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विमर्श : संतराम बी.ए. हिंदू संगठनकर्ता नहीं थे

जो आलोचक संतराम बी.ए. के विचारों और कामों को डॉ. आंबेडकर के विचारों के साथ जोड़कर उनका मूल्यांकन करते हैं, उन्हें देखना चाहिए कि 1927 के महाड़ सत्याग्रह और 1930 के कालाराम मंदिर प्रवेश सत्याग्रह के नेतृत्व के बाद ही डॉ. आंबेडकर की छवि एक दलित नेता के रूप में ठीक से बन सकी थी। जबकि संतराम बी.ए. 1922 में ही जात-पात तोड़क मंडल बनाकर पंजाब में जाति विनाश का काम आरंभ कर चुके थे। पढ़ें, डॉ. महेश प्रजापति का यह आलेख

बीसवीं शताब्दी के नवजागरणकालीन जिन समाज सुधारकों की चर्चा दलित साहित्य के अंतर्गत होती है उनमें संतराम बी.ए. का नाम बाद में जोड़ा जाता है। यद्यपि जोतीराव फुले और छत्रपति शाहूजी महाराज को छोड़ दें तो कालक्रम में वह रामासामी पेरियार, डॉ. भीमराव आंबेडकर, स्वामी अछूतानंद हरिहर व चौधरी मंगूराम के समकालीन थे और उत्तर भारत के पेरियार कहे जाने वाले ललई सिंह यादव तथा उत्तर भारत में दलित-पिछड़ों को राजनीतिक भागीदारी कराने वाले जगदेव प्रसाद, कर्पूरी ठाकुर तथा रामस्वरूप वर्मा से तो वह कई साल सीनियर भी थे। लेकिन क्या कारण थे कि भारत के दलित और पिछड़े समुदाय के इन समाज-सुधारकों की जब चर्चा होती है तो संतराम बी.ए. को लगभग पीछे छोड़ दिया जाता है व उनके ऊपर देश के बड़े साहित्यिक मंच या पत्रिकाएं चर्चा करने से उदासीन रहते हैं?

संतराम बी.ए. का जन्म 14 फरवरी, 1887 को पंजाब के होशियारपुर जिले के पुरानी बसी नामक गांव में एक कुम्हार परिवार में हुआ था। जैसा कि उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘मेरे जीवन के अनुभव’ में लिखा है कि उनका परिवार आर्थिक रूप से समृद्ध था और उनके पूर्वजों का व्यवसाय पंजाब के होशियारपुर से कश्मीर और वर्तमान चीन के शिनजियांग प्रांत के यारकंद और काशगर तक फैला था।[1] तत्कालीन अनेक क्रांतिकारियों, स्वाधीनता सेनानियों और समाज सुधारकों की आरंभिक पाठशाला आर्यसमाज हुआ करती थी। संतराम बी.ए. का व्यक्तित्व भी आर्यसमाज की छांव में ही पला-बढ़ा। यह इस कारण भी हुआ क्योंकि आर्यसमाज जो उस समय पूरे देश खासकर पंजाब में प्रगतिशील विचारों का वाहक और प्रचारक बना था, ऐसे में उसकी ओर संतराम बी.ए. का अग्रसर होना स्वाभाविक था।

जीवन के आरंभिक दिनों में आजीविका के लिए वह विभिन्न स्थानों पर भटकते रहे और अंत में 1921 में लाहौर जाकर बस गए।[2] तत्पश्चात भारत विभाजन तक वहीं रहकर ‘जात-पात तोड़क मंडल’ के माध्यम से समाज-सुधार के कार्य करते रहे। भारत विभाजन के पश्चात 1947 में वह अपने गांव पुरानी बसी आ गए और स्वतंत्र लेखन करने लगे, साथ ही वहां के विश्वेश्वरानंद वैदिक शोध संस्थान (साधु आश्रम) से निकलने वाली पत्रिका ‘विश्व ज्योति’ के संपादन से भी जुड़ गए। जीवन के अंतिम दिनों में वह अपनी एकमात्र संतान पुत्री गार्गी देवी के पास दिल्ली चले गए, जहां 101 वर्ष की उम्र में 31 मई, 1988 को उनका निधन हुआ।

