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फुलेवाद के मूलभूत सिद्धांत एवं उनकी प्रासंगिकता (अंतिम भाग)

तात्यासाहेब ने अपने भाषण में और लेखन में हिंदू शब्द का ज्यादा इस्तेमाल नही किया। वे खुलकर जाति का नाम लेकर ही विश्लेषण करते हैं। उन्हें प्रबोधन के स्तर पर इस देश में जातीय ध्रुवीकरण चाहिए था, क्योंकि धार्मिक ध्रुवीकरण से ब्राह्मणी व्यवस्था मजबूत होती है, यह उन्होंने अच्छी तरह जान लिया था। पढ़ें, प्रो. श्रावण देवरे के विस्तृत आलेख का अंतिम भाग

[दलितबहुजनों के लिए अप्रैल माह विशेष मायने रखता है। इस महीने की 11 तारीख को जोतीराव फुले और 14 तारीख को डॉ. आंबेडकर की जयंती पूरे देश में लोग धूमधाम से मनाते हैं। जोतीराव फुले का जन्म 11, अप्रैल 1827 को हुआ था और इस लिहाज से यह वर्ष उनके जन्म के दो सौवीं जयंती का आगाज है। फारवर्ड प्रेस इस अवसर पर प्रस्तुत कर रहा है जोतीराव फुले उनके विचारों पर आधारित आलेखों की शृंखला। आज पढ़ें महाराष्ट्र के सामाजिक न्याय के चिंतक सत्यशोधक प्रो. श्रावण देवरे के आलेख का अंतिम भाग]

पहले भाग से आगे

जोतीराव फुले और डॉ. आंबेडकर ने जितना प्रत्यक्ष मैदानी संघर्ष किया उससे कई गुना उन्होंने लिखने का काम किया। सांस्कृतिक संघर्ष इतिहास के पन्नों पर अधिक लड़ा जाता है, क्योंकि वर्ण-जाति अंतक संघर्ष का दूसरा नाम है– सांस्कृतिक युद्ध। इस युद्ध के लिए नई पीढ़ी को तैयार करना है तो उसके लिए स्कूलों-कालेजों में वैसा संस्कार देने वाली शिक्षा भी मिलनी चाहिए। इसके लिए फुले-आंबेडकर द्वारा लिखे ग्रंथों को स्कूलों, कालेजों के पाठ्यक्रमों में शामिल किया जाना चाहिए और पढ़ाया जाना चाहिए। यह काम अंग्रेजों के समय में ब्राह्मणों के भय के कारण नहीं हो सका और स्वतंत्रता मिलने के बाद ब्राह्मणों का ही राज्य होने के कारण ऐसा हो ही नहीं सकता। ऐसी परिस्थिति में हमने 1993-94 में ‘फुले-आंबेडकर तत्वज्ञान विद्यापीठ’ स्थापित करके यह कार्य शुरू किया। आजतक 29 वर्षों में इस विद्यापीठ के द्वारा होने वाली परीक्षाओं में पाठ्यक्रम के रूप में फुले-आंबेडकर के सभी ग्रंथों को लिया गया है। लेकिन इस विद्यापीठ को प्रगतिशील आंदोलन का सहयोग आजतक नहीं प्राप्त हो सका है।

सांस्कृतिक युद्ध का सिद्धांत फुलेवाद का केंद्रीय तत्व है। ‘गुलामगिरी’ ग्रंथ लिखकर तात्यासाहेब ने सांस्कृतिक युद्ध का शंखनाद किया। बलीराजा उत्सव, नवरात्र उत्सव व शिव जयंती उत्सव इस प्रकार के कार्यक्रम देकर तात्यासाहेब ने ब्राह्मणी सांस्कृतिक प्रतिक्रांति को चुनौती दी।

तात्यासाहेब फुले द्वारा छेड़े गए इस सांस्कृतिक युद्ध का ब्राह्मणी छावनी ने प्रत्युत्तर देकर सफलतापूर्वक मात दिया। बलिराजा के विरोध में गणपति खड़ा किया गया व ‘कुलवाड़ी कुलभूषण शिवाजी’ के विरोध में ‘गो ब्राह्मण प्रतिपालक शिवाजी’ खड़ा किया गया। इस सांस्कृतिक युद्ध के अगले सोपान पर बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने ‘रिडल्स इन हिंदूइज्म’ लिखकर आगे बढ़ाया।

