विश्वविद्यालय से स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की थी।[6] सन् 1920 में वे मिनेसोटा विश्वविद्यालय में समाजविज्ञान और राजनीति के विद्यार्थी थे। उस समय उन्होंने कलकत्ता में अपनी जवानी के दिनों को याद किया था। वे कलकत्ता वालंटियर राइफल्स के सदस्य थे और कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक उपाधि प्राप्त करने के बाद अपनी चाची एस. बनर्जी के साथ अमरीका में टेक्सास गए थे। उनकी चाची एक उच्च हिंदू जाति से थीं, लेकिन बाद में वे ईसाई धर्मोपदेशक बन गई थीं।[7] उनके पिता भारत में तीन महत्वपूर्ण हैसियत में काम कर चुके थे – राजा, प्रधानमंत्री और जज। उन्होंने ब्रिटिश सरकार के लिए 38 साल तक काम किया। वे बंगाल में जज थे और उदयपुर के महाराजा भी थे। रोबीन्द्र के एक भाई मुख्य न्यायाधीश और झिंद के महाराज थे। एक और भाई स्कॉटलैंड के एडिनबरा विश्वविद्यालय में चिकित्सा विज्ञान के वरिष्ठ छात्र थे। कुल मिलाकर वे एक बहुत प्रतिष्ठित परिवार से थे।
सूची में दूसरा नाम था विश्वनाथ एन. बनावल्कर का जो पूना (आज का पुणे) से थे। उनके नाम में एन. ‘नारायण’ का संक्षिप्तीकरण था। वे भी कोलंबिया विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट थे। यह भी संभव है कि सितंबर, 1918 में पहले विश्वयुद्ध में लड़ने के लिए उन्हें मेजर जनरल इनोक क्राउडर के नेतृत्व में न्यूयॉर्क के कैंब्रिज शहर से सेना में शामिल कर लिया गया हो।
तीसरे व्यक्ति थे लाहौर (पंजाब) के अब्दुल अज़ीज़। किसी दस्तावेज या पूर्व विद्यार्थियों की सूची में उनका नाम नहीं मिलता। उनके बारे में हमें केवल एक जानकारी है और वह भी संयोगवश। उनका नाम इस घटनाक्रम के करीब दो हफ्ते पहले न्यूयार्क की 1915 की जनगणना में आंबेडकर के घर में उनके साथ रहने वाले व्यक्ति के तौर पर दर्ज किया गया था। उनके बारे में और जानकारी मेरे एक पूर्व लेख[8] से हासिल की जा सकती है। कुल मिलाकर वे 26 साल के युवक थे जो उस समय तक अमरीका में चार साल रह चुके थे। वे विद्यार्थी नहीं थे, मगर कुछ काम भी नहीं करते थे।
चौथे व्यक्ति थे तासगांव (जो अब महाराष्ट्र के सांगली जिले में है) के आर.आर. पवार। उनका पूरा नाम कदाचित रामचंद्र रावजी पवार था। यह दिलचस्प है कि कोलंबिया विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रों के रजिस्टर में उन्हें बड़ौदा का निवासी बताया गया है और शायद यही कारण है कि उनके बारे में और अधिक जानकारी पुणे के गोखले इंस्टीट्यूट[9] में संरक्षित बड़ौदा रियासत की फाइलों में मिलती है। उनमें बताया गया है कि उन्हें पहले बीए और फिर एलएलबी करने के लिए राज्य द्वारा सहायता उपलब्ध करवाई गई। बाद में न्यूयार्क से अर्थशास्त्र और वाणिज्य में एक पाठ्यक्रम में दाखिला लेने के लिए उन्हें सरकारी सहायता मिली। उन्होंने एमए की डिग्री हासिल की। वे अगस्त, 1917 में भारत लौटे। कोलंबिया विश्वविद्यालय के दस्तावेजों में भी यही दर्ज है कि उन्होंने 1917 में विश्वविद्यालय छोड़ दिया। यह भी बताया गया है कि वे बड़ौदा रियासत के राजस्व विभाग में काम करते थे और उन्होंने बड़ौदा के गायकवाड़ शासक के व्यक्तिगत दूत बतौर भी काम किया था। जून 1914 में वे न्यूयार्क पहुंचे और उन्होंने डेटन (ओहायो) की यात्रा की। वे “अमरीका में म्युनिसिपल सरकार का अध्ययन कर रहे थे ताकि बड़ौदा रियासत के शहरों की सरकार का पुनर्गठन करने में महाराज की मदद कर सकें।”[10] महाराज सयाजीराव गायकवाड़ के पहलों का भारत पर गहरा और व्यापक असर पड़ा। मगर देश ने उसे अब तक मान्यता देना तो दूर पहचाना तक नहीं है।
