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‘किसान का कोड़ा’ : फुले की वह कृति, जिसकी प्रासंगिकता आज भी है

फुले की इस कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह अपने समय से बहुत आगे की सोचती है। वे केवल किसानों की गरीबी का रोना नहीं रोते, वे उस व्यवस्था की संरचना को उजागर करते हैं जो इस गरीबी को जन्म देती है, उसे बनाए रखती है और उसे धर्म तथा परंपरा के नाम पर न्यायसंगत ठहराती है। पढ़ें, डॉ. अनुज कुमार का यह आलेख

[जोतीराव फुले का जन्म 11, अप्रैल 1827 को हुआ था और इस लिहाज से यह वर्ष उनके जन्म के दो सौवीं जयंती का आगाज है। फारवर्ड प्रेस इस अवसर पर प्रस्तुत कर रहा है जोतीराव फुले व उनके विचारों पर आधारित आलेखों की शृंखला। आज पढ़ें डॉ. अनुज कुमार का यह आलेख]

“इस किताब को जुल्म करने तथा जुल्म सहने वाले सभी लोगों को पढ़ना चाहिए। जुल्म करने वालों को इस किताब के पढ़ने से समझ में आ जाएगा कि वे अपने ही समान रक्त-मांस के मानव के साथ कितनी अमानवीयता के साथ बर्ताव करते हैं तथा जुल्म सहने वालों को भी पता चल जाएगा कि वे वास्तव में गुलाम हैं। [1]

उन्नीसवीं शताब्दी के भारतीय पुनर्जागरण के इतिहास में महात्मा जोती गोविंदराव फुले का व्यक्तित्व और कृतित्व एक ऐसी क्रांतिकारी चेतना का प्रतिनिधित्व करता है, जिसने समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति की पीड़ा को न केवल स्वर दिया, बल्कि उसके शोषण की संरचनात्मक जड़ों की भी शिनाख्त की। जब फुले ने अपनी कलम उठाई तो उन्होंने केवल उस समय के सामाजिक यथार्थ को दस्तावेज़ीकृत नहीं किया, बल्कि एक ऐसी वैचारिक परंपरा की नींव रखी जो आज भी उतनी ही जीवंत और चुनौतीपूर्ण है जितनी अपने लेखन के समय थी। वे एक ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने महाराष्ट्र के विचारकों का मार्गदर्शन किया। जैसे-जैसे बहुजन चेतना का उभार हुआ है, वे अखिल भारतीय होते गए हैं। फुले ने कुछ किताबें लिखी थीं। उनमें से दो किताबों को काफी शोहरत मिली, एक थी ‘गुलामगिरी’ और दूसरी ‘किसान का कोड़ा’। दोनों किताबों में ही जाति, धर्म और सत्ता के गठजोड़ के सामाजिक प्रभाव को देखने का प्रयास किया गया। फर्क इतना है कि ‘किसान का कोड़ा’ में किसान केंद्र में है।

‘किसान का कोड़ा’ लिखा गया था 1883 में। यानी यह काम उन्होंने आज से लगभग 143 साल पहले किया था। तात्कालिक परिस्थितियों में यह दुस्साहस से कम न था। सन् 1857 के क्रांति के बाद अंग्रेजों ने एहतियातन ब्राह्मण वर्गों को संतुष्ट रखने की नीति अपनाते हुए अपना नियंत्रण बनाए रखा और लगभग पूरे देश पर स्थापित कर लिया था। किसी भी प्रकार के प्रतिरोध के दमन के लिए वे, वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट (1878) को अमल में ला चुके थे। परंतु इन्हीं अन्यायपूर्ण नीतियों ने भारतीयों में एकता, राष्ट्रप्रेम और स्वतंत्रता की भावना को जन्म दिया। वे राजनीतिक रूप से जागृत होने लगे थे। इसलिए एक तरफ जहां सामाजिक-आर्थिक शोषण गहरा रहा था, वहीं दूसरी तरफ प्रतिक्रिया स्वरूप नए सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों का उदय हो रहा था।

लगभग डेढ़ सौ वर्षों के बाद भी हम देख सकते हैं कि जिन मुद्दों को ‘शेतकऱ्याचा असूड’ (‘किसान का कोड़ा’ का मूल मराठी) में उठाया गया था वे आज भी प्रासंगिक हैं। बस दमन के तरीके बदल गए हैं। भारत की कृषि व्यवस्था जिस परिवर्तन से गुजरी है, वहां बाज़ार के हिसाब से खेती, नकदी फसलों पर निर्भरता, कृषि-ऋण का विस्तार, बीज-कंपनियों का वर्चस्व, ये सब देखते हुए फुले की यह रचना एक नया अर्थ ग्रहण करती है। फुले के किसान को जो ब्राह्मण-पंडित, साहूकार और सरकारी अफसर मिलकर लूटते थे आज उसकी जगह बहुराष्ट्रीय बीज-कंपनियां, बैंक और वायदा-बाज़ार बहुत महीन ढंग से लूटते हैं। शोषण के औजार बदल गए हैं, लेकिन उसकी संरचना वही है जो फुले ने पहचानी थी। महज़ 104 पृष्ठों की एक छोटी पुस्तिका कितनी महत्वपूर्ण है, इसका अंदाज़ा हम इसके मूल उद्देश्य से लगा सकते हैं। किताब लिखी गई थी किसानों के लिए, वह उनके पास तक पहुंच सके, इसके लिए सोच समझ कर मूल्य रखा गया था– ‘चार आने’।

