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‘तृतीय रत्न’ : जोतीराव फुले का नाटक जो 125 साल अंधेरे में रहा

जोतीराव के लिए ‘तृतीय रत्न’ या ‘तीसरी आंख’ का आशय मानवीय विवेक से था। शूद्रातिशूद्रों की दोनों आंखें तो ब्राह्मण-पुरोहित की छलना का शिकार हैं। वे वही देखने की अभ्यस्त हैं जो वे दिखाना चाहते हैं। वास्तविक हालात को समझने के लिए उन्हें अपनी ‘तीसरी आंख’ खोलनी होगी। बता रहे हैं ओमप्रकाश कश्यप

[दलित-बहुजनों के लिए अप्रैल माह विशेष मायने रखता है। इस महीने की 11 तारीख को जोतीराव फुले और 14 तारीख को डॉ. आंबेडकर की जयंती पूरे देश में लोग धूमधाम से मनाते हैं। जोतीराव फुले का जन्म 11, अप्रैल 1827 को हुआ था और इस लिहाज से यह वर्ष उनके जन्म के दो सौवीं जयंती का आगाज है। फारवर्ड प्रेस इस अवसर पर प्रस्तुत कर रहा है जोतीराव फुले व उनके विचारों पर आधारित आलेखों की शृंखला। आज पढ़ें ओमप्रकाश कश्यप का यह आलेख]

क्रांतिधर्मा लेखक की युगांतरकारी रचना

जहां न्याय की अवमानना होती है, जहां जहालत और गरीबी है, जहां कोई भी समुदाय यह महसूस करे कि समाज सिवाय उसके दमन, लूट तथा अवमानना के संगठित षड्यंत्र के सिवाय कुछ नहीं है – वहां न तो मनुष्य सुरक्षित रह सकते हैं, न न्याय, न ही संपत्ति।

– फ्रैड्रिक डगलस

उत्पीड़ित वर्ग की त्रासदी है कि वह उत्पीड़न के लिए जिम्मेदार ताकतों को ही अपना मसीहा माने रहता है। अशिक्षा, अज्ञानता, लालच, आलस, दबाव, प्रलोभन आदि के चलते वह अपनी दुरवस्था के कारणों को समझ ही नहीं पाता। इस बीच यदि कोई महानायक हालात को चुनौती देकर बदलाव के लिए लंबे समय तक संघर्ष करता रहे तो भी, उन वर्गों में परिवर्तनकारी चेतना के अभाव में जिनके लिए वह जूझ रहा है – अनुकूल परिणामों की झलक दिखने में पीढ़ियां गुजर जाती हैं। कारण है कि समाज के बड़े हिस्से के दमन और उत्पीड़न के लिए जिम्मेदार वर्चस्वकारी ताकतें, उत्पीड़ित वर्गों की तुलना में ज्यादा संगठित, शक्तिशाली, धूर्त्त और अन्यायकारी होती हैं। जैसे ही उत्पीड़ित वर्ग का कोई सदस्य उन्हें चुनौती देने का साहस जुटाता है, तो बदलाव की मांग को समाज-विरोधी बताकर, वे तुरंत उसके विरोध में डट जाती हैं।

भारत में उत्पीड़न के दो बड़े कारक धर्म और जाति हैं। ये चार-पांच प्रतिशत के हाथों में बेशुमार अधिकार सौंपकर, शेष समाज को उनकी मर्जी पर जीने को विवश कर देते हैं। ये एक-दूसरे के सुरक्षा कवच भी हैं। जब भी इनमें से किसी एक पर आंच आती है, यहां तक कि विरोध में जरा-सी सुगबुगाहट भी होती है तो दूसरा तुरंत रक्षा में जुट जाता है। भारत में इसके अनगिनत उदाहरण हैं। बहुत-ज्यादा पीछे न जाकर उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से बात शुरू करते हैं।