लेख में जिन व्यक्तियों का हवाला दिया गया है उनमें से पांचवे और आखिरी हैं दलीप सिंह गिल, जो पटियाला (पंजाब) से थे और एक सिक्ख सरदार के लड़के थे। मगर अमरीका आने के बाद उन्होंने ‘लोकतंत्र की खातिर’ अपने नाम से सरदार की पदवी हटा दी थी। कोलंबिया विश्वविद्यालय के पूर्व विद्यार्थियों के रजिस्टर के अनुसार उन्होंने 1914 में विश्वविद्यालया से स्नातक की उपाधि हासिल की और 1916 में उन्हें स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग द्वारा सिविल इंजीनियरिंग में डिग्री प्रदान की गई।[11] शायद इंजीनियरिंग के उनके ज्ञान के चलते ही उन्होंने इस ज्ञापन, जो उद्योगों के बारे में शिक्षा से संबंधित थी, पर हस्ताक्षर किए थे। इस ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने के अलावा उन्होंने ‘जनरल फेडरेशन’ पत्रिका के लिए ‘भारत में महिलाओं की स्थिति’ विषय पर भाषण भी दिया था। इस भाषण में उन्होंने स्वीकार किया कि भारत की अधिकांश महिलाएं शिक्षा से महरूम हैं। उन्होंने गरीबी को इसका मुख्य कारण बताया और उत्तर व दक्षिण भारत की तुलना की। उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत में बहुत कम उम्र में लड़कों और लड़कियों की शादी कर दी जाती है और नतीजे में बहुत छोटी-छोटी लड़कियां मां बन जाती हैं। इसके विपरीत, उत्तर भारत में बच्चों की सगाई तो बहुत कम उम्र में हो जाती है परंतु वास्तविक विवाह और सहवास काफी बाद में होता है। “प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान वे जर्मनी और रूस में पर्यवेक्षक थे और जनरल ल्यूडेनडोर्फ से उनका निकट का परिचय था। युद्ध की समाप्ति के बाद उन्होंने अफगानिस्तान की सरकार की ओर से यूरोप और अमरीका का दौरा भी किया।”[12] इसी दौरे में 1925 में उन्होंने अपना वह भाषण दिया जो अब काफी प्रसिद्ध है। भाषण का विषय था ‘भारत की आजादी’ और इसमें उन्होंने चीन के स्वाधीनता संग्राम का समर्थन करने की अपील भी की थी।
इस तरह आंबेडकर सहित इस समूह के सभी सदस्य युवा, मुखर और उच्च शिक्षित थे। इन सबका उद्देश्य था भारत को अमरीका का व्यापारिक साझेदार बनवाना। इस लेख की शुरुआत में हम ब्यूरो ऑफ कामर्शियल इकोनोमिक्स पर बात कर चुके हैं और इसलिए अब हम ‘इंडियन सोसायटी फॉर द प्रमोशन और कॉमर्स’ के बारे में चंद बातें कर सकते हैं। दुखद यह कि मुझे अब तक इस संस्था के बारे में कोई जानकारी हासिल नहीं हो सकी है। लेकिन यह साफ है कि यह आंबेडकर[13] और कोलंबिया के अन्य ग्रेजुएट विद्यार्थियों का ‘हित समूह’ था। इसके दो सदस्यों का खर्च बड़ौदा के सयाजीराव महाराज उठा रहे थे। मेरी खोजबीन के अनुसार उस समय देश में दो ही प्रमुख व्यवसायिक संगठन थे। पहला था पुरुषोत्तम ठाकुरदास का इंडियन मर्चेंट्स चैंबर जिसकी स्थापना 1907 में हुई थी और दूसरा था 1853 में स्थापित बंगाल चैंबर ऑफ इंडस्ट्री। अगर आंबेडकर का समूह उनमें से किसी का भी प्रतिनिधित्व कर रहा होता तो स्वभाविकतः वे अपने संगठन का नाम प्रचारित करवाना पसंद करते। इसलिए हम इस संभावना को खारिज कर सकते हैं। कुल मिलाकर यह ज्ञापन इस समूह का स्वतंत्र प्रयास था।
