गत 17 अप्रैल, 2026 को पहली बार नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा 131वां संशोधन विधेयक प्रस्तुत किया गया, जिसकी पृष्ठभूमि में 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन विधेयक था। इसके साथ ही सरकार ने परिसीमन से संबंधित दो विधेयक प्रस्तुत किये थे। नारी शक्ति वंदन विधेयक को महिला आरक्षण विधेयक कहा जाता है। लोकसभा में 17 अप्रैल को इसे लेकर मत विभाजन हुआ जिसमें इस विधेयक के पक्ष में 298 और विरोध में 230 मत पड़े। लेकिन संविधान संशोधन के लिए आवश्यक 352 मत प्राप्त नहीं होने की वजह से सरकार द्वारा पेश किया गया विधेयक खारिज हो गया। इसके बाद विपक्ष की ओर से संविधान जिंदाबाद के नारे लगाए गए। इससे पहले लोकसभा में लंबी बहस हुई, जिसमें महिला आरक्षण में ओबीसी महिलाओं की भागीदारी और जातिगत जनगणना के सवाल उठाए गए।
सबसे पहले गौरव गोगोई ने कही जातिगत जनगणना की बात
मसलन, कांग्रेस की ओर से सबसे पहले गौरव गोगोई ने जातिगत जनगणना का सवाल उठाया। उनका कहना था कि सरकार जातिगत जनगणना को लेकर गंभीर नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि हम आज भी कह रहे हैं कि महिला आरक्षण को परिसीमन के साथ मत जोड़िए। 543 सीटों पर ही 2029 में लागू करिए। यह महिला आरक्षण विधेयक नहीं है, यह परदे के पीछे परिसीमन कराने की राजनीतिक मंशा है। गोगोई ने एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण बात कही कि सरकार ने 2022-23 के दौरान दो राज्यों असम और जम्मू-कश्मीर में परिसीमन करवाया। असम में यह काम चुनाव आयोग ने किया और इसके लिए 2001 की जनगण्ना को आधार बनाया गया। जबकि जम्मू-कश्मीर में परिसीमन के लिए एक आयोग का गठन किया गया और उसने 2011 की जनगणना को आधार बनाया। यह सरकार के दोहरे चरित्र का प्रमाण है।
अखिलेश यादव ने कहा, पिछड़ों और मुसलमान महिलाओं को भी मिले आरक्षण
दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने जोर देते हुए कहा कि हम महिलाओं के आरक्षण के पक्ष में हैं, लेकिन सवाल यह है कि भाजपा के अंदर इतनी जल्दबाजी क्यों है। सच तो यह है कि भाजपा जातिगत जनगणना को टालना चाहती है। हमारी मांग है कि आधी आबादी में पिछड़े और मुस्लिम महिलाओं को भी शामिल किया जा जाए।
महिला आरक्षण बिल का शीर्षक सावित्रीबाई फुले के नाम पर रखा जाए
पंजाब के होशियारपुर से आम आदमी पार्टी के सांसद डॉ. राजकुमार छब्बेवाल ने कहा कि सिक्खों के पहले गुरु गुरु नानक देव ने फरमाया कि महिलाओं के सम्मान के बगैर हम समाज की कल्पना नहीं कर सकते। वहीं दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह ने भी अपनी रचनाओं में महिलाओं का सम्मान किया। बाबासाहब डॉ. आंबेडकर ने संविधान में महिलाओं को हक दिया। इसलिए उन्हें ‘चैंपियन ऑफ वुमेन एंपावरमेंट’ कहा जाता है। उन्होंने कहा था कि किसी भी समाज की प्रगति का पैमाना महिलाओं की प्रगति है। सावित्रीबाई फुले भारत की पहली महिला शिक्षिका थीं, जिन्होंने भारत में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला। लेकिन भारत सरकार की ओर से उन्हें वाजिब सम्मान नहीं दिया गया है। मेरी यह मांग है कि महिला आरक्षण बिल का शीर्षक सावित्रीबाई फुले के नाम पर रखा जाए।
प्रियंका गांधी ने भी कहा, ओबीसी महिलाओं को हिस्सेदारी मिले
यहां तक कि प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी ओबीसी के हितों की बात कही। खास बात रही कि अपनी बात रखते हुए प्रियंका संवेदनशील रहीं। उन्होंने मोतीलाल नेहरू का जिक्र करते हुए बताया कि पहली बार उन्होंने ही महिलाओं की राजनीति में सक्रिय भागीदारी का प्रस्ताव पेश किया था। इस पर 1931 में कांग्रेस के कराची अधिवेशन, जिसकी अध्यक्षता सरदार पटेल ने की थी, एक प्रस्ताव पेश किया गया था और स्वीकार भी किया गया था।