तात्यासाहेब ने स्त्री-पुरुष विषय का गहन अध्ययन करके वैज्ञानिक विश्लेषण किया है। परंतु आजकल फुलेवाद का गंभीर अभ्यास करनेवाले विद्वान भी उस सिद्धांत का आकलन नहीं कर पा रहे हैं। इससे यह भी सिद्ध होता है कि तात्यासाहेब अपने समय से भी कितना आगे देख रहे थे। अक्सर सभी प्रगतिशील तत्वज्ञानी, विचारक और अभ्यासक स्त्री-पुरुष समानता की बात करते हैं। परंतु एकमेव तात्यासाहेब लैंगिक समानता के मुद्दे को नकारते हैं और नया सिद्धांत प्रस्तुत करते हैं–

“जोतीराव गोविंदराव  फुले – उनमें से सभी प्राणियों में मानव प्राणी श्रेष्ठ है और उनमें स्त्री और पुरुष में इस प्रकार का भेद है।”

“जोतीराव उ. – इन दोनों में ज्यादा श्रेष्ठ स्त्री है।”[1]

विज्ञान भी इसी क्रांतिकारी सिद्धांत की पुष्टि करता है। स्त्री व पुरुष हर प्रकार के कार्य आपस बांट सकते हैं। आपस में काम की अदला-बदली कर सकते हैं, किंतु प्रसूति वेदना ऐसी है कि पुरुष कितना भी प्रयास करें फिर भी वह उसमें हिस्सेदार नहीं हो सकता। वह मरणातंक वेदना स्त्री को ही सहन करनी पड़ती है, इसलिए स्त्री श्रेष्ठ है! आगे के प्रश्नों का उत्तर देते हुए तात्यासाहेब अनेक सबूत प्रस्तुत करते हुए सिद्ध करते हैं कि स्त्री और पुरुष दोनों में स्त्री श्रेष्ठ है। अपने गुरु के इसी क्रांतिकारी सिद्धांत का विकास करते हुए शिष्य बाबासाहेब आंबेडकर ने ‘हिंदू कोड बिल’ तैयार किया।

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अंतानियो ग्राम्सी नामक तत्वज्ञानी बुद्धिजीवी वर्ग के लिए बहुत कुछ कहते हैं। मसलन, पूंजीपति वर्ग के वेतन पर पलने वाले बुद्धिजीवी वर्ग अपने मालिक की पूंजी का विकास करने के लिए अपनी बुद्धि का उपयोग करता है। श्रमिक वर्ग को भी क्रांति करने के लिए बुद्धिजीवी वर्ग की आवश्यकता होती है। शूद्रातिशूद्रों में बुद्धिजीवी वर्ग के तैयार होने का सिद्धांत तात्यासाहेब महात्मा जोतीराव फुले प्रतिपादित करते हैं। वे स्पष्ट रूप से कहते हैं–

“…बलि स्थान के संपूर्ण शूद्रातिशूद्रों सहित भील, कोली, वगैरह सभी लोग विद्वान होकर विचार करने लायक हुए बिना और उन सभी लोगों को एकमत किए बिना राष्ट्र बन ही नहीं सकता।”[2]

स्त्रियों व शूद्रातिशूद्रों की शिक्षा के लिए स्कूल, इन स्कूलों में जाति अंतक शिक्षण, शूद्र जाति के शिक्षक, सरकारी विभागों में शूद्रों के लिए आरक्षण, स्त्री प्रधान्य आदि के लिए वे अत्यंत आग्रही थे। संपूर्ण जीवन ही उन्होंने इसके लिए संघर्ष किया। उसके पीछे उनका उद्देश्य यह था कि शूद्रातिशूद्रों की प्रत्येक जाति से बुद्धिजीवी वर्ग तैयार होना चाहिए। जाति अंतक शिक्षण लेकर तैयार हुआ यही बुद्धिजीवी वर्ग जाति अंतक क्रांति का नेतृत्व करेगा एवं जातिविहीन समतावादी एकमय देश का निर्माण करेगा, इसका उन्हें पूरा विश्वास था।

तात्यासाहेब महात्मा जोतीराव फुले द्वारा प्रतिपादित आरक्षण का सिद्धांत क्रांतिकारी है, क्योंकि वह आक्रामक था। अभी आरक्षण का जो सिद्धांत संविधान के माध्यम से अमल में लाया जा रहा है वह बचावात्मक है। तात्यासाहेब का आरक्षण का सिद्धांत बचावात्मक न होकर आक्रामक कैसे है, इसे यहां देखें–