इक्कीस वर्ष की अवस्था में जब एक युगदृष्टा महामना ने समाज की दुर्दशा और कारणों को समझने की कोशिश की तो उसे लगा कि सबसे बड़ी बाधा समाज का अशिक्षित होना है। उस समय उसके साथी सरकारी नौकरी की जुगाड़ में थे। खुद वह भी सरकारी नौकरी के सहारे सुख का जीवन जी सकता था। प्रतिभा, आत्मविश्वास और सुगठित देह के बल पर नौकरी मिलना कतई मुश्किल नहीं था। लेकिन मात्र इक्कीस वर्ष की अवस्था में उसने सरकारी नौकरी नहीं करने का प्रण किया; और समाज में यथास्थिति में जीने के बजाय उसे बदलने का रास्ता चुना।[1] उन दिनों स्त्रियां पढ़ नहीं सकती थीं। सबसे पहला विद्रोह उसने अपनी पत्नी को पढ़ाकर किया। अशिक्षा के समाहार के लिए उसने स्कूल खोलने की ठान ली। कुछ सहयोगी भी आ मिले। उनमें कई उसके ब्राह्मण मित्र भी थे।

पाठक समझ ही गए होंगे, जिस युगपुरुष की चर्चा ऊपर हुई है, उनका नाम जोतीराव और उनकी संगिनी का नाम सावित्री बाई था। समाज में उनका परिवार फुले नाम से ख्यात था। 1848 में फुले दंपति ने आंदोलन की शुरुआत की थी। इतिहास में जोतीराव के ब्राह्मण सहयोगियों को उदार कहा जाता है। लेकिन उनकी उदारता निःशर्त नहीं थी। इसका अनुभव जोतीराव को भी समय के साथ हुआ था। उन दिनों अंग्रेज खुद शिक्षा पर जोर दे रहे थे। जोतीराव के काम में सहयोग करना शासन-प्रशासन की निगाहों में आना था। इसलिए अंग्रेजों का कृपापात्र बनने के लिए अनेक पढ़े-लिखे ब्राह्मण उदार और सुधारवादी आंदोलनों का असली-नकली हिस्सेदार बनकर शासन और प्रशासन में ऊंचे ओहदे पाने लगे थे।

बहरहाल, जोतीराव के संघर्ष तथा ‘मित्रोंʼ के सहयोग से स्कूल चलने लगे। बच्चों की संख्या के साथ-साथ में स्कूलों की संख्या भी बढ़ने लगी। जोतीराव ने उनके प्रबंधन के लिए समिति का गठन कर, सारी जिम्मेदारी उसके ऊपर छोड़ दी। लड़कियों के स्कूल की जिम्मेदारी सावित्रीबाई संभालतीं। जोतीराव स्कूलों में पढ़ाने का काम करते। स्कूलों में सवैतनिक अध्यापक भी थे, लेकिन फुले दंपति यह काम बिना किसी वेतन के करते थे। घर चलाने के लिए जोतीराव ने सिलाई का काम शुरू किया था। सावित्री फुर्सत  मिलने पर रजाइयां बनातीं।[2] जीवन में अभाव थे, संघर्ष था, लेकिन मकसद कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण था।