शायद इस संगठन के बारे में और जानने के लिए अन्य अभिलेखागारों, विशेषकर ब्यूरो ऑफ कामर्शियल इकोनोमिक्स के अभिलेखागार, को और खंगालने की जरूरत है। लेकिन इस तथ्य के बावजूद कि ब्यूरो ने बिना शोर मचाए जनशिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी भूमिका निभाई थी, उससे संबंधित पुराने अभिलेख ढूंढना बड़ा मुश्किल काम है। डिजिटल माध्यमों से खोज से मैं यहीं तक पहुंच पाया हूं। चूंकि मैं ब्यूरो ऑफ कामर्शियल इकोनोमिक्स की बाद की गतिविधियों के बारे में कोई जानकारी हासिल नहीं कर पाया हूं और न ही वह कब बंद हुआ, इसके बारे में मुझे कोई जानकारी है इसलिए यह कहना बहुत मुश्किल है कि इस संस्था या ज्ञापन का अंततः हुआ क्या। सन् 1940 के दशक के अंत और 1950 के दशक में भी अखबारों में इस संस्था के बारे में थोड़ी-बहुत चर्चा होती रही। मगर यह निर्विवाद है कि 1923 तक, अर्थात इस ज्ञापन की तारीख से आठ साल के भीतर, ब्यूरो ऑफ कामर्शियल इकोनोमिक्स ने भारत में भी अपनी फिल्मों की रीलें उपलब्ध करवा दी थीं।[14] बाद में ब्यूरो ऑफ कामर्शियल इकोनोमिक्स दुनिया में फिल्मों का सबसे बड़े संग्रह का मालिक बन गया। उसने मानव की प्रकृति, मानव समाज और प्राकृतिक अजूबों पर नदियों में और बर्फ से ढंके साइबेरिया में रहने वाले लोगों को भी फिल्में दिखाईं, जो उस समय तक चित्र भी देखे नहीं थे।
बेविन योजना
डॉ. आंबेडकर अर्थशास्त्री थे और उन्होंने सर्वश्रेष्ठ अर्थशास्त्रियों से शिक्षा हासिल की थी। जाहिर है कि उन्हें यह अहसास था कि किसी भी देश और विशेषकर भारत जैसे देश के लिए औद्योगिकरण, व्यापार और वाणिज्य कितने महत्वपूर्ण हैं। उन्हें जनशिक्षण के लिए फिल्मों के महत्व का भी ज्ञान था। उन्हें यह भी पता था कि तकनीकी प्रशिक्षण में फिल्में कितनी उपयोगी हो सकती हैं। आंबेडकर ने श्रम मंत्री की हैसियत से पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जातियों के सदस्यों को ब्रिटेन में प्रशिक्षण हासिल करने का अवसर उपलब्ध करवाया। उस समय अर्नेस्ट बेविन ब्रिटिश सरकार में श्रम मंत्री थे और नवंबर 1940 में उन्होंने तत्कालीन भारत मंत्री (एमेरी) के साथ मिलकर एक योजना बनाई, जिसके अंतर्गत “कई सैकड़ा भारतीयों को उनके देश के कारखानों से इस देश (इंग्लैंड) में लाकर हमारे लोगों के घर में रखकर प्रशिक्षण दिया जाएगा। बाद में वे लोग अपने देश वापिस जाएंगे और तब तक उन्हें इस देश में ट्रेड यूनियनों और अन्य संस्थाओं की जानकारी हो चुकेगी … यह भारत के लोगों के लिए एक बड़ा मौका है और पहली बार असली समानता कायम करने की कोशिश भी है। इन लोगों को श्रम मंत्रालय की ओर से उतना ही वेतन दिया जाएगा जितना हमारे प्रशिक्षणार्थियों को दिया जाता है और मंत्रालय द्वारा भारत में उनकी पत्नियों को भी भरण-पोषण भत्ता दिया जाएगा। यह पूर्व और पश्चिम के बीच एक नए औद्योगिक संबंध की स्थापना की शुरुआत है।”[15]
