जब कोई व्यक्ति लगातार व्यवस्था की कठिनाइयों, अन्याय, उपेक्षा और असंवेदनशीलता का सामना करता है, तब वह मानसिक रूप से टूटने लगता है। समाज और शासन की व्यवस्था लोगों की सहायता और सुरक्षा के लिए बनाई जाती है, लेकिन जब यही व्यवस्था आम इंसान की समस्याओं को समझने में असफल हो जाती है, तब व्यक्ति के भीतर निराशा, गुस्सा और हताशा बढ़ने लगती है। ऐसी स्थिति में वह ऐसे कदम उठाने को विवश हो सकता है, जिसकी सामान्य परिस्थितियों में कल्पना नहीं की जा सकती।
भारत जैसे सार्वभौमिक गणतंत्र से लोगों को समानता, स्वतंत्रता, न्याय और सुरक्षा की अपेक्षा होती है। नागरिक चाहते हैं कि सरकार सभी धर्मों, जातियों और वर्गों के लोगों के साथ समान व्यवहार करें तथा उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसी मूलभूत सुविधाएं प्रदान करें। इसके साथ ही लोग एक ऐसी शासन व्यवस्था की आशा करते हैं जहां भ्रष्टाचार कम-से-कम हो, कानून का पालन हो और देश का विकास सभी के हित में किया जाए। हर व्यक्ति अपने जीवन में सम्मान और न्याय चाहता है। वह चाहता है कि उसकी बात सुनी जाए और उसकी समस्याओं का समाधान हो। लेकिन जब उसे बार-बार दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, अधिकारियों द्वारा अनदेखा किया जाता है या छोटी-सी जरूरत के लिए भी अपमान सहना पड़ता है, तब उसके धैर्य की सीमा टूटने लगती है। गरीब, आदिवासी और कमजोर वर्ग के लोगों के लिए यह समस्या और भी गंभीर होती है, क्योंकि उनके पास कई तरह से संसाधन, शिक्षा और पहुंच की कमी होती है।
हाल ही ओडिशा के क्योंझर जिला की घटना इसका एक बड़ा उदाहरण है, जहां एक आदिवासी व्यक्ति अपनी मृत बहन का कंकाल लेकर बैंक पहुंच गया। यह केवल एक घटना नहीं थी, बल्कि उस व्यक्ति की पीड़ा, मजबूरी और वर्तमान कालीन बैंकिंग व्यवस्था के प्रति उसकी हताशा का प्रतीक थी। उसने ऐसा कदम इसलिए उठाया क्योंकि उसे लगा कि उसकी बात पर कोई विश्वास नहीं कर रहा और उसकी समस्या का समाधान नहीं किया जा रहा। जब इंसान को चारों ओर से निराशा मिलती है, तब वह समाज का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए असामान्य कदम उठाने के लिए विवश हो ही जाता है।
जानकारी के अनुसार, जीतू मुंडा की बहन कलरा मुंडा की मृत्यु जनवरी, 2026 में हो गई थी। उनकी बहन के बैंक खाते में 19300 रुपए जमा थे, जिन्हें निकालने के लिए बैंक द्वारा मृत्यु प्रमाण पत्र या अन्य दस्तावेज मांगे गए। गरीब और अशिक्षित होने के कारण जीतू मुंडा आवश्यक कागज़ उपलब्ध नहीं करा पाए। उन्हें बार-बार बैंक से कहा गया की आपकी बहन की मृत्यु हुई है, इसका प्रमाण क्या है? जीतू मुंडा कई बार प्रमाण देने का भरसक प्रयास भी किया, परंतु बैंक के लिए वे काफी नहीं था। इसके बाद उन्होंने अपनी बहन की कब्र खोदकर कंकाल निकाला और कांधे पर रखकर लगभग 3 किलोमीटर पैदल चलकर उसे बैंक में लेकर गए ताकि यह साबित कर सकें कि उनकी बहन की मृत्यु हो चुकी है।
इतिहास में भी ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं, जब लोगों ने अन्याय और शोषण से तंग आकर विद्रोह किया। कई आंदोलन हुए, कभी धरने, तो कभी आत्मसम्मान बचाने के लिए लोगों ने कठोर फैसले लिए। यह बताता है कि यदि व्यवस्था संवेदनशील और न्यायपूर्ण न हो, तो समाज में असंतोष बढ़ता जाता है।