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बढ़ते अनुभव के साथ जोतीराव समझने लगे थे कि केवल अक्षर ज्ञान से शूद्रातिशूद्रों की समस्याओं का समाधान असंभव है। शिक्षा के साथ-साथ लोगों को उन रूढ़ियों तथा अंधविश्वासों के बारे में बताना भी जरूरी है, जो धर्म, परंपरा तथा संस्कृति के नाम पर  शूद्रातिशूद्रों पर स्वार्थवश थोपे गए हैं, जिनकी उनके विकास में सदैव हमेशा नकारात्मक भूमिका रही है। कुछ रूढ़ियां और कुसंस्कार तो पढ़ाई के साथ भी जुड़े थे। उन दिनों पुस्तकों पर चमड़े की बाइडिंग होती थी। ऐसी पुस्तकें ‘अछूत’ मानी जाती थीं। रोशनाई भी अछूत थी। ककहरा सिखाते समय अध्यापक अभ्यास कराते, ‘उ से उल्लू’; घर में ‘उल्लू’ का नाम लेना अपशकुन माना जाता था। इसके अलावा किसे छूना है, किससे कितनी दूर रहकर बात करनी है, किसकी छाया के भी करीब नहीं जाना है, किससे छू जाने पर छूत लगने का खतरा था – इसके भी नियम थे। रूढ़िवादी ब्राह्मणों के लिए अंग्रेजी भी मलेच्छ भाषा थी। उसे पढ़ने से ब्राह्मणत्व पर संकट आ जाता था। प्रतिबंध इतने कड़े थे कि पढ़े-लिखे, संपन्न-शक्तिशाली-ओहदेदार लोग भी सामाजिक मर्यादा भंग करने से घबराते थे। जोतीराव के समकालीन एक ब्राह्मण, गोपालराव हरि देशमुख जो प्रतिष्ठित परिवार से थे और आगे चलकर लोकहितवादी के नाम से प्रसिद्ध हुए – को अपनी पुस्तकें घर से बाहर, कुएं के पास बने ताक पर रखनी पड़ती थीं। स्कूल से आने पर घर में कदम रखने से पहले नहाना जरूरी था, ताकि छूत बाहर ही धुल जाए।[3] लड़कियों के लिए और भी मुश्किलें थीं। जो उम्र स्कूल में दाखिला कराने की होती, उस उम्र में उनके पिता को बेटी के विवाह की चिंता सताने लगती। अक्सर उन्हें पढ़ाई के बीच से स्कूल छोड़ने को मजबूर कर दिया जाता।

धर्म, संस्कृति तथा परंपरा के नाम पर जनसाधारण को उलझाए रखने के लिए ब्राह्मणों ने शोषण के तरह-तरह के रास्ते खोज निकाले थे। जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य को सैंकड़ों कर्मकांडों से गुजरना पड़ता था। उन्हें संपन्न कराने का अधिकार केवल ब्राह्मणों का था। कोई उन कर्मकांडों से बच नहीं सकता था। हर अवसर पर वे यजमान से मोटी दक्षिणा वसूलते थे। अज्ञानता हजार मुश्किलों की जड़ होती है। ब्राह्मण शूद्रातिशूद्र के जीवन में समस्या पैदा करते, फिर समाधान के नाम पर उन्हें अपनी शरण में आने को मजबूर कर देते। इस तरह छले जाने का सिलसिला लगातार चलता रहता था।

जोतीराव के लिए शिक्षा अक्षरज्ञान तक सीमित न होकर लंबी मुक्तिकामी यात्रा थी। कक्षाध्यापक के रूप में वे बच्चों को उन कुरीतियों, रूढ़ियों, कुसंस्कारों और अंधविश्वासों के बारे में भी बताते, जो उनके दयनीय व्यवस्था के असली कारण थे। पंडितों-पुरोहितों की उस लूट के बारे में भी जागरूक करते, जिसे वे विभिन्न पर्वों, संस्कारों, सामाजिक-पारिवारिक उत्सवों यथा जन्म, मृत्यु, विवाह, नामकरण आदि तरह-तरह के बहानों से गरीब, अशिक्षित, रूढ़िवादी शूद्रातिशूद्रों से हड़प लेते थे। यहीं से जोतीराव तथा उनके ब्राह्मण मित्रों के बीच अविश्वास की शुरुआत हुई। उनके मित्र चाहते थे कि जोतीराव बच्चों को पढ़ाते समय पाठ्यक्रम तक सीमित रहें। कक्षा में बस उतना पढ़ाएं जो उन्हें साक्षर बनाने के लिए जरूरी है। जोतीराव समझ गए कि उनकी लड़ाई कहीं ज्यादा लंबी है। इससे उनके और ब्राह्मण सहयोगियों के बीच दूरियां बढ़ने लगीं। जिन स्कूलों को उन्होंने जोर-शोर से आरंभ किया था, उनसे उनका जी उचटने लगा। उन दिनों के अनुभव को साझा करते जोतीराव ने खुद लिखा था–