पहला समूह, जिसमें 200 आवेदकों में से चुने गए 50 युवा शामिल थे, बंबई से फरवरी, 1941 में इंग्लैंड के लिए रवाना हुआ। इन्हें ‘बेविन बॉयज’ कहा जाता था। चयन के लिए हर प्रांत का कोटा निर्धारित किया गया था। योजना के अंतर्गत उन्हें इंग्लैंड में स्थानीय मजदूर परिवारों के साथ रहकर करीब 6 महीने तक प्रशिक्षण हासिल करना था। बॉम्बे टेक्सटाइल यूनियन के पी.एस. बाखले, जो आंबेडकर के सहयोगी थे, उस ट्रिब्यूनल के मुखिया थे जिसने बेविन बॉयज को इंग्लैंड भेजने का प्रबंध किया।[16] सन् 1945 में श्रम मंत्री के हैसियत से आंबेडकर ने बेविन बॉयज के रोज़गार की स्थिति पर केंद्रीय विधानमंडल में अनेक प्रश्नों के उत्तर दिए।[17] सन् 1945 के अप्रैल में शिमला में ट्रिब्यूनल को अपने संबोधन में आंबेडकर ने बेविन योजना की सराहना करते हुए कहा कि उससे भारत को भविष्य में लाभ होगा। मगर उन्होंने यह भी कहा कि, “अगर देश का औद्योगिक विकास उस पैमाने पर होना है, जिसकी कल्पना की जा रही है, तो हमें न केवल कुशल श्रमिकों की ज़रूरत पड़ेगी, बल्कि हमें क्षमतावान और योग्य तकनीशियनों के अलावा ऐसे लोगों की ज़रूरत भी पड़ेगी जो उद्योगों का प्रबंधन कर सकें और उन्हें दिशा दे सकें।”[18] कुल मिलाकर इस योजना के अंतर्गत करीब 900 भारतीय युवकों को इंग्लैंड में प्रशिक्षण पाने का मौका मिला। इस जानकारी को हासिल करने के लिए मैंने जब पुराने दस्तावेजों को खंगाला तब मुझे आंबेडकर द्वारा फरवरी, 1946 में तत्कालीन भारत मंत्री एमेरी को लिखा गया धन्यवाद ज्ञापन भी मिला, जिसे नीचे दिया गया है।

मुझे उम्मीद है कि इस तरह की ज्ञापन और पत्र बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय के भविष्य में प्रकाशित होने वाले खंडों में स्थान पाएंगे। अंत में मैं यही कहना चाहूंगा कि आंबेडकर के अथक प्रयासों और उच्चतम आदर्शों पर आधारित उनके कार्यों – जिनमें अब तक अज्ञात यह घटनाक्रम भी शामिल है – को भुलाया नहीं जाना चाहिए। भविष्य में प्रकाशित होने वाली उनकी जीवनियों के लेखकों को – अगर वे कुछ नया करना चाहते हैं तो – उनके जीवन के इस अध्याय को अपनी पुस्तकों में शामिल करना चाहिए। भले ही उनके बारे में हमें आज कितनी ही कम जानकारी क्यों न उपलब्ध हो।
संदर्भ :
[1] यह लेख जिस घटनाक्रम पर आधारित है, वह जून, 1915 में हुआ था। इसी महीने की पहली तारीख को आंबेडकर का नाम न्यूयार्क प्रांत की जनगणना में दर्ज किया गया था और उसके अगले दिन उन्हें अपनी स्नातकोत्तर उपाधि हासिल हुई थी (जिसकी खबर न्यूयार्क टाइम्स में 3 जून, 1915 को प्रकाशित हुई थी)।
[2] संविधान सभा में व्यापार एवं वाणिज्य पर हुई दिलचस्प चर्चा का विवरण इंडिया कानून की वेबसाइट पर यहां पढ़ा जा सकता है।
[3] ‘द टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ में प्रकाशित विभिन्न लेख। (‘कॉटेज इंडस्ट्रीज एंड कोऑपरेशन’ 14 जनवरी 1924, बम्बई के डीटी हाल में सोशल सर्विस लीग का कार्यक्रम; ‘द प्रेजेंट प्रॉब्लम ऑफ़ इंडियन करेंसी’, 28 फरवरी 1925, सैनहर्स्ट रोड, गिरगाम, बंबई में सर्वेन्ट्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी के हाल में; ‘पब्लिक मीटिंग्स ऑन इकनोमिक मैटर्स: रिपोर्ट ऑफ़ दि रॉयल कमीशन ऑन इंडियन करेंसी’, 19 अगस्त 1926, इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ द पोलिटिकल एंड सोशल साइंस, गिरगाम, बम्बई में, इत्यादि)