मराठी में ‘असूड’ का अर्थ होता है कोड़ा। कोड़ा या तो गाड़ीवान के पास होता है, या पुराने जमाने में मालिक के पास हुआ करता था जिसका इस्तेमाल वह अपने गुलाम या बंधुआ मजदूरों को सजा देने तथा खटाते रहने के लिए करता था। वर्तमान में कोड़े की जगह बेल्ट ने ले ली है। ऐसी कितनी ही घटनाएं हैं, जिनमें दलितों को हैवानियत के साथ बेल्ट द्वारा पीटे जाने की बात सामने आई है। बांध कर सभी के सामने पीटा गया ताकि नजीर बन सके।

संभवतः फुले अपने समय में इस शीर्षक के हवाले कुछ बातों को स्थापित करना चाहते हों। पहला यह कि किसान सदियों से तरह-तरह के कोड़े खा रहा है। मसलन, धर्म, जाति और आर्थिक मार उनमें से कुछ हैं। दूसरा यह कि किसान को कोड़े की पहचान करनी होगी, उन वजहों को तलाशने और समझने के प्रयास करने होंगे जो उन्हें गुलाम बनाए रखते हैं ताकि वे अपनी गुलामी से जाग सकें। और तीसरा यह कि वे प्रतिकार करना सीखें।

फुले भट्ट ब्राह्मणों को लेकर पूरी किताब में कठोर आलोचक हैं। भाषा भी तीखी है। यही पूरी किताब की पहचान है। स्वतः एक बात उभर कर आती है, वह यह कि आखिर फुले ब्राह्मणों को लेकर इतने तल्ख क्यों थे? कारण था– ब्राह्मणों द्वारा ‘दक्कन दंगा आयोग’ (डेक्कन राएट्स कमीशन) के सामने दिया गया बयान। इनके द्वारा किसानों पर ‘फिजूलखर्च’ करने का आरोप लगाया गया– “कुछ नादान मूर्ख ब्राह्मणों में से कुछ विद्वान, अपनी सभाओं में झूठी-मूठी बातें फैलाकर अधिकारियों को बताते रहते है कि किसान अपने बाल-बच्चों के शादी-ब्याह में बेहिसाब पैसा खर्च करते हैं, इसीलिए वे लोग कर्जदार हुए हैं। वाह!”[2] जबकि हकीकत इसके ठीक उलट थी। असल में सुविधाभोगी जीवन के आदि तो ब्राह्मण थे। किसानों को अज्ञानी भी कहा गया। मानो पूरी पटकथा पहले से तय हो। फुले इस ‘एकतरफा बयान’ को बर्दाश्त नहीं कर पाए और उनका गुस्सा इस किताब की शक्ल में फूटा और सत्ता के दस्तावेज के सामने किसान का दस्तावेज प्रस्तुत हुआ। यानी एक काउंटर रिपोर्ट।

फुले की इस कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह अपने समय से बहुत आगे की सोचती है। वे केवल किसानों की गरीबी का रोना नहीं रोते, वे उस व्यवस्था की संरचना को उजागर करते हैं जो इस गरीबी को जन्म देती है, उसे बनाए रखती है और उसे धर्म तथा परंपरा के नाम पर न्यायसंगत ठहराती है। इस दृष्टि से फुले एक ऐसे चिंतक के रूप में सामने उभर कर आते हैं जो मार्क्स के जैसे संरचनात्मक विश्लेषण की परंपरा से जुड़ते हैं, जिसे बाद में ग्राम्शी और आंबेडकर ने अपने-अपने तरीकों से आगे बढ़ाया। ‘किसान का कोड़ा’ जाति, वर्ग और औपनिवेशिक सत्ता के गठजोड़ के विरुद्ध एक सशक्त घोषणापत्र है और निःसंदेह आज भी प्रासंगिक है।

‘किसान का कोड़ा’ के उद्देश्य और महत्व को समझने के लिए हमें 1870-1883 के दक्कन की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि को देखना होगा। पहले उद्देश्य देख लेते हैं जो कि सीधे-सीधे इस उद्धरण से स्पष्ट हो जाता है– “इस ग्रंथ को लिखने का उद्देश्य यह है कि शूद्र किसान के आज इस दीन अवस्था में पहुंचने के धार्मिक और राज्य संबंधी कई कारण हैं। उन तमाम कारणों में से कुछ कारणों का विश्लेषण करने के उद्देश्य से ही मैंने इस ग्रंथ को लिखा है। शूद्र किसान – नकली और जुल्मी धर्म की मदद से, सभी सरकारी विभागों में ब्राह्मण कर्मचारियो का वर्चस्व होने की वजह से, भट्ट-भिक्षुकों द्वारा (ब्राह्मण-पंडित) और सरकारी यूरोपियन कर्मचारी के ऐशोआरामी होने की वजह से – ब्राह्मण कर्मचारियों द्वारा सताए जाते हैं। इस ग्रंथ के अध्ययन से उनको उस शोषण से अपना बचाव करने की क्षमता प्राप्त हो, यही मेरा उद्देश्य है; इसलिए इस ग्रंथ का नाम भी ‘किसान का कोड़ा’ (शेतकऱ्याचा असूड) रखा गया है।”[3]