“…भट ब्राह्मणों का संख्यानुपात कर्मचारियों की ज्यादा नियुक्ति होने के कारण… भट ब्राह्मणों को अनंत फायदे होते हैं।”

“इसलिए शूद्र किसानों के बच्चे सरकारी पदों पर काम करने लायक होने तक ब्राह्मणों की उनकी संख्यानुपात से ज्यादा नियुक्ति न की जाय। बाकी बचे हुए सरकारी पद मुसलमान अथवा यूरोपियन लोगों को दिए बिना वे (ब्राह्मण) शूद्र किसानों की विद्या के आड़े आना नहीं छोड़ेंगे।”[3]

“भट ब्राह्मणों के दासत्व से मुक्त होने के लिए क्या उपाय हैं?” धोंडिबा द्वारा यह प्रश्न पूछने पर तात्यासाहेब कहते हैं–

“इसका एक ही उपाय है। समाज में भटों की संख्या को देखते हुए सभी विभागों में उनका उचित प्रतिनिधित्व हो, इसमें कोई समस्या नहीं है। मैं यह तो नहीं कहता कि भटों की नियुक्ति ही नहीं होनी चाहिए। मेरा तो बस इतना ही कहना है कि अन्य जातियों के अफसरों की भी नियुक्ति होनी चाहिए और अगर अन्य जातियों में पर्याप्त अफसर नहीं मिलें तो उन जगहों को केवल यूरोपीय अफसरों से भरना चाहिए। ऐसा करने से सभी ब्राह्मण अफसर सरकार का तथा शूद्रों का इतना नुकसान नहीं कर पाएंगे।”[4]

तात्यासाहेब के उपरोक्त दो प्रतिपादनों से अनेक क्रांतिकारी मुद्दे आगे आते हैं, जो आज भी अमल में लाए जाएं तो परिवर्तनवादी आंदोलन को सही अर्थों में क्रांतिकारी मोड़ मिल सकता है। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण पहला मुद्दा आता है, वह जाति आधारित जनगणना का है। इस मुद्दे ने पिछले 40 वर्षों में अधिक जोर पकड़ा है।

उपरोक्त में से दूसरा उद्धरण ‘गुलामगिरी’ ग्रंथ से है। तात्यासाहेब ने यह ग्रंथ 1873 में लिखा और अंग्रेजों ने जाति आधारित जनगणना 1881 से शुरू किया। इससे स्पष्ट होता है कि तात्यासाहेब के कहने पर अंग्रेजों ने जाति आधारित जनगणना शुरू की। ब्रिटिश शासक यूरोपियन पुनर्जागरण आंदोलन के वारिस थे और वे पूंजीवादी लोकशाही क्रांति के समर्थक थे। इसलिए समाज सुधार, समाज सुधारकों एवं समाज क्रांतिकारियों को देखने का उनका नजरिया उदारतमवादी व लोकशाहीवादी था। राजा राममोहन राय जैसे समाज सुधारक व तात्यासाहेब महात्मा जोतीराव फुले जैसे समाज क्रांतिकारी क्या लिखते हैं, क्या बोलते हैं, यह सब अंग्रेज गंभीरतापूर्वक देखते थे और उसी के अनुसार क्रियान्वयन भी करते थे। राजा राममोहन राय ने सती प्रथा बंद करने की अपील की और ब्रिटिश सरकार ने तुरंत सती प्रथा बंदी का कानून ही बना दिया। तात्यासाहेब जोतीराव फुले ने जाति आधारित जनगणना की बात की और ब्रिटिश शासकों ने उसका क्रियान्वयन शुरू कर दिया। उदारतमवादी ब्रिटिशों ने जाति आधारित जनगणना शुरू किया और स्वतंत्रता के बाद सत्ता में आते ही जाति-व्यवस्था समर्थक सामंतवादी ब्राह्मणों ने जाति-आधारित जनगणना बंद कर दिया। इसी पर जाति के विनाश के संदर्भ में जाति आधारित जनगणना का क्रांतिकारी महत्व ध्यान में रखा जाना चाहिए। जाति अंतक दृष्टि से क्रांतिकारक जाति आधारित जनगणना का मुद्दा सर्वप्रथम तात्यासाहेब महात्मा जोतीराव फुले ने रखा। इस पर उनकी तत्वज्ञानी के रूप में दूरदर्शिता को समझने की जरूरत है। जाति आधारित जनगणना करने के बाद उसमें से ब्राह्मण जाति की जनसंख्या निकालकर उनकी लोकसंख्या के अनुपात में ब्राह्मणों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देना चाहिए, ऐसा स्पष्ट रूप से तात्या साहेब कहते हैं। ब्राह्मणों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण देने का यह सिद्धांत वास्तव में क्रांतिकारक है।

