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दिल्ली और पटना में यूजीसी रेगुलेशन के समर्थन में कन्वेंशन, सांसद पी. विल्सन ने कहा– रेगुलेशन नहीं, एक्ट बने

अपने संबोधन में वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने यूजीसी रेगुलेशन-2026 पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगाए जाने के संबंध में कहा कि उन्हें पहले तो यह यकीन नहीं हुआ कि जिन्होंने एक साल पहले यूजीसी को नया रेगुलेशन लाने की बात कही, वे रेगुलेशन लागू किए जाने पर रोक कैसे लगा सकते हैं। पढ़ें, यह खबर

गत 25 फरवरी, 2026 का दिन एक मायने में बहुत खास रहा कि पटना और दिल्ली में दलित-बहुजन समाज के लोग जुटे और यूजीसी रेगुलेशन-2026 को लागू किए जाने की मांग को मजबूती दी। पटना में एक राज्यस्तरीय कन्वेंशन यूजीसी रेगुलेशन समता आंदोलन के तत्वावधान में आईएमए सभागार में किया गया। वहीं दिल्ली के कंस्टीट्यूशन क्लब के सभागार में राष्ट्रीय स्तरीय कन्वेंशन का आयोजन समता संघर्ष समिति के द्वारा किया गया।

दोनों कन्वेंशनों में यूजीसी रेगुलेशन-2026 के पक्ष में जन-समर्थन बढ़ाने की बात कही गई। दिल्ली में आयोजित कन्वेंशन को संबाेधित करते हुए डीएमके के सांसद पी. विल्सन ने कहा कि अब समय केवल रेगुलेशन बनाने का नहीं, बल्कि एक्ट बनाने का है। उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षण संस्थानों सहित सभी क्षेत्रों में पिछड़ों की हकमारी न हो, उनका उत्पीड़न न हो, इसके लिए एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तर्ज पर मजबूत कानून बनाने की आवश्यकता है।

बिहार में 19 मार्च को समता अधिकार रैली का आह्वान

वहीं, पटना में आयोजित राज्य स्तरीय कन्वेंशन में आगामी 19 मार्च को समता अधिकार रैली का आह्वान किया गया। इसके साथ ही 6 प्रस्ताव पारित किए गए। इनमें कहा गया कि शिक्षा संस्थानों में बढ़ते जातीय भेदभाव, उत्पीड़न और असमानता बेहद गंभीर है। हाल में जेएनयू की वाइस चांसलर द्वारा एक पॉडकास्ट में दलित उत्पीड़न का मजाक उड़ाने और यूजीसी गाइडलाइन को अनावश्यक व अतार्किक बताने जैसी टिप्पणियां निंदनीय है। इसी तरह दिल्ली विश्वविद्यालय में गाइडलाइन के समर्थन में आंदोलनरत छात्रों पर हमले और प्रशासन की मौजूदगी में अपमान की घटनाएं लोकतांत्रिक मूल्यों पर आघात हैं और यह भी बेहद निंदनीय हैं।

यूजीसी रेगुलेशन-2026 नोटिफिकेशन को संसद द्वारा कानून बनाया जाए तथा संस्थागत जातिवाद को दंडनीय अपराध घोषित किया जाए। इसके अलावा यह कि राष्ट्रीय समता आयोग का गठन हो जिसे संवैधानिक दर्जा और स्वतंत्र जांच शक्तियां हों। 

पटना में आयोजित इस कन्वेंशन में जाति जनगणना करवाने तथा नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को वापस लेने की मांग भी की गई। एक प्रस्ताव यह भी पारित किया गया कि बिहार में जातीय सर्वेक्षण के बाद 65 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था को नौवीं अनुसूची में शामिल किया जाए। इसके अलावा जजों की नियुक्ति में कॉलेजियम सिस्टम खत्म करके एससी-एसटी-ओबीसी की आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए तथा निजी क्षेत्रों में भी रिजर्वेशन को लागू किया जाए। 