अपने सौ वर्षों के जीवन में संतराम बी.ए. ने अनेक संघर्षों का सामना किया। सन् 1909 में गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर से स्नातक करने के बाद उन्होंने समाज सेवा की जो राह चुनी, उसने जीवन भर उन्हें भटकाया ही। लाहौर में बिताए जीवन के कुछ वर्षों को निकाल दिया जाए तो इस यायावरी के चलते वह न तो कोई स्थायी जीविका ही अपना सके और न ही लंबे समय तक कहीं टिके रह सके। लाहौर में 1922 में जात-पात तोड़क मंडल की स्थापना के बाद वह आर्य समाज की सीमाओं के अंदर ही जाति के विनाश का काम करते रहे। इस काम में उन्हें जितनी सफलता और सम्मान मिला, उससे कई गुना कष्ट, अपमान और मानसिक परेशानियां उन्हें झेलनी पडीं, जिसका जिक्र उन्होंने अपनी पुस्तक ‘हमारा समाज’ में किया है।[3] आर्यसमाज के जीर्णमताभिमानियों[4] ने उनके ऊपर हर तरह से हमले किये। न सिर्फ उनके विचारों की खिल्ली उड़ायी बल्कि उनकी जाति को लेकर अपमानजनक टिप्पणियां कीं। इन सबके बीच बिना विचलित हुए संतराम बी.ए. जाति और वर्ण-व्यवस्था, ऊंच-नीच के खिलाफ, स्त्रियों के सवालों पर, बच्चों के पालन-पोषण और उन्हें सच्चरित्र बनाने, हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने और अन्य विषयों पर लिखते रहे। इनमें ‘हमारा समाज’, ‘मेरे जीवन के अनुभव’ आदि पुस्तकें चर्चित हुईं। विश्व की अनेक भाषाओं के बेहतरीन ग्रंथों का उन्होंने हिंदी में अनुवाद किया। इनमें ‘अलबरूनी का भारत’, ‘इत्सिंग की भारत यात्रा’, प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक डेल कारनेगी की चर्चित पुस्तक ‘हाउ टू विन फ्रेंड्स एंड इन्फ्लुएंस पीपल’ का लोक-व्यवहार नाम से तथा प्रसिद्ध ब्रिटिश लेखिका और चिकित्सक मेरी स्टोप्स की महिला-अधिकार व यौन शिक्षा संबंधी पुस्तकों – ‘विवाहित प्रेम’, ‘दंपत्ति मित्र’ आदि मिलाकर उन्होंने सौ के लगभग पुस्तकें लिखीं अनुवादित और संपादित कीं।[5]

संतराम बी.ए. के जीवन परिचय और संघर्ष के आधार पर कहा जा सकता है कि यद्यपि उनका परिवार आर्थिक दृष्टि से संपन्न था, लेकिन सामाजिक स्तर पर वह शूद्र वर्ण में ही आते थे। इसके कारण अनेक कटु अनुभव उन्हें अपने विद्यार्थी जीवन में हो चुका था। शिक्षा-ग्रहण के दौरान उन्हें भी जाति-व्यवस्था के वही कटु अनुभव हुए थे जो डॉ. आंबेबेडकर जैसे महापुरुषों को झेलने पड़े थे। आगे चलकर आर्यसमाज में काम करते हुए तो उन्हें और भी कड़वे-कसैले अनुभव उन्हें हुए थे, जिनका उल्लेख उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘मेरे जीवन के अनुभव’ में किया है।[6] जाति के स्तर पर कुम्हार जाति की यह स्थिति आजादी के बाद भी बनी रही। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद कुछ पिछड़ी जातियां जागरूकता के चलते लामबंद हुईं और मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक रूप से संपन्न हुईं। उत्तर प्रदेश और बिहार में त्रिवेणी संघ के इतिहास से यह जानकारी की जा सकती है।[7] कुम्हार समुदाय के इस पिछड़ेपन का नुकसान संतराम बी.ए. को भी उठाना पड़ा।

जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि मंडल कमीशन की सिफारिशों के बाद पिछड़े समुदाय की अगड़ी जातियों के अनेक युवक अकादमिक दुनिया में आए और उन्होंने अपने-अपने समुदाय के नवजागरणकालीन समाज सुधारकों पर शोधकार्य आरंभ किये, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं ने उनके ऊपर विशेषांक निकाले और सामाजिक व सांस्कृतिक मंचों पर उनकी वैचारिकी पर बहसें आयोजित कीं। यद्यपि इसके कुछ अपवाद भी हो सकते हैं, लेकिन अमूमन देश में ऐसा ही होता आया है कि लोगों ने अपनी-अपनी जाति के महापुरुषों पर ही काम किया। इस पर गौर किया जाना दिलचस्प होगा कि संतराम बी.ए. जिस कुम्हार जाति में पैदा हुए थे, उसमें आजादी के सात दशक बाद कोई ऐसी राजनीतिक शख्सियत भी नहीं हो सकी जो देश की संसद या प्रांतों की विधानसभा में उनसे संबंधित कोई सवाल ही पूछ सकती हो। यह सवाल उठाना इसलिए लाजिमी है कि आजादी के बाद दलित और पिछड़े समाज के अनेक महापुरुषों के नाम पर स्मारक बने, सड़कों, भवनों और शैक्षणिक संस्थानों के नाम रखे गए, उनके साहित्य का प्रकाशन सरकारी स्तर पर किया गया, लेकिन संतराम बी.ए. की स्मृतियों को संजोने का कोई काम सरकारी या निजी तौर पर नहीं किया गया।

फिर संतराम बी.ए. चर्चा में कैसे आए?

दरअसल बीसवीं शताब्दी के आठवें दशक में जब दलित साहित्य विधिवत चर्चा में आया और आत्मकथाओं के जरिए उसने स्वयं को मुख्यधारा के साहित्य के मुकाबले में खड़ा करना प्रारंभ किया, उससे पहले ही संतराम बी.ए. अपनी आत्मकथा ‘मेरे जीवन के अनुभव’ (1967) लिख चुके थे। यद्यपि वे दलित समुदाय से नहीं पिछड़े समुदाय से आते थे, लेकिन इस आत्मकथा में ऐसा बहुत कुछ था जो दलित आंदोलन को गति दे सकता था। जात-पात तोड़क मंडल के 1936 के वार्षिक अधिवेशन की अध्यक्षता भले ही वे डॉ. आंबेडकर से न करवा सके, लेकिन इसके कारण उनकी अंतरंगता डॉ. आंबेडकर से हो गई थी। कहा जा सकता है कि डॉ. आंबेडकर के विचारों की छाप उनके ऊपर इतनी अधिक पड़ चुकी थी कि उन्हें दलित आंदोलन और दलित साहित्य में अच्छी तरह समावेशित किया जा सकता था। कारण यह कि संतराम बी.ए. की आत्मकथा को ‘दलित साहित्य की पहली स्वजीवनी’ कहकर परिचित कराया जाता रहा है।[8] इस बात से दलित आंदोलन के कुछ विचारक नाराज हो सकते हैं कि डॉ. आंबेडकर को छोड़ दें तो जिन महापुरुषों की वैचारिकता को आधार बनाकर यह आंदोलन आगे बढ़ा, उनमें अधिकतर पिछड़े समुदाय से ही आते थे। यह बात अलग है कि कुछ जातियों को छोड़ दें तो देश का विशाल पिछड़ा समुदाय वैचारिकता के मामले में आज भी खुद को बहुजन कहलाने में हिचकता है।

संतराम बी.ए. (14 फरवरी 1887 – 31 मई 1988)

आलोचनाओं के घेरे में संतराम बी.ए.