फीचर इमेज : जोतीराव फुले (11 अप्रैल, 1827 – 28 नवंबर, 1890)

यदि सर्वप्रथम ब्राह्मणों को आरक्षण दिया गया होता तो ब्राह्मण आरक्षण के सवाल पर दलित बनाम सवर्ण का ध्रुवीकरण करने में सफल नहीं हो पाए होते और देश में जो असंख्य जातीय दंगे हुए वह हुए ही नहीं होते। ब्राह्मणों को सर्वप्रथम आरक्षण देने के कारण भारतीय समाज का ध्रुवीकरण ब्राह्मण विरुद्ध ब्राह्मणेत्तर हुआ होता और जाति के विनाश के लिए यह ध्रुवीकरण क्रांतिकारक साबित होता। ब्राह्मण व ब्राह्मणेतर ध्रुवीकरण के कारण ब्राह्मणों का ब्राह्मणेतर समाज पर सांस्कृतिक एवं धार्मिक प्रभाव कम हुआ होता एवं ब्राह्मणेतरों का अब्राह्मणीकरण करना आसान हुआ होता। इसलिए जाति के विनाश की दृष्टि से ‘ब्राह्मणों को सर्वप्रथम आरक्षण’ तात्या साहेब का यह सिद्धांत क्रांतिकारी सिद्ध होता है।

एक क्रांतिकारी तत्वज्ञानी के रूप में तात्यासाहेब की दूरदर्शिता इससे ध्यान में आती है। उनके उपरोक्त उद्धरण से और एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा सामने आता है। शूद्रातिशूद्र जातियों को भी उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण देना चाहिए, ऐसा तात्यासाहेब का विचार है। लेकिन उस काल में शूद्रातिशूद्र जातियों में शिक्षा का स्तर कम होने के कारण जनसंख्या के अनुपात में शूद्रातिशूद्र जातियों से लायक उम्मीदवार नहीं मिल पाएंगे, इसकी पूरी जानकारी तात्यासाहेब को थी। इसीलिए वे स्पष्ट कहते हैं कि शूद्रातिशूद्रों में से लायक उम्मीदवार मिलने तक उनके हिस्से के सरकारी पदों पर मुसलमानों अथवा अंग्रेजों को नियुक्त करें, परंतु वे जगह ब्राह्मणों को कतई न दें। ऐसा कहने के पीछे तात्यासाहेब का क्या उद्देश्य था? नोकरशाही का संपूर्ण रूप से अब्राह्मणीकरण करना यही मुख्य उद्देश्य था।

ब्रिटिश भारत व स्वतंत्र भारत की नौकरशाही में ब्राह्मणों का अनुपात 90 प्रतिशत से भी अधिक रहा है ऐसा मंडल आयोग की रिपोर्ट (1980) कहती है। ब्राह्मणीकरण से ओतप्रोत नौकरशाही ने प्रगतिशील एवं जाति अंतक कानूनों का क्रियान्वयन प्रमाणिक रूप से कभी होने ही नहीं दिया। बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर हमें और अधिक स्पष्ट करके बताते हुए कहते हैं–

“समान न्याय का सिद्धांत कारगर होता है या नहीं, यह आवश्यक रूप से प्रशासनिक अधिकारियों के स्वभाव और आचरण पर निर्भर करता है, जिन्हें इसका पालन करना है। यदि प्रशासनिक पक्ष स्थापित व्यवस्था के प्रति उसी वर्ग का होने के कारण सहानुभूति रखकर उसका पक्ष लेगा और नई व्यवस्था के प्रति वैर-भाव रखेगा, तो नई व्यवस्था कदापि लागू नहीं हो सकती। नई व्यवस्था की सफलता के लिए प्रशासन के तदनुरूप होने की आवश्यकता कार्ल मार्क्स द्वारा 1871 में पेरिस नगर परिषद के गठन के अवसर पर स्वीकार की गई थी और इस सिद्धांत को लेनिन ने सोवियत साम्यवाद के संविधान में लागू किया था।”[5]

बाबासाहेब आगे अनेक उदाहरण देकर सिद्ध करते हैं कि भारत की नौकरशाही दिल्ली से गली-गली तक पूर्ण रूप से उच्च जातीय अर्थात ब्राह्मणी है।