अब विस्तार, प्रारंभ दिल्ली के कन्वेंशन से

दिल्ली में आयोजित कन्वेंशन में अपने संबोधन में अनिल चमड़िया ने कहा कि मेरे गांव के इलाके में जो कि पहाड़ की तलहटी में था, वहां एक स्कूल खोलने की बात हुई। यह आजादी के तुरंत बाद की बात है। जब शिक्षा विभाग के अधिकारी वहां पहुंचे तो स्थानीय सामंती जमींदार ने उन्हें अपने पास बुलाया और कहा कि जब यहां स्कूल खुलेगा और ये लोग पढ़-लिख जाएंगे तो फिर हमारे खेतों में काम कौन करेगा। फिर वह स्कूल नहीं खोली गई। उन्होंने यह भी कहा बिहार में जहां कहीं भी स्कूल खोले गए, वहां यदि आप गौर से देखेंगे तो आप पाएंगे कि गांव के दक्खिन टोले में नहीं, बल्कि उत्तर टोले के भी उत्तर में खोले गए। ऐसा इसलिए किया गया ताकि दलित और पिछड़े समाज के बच्चे उन स्कूलों में पढ़ने नहीं जा सकें। 

उन्होंने कहा कि आर्थिक सर्वेक्षण जैसी सरकारी रपटों को पढ़ने की परंपरा अब खत्म हो रही है। आवश्यकता है कि सरकारी दस्तावेजों को देखें और तथ्यों के साथ बातों को रखा जाए। आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट में इस बार केंद्र सरकार ने जहां एक ओर यह दिखाया है कि सरकारी विद्यालयों में नामांकन बढ़ा है, लेकिन दूसरा आंकड़ा यह भी है जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं एक्सक्लूजन भी बढ़ा है। उन्होंने इसका कारण समझाने के लिए एकलव्य के अंगुठा काटे जाने का प्रसंग का उपयोग किया और कहा कि आज भी हमारे बच्चों का अंगुठा दाखिले से लेकर एनएफएस किए जाने तक हर चरण पर काटा जा रहा है। उन्होंने कहा कि अंगुठा केवल शरीर का एक अंग भर नहीं है, यह ज्ञान और कौशल का प्रतीक है, जिससे हमारे लोगों को वंचित किया जा रहा है। इसके सांस्कृतिक और सामाजिक निहितार्थ को समझा जाना चाहिए। इस लिहाज से देखें तो यूजीसी रेगुलेशन-2026, जिसमें कई खामियां हैं, के बावजूद ऊंची जातियों का विरोध बताता है कि वे इतना-सा भी अधिकार नहीं देना चाहते। 

नई दिल्ली के कंस्टीट्यूशन क्लब सभागार में कन्वेंशन को संबोधित करते प्रो. शम्सुल इस्लाम व मंचासीन गणमान्य

दोमुंहा व्यवहार न करें सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाली पार्टियां

अनिल चमड़िया ने 2006 में सुखदेव थोराट कमेटी की अनुशंसाओं की चर्चा करते हुए कहा कि जब सुखदेव थोराट एम्स पहुंचे और जो उन्होंने पाया, उसके आधार पर अपनी रपट तैयार की। उनकी अनुशंसाओं को देखें तो यूजीसी रेगुलेशन-2026 में आंशिक तौर पर बातें जोड़ी गईं। और यह भी कि यह कोई नई बात नहीं है। 2019 में यूजीसी ने जारी एक नोटिफिकेशन में पिछड़ा वर्ग की बात कही थी। उसने कहा था कि उच्च शिक्षण संस्थानों में दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, महिलाओं और दिव्यांगों के हितों की रक्षा के लिए पहल किए जाएं। यही बात 2023 में भी दुहराई गई। इसलिए 2026 के रेगुलेशन में कोई नई बात नहीं कही गई है।

चमड़िया ने सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों की यह कहते हुए आलोचना की कि उनका दोमुंहा व्यवहार ठीक नहीं है। यदि वे इस पक्ष में हैं कि यूजीसी रेगुलेशन-2026 को लागू किया जाए ताकि उच्च शिक्षण संस्थानों में दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के विद्यार्थियों को संरक्षण मिल सके तो राजनीतिक दलों को यह बात सड़क से लेकर सदन तक उठानी होगी।