“मैंने जब स्कूलों में ब्राह्मणों के पूर्वजों के बनावटी धर्मग्रंथों में लिखी धूर्ततापूर्ण बातों के संबंध में छात्रों को पढ़ाना-समझाना शुरू किया, तब उन ब्राह्मणों तथा मेरे बीच रूखापन बढ़ता गया… अंदर की बात मैं किसी भी समय बताऊंगा जरूर।”[4]

अंदर की बात क्या थी? दरअसल उनके ब्राह्मण मित्र चाहते थे कि शिक्षा को औपचारिक ही रहने दिया जाए। शूद्रातिशूद्र विद्यार्थियों को कामचलाऊ शिक्षा से ज्यादा न पढ़ाया जाए। उच्च शिक्षा की तो उन्हें आवश्यकता ही नहीं है। यह मान्यता बहुत बाद तक बनी रही। मुट्ठी-भर लोगों के हितों के पैरोकार होकर भी ‘लोकमान्य’ कहे जाने वाले तिलक ने दि मराठा (15 मई, 1881) में लिखा था कि “गैर-ब्राह्मण बच्चों को पढ़ाना, लिखाना और इतिहास, भूगोल, तथा गणित की बुनियादी बातें सिखाना सही मायने में उन्हें नुकसान पहुंचाएगा।”[5]

जोतीराव मान चुके थे कि ब्राह्मणवाद के मकड़जाल में बुरी तरह फंस चुके समाज को केवल औपचारिक पढ़ाई से मुक्त नहीं कराया जा सकता। धर्म और संस्कृति के नाम पर लोगों के दिलो-दिमाग पर शताब्दियों से जमे धूल को साफ करना जरूरी है। अंग्रेज शूद्रातिशूद्र की औपचारिक शिक्षा का इंतजाम तो कर सकते हैं, उन्हें वास्तविक आजादी नहीं दिला सकते। ब्राह्मणवाद के चंगुल से अपने समाज को आजाद कराने के लिए जंग की शुरुआत उन्हें स्वयं करनी होगी। इस निश्चय के साथ 1855 में उन्होंने ‘तृतीय रत्न’ शीर्षक से एक नाटक की रचना की थी। उन दिनों दक्षिणा पुरस्कार कोष समिति मराठी की मौलिक पुस्तकों को पुरस्कृत करती थी। इस इच्छा के साथ कि नाटक प्रकाशित होकर लोगों तक पहुंचे, जोतीराव ने अपने ‘तृतीय रत्न’ नाटक को समिति के विचारार्थ भेज दिया।

दक्षिणा दरअसल वह धन था जो पेशवाओं के शासनकाल में राज्य द्वारा ब्राह्मणवाद के पोषण-संरक्षण पर खर्च किया जाता था। उसमें सुधार करते हुए मुंबई के तत्कालीन गवर्नर माउंट स्टुअर्ट एलफिंस्टिन ने दक्षिणा पुरस्कार कोष समिति का गठन उससे कुछ ही वर्ष पहले किया था। उद्देश्य था– मराठी भाषा, साहित्य और संस्कृति को बढ़ावा देना। पुरानी व्यवस्था में सुधार के लिए जिन बुद्धिजीवियों ने आंदोलन किया था, उसमें जोतीराव का केंद्रीय योगदान था। उन्हीं जोतीराव का नाटक ‘तृतीय रत्न’ जब समिति के पास पहुंचा तो उसे देखते ही ब्राह्मण सदस्यों के माथे पर बल पड़ गए। उनके बहुमत के चलते नाटक अस्वीकृत कर दी गई। उसमें जिस तरह पुरोहितवाद पर हमला किया गया था, पूना में शासन-प्रशासन पर ब्राह्मणों की मजबूत पकड़ के चलते, उसका अपुरस्कृत रह जाना आश्चर्य की बात न थी।

