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बिहार में मंडलवादी राजनीति के अस्तित्व पर सवाल

मंडल राजनीति का मूल उद्देश्य केवल सत्ता में भागीदारी नहीं था, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संरचना में बुनियादी बदलाव लाना था। यह केवल जातीय प्रतिनिधित्व की राजनीति नहीं, बल्कि वर्ण-जाति के उन्मूलन के साथ वर्ग की ओर बढ़ने का एक संघर्ष था, जो सामाजिक संरचना में क्रांतिकारी बदलाव की बात करता है। बता रहे हैं कुमार दिव्यम

नीतीश कुमार द्वारा राज्यसभा की सदस्यता के लिए शपथग्रहण करने के बाद बिहार की राजनीति एक बड़े संक्रमण काल से गुजर रही है। यह लगभग तय माना जा रहा है कि नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री के रूप में दौर समाप्ति की ओर है। बिहार की मंडलवादी राजनीति के दो चेहरे लालू प्रसाद एवं नीतीश कुमार, दोनों का दौर समाप्ति की ओर है। और यह समापन भाजपा के सत्ता पर कब्जे की शुरुआत के साथ हो रहा है।

बिहार की राजनीति को व्यापक रूप से दो चरणों में बांटा जाता है– 1990 से पहले और 1990 के बाद। 1990 के बाद का दौर मंडलवादी राजनीति का दौर रहा, जिसकी शुरुआत बी.पी. मंडल के नेतृत्व में बने पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिशों को तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह द्वारा लागू करने की घोषणा से हुई। इस फैसले ने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी और ओबीसी को सत्ता में निर्णायक भागीदारी दिलाई। सत्ता के साथ ही ओबीसी जातियों की भागीदारी अलग-अलग क्षेत्रों में बढ़ी।

बिहार में इस दौर के दो प्रमुख चेहरे रहे– लालू प्रसाद और नीतीश कुमार। लालू प्रसाद के शासनकाल को सामाजिक न्याय और जातिगत भेदभाव के खिलाफ संघर्ष के रूप में देखा जाता है, जबकि नीतीश कुमार ने विकास के एजेंडे को आगे बढ़ाने का दावा किया। लालू प्रसाद के कार्यकाल के लिए प्रचलित संबोधन यह रहा कि उन्होंने बिहार को आवाज दिया और वंचितों को खाट पर बैठने का अधिकार दिया। लेकिन आज दोनों ही नेताओं का दौर अपने अंत की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। राजद की कमान अब तेजस्वी यादव के हाथ में है, जबकि जेडीयू में नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार को उत्तराधिकारी के रूप में देखा जा रहा है।

मंडल दौर का अंत : लालू प्रसाद व नीतीश कुमार

मंडल राजनीति का मूल उद्देश्य केवल सत्ता में भागीदारी नहीं था, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संरचना में बुनियादी बदलाव लाना था। यह केवल जातीय प्रतिनिधित्व की राजनीति नहीं, बल्कि वर्ण-जाति के उन्मूलन के साथ वर्ग की ओर बढ़ने का एक संघर्ष था, जो सामाजिक संरचना में क्रांतिकारी बदलाव की बात करता है। मंडल आयोग ने पिछड़े वर्गों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की सिफारिश की, जिससे उनकी सरकारी संस्थानों में भागीदारी बढ़ी। इससे हिंदुत्ववादी वर्चस्व को चुनौती मिली और सामाजिक न्याय का एजेंडा केंद्र में आया।

लेकिन इसके खिलाफ में लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में कमंडल राजनीति उभरी, जिसने धार्मिक ध्रुवीकरण को तेज किया गया। राम मंदिर आंदोलन और रथयात्रा इसी रणनीति का हिस्सा थे। मंडल की राजनीति ने एक दौर में आरएसएस-भाजपा के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को आगे बढ़कर चुनौती दी थी। लेकिन मंडलवादी राजनीति करने वाले राजनेताओं के धीरे-धीरे सत्ता में बने रहने का आस्वाद लेने के मोह में डूबने एवं मंडलवादी सिफारिशों से मुंह मोड़ने के कारण सतत् आरएसएस मजबूत होता रहा।