ओबीसी मुसलमान का प्रमाण पत्र हासिल करना मुश्किल

अनिल चमड़िया से पहले अपने संबोधन प्रो. शम्सुल इस्लाम ने यूजीसी रेगुलेशन-2026 के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने एक महत्त्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि जब वे दिल्ली आए थे तब गोस्वामी जाति जो कि ओबीसी श्रेणी में शामिल है, का सर्टिफिकेट लेकर कई ब्राह्मणाें ने नौकरियां हासिल की। उन्होंने कहा कि आज के माहौल में किसी भी सवर्ण के लिए ईडब्ल्यूएस या अन्य तरह के प्रमाण पत्र हासिल करना सहज है लेकिन यदि कोई ओबीसी मुसलमान ओबीसी का प्रमाण पत्र चाहे तो उसके लिए किसी राजपत्रित अधिकारी का हस्ताक्षर आवश्यक होता है, जो उनके लिए असंभव-सा है।

राजनीतिक पार्टियां इलेक्शन मशीन

राजद सांसद प्रो. मनोज झा ने विस्तार से बताया कि यूजीसी रेगुलेशन को क्यों लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की इस टिप्पणी का भी विरोध किया कि क्या हम अतीत की ओर लौट रहे हैं। प्रो. झा ने कहा कि आज के दौर में जिस तरह की हुकूमत देश में है, वह भारतीय समाज को अतीत की ओर ले जाने की कोशिश है। उनके लिए संविधान से अधिक महत्वपूर्ण मनुस्मृति है। प्रो. झा ने फिर अपना उदाहरण देते हुए कहा कि उन्हें किस तरह से विशेषाधिकार प्राप्त हुए।

अपने संबोधन के क्रम में ही प्रो. झा ने अनिल चमड़िया की टिप्पणी का जवाब दिया कि राजनीतिक पार्टियां इलेक्शन मशीन बन गई हैं। कई बार ऐसा होता है कि राजनीतिक पार्टियां इस बात का इंतजार करती हैं कि किसी मुद्दे पर मोमेंटम किस तरफ बन रहा है।

सुप्रीम कोर्ट को कैसे बताऊं कि जातिवाद अब भी जारी है

अपने संबोधन में वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने यूजीसी रेगुलेशन-2026 पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगाए जाने के संबंध में कहा कि उन्हें पहले तो यह यकीन नहीं हुआ कि जिन्होंने एक साल पहले यूजीसी को नया रेगुलेशन लाने की बात कही, वे रेगुलेशन लागू किए जाने पर रोक कैसे लगा सकते हैं। इंदिरा जयसिंह ने कहा कि “मुझे तो समझ में नहीं आता कि उनको कैसे बताऊं कि जातिवाद खत्म नहीं हुआ है, यह अब भी जारी है।” इस संबंध में उन्होंने अपना एक अनुभव साझा करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के बार एसोसिएशन में महिला अधिवक्ताओं के लिए पृथक खंड में पानी पीने के लिए डिस्पेंसर की व्यवस्था है। एक दिन अस्वस्थ रहने के कारण उन्होंने जब वहां तैनात एक महिला कर्मी से एक गिलास पानी देने के लिए कहा तो उस महिला कर्मी ने आश्चर्य करते हुए कहा कि आप मेरे हाथ से छुआ पानी पिएंगी?

आरएसएस-भाजपा के बीच तकरार

वहीं अपने संबोधन में वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने कहा कि उन्हें मिली एक जानकारी के अनुसार भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को यूजीसी रेगुलेशन-2026 से कोई परेशानी नहीं थी। लेकिन जब यह आरएसएस के नेतृत्व के पास पहुंचा तो उन्हें लगा कि इसके व्यापक परिणाम सामने आएंगे। उर्मिलेश ने यह दावा किया एक बैठक यहीं दिल्ली में हुई और फिर यूजीसी रेगुलेशन के विरोध की योजना बनाई गई। 

कन्वेंशन को पटना हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश इकबाल अंसारी, दिल्ली सरकार में पूर्व मंत्री व कांग्रेस के दलित प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र पाल गौतम, सुभाषिणी यादव, जेएनयू के प्रो. गंगा सहाय मीणा, प्रो. राजेश पासवान, राजद की प्रवक्ता प्रियंका व कंचन यादव के अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. रतनलाल, प्रो. संदीप यादव, प्रो. सूरज मंडल, प्रो. कंचन व प्रशांत कनौजिया सहित कई गणमान्यों ने संबोधित किया। मंच का संचालन अधिवक्ता मयंक यादव ने किया।

