[दलित-बहुजनों के लिए अप्रैल माह विशेष मायने रखता है। इस महीने की 11 तारीख को जोतीराव फुले और 14 तारीख को डॉ. आंबेडकर की जयंती पूरे देश में लोग धूमधाम से मनाते हैं। जोतीराव फुले का जन्म 11, अप्रैल 1827 को हुआ था और इस लिहाज से यह वर्ष उनके जन्म के दो सौवीं जयंती का आगाज है। फारवर्ड प्रेस इस अवसर पर प्रस्तुत कर रहा है जोतीराव फुले व उनके विचारों पर आधारित आलेखों की शृंखला। आज पढ़ें डॉ. राजेंद्र मुंढे का यह आलेख]
सामाजिक क्रांति के अग्रदूत महात्मा जोतीराव फुले का जीवन और कार्य भारतीय समाज में समानता, न्याय और मानवीय गरिमा की पुनर्स्थापना का विराट प्रयत्न है। उन्होंने केवल विचार ही नहीं दिए, बल्कि उन विचारों को व्यवहार में उतारकर एक सामाजिक आंदोलन खड़ा किया। स्त्री-शिक्षा का आरंभ, शूद्र-अतिशूद्रों के लिए विद्यालयों की स्थापना, विधवा-सेवा, बालहत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना, तथा सत्यशोधक समाज के माध्यम से धार्मिक-सामाजिक वर्चस्व को चुनौती – ये सब उनके कार्यक्षेत्र के जीवंत आयाम हैं। उनकी वैचारिकी का केंद्र ‘मानव-मुक्ति’ है, जिसमें जाति, लिंग और धर्म के आधार पर होने वाले हर प्रकार के भेदभाव का निषेध है।
फुले के चिंतन का दार्शनिक उत्कर्ष उनकी कृति ‘सार्वजनिक सत्यधर्म’ में दिखाई देता है। यहां वे एक ऐसे धर्म की अवधारणा प्रस्तुत करते हैं, जो किसी शास्त्र, पुरोहित या जाति पर आधारित नहीं, बल्कि सत्य, नैतिकता और सार्वभौमिक मानवता पर आधारित है। यह ‘सत्यधर्म’ मूलतः एक नैतिक-सामाजिक अनुशासन है, जिसमें मनुष्य-मनुष्य के बीच समानता और बंधुत्व सर्वोपरि है। इस प्रकार फुले का चिंतन सामाजिक सुधार से आगे बढ़कर एक वैश्विक मानवीय दर्शन का रूप ले लेता है।
फुले की साहित्यिक दृष्टि उनके वैचारिक संघर्ष का ही विस्तार है। उन्होंने साहित्य को केवल सौंदर्यबोध का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे सामाजिक परिवर्तन का औजार बनाया। उनकी रचनाओं में विविध साहित्य-विधाओं का प्रयोग मिलता है। मसलन, नाटक, पवाड़ा (वीरगाथात्मक काव्य), गद्य-निबंध, तथा अखंडात्मक काव्य। सन् 1855 में रचित ‘तृतीय रत्न’ मराठी का पहला आधुनिक सामाजिक नाटक माना जाता है। इसमें अंधश्रद्धा, पुरोहितवाद और स्त्री-अशिक्षा के प्रश्नों को नाटकीय रूप में प्रस्तुत किया गया है।
इसी प्रकार ‘पवाडा : छत्रपती शिवाजीराजे भोसले यांचा’ में छत्रपति शिवाजी महाराज को बहुजन दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है, जो पारंपरिक इतिहास-लेखन से भिन्न है। ‘गुलामगिरी’ और ‘शेतकऱ्याचा असूड’ जैसे ग्रंथों में गद्य और तर्क का संयोजन है, जिसमें सामाजिक और आर्थिक शोषण का विश्लेषण मिलता है। इस प्रकार फुले का साहित्य विधागत विविधता के साथ एक स्पष्ट उद्देश्य – सामाजिक जागृति – को साधता है।
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इसी संदर्भ में उनका काव्य-प्रयोग विशेष रूप से उल्लेखनीय है। संत तुकाराम के अभंग काव्य की परंपरा से प्रेरित होकर फुले ने ‘अखंड’ नामक आधुनिक मराठी काव्यरूप की रचना की। यह काव्यरूप सतत प्रवाह, विचार की निरंतरता और सामाजिक संदेश की तीव्रता को अभिव्यक्त करता है। अभंग की भक्ति-धारा को उन्होंने सामाजिक चेतना की धारा में रूपांतरित किया। इस प्रकार ‘अखंड’ केवल काव्य-विधा नहीं, बल्कि वैचारिक हस्तक्षेप है, जो धर्म और समाज की रूढ़ धारणाओं को चुनौती देता है।