रोसलिंड ओ’हेनलॉन ने नाटक के शीर्षक का अनुवाद ‘दि थर्ड आई’ (तीसरी आंख) किया है। भारत में इस मिथ का उपयोग शिव के संदर्भ में किया जाता है। पुराकथाओं के अनुसार शिव की तीसरी आंख उसी समय खुलती है, जब उनका कोप चरमावस्था में पहुंच जाता है। जोतीराव के लिए ‘तृतीय रत्न’ या ‘तीसरी आंख’ का आशय मानवीय विवेक से था। शूद्रातिशूद्रों की दोनों आंखें तो ब्राह्मण-पुरोहित की छलना का शिकार हैं। वे वही देखने की अभ्यस्त हैं जो वे दिखाना चाहते हैं। वास्तविक हालात को समझने के लिए उन्हें अपनी ‘तीसरी आंख’ खोलनी होगी। अपने विवेक को जाग्रत करना होगा।  ‘तृतीय रत्न’ नाटक इसी सदिच्छा के साथ लिखा गया था। इसमें ‘रत्न’ आधुनिक भावबोध का प्रतीक था।

‘तृतीय रत्न’ नाटक का पहला पृष्ठ

कला तथा रचनात्मक सौष्ठव की दृष्टि से ‘तृतीय रत्न’ किसी भी आदर्श नाट्य कृति से कमतर नहीं था। फिर भी क्रूर यथार्थ के चलते किसी प्रकाशक की हिम्मत इसे छापने की न हुई। लगभग 125 वर्षों तक यह नाटक गुमनामी में पड़ा रहा। शूद्रातिशूद्र वर्गों के किसी नेता, किसी बुद्धिजीवी ने इसका संज्ञान नहीं लिया; जबकि ‘गुलामगिरी’ में जोतीराव स्वयं इसका जिक्र कर चुके थे–

“सन् 1855 में मैंने एक छोटा-सा नाटक लिखकर दक्षिणा पुरस्कार समिति के पास भेजा था। नाटक में बताया था कि भट-जोशी स्वार्थपूर्ण ब्राह्मण धर्म की गल्पों और मिथकों की मदद से, अनपढ़-नादान शूद्रों का किस तरह शोषण करते हैं। साथ में यह भी बताया था कि ईसाई धर्मोपदेशक अपने ऊंच-नीच रहित धर्म का उपदेश देकर शूद्रों को किस तरह सत्य-धर्म के बारे में समझाते हैं। लेकिन दक्षिणा पुरस्कार समिति के हठी ब्राह्मण सभासदों के आगे यूरोपियन सदस्यों की एक न चली। समिति ने मेरे नाटक को छापने से मना कर दिया… अंत में मैंने उस पुस्तक को एक तरफ रख दिया।”[6]

लगभग 125 वर्षों तक यह नाटक गुमनामी में पड़ा रहा। हालांकि उसकी कुछ हस्तलिखित प्रतियां जोतीराव ने अपने सहयोगियों को भेजी थीं। कुछ संभवतः उनके साथियों ने अपने स्तर पर तैयार कराई थीं। नाटक की तीन हस्तलिखित प्रतिलिपियां जोतीराव फुले के प्रथम जीवनीकार पंढरीनाथ सीताराम पाटील के पास सुरक्षित थीं। नाटक की विषयवस्तु को देखते हुए उसे पुस्तक रूप में लाने के लिए साहस की आवश्यकता थी। वर्तमान स्वरूप में इस नाटक का प्रथम प्रकाशन 125 वर्ष बाद, एस रायकर द्वारा ‘पुणे सत्यशोधक’ (अप्रैल-जून 1979, खंड 5, अंक दो) में किया गया था। परिचय में संपादक ने बताया था कि ‘तृतीय रत्न’ की तीन उपलब्ध पांडुलिपियों में से एक पर इसका शीर्षक ‘तृतीय नेत्र’ लिखा हुआ था, संभावना है कि जोतीराव इसी अर्थ को पाठकों तक पहुंचाना चाहते थे।[7]