‘ब्राह्मणों को उनकी जनसंख्या के अनुसार प्रथम आरक्षण’ यह तात्यासाहेब महात्मा जोतीराव फुले का क्रांतिकारी सिद्धांत बाबासाहेब ने कॉमरेड लेनिन की तरह संविधान में स्वीकार किया होता, तो कदाचित नौकरशाही का पूर्ण रूप से अब्राह्मणीकरण हो गया होता और आज भारत में पेशवाई का पुनरागमन दिखाई न पड़ता।

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‘ब्राह्मणों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रथम आरक्षण’ इस सिद्धांत की चर्चा एक प्रसंग से घटित होती है और वह प्रसंग भी एक अलग प्रकार के सिद्धांत को जन्म देकर जाता है। ब्राह्मणों की ‘सार्वजनिक सभा’ की तरफ से ब्रिटिश सत्ताधारियों के पास एक अर्जी भेजी जाती है, तब इस अर्जी पर चर्चा करते हुए तात्यासाहेब महात्मा फुले अपने कार्यकर्ताओं को कहते हैं– “जोतीराव फुले– इस प्रकार हम हिंदुओं को ‘कलेक्टरों की जगह’ यूरोपियन लोगों की तरह सरकार दे, इसलिए सार्वजनिक सभा के रिकार्ड में दर्ज होगी लेकिन वह अर्जी अविद्वान शूद्रातिशूद्रों के किस काम की? क्योंकि नाम हिंदू का और उसका उपभोग करने वाले अकेले ब्राह्मण। वाह रे वाह सभा! वाह रे वाह दोमुंहापन!”[6]

‘नाम हिंदू का और उपभोग करने वाले अकेले ब्राह्मण’ तात्यासाहेब के इस सिद्धांत से ब्राह्मणी षड्यंत्र का कैसे पर्दाफाश होता है। यह ध्यान में आता है। जाति-व्यवस्था की बुलंदी के समय ब्राह्मणों ने धर्म के किसी पर्दे की कोई आड़ लिए बिना खुल्लमखुल्ला ब्राह्मण पहचान दिखाकर फायदा उठाया एवं जाति वर्चस्व स्थापित किया। मनुस्मृति में खुले तौर पर ब्राह्मणों के वर्चस्व का कानून बनाया। मुगल काल में जिजिया कर से छूट पाने के लिए ‘हम ब्राह्मण हैं, हिंदू नहीं’, ऐसा स्पष्ट करते हुए ब्राह्मण होने का फायदा उठाया। परंतु ब्रिटिशों के आगमन के बाद शुरू हुए जाति अंतक प्रबोधन के दबाव में आकर ब्राह्मणों को जाति की पहचान अड़चन वाली लगने लगी। इसलिए जाति के लिए फायदा उठाते समय ब्राह्मण के बजाय हिंदू पहचान उन्हें सुरक्षित लगने लगी। इसलिए ब्राह्मणों की ‘सार्वजनिक सभा’ हिंदू के नाम से अर्जी करके सरकारी नौकरी मांगते हैं। ब्राह्मणों का यह षड्यंत्र या कहिए कि सफेद झूठ दूरदर्शी तत्वज्ञानी तात्यासाहेब जोतीराव फुले की नजरों से कैसे बच सकता है?

हिंदू नाम से कोई भी फायदा होने वाला होगा तो वह सिर्फ ब्राह्मणों का होगा। लेकिन हिंदू नाम से कुछ नुकसान होने वाला होगा तो वह शूद्रातिशूद्रों का होगा। ऐसी व्यवस्था ब्राह्मणों ने की हुई है। धर्म के नाम पर दंगे हुए तो उसमें दोनों धर्मों के शूद्रातिशूद्र ही मारे जाते हैं और उन्हीं के ऊपर अपराध के मुकदमे दर्ज करके शूद्रों का ही जीवन बर्बाद किया जाता है। धर्म के नाम पर बाबरी मस्जिद गिराने के बाद देश भर में सांप्रदायिक दंगे हुए, जिससे संघ-भाजपा के ब्राह्मणों को देश की सत्ता मिली। लेकिन तभी से दलितों और पिछड़ों का आरक्षण खतरे में आ गया है। मतलब यह कि हिंदू नाम से ब्राह्मणों को फायदा हुआ तब भी और उन्हें नुकसान हुआ तब भी, हर हाल में शूद्रातिशूद्रों का ही सत्यानाश होता है। यह अनेक बार सिद्ध हो चुका है।