ज्यादा पीछे अगर न भी जाएं और पिछले दो दशकों में ही किसानों की स्थिति का जायजा लें तो अलग से इस किताब के महत्व को रेखांकित करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। किसानों की तरह मजदूरों की भी वही हालत है। अभी जब मैं लिख रहा हूं तो एक महीना भी नहीं हुआ है जब नोएडा की फैक्ट्रियों में तनख्वाह बढ़ोत्तरी को लेकर मजदूरों ने अपना प्रतिरोध दर्ज किया। वे अपने बेहतर जीवन स्तर की मांग कर रहे थे। एक लोकतांत्रिक देश में ऐसी अपेक्षा रखना गुनाह नहीं। लेकिन मौजूदा हुकूमत द्वारा इसे अपराध की तरह देखा गया। हिंसा हुई, जिसका फैक्ट्री के मजदूरों ने विरोध भी किया। बावजूद इसके निर्दयता के साथ तंत्र ने उनकी जायज़ मांगों को दबाने के प्रयास किए। जिस किसी ने मजदूरों के साथ खड़ा होना चाहा उन्हें भी मजूदरों के साथ सलाखों के पीछे डाल दिया गया। आज भी ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता रिहा होने की राह ताक रहे हैं। सवाल है कि एक बेहतर जीवन की आस रखना कब से गुनाह हो गया। आखिर में ये मजदूर भी कौन हैं? वही हैं, जो कभी किसान हुआ करते थे। जब किसानी से पेट पालना दूभर होता गया तो मजदूर बनने को बाध्य होना पड़ा।

वहीं दूसरी ओर ईरान-इज़राइल-अमेरिका युद्ध को शुरू हुए करीब तीन महीने होने को हैं। युद्ध अब नाक का मामला बन गया है। सामरिक आधिपत्य का मामला बन गया है। युद्ध कि वजह से तेल आयात बाधित हुआ है। लेकिन यह केवल तेल से जुड़ा हुआ नहीं है, वरन खेती के लिए बहुत ही आवश्यक सामग्री, यूरिया से जुड़ा मामला भी है। यानी की आपूर्ति की कमी होगी। आपूर्ति की कमी हमेशा लागत की बढ़ोत्तरी की वजह बनती है। कुल जमा यह कि पिछले दो दशकों में भारतीय किसानों ने कई गंभीर संकटों का सामना किया है। बढ़ती लागत, अनिश्चित मौसम, नीतिगत बदलाव और कम मुनाफे ने खेती को जोखिम भरा बना दिया है। किसानों द्वारा आत्महत्या कोई नई परिघटना नहीं है। 2023 यानी तीन साल पहले की ही बात करें तो महाराष्ट्र में 830 से अधिक किसानों ने आत्महत्या की। 1995 के बाद से अब तक 4 लाख किसानों ने आत्महत्या की है। क्या आप इन किसानों कि खबर किसी भी मीडिया मंच से सुनते हैं? जवाब होगा– नहीं।

कौन भूल सकता है साल भर से अधिक चलने वाले 2020-2021 के किसान आंदोलन को? यह आंदोलन, भारत सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानूनों के विरोध में था, जिसे मुख्य रूप से दिल्ली की सीमाओं पर पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसानों ने चलाया था। जहां सरकार द्वारा पारंपरिक खेती को कॉर्पोरेट खेती में तब्दील करने की मंशा थी। सवाल उठता है कि पंजाब, हरियाणा और दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के किसानों के अलावा क्या दूसरे राज्यों के किसानों की वह आर्थिक हैसियत थी जिसकी बदौलत वे साल भर टिक पाते? जवाब होगा– नहीं। लगभग 700 से अधिक किसानों की जान गई, उन्हें देशद्रोही करार दिया गया और अपने ही वतन की राजधानी से वे बेदखल थे। वे दाखिल न हो पाएं, इसके तमाम इंतजामात किए गए। यह मंज़र किसने नहीं देखा था। जाहिर है सभी ने सरकारी मनमानी का अनुभव किया था। किसानों और हुकूमत की तनातनी में किसानों का दृढ़ निश्चय अधिक मज़बूत था। इसलिए थक-हार कर सरकार को कानूनों को वापस लेना पड़ा।

किसे याद नहीं है तमिलनाडु के किसानों का 2017 में दिल्ली में प्रदर्शन जहां वे नरकंकाल (उन किसानों की जिन्होंने आत्महत्या कर ली थी) ले कर आए थे, उन्होंने अपने आधे बाल मुंडवा लिए और अपना मूत्र पीने तक का कार्य किया ताकि लोगों और सरकार का ध्यान उन पर जाए। पुनः तमिलनाडु के किसानों ने 2024 में भी अपना प्रतिरोध दर्ज करने का प्रयास किया था। दो सौ से अधिक किसानों को मध्यप्रदेश के नर्मदापुरम में रोक दिया गया था। वहां भी प्रतीकात्मक रूप से उन्होंने अर्धनग्न होकर प्रदर्शन किया था। सायास ही अमीर क़ज़लबाश का लोकप्रिय शेर याद आता है जो यहां मौजूं है–

“उसी का शहर वही मुद्दई वही मुंसिफ़,
हमें यक़ीं था हमारा क़ुसूर निकलेगा”