इस बात का जिक्र ऊपर किया जा चुका है कि दलित आंदोलन के उभार के दिनों में संतराम बी.ए. को किस तरह दलित लेखकों में शुमार करके उनकी आत्मकथा को ‘हिंदी की पहली दलित आत्मकथा’ घोषित किया गया।[9] उनके ऊपर लेख लिखे गए, लेकिन आज एक दलित युवा आलोचक सुजीत कुमार सिंह द्वारा उन्हें एक ‘हिन्दू संगठनकर्ता’ के रूप में प्रचारित किया जा रहा है।[10] अपनी भूमिका में वे लिखते हैं– “संतराम बी.ए. एक ऐसा वृहत्तर हिंदू समाज चाहते थे जो संगठित होकर मुसलमानों से टक्कर ले सके। चूंकि मुसलमान मेहनत-मजदूरी करने वाले थे। अत: ‘मुसलमानी दल का दंगे-फिसाद के समय’ उनसे मुकाबला करने के लिए हिंदू-दल में अछूतों को शामिल करना आवश्यक माना गया।”[11]

सुजीत कुमार सिंह बाबू मंगूराम और संतराम बी.ए. के बीच अंतर की बात कहते हैं। उनका मानना है कि दोनों की राहें अलग थीं। वे यह कहते हैं कि “संतराम बी.ए. ने अपने सशक्त हिंदू राष्ट्र की योजना में बाबू मंगूराम जी को कांटे के रूप में देखा।”[12] जबकि इसके ठीक बाद वे लिखते हैं– “बाबू मंगूराम और संतराम बी.ए. – दोनों एक ही इलाके के रहने वाले। दोनों का मिलना-जुलना था। एक-दूसरे के घर आना-जाना भी। इसलिए ‘युगांतर’ के पृष्ठों पर बाबू मंगूराम और उनके आदिधर्म मंडल की जोरदार उपस्थिति भी दिखाई देती है। लेकिन दोनों के रास्ते अलग हैं। यह रास्ता ही बहुजनों को एक नहीं होने दिया। बाबू मंगूराम जी सही रास्ते पर थे। परंतु, संतराम बी.ए. सवर्ण हिंदुओं के झांसे में आकर गलत राह पकड़ लिए थे।”[13]

अपने इस निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सुजीत कुमार सिंह अपनी भूमिका में यह भी लिखते हैं– “संतराम बी.ए. के विचारों में होनेवाले परिवर्तनों को समझने के लिए उनके संपूर्ण साहित्य का अध्ययन आवश्यक है।” (वही, पृष्ठ 20)

इस किताब की भूमिका दलित समालोचक कंवल भारती ने लिखी हैं।[14] ऐसे में संतराम बी.ए. के बारे में ऐसी स्थापनाओं और हिंदुत्व संबंधी उनके विचारों पर बात करना जरूरी हो जाता है।

जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है संतराम बी.ए. की वैचारिकी तत्कालीन अनेक समाज सुधारकों, क्रांतिकारियोंकारियों और स्वाधीनता सेनानियों की भांति आर्यसमाज की सीमाओं में निर्मित हुई थी। हर लेखक विचारक की भांति वह भी अपने समय और परिस्थितियों की उपज थे। जिस समय उन्होंने पंजाब में जाति-व्यवस्था के विरुद्ध लिखना-बोलना शुरू किया, तब उनके सामने कोई बनी-बनाई राह नहीं थी। उनकी मातृभाषा पंजाबी और शिक्षा का माध्यम फारसी थी। हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत भाषा का ज्ञान उन्होंने स्वाध्याय से अर्जित किया था और बाद में महावीर प्रसाद द्विवेदी के प्रोत्साहन से हिंदी को अपने लेखन की भाषा बनाया था। यद्यपि उन्होंने हिंदुत्व संबंधी विचार आर्यसमाज से ही ग्रहण किए थे, लेकिन इस पर उनकी अपनी मौलिक सोच क्या थी, यह देखना जरूरी होगा।