इस घटना का सामाजिक और सांस्कृतिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है। मुंडा आदिवासी समुदाय में मृत शरीर को कब्र से निकालना अपवित्र माना जाता है। इसलिए समुदाय के बुजुर्गों ने जीतू मुंडा से शुद्धिकरण अनुष्ठान करवाया। बाद में उन्होंने परंपरा के अनुसार पूजा और सामुदायिक भोज भी कराया।

अगर किसी परिस्थितिवश जीतू मुंडा की जगह कोई आदिवासी महिला होती तो उसके सामने कठिनाइयां और भी अधिक हो सकती थी। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में महिलाओं को अक्सर आर्थिक, सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर ज्यादा संघर्ष करना पड़ता है। बैंक, सरकारी दफ्तर या कानूनी प्रक्रियाओं तक उनकी पहुंच कई बार सीमित होती है।
संभावना यह भी हो सकता था कि अकेली महिला को सुरक्षा, सामाजिक दबाव और लोगों की आलोचना का सामना करना पड़ता। कई जगहों पर महिलाओं की बात को गंभीरता से लेने में भी देरी होती है। यदि वह अपनी बहन या परिवार के सदस्य का कंकाल लेकर बैंक पहुंचती, तो समाज में उसके प्रति सहानुभूति के साथ-साथ ताने, डर या अपमानजनक व्यवहार भी हो सकता था।
भारतीय ग्रामीण और आदिवासी समाज के कई हिस्सों में आज भी महिलाओं के प्रति अंधविश्वास, पितृसत्ता और सामाजिक भेदभाव गहराई से मौजूद हैं। ऐसी स्थिति में यदि कोई आदिवासी महिला अपने अधिकारों के लिए कब्रिस्तान तक पहुंचकर कब्र खोदने जैसा कदम उठाती, तो संभव है कि समाज उसके इस कार्य को मानवीय मजबूरी के बजाय अपशकुन, परंपरा-विरोध या डायन जैसी कुप्रथाओं से जोड़ देता। कई क्षेत्रों में महिलाओं को छोटी-छोटी असामान्य घटनाओं या सामाजिक मान्यताओं के विरुद्ध जाने पर डायन कहकर अपमानित, प्रताड़ित या समाज से बहिष्कृत करने की घटनाएं सामने आती रही हैं। ऐसी महिला को धार्मिक रीति-रिवाज तोड़ने वाली, अशुभ या समुदाय की मर्यादा के खिलाफ बताकर पंचायत और समाज द्वारा मानसिक तथा सामाजिक दबाव झेलना पड़ सकता था। इसके कारण वह केवल प्रशासनिक अन्याय ही नहीं, बल्कि अपनी इज्जत, सुरक्षा और सामाजिक पहचान के संकट से भी गुजरती। यह स्थिति दिखाता है कि महिलाएं विशेषकर आदिवासी और गरीब महिलाओं को अपने अधिकार पाने के लिए दोहरी लड़ाई लड़नी पड़ती है– एक व्यवस्था के खिलाफ और दूसरी समाज में फैली रूढ़ियों और अंधविश्वासों के खिलाफ।
झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, बिहार और असम जैसे कुछ राज्यों में डायन बताकर महिलाओं की पिटाई करना, सिर मुंडवाना, गांव से निकाल देना और पत्थर मार-मार कर हत्या करनेे तक की घटनाएं सामने आती रही हैं। अधिकतर मामलों में महिलाएं गरीब, विधवा, अकेली या आदिवासी समुदाय से होती हैं, जिनकी सामाजिक सुरक्षा कमजोर होती है। यह केवल अंधविश्वास ही नहीं, बल्कि महिलाओं के अधिकारों, सम्मान और मानवता पर सीधा हमला है। ऐसी घटनाएं बताती हैं कि समाज में शिक्षा, वैज्ञानिक सोच, कानून के प्रति जागरूकता और महिलाओं की सुरक्षा को मजबूत करना कितना आवश्यक है।