‘तृतीय रत्न’ में जोतिबा ने ब्राह्मणवाद के चंगुल में फंसे समाज के क्रूर यथार्थ का वर्णन किया था। उसका एक-एक दृश्य भारतीय समाज का आईना था। फुले ने उसमें कई स्थापित मिथों का खंडन किया था। शूद्रातिशूद्रों के दैन्य, दुर्दशा की चर्चा होने पर ब्राह्मण बुद्धिजीवी अकसर यही कहते थे कि इन वर्गों ने अपने दैन्य की स्थितियां स्वयं पैदा की हैं। उनके सभी दुख-संताप उनकी अपनी सामाजिक व्यवस्था का परिणाम हैं। ‘तृतीय रत्न’ नाटक में जोतीराव ने इस मिथ को निर्णायक रूप से खारिज कर दिया था। उन्होंने बताया था कि शूद्रातिशूद्र की दुरवस्था का असली कारण पुरोहितों द्वारा किया जाने वाला शोषण तथा अज्ञानता का प्रचार है, जो उनके विवेक को हर लेता है।

तृतीय रत्न का कुटिल पुरोहितवाद

नाटक में अज्ञानी और अंधविश्वासी, पुरोहितों के मायातंत्र में फंसे कृषक दंपति को दिखाया गया है। ब्राह्मण पुरोहित धर्म के नाम पर डराकर उन्हें कदम-कदम पर लूटते हैं। इससे उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा व्यर्थ चला जाता है। केवल आधुनिक शिक्षा शूद्रातिशूद्रों को उन्हें उनके दैन्य तथा उत्पीड़न से छुटकारा दिला सकती है – यही इस नाटक का मूल संदेश था। जोतीराव का पूरा अभियान इसी लक्ष्य को समर्पित था। ‘तृतीय रत्न’ के माध्यम से उन्होंने ब्राह्मणों पर आरोप लगाया था कि उन्होंने कुनबियों-मालियों आदि को इतना अज्ञानी बनाकर रखा है कि उन्हें भगवान तथा पत्थर में कोई फर्क ही नजर नहीं आता। वे भीतर ही भीतर उन्हें समझाते हैं कि उन्हें अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजना चाहिए। इससे उनका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। यहां तक कि जो पढ़े-लिखे ब्राह्मण हैं, जो उदार होने का दावा करते हैं, बात चलने पर वे भी कहते थे कि उनके तथा गैर-ब्राह्मणों के बीच कुछ न कुछ अंतर तो होना ही चाहिए।

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यह देखते हुए कि ब्राह्मण अध्यापक गैर-ब्राह्मण समुदायों के बच्चों के साथ पक्षपात करते हैं। उन्हें पढ़ाने में कोताही बरतते हैं, अंग्रेज अधिकारी केंडी ने नए अध्यापकों को गांव-गांव भेजना आरंभ कर दिया था। ‘तृतीय रत्न’ में इससे संबंधित एक दृश्य आता है। उसके एक पात्र पादरी ने जब बताया कि केंडी साहब ने नए अध्यापकों को सुदूर गांव-देहात तक भेजना आरंभ कर दिया है, तब ब्राह्मणों की धूर्त्तता से परिचित एक पात्र की प्रतिक्रिया थी–

“साहब ऐसा लगता है कि आप अपने ही साथ परिहास कर रहे हैं। अरे हुजूर! मान लिया कि आपके कैंडी साहब ने हाथी जैसे अध्यापक तैयार कर बच्चों को पढ़ाने के लिए गांव-गांव भेजना आरंभ कर दिया है। लेकिन क्या यह देखकर उन गांवों के ब्राह्मण चुप बैठे रहेंगे? क्या वे कुनबी-मालियों से अंदर ही अंदर यह नहीं कहेंगे कि उन्हें अपने बच्चों को स्कूल से दूर रखना चाहिए? क्या वे बच्चों के गरीब माता-पिताओं को अपने कुलकर्णीपन का डर दिखाकर उनकी पढ़ाई-लिखाई की राह का रोड़ा नहीं बन जाएंगे।”[8]