तात्यासाहेब ने अपने भाषण में और लेखन में हिंदू शब्द का ज्यादा इस्तेमाल नही किया। वे खुलकर जाति का नाम लेकर ही विश्लेषण करते हैं। उन्हें प्रबोधन के स्तर पर इस देश में जातीय ध्रुवीकरण चाहिए था, क्योंकि धार्मिक ध्रुवीकरण से ब्राह्मणी व्यवस्था मजबूत होती है, यह उन्होंने अच्छी तरह जान लिया था। आगे चलकर ब्राह्मणेतर आंदोलन का उभार हुआ एवं राजनीतिक पक्ष भी स्थापित हुआ, यही ट्रेंड आगे चालू रहा होता तो तमिलनाडु से पहले महाराष्ट्र में ‘अब्राह्मणी क्रांति’ हो गई होती। लेकिन मूर्ख मराठा नेताओं की सत्तालोलुपता के कारण यह जातीय ध्रुवीकरण गांधी नाम के ब्राह्मणवाद को शरणागत हो गया एवं तात्यासाहेब का ‘बली राज्य’ का स्वप्न मराठा नेताओं ने बेच खाया।

मराठा नेताओं के कारण एक तरफ ब्राह्मण ब्राह्मणेतर जातीय ध्रुवीकरण पटरी से उतरा और दूसरी तरफ बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ने हिंदू नाम से धार्मिक ध्रुवीकरण को पकड़ कर रखा। अस्पृश्यों के सवाल उठाते हुए वे लगातार शत्रु की पहचान हिंदू के रूप में करते रहे। शोध करते समय उनके लेखन में बहुत-सी जगहों पर उन्होंने ब्राह्मण व ब्राह्मणी संकल्पना की चर्चा की लेकिन राजनीतिक लड़ाई में उन्होंने हिंदू संकल्पना का इस्तेमाल करके धार्मिक ध्रुवीकरण को ही  बढ़ावा दिया, जिसके कारण दो दुष्परिणाम हुए। बाबासाहेब ने दलितों के दोस्त के रूप में अपेक्षित ओबीसी को फिर से हिंदू बनाकर ब्राह्मणी छावनी में धकेल दिया। दूसरा दुष्परिणाम यह हुआ कि 1925 में स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हिंदू संगठन का काम आसान हो गया। यह ‘उल्टा’ काम हुआ, लेकिन इसी समय में तमिलनाडु में इसके विपरीत काम शुरू हुआ। तमिलनाडु में पेरियार कृत ब्राह्मण विरोधी आंदोलन का नेतृत्व शुरुआत से ही ओबीसी जाति के हाथ में होने के कारण वहां फुलेवाद शुद्ध रूप में आगे बढ़ता रहा और सफल भी रहा है। पेरियार ने धार्मिक संघर्ष के बजाय ‘सांस्कृतिक संघर्ष’ पर ज्यादा फोकस किया। ब्राह्मण धर्म के खिलाफ जितने भी धार्मिक विद्रोह हुए हैं, वो सभी जाति-व्यवस्था के शरण में चले गए हैं। एकमात्र बौद्ध धम्म अपवाद था, लेकिन वह भी ब्राह्मणों के सांस्कृतिक आक्रमण के आगे हार गया। इसलिये तात्यासाहेब ने ब्राह्मणवाद को ‘ब्राह्मण धर्म’ न मानकर केवल ‘ब्राह्मण संस्कृति’ मानकर उसके खिलाफ ‘सांस्कृतिक युद्ध’ शुरू किया। पेरियार ने इसी सिद्धांत को आगे बढ़ाया और सफलता प्राप्त की।