सो कुल जमा यह कि यह हालत आज से 143 साल पहले भी कुछ अलग नहीं थी। तंत्र अपने ढंग से किसानों और किसानी को बर्बाद करने पर तुला था। बात करते हैं उन तात्कालिक सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों की जो दक्कन दंगे के कारण बने। कैथलीन गॉफ ने अपने लेख ‘इंडियन पिजेंट अपराइजिंग (1974)’ में 19वीं और 20वीं शताब्दी के दौरान 77 विद्रोहों की पहचान की– “देश के लगभग सभी क्षेत्रों में स्वतंत्रता-पूर्व अवधि के दौरान कृषि आंदोलन देखे गए। इन्हें भले ही लोकप्रिय रूप से किसान आंदोलनों के रूप में जाना जाता है, लेकिन इसमें सभी शोषित वर्ग, रैयतदार, बटाईदार, कृषि श्रमिक और शिल्पकार आदि शामिल थे। उन्नीसवीं शताब्दी का आंदोलन मुख्य रूप से भूमि राजस्व की अत्यधिक दरों और जमींदारों के अत्याचारी व्यवहार के खिलाफ था। इस अवधि के दौरान सूखे और अकाल ने इस स्थिति को और बढ़ा दिया। 1855 का संथाल विद्रोह, 1875 का दक्कन दंगा 1870-85 के दौरान बंगाल सिद्धांत संघर्ष, अवध विद्रोह, नील विद्रोह इस संबंध में कुछ उदाहरण हैं। इस चरण में किसानों ने सीधे अपनी मांगों के लिए लड़ाई लड़ी, जो आर्थिक मुद्दों और जमींदार, साहूकारों और विदेशी बागानों के खिलाफ केंद्रित थी। आंदोलन की क्षेत्रीय पहुंच भी सीमित थी। इन आंदोलनों में उठाया गया मुद्दा सीधे कृषि संबंधों की प्रकृति से संबंधित था। ये मुद्दे कृषि कार्य करने वाले विभिन्न वर्गों यथा बटाईदारों, किसानों और खेतिहर मजदूरों आदि के शोषण से संबंधित थे। औपनिवेशिक ताकतों की आवश्यकता और उनकी सामंती जरूरतों को पूरा करने के लिए जमींदारों ने कई तरीकों से उनका शोषण किया। इनमें लगान में अनुचित वृद्धि, जबरन नजराना, बेगारी (जबरन मजदूरी) शारीरिक प्रताड़ना और कार्यकाल की असुरक्षा (बेदखली) शामिल थी। इन सबके विरोध में किसानों का विरोध उनकी सहज प्रतिक्रिया थी। किसान अक्सर विद्रोह तभी करते थे जब उन्हें लगता था कि मौजूदा तरीके से आगे बढ़ना संभव नहीं है।”[4]

1870-83 के दौरान महाराष्ट्र में कृषि व्यवस्था बेहद अस्थिर थी, उपरोक्त जितनी बातें किसान-विद्रोह के कारण के रूप में इंगित की गई हैं, उसमें करों में अनुचित वृद्धि मुख्य कारण बनी, लेकिन यह वह था जो सामने से दिख रहा था। दरअसल इस विद्रोह के मूल में बहुआयामी परिस्थितियां काम कर रही थीं। संस्था और संरचना का ऐसा क्रूर चक्र था, जिससे किसानों का बच पाना मुश्किल था। जाति, धर्म, भ्रष्ट प्रशासनिक तंत्र, न्यायिक तंत्र, शिक्षा से वंचना और यहां तक कि किसानों के जीवन के आधार यानी उनके पशुधन, सभी का इस्तेमाल एक सोची-समझी रणनीति के तहत उनकी व्यवस्थित लूट के लिए किया जा रहा था। ये सभी कारण 1875 के दक्कन दंगों की वजह बने।

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दक्कन दंगे बॉम्बे प्रेसीडेंसी के पुणे और अहमदनगर जिलों में शुरू हुए और यह विद्रोह किसानों द्वारा साहूकारों के शोषण के विरुद्ध किया गया एक महत्वपूर्ण विद्रोह था। इसकी जड़ें रैयतवारी प्रणाली में थीं, जिसके तहत किसानों को फसल खराब होने या सूखे की परवाह किए बिना भारी और निश्चित भू-राजस्व देना पड़ता था। इस दबाव ने उन्हें साहूकारों से बेहद ऊंची ब्याज दरों पर कर्ज लेने पर मजबूर कर दिया, और फिर कर्ज का ऐसा चक्र शुरू हुआ कि निकलना मुश्किल हो गया। अमेरिकी गृहयुद्ध के दौरान तो कपास की मांग बढ़ने से थोड़ी राहत मिली, लेकिन युद्ध खत्म होते ही मांग गिर गई और किसान कर्ज चुकाने में पूरी तरह असफल हो गए। सन् 1867 में अंग्रेजों ने राजस्व में पचास प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी कर दी, जिससे हालात और बिगड़ गए। किसान असहाय और हताश हो गए। साहूकारों ने भी पहले उदारता से कर्ज दिया, फिर अचानक नया कर्ज देना बंद कर दिया और पुराने वसूलने लगे। मई, 1875 में पुणे जिले के सुपा गांव में ये दंगे शुरू हुए, जिनमें किसानों ने एक साहूकार के घर को लूटा, ऋण संबंधी दस्तावेजों को नष्ट किया और आग लगा दी। इसके बाद अशांति तेजी से पूरे क्षेत्र में फैल गई और हजारों किसानों ने साहूकारों को निशाना बनाते हुए रिकॉर्ड जलाए, लूटपाट की और कई बार हिंसा का भी सहारा लिया। इन दंगों में कोई केंद्रीय नेतृत्व नहीं था, बल्कि किसानों ने सामूहिक कार्रवाई की थी। विभिन्न सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि के किसान इसमें शामिल हुए और महिलाएं भी साहूकारों पर हमला करने और ऋण संबंधी रिकॉर्ड नष्ट करने में सक्रिय रहीं। किसानों का मुख्य उद्देश्य ऋण के रिकॉर्ड मिटाना और भूमि पर पुनः नियंत्रण प्राप्त करना था। ब्रिटिश प्रशासन ने शुरू में इस विद्रोह के पैमाने को समझने में देरी की, लेकिन बाद में सैन्य और पुलिस बल तैनात किए, नेताओं को गिरफ्तार किया और जून, 1875 तक विद्रोह को दबा दिया।