प्रियंका गांधी ने जोर देते हुए कहा कि सरकार यह विधेयक लाई है क्योंकि वह अन्य पिछड़ा वर्ग को भागीदारी नहीं देना चाहती है। अगर यह विधेयक पारित होता है तो समझ लीजिए कि देश में लोकतंत्र खत्म हो जाएगा। अगर प्रधानमंत्री ने यह ऐतिहासिक कदम ईमानदारी से उठाया होता तो पूरा सदन इसका समर्थन करता। अगर आप महिलाओं का सम्मान करते हैं तो महिलाओं का राजनीतिक इस्तेमाल नहीं करते तथा यह कदम आपके पद और गरिमा के लिए अनुकूल नहीं है। प्रधानमंत्री ने ओबीसी को ‘इस वर्ग व उस वर्ग’ कहकर पल्ला झाड़ा है। इनको भी अपना हक मिलना चाहिए। प्रधानमंत्री इस बात से घबरा रहे हैं कि जनगणना होगी तो पता चलेगा कि यह ओबीसी कितना बड़ा है। सरकार इस वर्ग का हक छीनना चाहती है।
प्रिया सरोज ने कहा, खास जातियों की महिलाओं को लाभ देना चाहती है सरकार
वहीं, सपा सांसद प्रिया सरोज ने कहा कि हम सभी महिला आरक्षण के सपोर्ट में थे और हैं और रहेंगे। इसमें कोई किंतु-परंतु की बात नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह बिल सचमुच महिलाओं को आरक्षण देने के लिए है या महिलाओं के नाम पर कुछ राजनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए है? मुख्य बात यह है कि महिला आरक्षण में सभी वर्गों की महिलाएं शामिल हों। यदि ऐसा नहीं होता है तो इसका फायदा खास जातियों की महिलाओं तक सीमित हो जाएगा। यह ठीक है कि आधी आबादी को उसका हक मिले, लेकिन उस आधी आबादी में सबकी भागीदारी हो।
कनिमोझी ने कहा, हमें पूजा जाए, यह हम नहीं चाहतीं
कनिमोझी करुणानिधि ने कहा कि इस विधेयक को ‘नारी शक्ति वंदन विधेयक’ कहा गया है। हमें सलाम करना बंद कीजिए। हम सलामी नहीं चाहतीं। हमें किसी ऊंचे स्थान पर बिठाया जाए यह हम नहीं चाहतीं। हमें पूजा जाए यह हम नहीं चाहतीं। हम माता कहलाना नहीं चाहतीं। हम आपकी बहनें या पत्नियां नहीं कहलाना चाहतीं। हम बराबर हैं, इसका सम्मान चाहती हैं। आइए, ऊंचे स्थान से उतरकर एक बराबर चलें। इस देश पर हमारा भी उतना ही अधिकार है जितना कि आपका है। उतना ही यह देश हमारा है। यह संसद हमारी है। और यहां रहने का हमें पूरा अधिकार है।
राहुल गांधी ने फिर उठाया ओबीसी प्रतिनिधित्व का सवाल
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी जातिगत जनगणना और ओबीसी की हकमारी का सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि सरकार ओबीसी को उनका वाजिब हक नहीं देना चाहती है। उन्होंने कहा कि जातिगत जनगणना के बगैर परिसीमन लागू कर सरकार उनके प्रतिनिधित्व को सीमित कर देना चाहती है। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि आज हर क्षेत्र चाहे वह कार्यपालिका हो या न्यायपालिका, सरकारी क्षेत्र हों या निजी क्षेत्र ओबीसी, दलितों, आदिवासियों की भागीदारी न्यूनतम है। उनकी हकमारी से यह देश आगे नहीं बढ़ेगा।
एससी, एसटी, ओबीसी और मुस्लिम महिलाओं के आरक्षण के बगैर महिला आरक्षण अधूरा : चंद्रशेखर
आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के सांसद चंद्रशेखर ने कहा कि हम महिला आरक्षण के पक्ष में हैं। हम इसे महिलाओं का लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकार मानते हैं। मेरी सरकार से मांग है कि महिलाओं के लिए आरक्षण 33 प्रतिशत से बढ़ाकर 51 प्रतिशत कर दिया जाए। जो अधिकार इन्हें सदियों से नहीं मिला, वह अब मिले। ऐसी सरकार और सदन की मंशा होनी चाहिए। लेकिन आरक्षण से पहले महिलाओं की सुरक्षा की बात होनी चाहिए। एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के खिलाफ किस तरह अत्याचार बढ़े हैं। जहां तक महिलाओं के अधिकार की बात है तो यह कोई नई बात नहीं है। सावित्रीबाई फुले, अहिल्याबाई होलकर, फातिमा शेख, झलकारी बाई, अवंतीबाई लोधी, फूलन देवी जैसी वीरांगनाओं के संघर्ष हमारे सामने उदाहरण हैं। बाबासाहब ने भी संविधान बनाते समय कहा था कि हम ऐसा संविधान बना रहे हैं जो सभी को बराबरी का हक देगा, चाहे वह पुरुष हो या महिला। वे यह भी कहते थे कि मैं किसी भी समाज की प्रगति को महिलाओं की प्रगति से माापता हूं। कांशीराम जी ने कहा था कि जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी। अभी जो 33 प्रतिशत आरक्षण की बात कही जा रही है, उसमें एससी, एसटी, ओबीसी और मुस्लिम समाज की महिलाओं की भागीदारी की बात नहीं है। इसके बगैर महिला आरक्षण अधूरा है।
राजद सांसद अभय कुमार सिंह ने कहा कि हमारी पार्टी महिला आरक्षण के पक्ष में है और रहेगी। लेकिन इस आरक्षण में ओबीसी व अल्पसंख्यक समाज की महिलाओं की भागीदारी की बात नहीं है। सरकार महिला आरक्षण के नाम पर देश में परिसीमन के जरिए लोकतंत्र को कमजोर करना चाहती है।
सपा के सांसद आनंद भदौरिया ने कहा कि हास्यास्पद यह है कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम जिसे 2023 में पारित किया गया था, उसे नोटिफाई ही नहीं किया गया। आधी रात में नोटिफाई करके एक्ट बनाया गया। इसी से सरकार की नीयत का पता चलता है कि वह महिला आरक्षण नहीं लागू करना चाहती है। क्या इस आरक्षण में हर तबके की नुमादंगी है? इसमें 80 फीसदी ओबीसी और मुस्लिम बहनों का हक है क्या? जो पीछे छूट गए हैं, सरकार उन्हें बिना गिने किस तरह का आरक्षण देना चाहती है।
मनुवादी ताकतें महिलाओं का इस्तेमाल करती रही हैं : राजाराम सिंह
सपा के ही सांसद नीरज मौर्य ने कहा कि 131वां संशोधन विधेयक लाना क्यों पड़ा जबकि 2023 में सर्वसम्मति से पारित किया गया था। उसे उसी रूप में लागू करने में क्या दिक्कतें आ रही हैं। अगर यह संशोधन लाना ही था तो ओबीसी को भी शामिल कर लेते। उत्तर प्रदेश के अंदर पिछड़ी जाति के चाहे यादव हों, पटेल हों, शाक्य हों, मौर्य हों, अगर इनमें से कुछ लोग कथावाचक बन गए तो उन्हें अपमानित किया जा रहा है। क्या वे इस समाज के नहीं हैं? आधी आबादी को 33 प्रतिशत नहीं, 50 प्रतिशत आरक्षण मिले, हम इसके विरोध में नहीं हैं। जब ईडब्ल्यूएस के लिए दस फीसदी आरक्षण रातोंरात दे दिया गया तब एससी, एसटी और ओबीसी किसी ने इसका विरोध नहीं किया। लेकिन जब यूजीसी रेगुलेशन-2026 लाया गया तब उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। प्रश्न यह है कि सरकार के पास 131वां संशोधन विधेयक लाने का समय है तब उच्च शिक्षा में समानता के लिए तत्परता क्यों नहीं दिखाई गई।
भाकपा माले के सांसद राजाराम सिंह ने कहा कि सरकार द्वारा महिला आरक्षण विधेयक को परिसीमन बढ़ाने के लिए एक आवरण के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। मनुवादी समर्थक ताकतों ने हमेशा महिलाओं का इस्तेमाल किया है। इस बार भी वे इस्तेमाल ही कर रहे हैं। विपक्ष के दबाव पर देश में मुख्य जनगणना के साथ जातिगत जनगणना कराई जा रही है, ऐसे में परिसीमन के लिए वर्तमान जातिगत जनगणना को दरकिनार करना सरकार की मंशा पर संदेह उत्पन्न करता है। आवश्यकता इस बात की है कि जातिगत जनगणना के आंकड़ों के आधार पर नया परिसीमन हो।
(संपादन : अनिल)
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