तमिलनाडु के पेरियार स्कूल से जो ओबीसी एवं बहुजन नेता तैयार हुए उन्होंने सत्ता में आने के बाद फुलेवाद के मूल तत्व को बड़े पैमाने पर अमल में लाने का काम किया। सत्ता हाथ में आते ही उन्होंने सभी अब्राह्मणी जाति-जमात को उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण दिया, जिसके कारण नौकरशाही में गैर-ब्राह्मणों की संख्या बढ़ी। उन्होंने ब्राह्मणों को आरक्षण भले नहीं दिया लेकिन नौकरशाही में ब्राह्मणों की संख्या तीन प्रतिशत से ज्यादा न होने पाए इसका ध्यान रखा। ब्राह्मणों की संख्या तीन प्रतिशत से ज्यादा न होने पाए, इसलिए उन्होंने संघ-भाजपा की केंद्र सरकार द्वारा बनाया गया ईडब्ल्यूएस के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का कानून तमिलनाडु में लागू नहीं किया, क्योंकि 10 प्रतिशत उच्च जातिगत आरक्षण का फायदा उठाते हुए तमिलनाडु के ब्राह्मण नौकरशाही में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा सकते हैं। इसका दुष्प्रभाव तमिलनाडु में ओबीसी के नेतृत्व में हुई अब्राह्मणी क्रांति पर पड़ सकता है। इसीलिए तमिलनाडु के अब्राह्मणी शासन ने संघ-भाजपा की केंद्र सरकार के 10 प्रतिशत ईडब्ल्यूएस आरक्षण कानून को लागू करने से इंकार कर दिया।

तमिलनाडु की अब्राह्मणी द्रविड़ आंदोलन ने कड़ाई से धार्मिक ध्रुवीकरण को नकारा है। उन्होंने धर्म धर्मांतरण आदि मुद्दों को कभी बढ़ावा नहीं दिया। तात्यासाहेब महात्मा फुले की ही तरह पेरियार ने भी हिंदू धर्म में ही समता का शोध किया एवं हिंदू धर्म के अंतर्गत ही जातीय ध्रुवीकरण निर्मित किया, जिसके कारण वहां अब्राह्मणी क्रांति यशस्वी हुई।

तमिलनाडु में ओबीसी के नेतृत्व में द्रविड़ आंदोलन ने फुलेवाद का मूलतत्व रहे सिद्धांतों का अक्षरशः अमल में लाते हुए अब्राह्मणी क्रांति यशस्वी किया। लेकिन यह क्रांति निर्बाध रहे, इसके लिए समय-समय पर कानून बनाते रहना और उनका कड़ाई से पालन करते रहना आवश्यक होता है। उसी प्रकार इस अब्राह्मणी क्रांति को ब्राह्मणवादियों की तरफ से खतरा हो सकता है, उसके लिए सतत सतर्क रहना भी आवश्यक है। इसमें तमिलनाडु का अब्राह्मणी शासन-प्रशासन कहीं भी कम नहीं पड़ रहा है, यह उपरोक्त विवेचन से सिद्ध होता है।

मैंने तमिलनाडु की अब्राह्मणी क्रांति का जो विश्लेषण किया है, उससे इस प्रकार की समझ हो सकती है कि तमिलनाडु में जाति अंतक क्रांति पूर्ण होकर वहां जाति-व्यवस्था नष्ट हो चुकी है। कोई ऐसी गलतफहमी न पाले।

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तमिलनाडु को छोड़कर अन्य राज्यों में ब्राह्मणी छावनी जिस उन्माद के साथ सत्ता में आने जैसा व्यवहार कर रहे हैं वह देखते हुए तमिलनाडु में ब्राह्मणी छावनी पराभूत एवं अत्यंत मानहानि का जीवन जी रही है। आज भी तमिलनाडु में ओबीसी के नेतृत्व में अब्राह्मणी छावनी सर ऊंचा करके आक्रामक होकर ब्राह्मणवादियों के सामने चुनौती बनकर खड़ी है। यह बात निश्चित रूप से क्रांतिकारक है। अन्य राज्यों के वामपंथी, पुरोगामी, फुले-आंबेडकरी आंदोलन को कम-से-कम तमिलनाडु जितना तो क्रांति के स्तर तक पहुंचना चाहिए और उसके लिए जात-पांत के भेद किनारे रखकर तमिलनाडु के ओबीसी नेतृत्व से कुछ सीखना चाहिए।

तमिलनाडु की यह अब्राह्मणी क्रांति नकारात्मक कार्यक्रमों पर खड़ी है। केवल ब्राह्मण विरोध जैसे एक कार्यक्रम के आधार पर जाति-व्यवस्था नष्ट करने वाली क्रांति हो ही नहीं सकती। प्रबोधन के स्तर पर आमूलचूल मूल्य परिवर्तन निर्माण करनेवाली वैचारिक क्रांति का होना आवश्यक है। उसके साथ ही जमीन का पुनर्वितरण जैसे जाति अंतक क्रांतिकारक कार्यक्रम हाथ में लेना आवश्यक है। उसके लिए केवल मार्क्स, बुद्ध, फुले, आंबेडकर आदि तत्वज्ञान ही पर्याप्त नहीं हैं, क्योंकि यह सारे तत्वज्ञान ब्राह्मणी छावनी कब का निष्फल कर चुकी है। बदलती परिस्थितियों में ब्राह्मणवाद जैसे विकसित हो रहा है, उसी तरह हमें भी अपने तत्वज्ञान का विकास करना चाहिए। यह काम कामरेड शरद पाटिल ने ‘सौत्रांतिक मार्क्सवाद’ यानी बुद्ध के वचनों पर आधारित मार्क्सवाद के रूप में नए तत्वज्ञान को प्रस्तुत करके किया है।