पटना में सामाजिक न्याय की लड़ाई तेज करने का आह्वान

उधर पटना में आयोजित राज्य स्तरीय कन्वेंशन में डॉ. लक्ष्मण यादव, डीयू में यूजीसी आंदोलन की चर्चित नेत्री अंजली, पूर्व विधायक अमरजीत कुशवाहा, पूर्व विधायक व इंकलाबी नौजवान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अजीत कुशवाहा, इंकलाबी नौजवान सभा के राज्य सचिव शिवप्रकाश रंजन, जेएनयूएसयू के पूर्व अध्यक्ष धनंजय, मनजीत साहू, सुबोध यादव, विकास आजाद, एसएफआई की राज्य अध्यक्ष कांति कुमारी, निशांत यादव, कुमुद पटेल, आजाद शत्रु, विश्वा यादव, विजय पासवान, पृथ्वीराज, मुख्तार, विकास आजाद, सोनम राव, सूरज यादव आदि कई नेताओं ने संबोधित किया। कन्वेंशन का संचालन सामाजिक न्याय आंदोलन (बिहार) के रिंकु यादव ने किया।

पटना के आईएमए सभागार में कन्वेंशन में मौजूद लोग

जातिगत विशेषाधिकार के खिलाफ समता की लड़ाई

कन्वेंशन में वक्ताओं ने यूजीसी गाइडलाइन पर सुप्रीम कोर्ट की रोक को लेकर केंद्र सरकार पर सामाजिक न्याय को कमजोर करने का आरोप लगाया और व्यापक आंदोलन का आह्वान किया। मुख्य वक्ता डॉ. लक्ष्मण यादव ने कहा कि विपरीत परिस्थितियों में भी न्याय की लड़ाई जारी रहेगी। उन्होंने कहा कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के दबाव में ही गाइडलाइन लेकर आई थी, लेकिन बेहद कमजोर गाइडलाइन लेकर आई, गाइडलाइन जातिगत भेदभाव खत्म करने के लिए लाया जाना था, लेकिन उसमें अस्पष्ट प्रावधान रखे गए, जिसके आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई। हमारी लड़ाई किसी जाति के खिलाफ नहीं बल्कि जातिगत विशेषाधिकार के खिलाफ समता की लड़ाई है।

कोई और रोहित, कोई और पायल इस व्यवस्था का शिकार न बने

दिल्ली विश्वविद्याल की चर्चित छात्रा नेत्री अंजली ने कहा कि सामाजिक न्याय के सवाल पर एक वर्ग की छटपटाहट को उसके ऐतिहासिक संदर्भ में समझना होगा। उन्होंने कहा कि सदियों से श्रम और शोषण का बोझ एक समुदाय पर डाला गया, जबकि लाभ दूसरे उठाते रहे। उन्होंने कहा कि भूमिहीन, दलित और वंचित तबकों की स्थिति आज भी गंभीर है। जेएनयू की घटनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि दबे-कुचले समुदायों को ही उल्टा कटघरे में खड़ा किया जाता है। उन्होंने आह्वान किया कि आंदोलन को और तेज कीजिए ताकि कोई और रोहित, कोई और पायल इस व्यवस्था का शिकार न बने।

मनजीत साहू ने कहा कि बिहार में समता आंदोलन परवान चढ़ रहा है और 19 मार्च के कार्यक्रम को ऐतिहासिक बनाने की जिम्मेदारी हम सबके कंधो पर है। पूर्व विधायक अजीत कुशवाहा ने निजी क्षेत्र और न्यायपालिका में आरक्षण लागू करने, 65 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करने और ईडब्ल्यूएस प्रावधान खत्म करने की मांग की। इसके पूर्व जेएनयूएसयू के पूर्व अध्यक्ष धनंजय ने कन्वेंशन में प्रस्ताव को प्रस्तुत किया और बिहार में यूजीसी के समर्थन में चले आंदोलनों की एक रिपोर्ट रखी।

सभा का संचालन करते हुए रिंकू यादव ने कहा कि लड़ाई सदियों से जारी समाज के खास हिस्से के विशेषाधिकार को तोड़ने की है। लड़ाई जीवन के हर क्षेत्र में हिस्सेदारी और बराबरी की है और इस दौर में बिहार को सामाजिक न्याय की अग्रिम चौकी के रूप में फिर खड़ा होना होगा।

(इनपुट : पटना से कुमार दिव्यम, संपादन : अनिल)

लेखक के बारे में

नवल किशोर कुमार

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस के संपादक (हिन्दी) हैं।

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