यद्यपि आदिवासी समाज में महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण सामान्यतः सम्मान, सहभागिता और श्रम-साझेदारी पर आधारित माना जाता है। आदिवासी समुदायों में महिलाएं परिवार, खेती, जंगल से जुड़े कार्यों, पारंपरिक उत्सवों और सामाजिक निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वे आर्थिक गतिविधियों में पुरुषों के साथ बराबरी से भाग लेती हैं, इसलिए उन्हें केवल घर तक सीमित नहीं माना जाता। कई आदिवासी समाजों में विवाह, नृत्य, गीत और सांस्कृतिक परंपराओं में महिलाओं को अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता भी मिलती है।
लेकिन, यह भी सच है कि सभी आदिवासी समाज पूरी तरह समानतावादी नहीं है। आधुनिक सामाजिक दबाव, गरीबी, अशिक्षा और बाहरी प्रभावों के कारण कुछ क्षेत्रों में महिलाओं को भेदभाव, घरेलू हिंसा, संपत्ति के अधिकारों की कमी और अंधविश्वास जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। डायन प्रथा जैसी कुरीतियां भी कई बार महिलाओं के खिलाफ हिंसा का कारण बनती हैं। फिर भी व्यापक रूप से देखा जाए तो आदिवासी समाज में महिलाओं की भूमिका श्रम, संस्कृति और सामुदायिक जीवन की धुरी के रूप में महत्वपूर्ण मानी जाती है।
आदिवासी कवयित्री निर्मला पुतुल आदिवासी समाज में पितृसत्तात्मकता व्यवस्था को देखते हुए अपनी कविता ‘कुछ मत कहो सजोनी किस्कू’ में लिखती हैं–
“बस! बस! रहने दो!
कुछ मत कहो सजोनी किस्कू!
मैं जानती हूं सब
जानती हूं कि अपने गांव बागजोरी की धरती पर
जब तुमने चलाया था हल
तब डोल उठा था
बस्ती के मांझी-थान में बैठे देवता का सिंहासन
गिर गई थी पुश्तैनी प्रधानी कुर्सी पर बैठे
मगजहीन ‘मांझी हाड़ाम’ की पगड़ी
पता है बस्ती की नाक बचाने ख़ातिर
तब बैल बनाकर हल में जोता था
ज़ालिमों ने तुम्हें
खूंटे में बांधकर खिलाया था भूसा”
इन पंक्तियों के माध्यम से कवयित्री आदिवासी समाज में महिलाओं के साथ होने वाले अन्याय, पितृसत्ता और सामाजिक अत्याचार को उजागर करती हैं। सजोनी किस्कू नामक आदिवासी महिला ने जब परंपराओं को तोड़ते हुए हल चलाया, तो पुरुष प्रधान समाज इसे अपनी सत्ता और परंपरा के लिए चुनौती मान बैठा। ‘मांझी-थान’ और ‘मांझी हाड़ाम’ आदिवासी गांव की पारंपरिक सत्ता और व्यवस्था के प्रतीक हैं, जिनकी प्रतिष्ठा सजोनी के इस कार्य से हिलती दिखाई गई है। इसलिए समाज के लोगों ने उसे अपमानित करने के लिए बैल की तरह हल में जोता और खूंटे में बांधकर भूसा खिलाया। यह घटना दिखाती है कि स्त्री यदि सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध जाकर अपने अधिकार या स्वतंत्रता का प्रयोग करती है, तो उसे कठोर दंड और अपमान सहना पड़ता है। कविता स्त्री उत्पीड़न, सामाजिक असमानता और आदिवासी महिलाओं की पीड़ा का मार्मिक चित्र प्रस्तुत करती है।
दूसरा पक्ष यह है कि किसी भी देश और समाज की जिम्मेदारी होती है कि वह अपनी व्यवस्था को मानवीय और संवेदनशील बनाए। अधिकारियों और संस्थाओं को केवल नियमों का पालन ही नहीं, बल्कि लोगों की परिस्थितियों को समझने की भी आवश्यकता है। यदि समय पर सहायता और सम्मान मिल जाए, तो कोई भी व्यक्ति हताश होकर गलत या विचित्र कदम उठाने के लिए मजबूर नहीं होगा। कहा जा सकता है कि व्यक्ति जब व्यवस्था से परेशान और हताश हो जाता है तो कुछ भी कर सकता है। यह केवल एक कथन नहीं, बल्कि समाज के लिए एक चेतावनी है। यह हमें याद दिलाता है कि व्यवस्था का उद्देश्य केवल नियम चलाना नहीं, बल्कि इंसानियत को बचाए रखना भी है।
(संपादन : नवल/अनिल)
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