दंगों के बाद ब्रिटिश सरकार ने 1879 में दक्कन कृषक राहत अधिनियम पारित किया, जिससे ब्याज दरें कम हुईं, भूमि हस्तांतरण पर रोक लगी, और विवाद सुलझाने के लिए बोर्ड बने। हालांकि सुधार सीमित ही थे, लेकिन इन दंगों ने पूरे भारत में किसान आंदोलनों को एक मजबूत प्रेरणा दी और औपनिवेशिक कृषि नीतियों पर पुनर्विचार करने पर मजबूर किया। इन दंगों ने किसानों की चेतना जगाई और सामूहिक कार्रवाई की शक्ति को सिद्ध किया। दक्कन दंगे भारत में भविष्य के कृषि आंदोलनों के लिए एक प्रेरणा बने और औपनिवेशिक शोषण के तहत ग्रामीण जनता की दुर्दशा को उजागर किया।

फुले ने ‘किसान का कोड़ा’ में तत्कालीन महाराष्ट्र के किसानों की विभीषिका और दयनीय दशा का चित्रण किया और उन तमाम आयामों को देखने का प्रयास किया जो किसानों के शोषण और बाद में रोष और विद्रोह का कारण बने। वे इसके अंश लिखते और गांव-गांव जाकर सुनाते और किसानों और लोगों की प्रतिक्रिया लेते। कुछ अंश 1883 तक प्रकाशित हो गया था, लेकिन पूरी कृति उनके मरणोपरांत ही प्रकाशित हुई। समाज में जागरूकता बढ़े, यही साहित्य की सार्थकता है। इसे फुले ने चरितार्थ किया था।

‘किसान का कोड़ा’ किताब को लेकर जोतीराव फुले की सबसे बड़ी उपलब्धि जो मानी जा सकती है वह यह कि वे जाति और धर्म की दृष्टि से शोषण के तंत्र को देखने का प्रयास करते हैं। आज भी यह सच है। जब हम कृषि संकट के आंकड़ों को जाति के आधार पर वर्गीकृत करते हैं तो पाते हैं कि दलित और आदिवासी किसान इस संकट से सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं। उनके पास ज़मीन कम है, कर्ज़ अधिक है, और सरकारी सहायता पाने की क्षमता भी कम है। कृषि-विशेषज्ञ जब सिंचाई, बीज, बाज़ार और तकनीक की बात करते हैं तब वे अक्सर यह भूल जाते हैं कि जाति आधारित जमीन पर अधिकार की असमानता, सामाजिक नेटवर्क तक पहुंच की असमानता और संस्थागत भेदभाव – ये सब मिलकर उस किसान की स्थिति को और भी कठिन बनाते हैं जो पहले से ही हाशिए पर है।

यहां पहले हम किसानों पर जाति की मार को देखने का प्रयास करेंगे। किताब की भूमिका में ही फुले किसानों के आपस में जातियों में बंट जाने के इतिहास को मुख्तसर ढंग से पेश करते हैं– “आज के किसानों में तीन प्रकार के किसान दिखाई देते हैं– केवल किसान या कुनबी, माली और धनगर। अब यह तीन प्रकार (भेद) होने के कारणों को खोजने से पता चलता है कि प्रारंभ में जो लोग केवल कृषि पर अपना जीविका चलाते रहे थे, वे कुलवाड़ी (कुळवाड़ी) या कुनबी हुए। जो लोग अपना कृषि काम संभाल करके बागवानी करने लगे, वे माली (माळी) हुए और जो लोग दोनों प्रकार के काम करके भेड़-बकरियों के झुंड पालने लगे, वे धनगर (गड़रिया, गड़ेरिया) हो गए। इस तरह अलग-अलग काम के आधार पर यह प्रकार (भेद) हुए होंगे। किंतु अब यह तीन अलग-अलग जाति मानी जाती है। … इनमें बेटी-रोटी का व्यवहार नहीं होता। लेकिन पहले रोटी-व्यवहार आदि होता था।”[5]

फुले के विश्लेषण का पहला प्रहार उस ‘धार्मिक व्यवस्था’ पर है, जिसने किसान को जन्म से मृत्यु तक के कर्मकांडों में बांध रखा है। फुले के अनुसार, ‘भट-ब्राह्मण’ समुदाय ने धूर्तता के साथ एक ऐसी संरचना का निर्माण किए थे, जिसमें वे सबसे अधिक लाभार्थी थे। ऐसे रीति-रिवाज बनाए गए थे, जो किसान के पास बचे हुए थोड़े बहुत संसाधनों को भी दान और दक्षिणा के रूप में सोख लेते थे। गर्भाधान से लेकर श्राद्ध तक की प्रक्रिया में ब्राह्मणों का दखल था। ऐसे में फुले के लेखन में धर्म का प्रश्न केंद्रीय है। धर्म को लेकर उनकी दृष्टि आलोचनात्मक है। उनका स्पष्ट मत है कि जो धर्म मनुष्य को मनुष्य से ऊंचा-नीचा बताए, जो धर्म शोषण को पवित्र ठहराए, जो धर्म किसान की मेहनत को लूटने का औजार बने, वह धर्म नहीं, अधर्म है। यह आलोचना आज भी प्रासंगिक है जब धर्म और सत्ता का मेल अभूतपूर्व तरीके से हो रहा है। जब कॉर्पोरेट घाराने का करोड़ों का कर्ज पलक झपकते ही माफ हो जाता है और किसानों को कर्ज़-माफी के लिए संघर्ष करना पड़ता है। उन्हें देशद्रोही, धर्म-विरोधी करार दिया जाता है। जब मंदिर-निर्माण और तीर्थ-यात्रा की बात ज़ोर-शोर से हो, उन पर फूल बरसाने के इंतजाम किए जाते हों पर वहीं कृषि-संकट पर चुप्पी मार ली जाती हो। ऐसे में फुले का वह किसान याद आता है जो मंदिर के देवता को भोग लगाने के लिए कर्ज़ लेता था, पर खुद भूखा रहता था।