अर्थात आज का वामपंथी, पुरोगामी व फुले-आंबेडकरवादी नेता-कार्यकर्ताओं की बौद्धिक क्षमता देखते हुए उन्होंने अविलंब तमिलनाडु का फुलेवादी अब्राह्मणी क्रांति का पैटर्न स्वीकार करते हुए आंदोलन को एक अगले सोपान तक ले जाने की जरूरत है। जाति अंतक क्रांति का अगला सोपान अगली पीढ़ी को सौंप देना उचित होगा। कम से कम अगली पीढ़ी के लिए तो हम तमिलनाडु पैटर्न स्वीकारें। आइए अगली पीढ़ी के लिए जाति अंतक क्रांति के मार्ग पर आगे बढ़ें।

भारत में जाति-व्यवस्था के विरुद्ध लड़ने के लिए अनेक पैटर्न आए और गए। कांशीराम जी का ‘जाति जोड़ो’ पैटर्न, लोहिया व चंदापुरी का ‘समाजवादी व ओबीसी’ पैटर्न, यह दोनों जाति अंतक पैटर्न पूरी तरह फेल होते हुए हम सब देख ही रहे हैं। सिर्फ एकमात्र तमिलनाडु का पेरियार का ‘फुलेवादी अब्राह्मणी’ क्रांति का पैटर्न आज भी सीना तान कर लड़ते हुए दिख रहा है। संपूर्ण देश के वामपंथी, पुरोगामी, फुले-आंबेडकरवादियों ने तमिलनाडु पैटर्न स्वीकार किया तो आज देश पर आते हुए पेशवाई के संकट का मुकाबला किया जा सकता है। अन्यथा जाति-व्यवस्था जो 100 गुना अधिक विनाश करने वाली प्रतिक्रांति के रूप में देश में अवतरित तो हो ही चुकी है, वह और मजबूती से दलित-बहुजनों की गर्दन पर सवार होने वाली है।

(समाप्त)

संदर्भ :

[1] महात्मा फुले समग्र वाङ्मय, महाराष्ट्र राज्य साहित्य व सांस्कृतिक मंडल, पृष्ठ 465-466

[2] वही, पृष्ठ 523

[3] वही, पृष्ठ 331

[4] फुले जोतीराव, ब्राह्मणवाद की आड़ में गुलामगिरी, फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली, पृष्ठ 144-145

[5] बाबासाहब डॉ. आंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय, आंबेडकर प्रतिष्ठान, भारत सरकार, खंड 7, पृष्ठ 144

[6] फुले समग्र वाङ्मय, उपरोक्त, जाग फंसा माझा, पृष्ठ 521

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

श्रावण देवरे

अपने कॉलेज के दिनों में 1978 से प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े श्रावण देवरे 1982 में मंडल कमीशन के आंदोलन में सक्रिय हुए। वे महाराष्ट्र ओबीसी संगठन उपाध्यक्ष निर्वाचित हुए। उन्होंने 1999 में ओबीसी कर्मचारियों और अधिकारियों का ओबीसी सेवा संघ का गठन किया तथा इस संगठन के संस्थापक सदस्य और महासचिव रहे। ओबीसी के विविध मुद्दों पर अब तक 15 किताबें प्राकशित है।

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जमीनी संघर्ष के लिए फुलेवाद शुद्ध वर्गीय संगठन का मार्ग स्वीकार करता है। फुले के शिष्य भालेराव किसान संगठन खड़ा करते हैं और दूसरे...
‘फाउंडिंग फादर ऑफ इंडिया’ सम्राट असोक, देश-दुनिया के इतिहासकारों की नजर में
इतिहासकार विलियम डैलरिम्पल असोक की अद्वितीयता के बारे में लिखते हैं कि “अशोक के अनोखे स्तंभ बताते हैं कि अशोक कितना अद्वितीय था। वह...