इस नाटक का सूत्रधार जोतीराव की भावनाओं को अभिव्यक्त करता है–

“ब्राह्मणों ने शूद्र-अतिशूद्रों पर जो शिक्षा बंदी लगाई थी, उसको समाप्त करके, उनको शिक्षा का मौका प्रदान करके होशियार बनाने के लिए भगवान ने इस देश में अंग्रेजों को भेजा है। शूद्र-अतिशूद्र पढ़-लिखकर होशियार होने पर वे लोग अंग्रेजों का अहसान नहीं भूलेंगे। फिर वे लोग पेशबाई से भी सौ गुना ज्यादा अंग्रेजों को पसंद करेंगे। आगे यदि मुगलों की भांति अंग्रेज लोग भी इस देश की प्रजा का उत्पीड़न करेंगे तो शिक्षा प्राप्त बुद्धिमान शूद्र-अतिशूद्र पहले जमाने में हुए जवांमर्द शिवाजी की भांति अपने शूद्र-अतिशूद्र राज्य की स्थापना करेंगे और अमेरिकी लोगों की तरह अपनी सत्ता खुद चलाएंगे। लेकिन ब्राह्मण-पंडों की दुष्ट और भ्रष्ट पेशवाई को आगे कभी आने नहीं देंगे। यह बात जोशी-पंडों को भली-भांति समझ लेनी चाहिए।”[9]

जोतीराव की कृति ‘किसान का कोड़ा’ को पढ़ते हुए यह बात सामने आती है कि शूद्रों-अतिशूद्रों की मुख्य समस्या गरीबी नहीं है। असली समस्या गरीबी के कारण को न समझ पाने की है। समाज के प्रमुख उत्पादक शिल्पकार और किसान हैं। लेकिन अपनी आय को अपनी मर्जी से खर्च करने का सत्साहस उनमें नहीं है। उनकी आय का बड़ा हिस्सा धार्मिक-सामाजिक कर्मकांडों पर खर्च होता है। आड़े समय पर किसानों को कर्ज लेना पड़ता है। फसल के समय महाजन और बिचौलिए उनकी फसल का बड़ा हिस्सा हड़प लेते हैं। जो बचता है, उसे भी अपनी मर्जी से, अपने विकास के लिए खर्च करना, उनके लिए संभव नहीं होता। शादी-विवाह, श्राद्ध, मुंडन, उपनयन जैसे अनेक संस्कार हैं, जो बेहद खर्चीले, मगर पूरी तरह अनुत्पादक हैं। वे लोगों की आर्थिक विपन्नता और बौद्धिक विकलांगता दोनों को बढ़ाते हैं। सामाजिक व्यवस्था ऐसी है कि व्यक्ति इनके चंगुल से निकल ही नहीं पाता। शिक्षा के अभाव में आम आदमी वही करता है, जो पुरोहित उसे बताता है। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में जब सभी सत्ता प्रतिष्ठानों पर ब्राह्मणों का कब्जा था, उस समय ‘तृतीय रत्न’ जैसा नाटक लिखना कितने बड़े साहस का काम था, वह बिना इस नाटक को पढ़े नहीं समझा जा सकता।

नाटक की शुरुआत एक गर्भवती कुनबी स्त्री से होती है। उसकी ‘कोख में गर्भ जैसे-तैसे पनप ही रहा होता कि एकाएक ब्राह्मण जोशी अपनी सवारी ले आता है और छल-प्रपञ्च से डराकर, आश्वासन देकर स्त्री के परिवार को भिखारी की स्थिति में ले आता है–

जोशी : (मामूली भिक्षा देख अप्रसन्न होकर) बहन, मेरे जैसे ब्राह्मण के लिए भिक्षा लाने वाली क्या तुम्हीं हो?