किसानों के साथ धर्म के नाम पर भी खूब ठगी की जाती थी। इसे फुले की इस किताब से बेहतर ढंग से समझा जा सकता है– “अंत में किसान के मरने के बाद भट्ट ब्राह्मण श्मशान में करट (कारटा) का स्वांग लेकर उनके बच्चों की ओर से प्रत्येक दिन हर प्रकार के कर्मकांड करवाते हैं। उनके घर में प्रत्येक दिन गरूड़ पुराण का पाठ करते हैं। दसवें दिन धनकवड़ी आदि डिपो के वतनदार काग पंडित को कांव-कांव कहकर पिंड-प्रयोजन का सामान देते हैं, फिर वे उनसे गरूड़-पुराण के मेहनताना के साथ कम-से-कम तांबा, पीतल, छतरी, लाठी, गादी और जूता दान में लेते हैं। मृतक के श्राद्धपक्ष को पिंडदान करवाते समय उसकी क्षमता के अनुसार सीधा (दक्षिणा में अनाज लेना) और दक्षिणा लेने की परंपरा सालों से उन्होंने कायम रखी है।”[6] लेकिन जब वही ब्राह्मण अपने बच्चों के शादी ब्याह करते तो “सबसे पहले अपने जातिवालों को भोजन खिलाते हैं। उनके भोजन करके उठने के बाद वहां के सभी पत्तल की जूठन को ढंग से अलग-अलग रखकर उनको अपने शूद्र नौकरों की पंक्ति में बिठाकर उस सारी जूठन को बड़े चतुराई से कई तरह से मांगल्य का ढोंग रचाकर दूर से ही परोसते हैं।”[7]

जोतीराव फुले व सितंबर, 2020 में दिल्ली-हरियाणा की सीमा पर स्थित सिंघु बार्डर पर किसान आंदोलन की तस्वीर

हम देख सकते हैं कि सामाजिक स्तर पर जाति-व्यवस्था और धर्म के नाम पर विभेदी व्यवहार ने किसानों को हाशिए पर धकेल दिया था।

अब जरा सोचिए कि जो समाज खुद ही एका में नहीं है, जिनको नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती, ऐसे समाज का क्या किसी अन्य समाज के साथ बंधन संभव है? जाहिर है नहीं। जोतीराव व्यंग्य करते हुए लिखते हैं– “वे अपने यजमान किसान को इतना नीच मानते हैं कि उन्हें अपने आंगन के हौज और कुएं तक छूने नहीं देते। फिर उनसे रोटी और बेटी-व्यवहार क्या कोई कर सकता है?”[8] इस जाति आधारित दमन ने किसानों के आत्मसम्मान और सोचने-समझने की शक्ति को पूरी तरह कुचल कर रख दिया था। ऐसे में अपने साथ किए तमाम ठगी और अपमान के बावजूद किसान, ब्राह्मण की सेवा को ही श्रेयस्कर मानते थे। फुले इसकी वजह की भी पड़ताल करते हैं। उनका मानना था– “प्राचीन काल में आदि आर्य भट्ट ब्राह्मणों का इस देश में अमल शुरू होते ही उन्होंने पराजित शूद्र किसानों को पढ़ने-लिखने पर पाबंदी लगा दी और उनको हजारों साल तक मनचाहे परेशान करके, लूट करके खाए, इस संबंध में उनके मनुस्मृति जैसे धूर्त ग्रंथ में लिखा गया है।”[9] उसी मानुस्मृति में यह भी लिखा गया है कि “ब्राह्मणों के घर में शूद्र को काम न मिला और उसके बाल-बच्चे भूखे मरने लगे तो उसे मेहनत-मजदूरी करके अपनी जीविका चलानी चाहिए। बुद्धिमान शूद्र को कभी भी ज्यादा धन-दौलत इकट्ठा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से उसको घमंड हो सकता है और वह ब्राह्मणों का निषेध कर सकता है।”[10]

ऐसे माहौल में यदि सत्ता संरक्षण भी प्राप्त हो जाए तो फिर कहना ही क्या। फिर वही हुआ जो होना था। किसानों की हालत बदतर होती गई। उनका दोष यह कि वे अधिकतर शूद्र थे। ब्राह्मणों को खुश रखने के लिए क्या कुछ नहीं किया गया। शिवाजी के रहते यह कोशिश की गई कि वे संत तुकाराम से न मिल सकें, क्योंकि संत तुकाराम आम जनता के हिमायती थे। जात-पात के विरोधी थे। फिर जब पेशवा आए तो किसानों का खून चूसकर ब्राह्मणों का आवभगत किया जाने लगा– “दक्षिणा देने के लिए, सारा भंडार खोल दिया था। हमेशा ही पेंढारियों ने लुटकर बेजार हुए किसानों से जबरदस्ती वसूल किए जामदारखाने से एक कौड़ी भी अज्ञानी किसानों को कम-से-कम प्राकृत विद्या पढ़ाने के लिए भी खर्च नहीं की। ब्राह्मणों के स्वार्थी धर्मशास्त्र सीखनेवाले भट्ट ब्राह्मणों को सैकड़ों रुपयों का सालाना अनुदान देने की लूट लगा दी है।”[11]

ब्राह्मणों द्वारा किसानों को मानसिक गुलाम बनाने की एक बानगी देखिए– “किसानों को पढ़ना-लिखना नहीं सीखना चाहिए, इसलिए पौराणिक कथापाठ करनेवाले ब्राह्मणों ने उनके दिलोदिमाग पर, मन पर इनकी ऐसी छाप छोड़ी है कि किसानों को अपने बाल-बच्चों को विद्वान बनाना बड़ा पाप लगता है।”[12] इन सभी का परिणाम यह हुआ कि शूद्र किसानों के बच्चे ज्ञान से दूर होते गए और इस स्थिति में पहुंच गए कि “उनको अपने बच्चों को स्कूल भेजने की हिम्मत नहीं होती।”[13]