जो आलोचक संतराम बी.ए. के विचारों और कामों को डॉ. आंबेडकर के विचारों के साथ जोड़कर उनका मूल्यांकन करते हैं, उन्हें देखना चाहिए कि 1927 के महाड़ सत्याग्रह और 1930 के कालाराम मंदिर प्रवेश सत्याग्रह के नेतृत्व के बाद ही डॉ. आंबेडकर की छवि एक दलित नेता के रूप में ठीक से बन सकी थी। जबकि संतराम बी.ए. 1922 में ही जात-पात तोड़क मंडल बनाकर पंजाब में जाति विनाश का काम आरंभ कर चुके थे और उर्दू में ‘क्रांति’ नामक पत्रिका धड़ल्ले से निकाल रहे थे। इससे पहले भी वह ‘भारती’, ‘आर्य मुसाफिर’, ‘दीपक’ और ‘उषा’ नामक पत्रिकाएं निकालकर अच्छी खासी ख्याति अर्जित कर चुके थे। महाराष्ट्र में जोतीराव फुले और दक्षिण के गैर-ब्राह्मण आंदोलन के उभार से उनका गहन परिचय तब तक नहीं हो सका था। फिर भी देश की जाति और वर्णवादी व्यवस्था से उनकी असहमति अच्छी तरह बन चुकी थी। मार्च, 1935 से उन्होंने ‘युगांतर’ नामक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया, जो उनके जात-पात तोड़क मंडल का मुखपत्र थी।

इस पत्रिका में संतराम बी.ए. जाति और वर्ण-व्यवस्था के विरुद्ध, हिंदी को राजभाषा बनाने और उसे उसका गौरव दिलाने, स्त्रियों के संतानोत्पत्ति और यौन अधिकारों (आज के स्त्री विमर्श से दशकों पहले वे इस विषय पर लिख और छाप रहे थे) तथा लोक-व्यवहार संबंधी लेख, कविताएं, कहानियां व अन्य विधाओं की सामग्रियां छापते थे। ‘युगांतर’ का लेखक मंडल लगभग वही था जो समकालीन ‘सरस्वती’, ‘चाॅंद’, ‘माधुरी’, ‘प्रताप’, ‘विश्वमित्र’ और ‘हंस’ आदि पत्रिकाओं का था।

यह बात सही है कि ‘युगांतर’ के रचनाकार केवल दलितों की पीड़ा और करुणा के वर्णन तक ही सीमित रहे, शोषक और शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ आज की तरह आक्रोश और प्रतिरोध की आवाज वह नहीं उठा सके, जिसने सदियों से दलितों को हाशिए पर रखा था। लेकिन यह भी नहीं कि दलितों की इस दुर्वस्था पर वह चुप थे। आर्यसमाज के रुढ़िवादी कार्यकर्ताओं, कांग्रेस के पक्षपाती सवर्ण नेताओं, अछूत और दलितोद्धार के अगुवा महात्मा गांधी और हिंदू महासभा के कर्ता-धर्ता मदनमोहन मालवीय जैसे दिग्गजों से दलितोद्धार के मुद्दों पर संतराम बी.ए. की भिड़ंत के कुछ उदाहरणों को देखना यहां दिलचस्प होगा।

आर्यसमाजियों और हिंदू महासभा के नेताओं ने मुसलमानों और ईसाइयों के विरुद्ध हिंदुओं को गोलबंद करने हेतु ‘शुद्धि’ नामक जो अभियान चलाया, उसकी असलियत बहुत दिनों तक छिपी नहीं रह सकी। वास्तविकता यह थी कि सवर्ण आर्यसमाजी और हिंदू महासभा के मदनमोहन मालवीय आदि मुस्लिम लीग के विरुद्ध हिंदुओं को एकजुट करने हेतु ‘शुद्धि’ जैसे ढकोसले कर रहे थे। शूद्र और अतिशूद्र हिंदुओं को उनकी दीन-हीन अवस्था से बाहर निकालने की उनकी कोई मंशा नहीं थी।