हालांकि लालू प्रसाद भाजपा व आरएसएस के खिलाफ आज भी मुखर आवाज बनकर खड़े हैं। नीतीश कुमार तो भाजपा का हिस्सा ही हो गए और उसके साथ सरकार चलाते रहे और उसे पांव पसारने का मौका देते रहे। नतीजतन आज भाजपा उनसे उनकी पूरी सत्ता हड़प ली है और राजनीतिक मोर्चें पर भी बेबस बना दिया है। वे दो बार भाजपा से अलग भी हुए तो किसी वैचारिक मतभेदों की वजह से नहीं अपितु अपनी कुर्सी बचाए रखने लिये।

यह समझना जरूरी है कि मंडल आयोग की सिफारिशें केवल आरक्षण तक सीमित नहीं थीं। इसमें कई महत्वपूर्ण सुझाव शामिल थे। मसलन, भूमि सुधार, शिल्पी जातियों के लिए सहायता, पूंजी और तकनीकी सहयोग, लघु उद्योगों को बढ़ावा, निजी क्षेत्र में आरक्षण, शिक्षा सुधार, मुफ्त शिक्षा, छात्रावास, संस्थानों का विकास महत्वपूर्ण सिफारिशें थीं, लेकिन दुर्भाग्यवश, पिछले तीन दशकों में इन सिफारिशों पर गंभीरता से अमल नहीं हुआ। मंडल राजनीति धीरे-धीरे केवल आरक्षण तक सीमित हो गई, जिससे सामाजिक न्याय का व्यापक उद्देश्य कमजोर पड़ गया। मंडल कमीशन की रिपोर्ट स्पष्ट तौर पर कहती है कि सभी राज्य सरकारों को निर्देशित किया जाना चाहिए कि वे प्रगतिशील भूमि कानून बनाएं और उन्हें लागू करें, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूदा उत्पादन संबंधों में बुनियादी संरचनात्मक बदलाव लाए जा सकें। भूमिहीन ओबीसी जातियों को वैसे ही जमीन दिया जाए जैसे भारत सरकार भूमिहीन अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति को जमीन देती है।

औद्योगिकीकरण और मशीन आधारित उत्पादन ने पारंपरिक कारीगर जातियों जैसे कुम्हार, लोहार, बढ़ई, तेली आदि की आजीविका को गंभीर रूप से प्रभावित किया। मंडल कमीशन की सिफारिशों के मुताबिक कोई ठोस योजना नहीं होने से ये समुदाय और हाशिए पर चले गए। आज सामाजिक न्याय का मॉडल कई कारणों से संकट में है आरक्षण को ही अंतिम लक्ष्य मान लेना, भूमि सुधार जैसे बुनियादी बदलावों की अनदेखी, शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में कमजोर नीतियां, राजनीतिक दलों का सत्ता के लिए समझौता, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का बढ़ना – इन कारणों से मंडल राजनीति अपने मूल उद्देश्यों से भटक गई है।

आज जब भाजपा केंद्र और बिहार दोनों जगह मजबूत स्थिति में है, और सामाजिक न्याय का एजेंडा पीछे धकेला जा रहा है, तब मंडलवादी राजनीति को नए सिरे से परिभाषित करने की जरूरत आन पड़ी है। नई मंडल राजनीति को आरक्षण से आगे बढ़कर आर्थिक और सामाजिक संरचना में बदलाव पर ध्यान देना होगा, भूमि सुधार को केंद्र में लाना होगा, शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश बढ़ाना होगा, कारीगर और अतिपिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए ठोस नीतियां बनानी होंगी। साथ ही सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ एक वैकल्पिक मॉडल पेश करना होगा जो सांस्कृतिक तौर पर भी शासक वर्ग के साथ भिन्नता स्थापित करे।

अगर मंडल राजनीति को जीवित और प्रासंगिक बनाए रखना है, तो उसे अपने मूल उद्देश्यों – सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और संरचनात्मक बदलाव – की ओर लौटना होगा। तभी यह राजनीति भविष्य में भी समाज के वंचित तबकों की वास्तविक प्रतिनिधि बन सकेगी। जातियों के गठजोड़ और वोट के समीकरण के राजनीति से आगे सामाजिक न्याय के क्रांतिकारी एजेंडे पर जनता को गोलबंद करना ही होगा। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

कुमार दिव्यम

लेखक पटना विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग में स्नातकोत्तर छात्र व स्वतंत्र लेखक हैं

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