गरचे शूद्र किसानों के बच्चे यदि स्कूल चले भी जाते तो जो पढ़ाने वाले भी होते वे किसानों की जाति से नहीं होते थे। जाहिर है उनमें वह संवेदना या हमदर्दी भी न होती जिसकी दरकार एक आदर्श शिक्षक में होनी चाहिए। याद कीजिए ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा ‘जूठन’ और तुलसीराम की आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ को। दोनों आत्मकथाओं में शिक्षकों की क्या भूमिका रही। जूठन में ‘चूहड़ा’ कहता हुआ मास्टर मिलता है और मुर्दहिया में ‘चमरकिट’ कहता हुआ शिक्षक। आज भी यही कथा है। सरकारी स्कूलों में आज भी यदि आपको बच्चे काम करते मिल जाएंगे तो औसतन वे दलित, पिछड़े और आदिवासी ही होंगे। फुले भी इस बात को रेखांकित करते हुए बताते हैं कि ऐसे शिक्षक व्यंग्य-वाण छोड़ने से बाज़ नहीं आते– “गांव-खेड़ों में जितने मास्टर होते हैं, वे सभी ब्राह्मण जाति के ही होते है। उनका वेतन आठ-बारह रुपए से ज्यादा नहीं होता। जिनकी योग्यता पूना जैसे शहर में चार-छह रुपए से ज्यादा नहीं होती, ऐसे पेटू अविद्वान ब्राह्मण मास्टर अपने स्वार्थी धर्म और बनावटी जाति-अभिमान को बड़ी मजबूती के साथ पकड़ करके रखते हैं। वे किसानों के बच्चों को स्कूल में पढ़ाते समय खुल्लमखुल्ला उपदेश देते हैं कि, ‘तुम लोगों को पढ़-लिख करके बाबूगीरी का काम नहीं मिला, तो क्या हमारी तरह पंचांग हाथ में लेकर भीख मांगते हुए घूमना है?’”[14]

जोतीराव बिला शक यह देख पा रहे थे कि जाति व्यवस्था ही कृषि-संकट की जड़ है। जातिवादी व्यवस्था ने किसानों को बांटा, लूटा, अशिक्षित रखा, मानसिक रूप से तोड़ा और संसाधनों से वंचित किया। जब तक जाति है, तब तक किसान मुक्त नहीं हो सकता। साथ ही धर्म का भय भी काम करता था। इस धार्मिक शोषण की सबसे चालाक विशेषता यह थी कि यह स्वैच्छिक प्रतीत होता था। किसान स्वयं भट्ट-ब्राह्मण को बुलाता था, स्वयं दक्षिणा देता था, स्वयं पूजा करवाता था। फुले यह दिखाते हैं कि यह स्वैच्छिक प्रवृत्ति दरअसल भय, अज्ञान और पीढ़ियों से चले आ रहे संस्कारों का परिणाम है। अगर किसान इनकार करे तो उसे पाप का भय दिखाया जाता है, अगर वह प्रश्न करे तो उसे धर्म-विरोधी कहा जाता है। वर्चस्व की यह भावना, ग्राम्शी के हेजेमनी से जुड़ती प्रतीत होती है, जहां विचार और संस्कृति का हवाला देकर शासक वर्ग अपना वर्चस्व बरकरार रखता है।

राजनीतिक, प्रशासनिक और न्यायिक तंत्र का आलम यह था कि इन सभी तंत्रों के नुमाइंदे दमन करने में एक से बढ़कर एक थे। अंग्रेजों ने भट्ट ब्राह्मणों की सेवा में कोई कमी नहीं आने दी। उनकी सेवा की जो परंपरा पेशवाओं के समय में थी, उसी मान-महत्व को बरकरार रखा गया– “उन सभी के लिए रात-दिन नाच-गाना सुनने और देखने की व्यवस्था की जाती है, तथा मौज-मस्ती करने की सुविधा दी जाती है। यही रिवाज हमारी डरपोक अंग्रेज सरकार ने आज तक जस-का-तस चालू रखा है। मेहनती शूद्रादि-अतिशूद्र किसानों के पसीनों से वसूल किए गए लगान के हजारों रुपए हर साल अन्य मुद्दों पर खर्च किए जाते हैं।”[15] अलग से बताने की जरूरत नहीं कि पेशवाओं की ही परंपरा को अंग्रेज़ निभाते चले गए।

