भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) बिहार में सरकार बनाने के मुहाने पर खड़ी है। डाॅ. राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण और कर्पूरी ठाकुर के शिष्य तथा लालू यादव के छोटे भाई नीतीश कुमार अपने हाथों से भाजपा के माथे पर राजमुकुट रखेंगे। लालू यादव और उनकी पार्टी राजद भी अस्तित्व के संकट से गुजर रही है। चिराग पासवान, जीतनराम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा जैसे लोग भाजपा की रोटी पर पल रहे हैं।
नीतीश कुमार के संबंध में लगता था कि उनकी कोई अपनी अलग वैचारिक पहचान है। लेकिन वास्तविकता यह रही कि उनकी अंतरात्मा भी भाजपा की गुलाम से अधिक कुछ नहीं है। भाजपा के निर्देश या कहें कि परामर्श पर ही नीतीश कुमार ने अपने बेटे निशांत कुमार को राजनीति में सक्रिय होने की सहमति दी। उन्हें भी अहसास हो गया था कि पार्टी बचाने और चलाने के लिए रक्तसिंचित राजनीति जरूरी है यानी बाप के बाद बेटा को विरासत।
यह सब सत्ता पाने और बचाने की राजनीति की बात हो रही थी। असली संकट अब वैचारिक प्रतीकों के हड़पे जाने की हो गई है। डॉ. आंबेडकर, कर्पूरी ठाकुर, संत रविदास, संत गाडगे समेत वंचित जातियों से आने वाले सभी प्रतीकों को भाजपा ने अपने एजेंडे का हिस्सा बना लिया है। भाजपा ने राममनोहर लोहिया, जार्ज फर्नांडिज, जगदेव प्रसाद और वीपी मंडल जैसे संपन्न जाति से आने वाले समाजवाद के नेताओं को कभी अपना आदर्श नहीं बनाया और न ही उनको प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया। उसने दलित और अतिपिछड़ी जाति के प्रतीकों पर ही अपना निशाना साधा।

आगामी 11 अप्रैल को जोतीराव फुले की 199वीं जयंती है। मतलब दो सौ होने वाला है। अतिपिछड़ी और सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाली जातियों में उनकी व्यापक स्वीकार्यता भी है। इसके राजनीतिक महत्व को समझते हुए भाजपा ने प्रदेश भर में महात्मा जोतीराव फुले जयंती मानने का निर्णय लिया है। इसके लिए आयोजन समिति भी गठित कर दी गयी है। इसके माध्यम से भाजपा ने एक वैचारिकी पर अपनी दावेदारी पेश कर दी है। भाजपा सामाजिक न्याय के इस प्रतीक को धार्मिक उन्माद में बदलने का पूरा प्रयास करेगी।
सामाजिक न्याय के प्रतीकों पर धावा भाजपा की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। राजनीति की प्रक्रिया भी हो सकती है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले लोग कहां गुम हो गये हैं? आखिर वे अपने प्रतीकों को स्थापित क्यों नहीं कर पा रहे हैं। सामाजिक न्याय के प्रतीकों की एक लंबी कड़ी है। ये सत्ता के कारण नहीं, बल्कि संघर्षों की वजह से स्थापित हुए थे। सबकी अपनी संघर्ष गाथा है। ये सभी लोग सामाजिक न्याय और सामाजिक स्वाभिमान की लड़ाई लड़ रहे थे। इनमें से किसी को धर्म के नाम पर कोई विशेषाधिकार नहीं था, बल्कि धर्म इनको शोषित बनाये रखने की साजिश भर था। भाजपा ऐसे लोगों को भी धर्मध्वज वाहक बनाने का अभियान चला रही है। सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले भी उसी में समाहित होते जा रहे हैं।
जाति के आधार पर कहें तो यादव जाति ही अकेला धार्मिक उन्माद के खिलाफ लड़ रही है और पार्टी के आधार पर राजद सांप्रदायिकता के खिलाफ मोर्चा संभाले हुए है। लेकिन राजद अब खुद अस्तित्व के संकट से गुजर रहा है। राजद खुद अब धर्म और जाति की दुविधा में उलझ गया है। ऐसी स्थिति में वैचारिक आंदोलन और संघर्ष हाशिये के विषय बनते जा रहे हैं। उधर, जो गैर-सवर्ण वैचारिकी के प्रतीक हैं, भाजपा उन पर धर्म का लेप लगाकर सवर्ण सरोकार का गुलाम बना रही है। यह खतरा धीरे-धीरे गंभीर होता जा रहा है। इस पर अब समग्रता से मंथन की जरूरत महसूस की जा रही है।
(संपादन : नवल/अनिल)
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