[4] ब्यूरो ऑफ़ कमर्शियल इकोनॉमिक्स: इंडस्ट्रियल इनफार्मेशन बाय द मीन्स ऑफ़ द सिनेमाटोग्राफ, 1914। इसे अर्काइव डॉट ओआरजी की वेबसाइट पर यहां देखा जा सकता है।
[5] डॉ. आंबेडकर के पास कई टाइपराइटर थे जिनमें से कुछ नागपुर में शांतिवन चिचोली में संरक्षित हैं। ये टाइपराइटर ‘रेमिंगटन टाइपराइटर्स’ कंपनी द्वारा निर्मित थे। सहयोगी कंपनियों में यह कंपनी भी शामिल थी।
[6] कोलंबिया यूनिवर्सिटी एलुमनाई रजिस्टर 1754-1931। इसका संकलन ‘द कमेटी ऑन जनरल केटलाग’ द्वारा किया गया है और यह ‘हाथी ट्रस्ट’ की वेबसाइट पर यहां उपलब्ध है। इस लेख में इस रजिस्टर में उपलब्ध जानकारी का उपयोग किया गया है।
[7] तत्समय के विभिन्न समाचारपत्र, जिनकी सूची बहुत लंबी है मगर इनमें से कुछ को गूगल न्यूज़ आर्काइव या लाइब्रेरी ऑफ़ कांग्रेस में देखा जा सकता है।
[8] ‘डॉ. आंबेडकर की विदेश यात्राओं से संबंधित अनदेखे दस्तावेज, जिनमें से कुछ आधारहीन दावों की पोल खोलते हैं’, फॉरवर्ड प्रेस
[9] ‘रिपोर्ट ऑन पब्लिक इंस्ट्रक्शन इन द बड़ोदा स्टेट फॉर द इयर 1916-1917’ (1919), जीआईपीई (पीडीएफ संस्करण), गोखले इंस्टिट्यूट ऑफ़ पॉलिटिक्स एंड इकोनॉमिक्स का डीएसपीएसीई, जिसे यहां देखा जा सकता है।
[10] दस्तावेजों के अनुसार यह इसलिए संभव हो सका क्योंकि अपनी भारत यात्रा के दौरान सिनसिनाटी (अमरीका) के एक ठेकेदार जे.एम. जिस्ट ने बड़ोदा के सयाजीराव गायकवाड़ से मुलाकात कर यह तुलनात्मक अध्ययन करवाने का अनुरोध किया था।
[11] कोलंबिया कॉलेज के स्कूल ऑफ़ माइंस के नाम का यह संस्थान आगे चलकर इंजीनियरिंग, केमिकल इत्यादि कई खण्डों में विभाजित हो गया। शायद उन्हें न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय से भी डिग्री मिली थी।
[12] ‘लेक्चर्ड अपऑन फ्रीडम ऑफ इंडिया’, द सटर काउंटी फार्मर, 21 अगस्त, 1925, पृष्ठ 2
[13] हस्ताक्षरकर्ताओं के नामों के क्रम के महत्व को न नकारते हुए मेरा यह मत है कि आंबेडकर यद्यपि उनमें से सबसे वरिष्ठ नहीं थे तथापि वे इस उपक्रम से नजदीकी तौर पर जुड़े हुए थे और शायद उसका नेतृत्व भी कर रहे थे।
[14] ‘पिक्चर्स विदाउट मनी एंड विदाउट प्राइस’, द सटन रजिस्टर (सटन, नब्रास्का), 31 मई, 1923, पृष्ठ 3
[15] द टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 25 नवंबर, 1940
[16] “… तीसरे, यूनियन को जो शिकायतें मिलीं थीं, उनसे संबंधित कानूनी बिंदुओं के संदर्भ में अमूल्य विधिक सलाह देने के लिए यह यूनियन डॉ बी.आर. आंबेडकर व सर्वश्री एस.सी. जोशी, पी.एस. बाखले व एच.ए. तालचेरकर के प्रति आभार व्यक्त करती है।” हिस्टोरिकल ओरिजिन ऑफ़ द साल्ट टैक्स (इसका पीडीऍफ़ संस्करण गोखले इंस्टिट्यूट ऑफ़ पॉलिटिक्स एंड इकोनॉमिक्स के डीएसपीएसीई पर यहां देखा जा सकता है।)
[17] बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय, खंड तीन, जिसे यहां देखा जा सकता है।
[18] द टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 21 अप्रैल 1945
(मूल अंग्रेजी से अनुवाद: अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)