स्त्री : क्यों, महाराज? क्या हुआ? क्या यह भिक्षा नहीं है? मैं गरीब-निर्धन हूं। मेरे पति को पूरे महीने में केवल चार रुपए मिलते हैं।

जोशी : बहन, यह भिक्षा नहीं है, ऐसा कौन कहेगा! लेकिन इस भिक्षा से मेरा पेट कैसे भरेगा? और फिर मैं तेरे कल्याण की कामना कैसे करूंगा?

स्त्री : (खिन्न होकर)… हम लोगों को आपके पेट की चिंता कब तक करनी चाहिए… आप लोगों को कुछ न कुछ कार्य तो करना ही चाहिए।

जोशी : … तेरी बात सही है, किंतु तेरी पड़ोसिन की तरह तेरा कुछ भी नुकसान नहीं हुआ है न! मैं तेरे को बोलने भी नहीं दूंगा, ठीक?

स्त्री : (सोचते हुए) उस बहन का बेटा तो अपने नसीब से मरा है।

जोशी : क्या कहा, वह अपने नसीब से मरा है?

स्त्री : नसीब से नहीं तो और किससे मरा है? आपको ढेर सारी भिक्षा नहीं दी, क्या इसलिए मरा है?

….

जोशी : क्या इसमें भी संदेह है? यदि उसने मेरा समाधान कर दिया होता तो मैं उस बच्चे की सारी अला-बलाओं को दूर कर दिया होता और क्या वह अब तक पुत्रवती नहीं हुई होती? (संपादित)

आरंभ में जोशी-ब्राह्मण के आगे साहस दिखाने वाली स्त्री बच्चे के नाम पर कमजोर पड़ती चली जाती है। इसके साथ ही आरंभ होता है उसके शोषण का सिलसिला, जो कुनबी दंपति को कंगाल बना देता है। यह नाटक आज से करीब 180 वर्ष पहले लिखा गया था, लेकिन सच तो यह है कि ऐसा नाटक और इतनी मारक शैली में लिख पाना आज के लेखक के लिए भी बहुत बड़ी चुनौती है। शायद इसी कारण सवा सौ साल तक कोई प्रकाशक इसे छापने की हिम्मत नहीं कर पाया था। इसका लंबे समय तक अप्रकाशित-उपेक्षित-अचर्चित रहना शूद्रातिशूद्र वर्ग के बुद्धिजीवियों में साहस की कमी तथा अपनी बौद्धिक विरासत की ओर से उदासीनता को दर्शाता है।

संदर्भ :

[1] पंढरीनाथ सीताराम पाटिल, महात्मा ज्योतिराव फुले [1984 : 9], महाराष्ट्र राष्ट्र आणि संस्कृति मंडळ, मुंबई
[2] धनंजय कीर, महात्मा जोतिबा फुले [1960 : 74], पोपुलर प्रकाशन, मुंबई
[3] धनंजय कीर, महात्मा जोतिबा फुले [1960 : 11]
[4] गुलामगिरी, 15वां परिच्छेद
[5] तिलक, एडमिशन ऑफ महार ब्वॉयज इन टू गवर्नमेंट स्कूल्स, दि मराठा, 26 मार्च 1882
[6] गुलामगिरी, पंद्रहवां परिच्छेद
[7] रोसलिंड ओ’हेनलॉन, कॉस्ट, कन्फलिक्ट, एंड आइडियोलॉजी [1985 : 122-123 (फुटनोट)]
[8] तृतीय रत्न, नाटक
[9] वही

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

ओमप्रकाश कश्यप

साहित्यकार एवं विचारक ओमप्रकाश कश्यप की विविध विधाओं की तैतीस पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। बाल साहित्य के भी सशक्त रचनाकार ओमप्रकाश कश्यप को 2002 में हिन्दी अकादमी दिल्ली के द्वारा और 2015 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के द्वारा समानित किया जा चुका है। विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में नियमित लेखन

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