संतराम बी.ए. इस तरह के ढकोसलों के सख्त खिलाफ थे। इस संबंध में उन्होंने अपनी आत्मकथा में साफ-साफ लिखा कि– “उनको (रुढ़िवादी आर्यसमाजियों को) मेरी बातें चुभने का कारण यह था कि वह अछूतोद्धार और जात-पात मिटाने जैसी बातें हिंदूहित या अधिक से अधिक राष्ट्रहित की दृष्टि से करना चाहते थे। दूसरे शब्दों में वह चाहते थे कि भंगी रहे तो भंगी ही, पर उनका वेतन बढ़ जाए या उसकी टट्टी उठाने की रीति का सुधार हो जाए। इसके विपरीत मेरा भाव बदल चुका था। मैं यह दोनों कार्य मानवता की दृष्टि से करना चाहता था। भारतीय मुसलमानों और अछूतों के हिंदू-विरोध का मूल कारण भी मैं हिंदुओं की दूषित मनोवृति को ही समझता था।… एक मनुष्य रहे तो अछूत पर हिंदू कहलाए या भारत को स्वराज मिल जाए पर वह व्यक्ति अपनेआप गुलाम ही बना रहे, इसलिए अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए हम अछूतों को ‘शुद्ध’ कर लें और ईसाई या मुसलमान न बनने दें। यह बात मुझे स्वार्थपरता लगने लगी थी। मैं चाहता था कि व्यक्ति को मानवता के अधिकार प्राप्त हों, मजहब (धर्म) से वह चाहे हिंदू, मुसलमान या ईसाई रहे। धर्म मनुष्य के हितार्थ होना चाहिए नीच स्वार्थसिद्धि के लिए नहीं। अछूत को यदि दास, शूद्र या नीच ही रहना है तो स्वराज उसके लिए विदेशी राज्य से कुछ भी अच्छा नहीं।”[15]

सभी जानते हैं कि पूना पैक्ट के बाद दलितोद्धार के बारे में कांग्रेस के सवर्ण नेताओं की पोल खुल चुकी थी और उन्होंने छुआछूत की समस्या खत्म करने हेतु कुछ ऊपरी उपाय किए थे। इसी मुद्दे पर ‘युगांतर’ के मार्च, 1935 के अंक में उन्होंने संपादकीय टिप्पणी लिखी– “जात-पात ने हिंदुओं को मनुष्यता से भी गिरा रखा है। ऊपर से दया-धर्म की दुंदुभी बजाते हुए भी यह भीतर से कसाई बन गए हैं। हमारे मित्र श्रीमान बाबू तीर्थराम जी ने हमें एक बार अपनी आंखों-देखी घटना सुनाई। शिकोहाबाद में उनका कारखाना था। उनके कहार नौकर को इन्फ्लूएंजा हो गया। वह बेचारा पानी के लिए तड़पने लगा। उसने बाबूजी के ब्राह्मण रसोईया को पुकारा कि मुझे पानी दो, परंतु उसने पानी देने से इनकार कर दिया। जब श्री तीर्थराम जी को पता लगा तो उन्होंने ब्राह्मण से बीमार को पानी न देने का कारण पूछा। वह बोला– ‘मैं उसे पानी कैसे दे सकता हूं? वह तो कहार है, उसका जूठा बर्तन कौन मांजेगा? ससुरा थूकता है, पखाना करता है, पानी के छींटे उड़ते हैं। कहार से कौन छुए।’ यह है दया-धर्म की दुहाई देने वालों का नमूना! आप जहां भी देखेंगे प्याऊ पर पानी पिलाने वाले आपको सब कहीं ब्राह्मण ही मिलेंगे। कारण यह कि कहार के हाथ से ब्राह्मण और ठाकुर पानी नहीं पी सकते हैं। इतर जातियों के छींटे से भ्रष्ट न हो जाएं, इसलिए यह प्याऊ पर बैठने वाले ब्राह्मण देवता अपनी लुटिया को एक लंबा डंडा से बांधे रखते हैं और दूर से ही दया का पनाला बहाते हैं। यह पवित्रता के अवतार वास्तव में जन्मजात अभिमान के पुतले क्या ‘समता और भ्रातृभाव के असली प्रचारक इस्लाम’ के खर-स्रोत को रोक सकते हैं।”[16]