फिर भी यह एक विडंबना है कि इतने व्यापक और मौलिक साहित्यिक योगदान के बावजूद फुले को मराठी साहित्य के मुख्यधारा के आलोचकों ने लंबे समय तक ‘साहित्यकार’ के रूप में पूर्ण मान्यता नहीं दी। इसके पीछे केवल साहित्यिक कारण नहीं, बल्कि गहरे सामाजिक-ऐतिहासिक कारण निहित हैं। पहला कारण जातिगत पूर्वाग्रह है। उस समय का साहित्यिक विमर्श मुख्यतः उच्चवर्णीय वर्ग के नियंत्रण में था, जो साहित्य को एक विशेष सांस्कृतिक और भाषिक मानक से परिभाषित करता था। फुले का साहित्य इस मानक को तोड़ता था। उनकी भाषा सीधी, प्रहारात्मक और लोकजीवन से जुड़ी हुई थी। वे अलंकारिकता या शास्त्रीयता की अपेक्षा सत्य और तर्क को प्राथमिकता देते थे। इस कारण उनके लेखन को ‘साहित्यिक’ कम और ‘आंदोलनात्मक’ अधिक माना गया।
दूसरा कारण ‘शूद्र भाव’ से जुड़ा हुआ है। फुले स्वयं शूद्र समुदाय से थे और उन्होंने शूद्र-अतिशूद्रों के पक्ष में आवाज उठाई। उनके लेखन में जो आक्रोश और प्रतिरोध दिखाई देता है, वह उस समय के सवर्ण आलोचकों के लिए असुविधाजनक था। परिणामस्वरूप, उनके साहित्य को हाशिए पर रखा गया या उसकी उपेक्षा की गई। तीसरा कारण यह भी है कि फुले ने साहित्य की पारंपरिक अवधारणा को ही चुनौती दी। उनके लिए साहित्य केवल सौंदर्य या रस का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का माध्यम था। यह दृष्टिकोण उस समय की प्रचलित ‘कलावादी’ धारणाओं से भिन्न था। इसलिए उनके साहित्य का मूल्यांकन भी उन्हीं सीमित मानकों से किया गया, जिनमें उनके योगदान का पूरा आकलन संभव नहीं था।
यदि हम इस प्रश्न का गहराई से विश्लेषण करें, तो स्पष्ट होता है कि फुले की उपेक्षा वस्तुतः साहित्यिक नहीं, बल्कि सामाजिक और वैचारिक असहमति का परिणाम थी। आज जब साहित्य की अवधारणा व्यापक हुई है और उसमें हाशिए के स्वरों को महत्व दिया जा रहा है, तब फुले का साहित्य नए अर्थों में पुनः मूल्यांकित हो रहा है।
वास्तविकता यह है कि फुले का समग्र वाङ्मय मराठी साहित्य में एक अद्वितीय स्थान रखता है। यह ‘अक्षर साहित्य’ है – ऐसा साहित्य जो समय की सीमाओं से परे जाकर मानवता के मूल प्रश्नों को संबोधित करता है। इसमें बहुजन समाज के संघर्ष, पीड़ा, स्वप्न और प्रतिरोध के अनेक स्तर उजागर होते हैं। उनका लेखन भारतीय शोषित समूहों की आवाज को न केवल स्वर देता है, बल्कि उसे वैचारिक आधार भी प्रदान करता है।
इस प्रकार, महात्मा जोतीराव फुले की वैचारिकी और साहित्य एक-दूसरे के पूरक हैं। उनका साहित्य उनके विचारों का जीवंत रूप है और उनकी वैचारिकी उनके साहित्य की आत्मा। उन्हें केवल एक समाज सुधारक या केवल एक साहित्यकार के रूप में देखना उनके व्यक्तित्व को सीमित करना होगा। वे एक ऐसे चिंतक हैं, जिनकी लेखनी ने समाज को बदलने की दिशा दी और जिनका साहित्य आज भी सामाजिक न्याय की राह को प्रकाशित करता है।
(संपादन : नवल/अनिल)