इसी तरह जब सन् 1932 में जब मदनमोहन मालवीय ने हिंदुओं को ध्रुवीकृत करने हेतु उन्हें मंत्र-दीक्षा के द्वारा पवित्र करने की शुरुआत की तब संतराम जी ने लिखा– “श्रीमान मालवीय जी इस कलिकाल में पतित पावन बने हैं। आप अछूतों को मंत्र दीक्षा देकर पवित्र कर रहे हैं। ब्राह्मण देवता के मुख से ‘नमो भगवते वासुदेवाय’ की गुनगुनाहट सुनकर ही हमारे अछूत भाइयों का उद्धार हो जाएगा। हम तो केवल भगवत को ही पतित-पावन सुनते आए हैं, पर अब मालूम हुआ कि कुछ मनुष्य भी अपने को पतित पावन कहाते हैं। मनुष्यता का कितना भारी अपमान है। इस साम्यवाद और प्रजातंत्र के युग में भी एक मनुष्य अपने को केवल जन्म के कारण इतना ऊंचा समझता है कि वह दूसरे मनुष्यों को नीच और पतित मानकर अपनी गुनगुनाहट से उनका उद्धार कर सकता है! ब्राह्मण की यह जन्म की उच्चता ही तो अछूतपन का मूल कारण है। और मंत्र दीक्षा का ढोंग रचकर भी उच्चता को और दृढ़ किया जा रहा है।”[17]

इन समस्त घटनाओं पर विचार करने के बजाय सुजीत कुमार सिंह संतराम बी.ए. से फुले और डॉ. आंबेडकर के विचारों और कार्यों के समान अपेक्षा करते हैं और उन्हीं की कसौटी पर उन्हें कसते हैं और जब वह इस कसौटी पर खरे नहीं उतरते हैं तो उन्हें ‘हिंदू संगठनकर्ता’ जैसी उपाधियां देकर भ्रम पैदा करते हैं।

यह बात सही है कि डॉ. आंबेडकर ने जहां हिंदू धर्मग्रंथों की खामियों को जानकर और उसमें सुधार की गुंजाइश न मानकर उसे पूरी तरह नकार दिया, वहीं संतराम बी.ए. ने हिंदू धर्मग्रंथो में से चुन-चुनकर वही बातें हिंदुत्व के तथाकथित रक्षकों के समक्ष रखीं और उन्हें फटकारा कि देखो, तुम जिन धर्मग्रंथो के आधार पर अपने ही इन भाइयों को दीन-हीन बनाकर उन पर जुल्म करते हो, उसकी इजाजत यह धर्मग्रंथ तुम्हें बिलकुल नहीं देते! उन्होंने वेद-पुराण और प्राचीन धर्मग्रंथों के आधार पर यह सिद्ध किया कि सवर्ण हिंदुओं द्वारा शूद्रों के प्रति किए जाने वाले अत्याचार सर्वथा निंदनीय है।[18]

कह सकते हैं कि डॉ. आंबेडकर एक बडे़ भवन (हिंदू धर्म) के किसी क्षतिग्रस्त और जर्जर हिस्से को देखकर उसमें सुधार की कोई गुंजाइश न देखकर उसे छोड़कर दूसरे छोटे भवन में जाना ही हितकर समझते हैं और संतराम बी.ए. उसी पुराने जर्जर भवन की आजीवन मरम्मत करते रहने को श्रेयस्कर समझते हैं। भले ही दोनों भवन एक ही भारत भूमि पर खड़े हैं, लेकिन अपने मूलनिवासी पूर्वजों के भवन को ठोक-पीटकर मरम्मत करने को गलत कैसे कहा जा सकता है?

इस संबंध में संतराम बी.ए. ने अपनी आत्मकथा में लिखा है– “मेरा जन्म एक ऐसी जाति में हुआ था जो न तो द्विजों के समान ऊंची है और न अछूत के समान बिल्कुल गिरी हुई। ऐसी जाति में जन्म पाने से मैं इस योग्य हुआ कि कथित द्विज और कथित अछूत जातियों की दशा का ठीक-ठाक सर्वेक्षण कर सकूं। मैं सही या गलत तौर पर इस परिणाम पर पहुंचा हूं कि अछूतों और शूद्रों को उतना अपनी निर्धनता का दुख नहीं जितना कि द्विजों द्वारा पग-पग पर होने वाले उनके सामाजिक तिरस्कार का। भारत में मुसलमानों की इतनी अधिक संख्या और उनके हिंदुओं का विरोधी होने और साथ ही कथित अछूतों की दुर्व्यवस्था का मूल कारण ऊंचे वर्ण के हिंदुओं की दूषित मनोवृति है। जन्माभिमान के नशे में मदमस्त हो इन्होंने मानवता का दिवाला निकाल दिया है। इन्होंने अपनों को पराया ही नहीं कट्टर शत्रु भी बनाया है। इन्होंने विदेशियों की सहस्रों वर्ष की दासता सहन की, परंतु जन्मना ऊंच-नीच अर्थात जात-पात को न छोड़ा। चिकनी-चुपड़ी बातों का इन पर कोई प्रभाव नहीं होता। कुंभकर्ण की नींद सोई हिंदू जाति को जगाने के लिए कठोर कशाघात का प्रयोजन है। इसीलिए मुझे खरी-खरी सुनानी पड़ती है।”[19]

कह सकते हैं कि संतराम बी.ए. ने एक कुम्हार परिवार में जन्म लिया था और गुरु की महिमा वह अच्छी तरह जानते थे– “गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़-गढ़ काढै खोट। अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट।” इतना सब कुछ जानकर भी संतराम बी.ए. को ‘हिंदू संगठनकर्ता’ कहकर भ्रम फैलाया जाए तो यह भ्रम फैलाने वाले की मंशा पर सवाल उठना लाजिमी है।

संदर्भ :

[1] संतराम बी.ए., मेरे जीवन के अनुभव, संतराम बी.ए. फाउंडेशन प्रकाशन, 2021, पृष्ठ 13
[2] वही, पृष्ठ 46-56
[3] वही, प्राक्कथन, पृष्ठ 5-7
[4] संतराम बी.ए. रुढ़िवादी आर्यसमाजियों के लिए यही शब्द इस्तेमाल किया करते थे।
[5] मेरे जीवन के अनुभव, उपरोक्त, पृष्ठ 92
[6] वही, पृष्ठ 125
[7] डॉ. लक्ष्मण यादव, जाति जनगणना : जात से जमात की ओर, युवान बुक्स दिल्ली, 2026, पृष्ठ 86-87
[8] देखें भूमिका, मेरे जीवन के अनुभव, लेखक संतराम बी.ए., संपादक सतनाम सिंह, सम्यक प्रकाशन, 2008
[9] वही, पृष्ठ 6-7
[10] अछूतों की आह, संकलन-संपादन सुजीत कुमार सिंह, रुद्रादित्य प्रकाशन, प्रयागराज, 2026, पृष्ठ 17
[11] वही, पृष्ठ 36
[12] वही
[13] वही
[14] वही, भूमिका, कंवल भारती, पृष्ठ 7-16
[15] मेरे जीवन के अनुभव, उपरोक्त, पृष्ठ 133
[16] युगांतर (मासिक), संपादक संतराम बी.ए., मार्च, 1935, पृष्ठ 35
[17] वही, पृष्ठ 56
[18] हमारा समाज – लेखक संतराम बी.ए., संतराम बी.ए. फाऊंडेशन प्रकाशन, 2022, सभी परिच्छेद
[19] मेरे जीवन के अनुभव, उपरोक्त, पृष्ठ 135

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

महेश प्रजापति

लेखक संतराम बी.ए. फाऊंडेशन, शाहजहांपुर, उत्तर प्रदेश के संस्थापक हैं

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