फुले जानते थे कि ब्रिटिश हुकूमत और भट्ट ब्राह्मणों के गठजोड़ ने किसानों की कमर तोड़ दी है। उस समय के किसान भारी लगान और विभिन्न करों के दमनकारी बोझ तले दबे होते थे। ऐसे में जब वे लगान चुकाने में असमर्थ होते तो उन्हें जेल में डाल दिया जाता था, गोया जैसे कोई मुजरिम हों। दुखद पहलू यह था कि जेल में बंद अपनों को छुड़ाने के लिए उनके भूखे-प्यासे परिवार की औरतें अपने बचे-खुचे गहने तक बेच देती थीं। बेचे गए जेवरों से जो धन मिलता था वह किसी वैधानिक न्याय के लिए नहीं, बल्कि फौजदार और कचहरी के भ्रष्ट कर्मचारियों की भूख शांत करने में नष्ट हो जाता था। एक उदाहरण देते हुए फुले समझाने का प्रयास करते हैं– “यदि किसी एक पक्ष के लोगों को ज्यादा मार पड़ी है तो धूर्त कर्मचारी कुलकर्णी दूसरे पक्ष के लोगों से पैसा लेकर, उनके घाव सूखकर निशान मिटने तक, केस तैयार करके मजिस्ट्रेट साहब की ओर भेजने में देर लगाते हैं। कभी-कभी धूर्त कर्मचारियों की जेब गरम हो जाने पर, दूसरे पक्ष के प्रमुख गवाह उनके केस में गवाही नहीं दें, इसलिए वे साहूकार से नजदीकी संबंध साधने की कोशिश करते हैं। कभी-कभी मुद्दे के गवाहों को अपने सामने पेश करने से पहले उनको कुलकर्णियों के द्वारा तरह-तरह की धमकियां दिलवाते है और उसको किसी दूर अपरिचित गांव भगाकर ले जाते हैं।… जब धूर्त कर्मचारी उनको डराते हैं तो उसे आसमान दिखाई देने लगता है। वे कभी-कभी अज्ञानी किसानों की गवाही लेते समय उनसे तरह-तरह के सवाल करके उनको इतना डराते हैं कि उन्हें सचमुच में अपनी आंखों से जो कुछ दिखाई दिया होता है और कानों से जो सुनाई दिया होता है, वे सब कुछ भूल जाते हैं।”[16]

इस घोर विपदा के विपरीत, औपनिवेशिक शासक और उनके चाटुकार कर्मचारी किसानों के इसी खून-पसीने की कमाई पर अय्याशी का नंगा नाच नाचते थे। आलीशान बंगलों में उनके नाश्ते, दावतों और नाच-गाने का खर्च इन्हीं भूखे किसानों की पीठ पर लादा गया था– “इधर शूद्र किसान लंगोट पहने, कमर के धागे में चूना-तंबाकू की पोटली बांधे, माथे पर पतली-सी गमछी बांधे, नंग-धड़ंग काया, नंगे पांव, हाथ में हल की मूठ पकड़ घास से भरी खेत को आठ बैलों से जाेत रहा है। उधर गोरा सिपाही पतलून पहने, बदन पर कमीज के ऊपर लाल रंग का कोट, सिर पर चांदी की कढ़ाई वाली आकर्षक तिरछी टोपी, पांव में सूती की जुराब पर विलायती मजबूत मुलायम चमड़े का जूता, कमर पर चमड़े का पट्टा और कंधे पर घोड़ेवाली बंदूक लेकर हर दिन सुबह और शाम को सुहाने मौसम में खुले मैदान में घंटा-आधा घंटा परेड की कसरत कर रहा है।”[17] फुले इस अमानवीय विरोधाभास पर अत्यंत तीखा प्रतिरोध दर्ज करते हैं– “इसको क्या कहा जाए? इसलिए हमारी आंखों पर पट्टी बांधकर निराकार परमात्मा की प्रार्थना करनेवाले, अंग्रेज सरकार को यहां के धूर्त ब्राह्मणों द्वारा स्थापित समाजों के और अखबारों की गुदगुदानेवाली कलम पर बिलकुल विश्वास नहीं रखना चाहिए।”[18]

फुले का मौलिक तर्क यह था कि ब्रिटिश शासन के दौरान भी प्रशासनिक तंत्र पर ब्राह्मणों का ही कब्ज़ा रहा, क्योंकि अक्सर ब्रिटिश अधिकारियों का जीवन आलस और विलासिता से भर रहा। फुले कहते हैं कि ऐसे अधिकारी ज़मीनी हकीकत जानने के बजाय पूरी तरह से अपने ‘कुलकर्णी’ और ‘लिपिक’ जैसे अधीनस्थ कर्मचारियों पर निर्भर थे। अंग्रेज़ अधिकारियों का व्यक्तित्व भी निराला था। वे अपनी ही धुन में रहते थे। अपने हित के अलावा उन्हें किसी की चिंता नहीं थी। दूसरे परिच्छेद के आरंभ में ही जोतीराव कहते हैं– “सरकारी गोरे अफसर आम तौर पर ऐशोआराम में मदहोश रहते हैं, जिसकी वजह से उनको किसानों की वास्तविक स्थिति के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए फुरसत ही नहीं मिलती। उनके इस गाफिल व्यवहार की वजह से सभी सरकारी विभागों में ब्राह्मण कर्मचारियों का वर्चस्व होता है। इन दोनों कारणों से किसान इतने लूट लिए जाते हैं कि उनको पेट-भर की रोटी और बदन पर पूरा कपड़ा भी नहीं मिलता ।”[19]

फुले बताते हैं कि कैसे अंग्रेजों की नीतियों ने जंगलों पर निर्भर रहने वाले किसानों की ज़िंदगी दुष्कर कर दी। फॉरेस्ट एक्ट आने की वजह से वे बिल्कुल मजबूर हो गए और अपने मवेशियों को चारा खिलाना भी उनके लिए मुश्किल होता गया– “गांव के चरागाह के भरोसे अपने पास एक-दो गाएं और दो-चार बकरियां पालकर, नपा-तुला गुजारा करके बड़े आनंद से अपने-अपने गांव में ही रहते थे; किंतु हमारे माई-बाप सरकार के कारस्तानी यूरोपियन कर्मचारियों ने अपनी विलायती बहुरूपी अक्ल पूरी तरह खर्च करके, उन्होंने बहुत बड़ा जंगल विभाग शुरू किया है। उसमें सभी पहाड़, पर्वत, टेकरियां, घाटी और उसी में खाली जमीन और चरागाह मिला करके फॉरेस्ट विभाग को पहाड़ों तक ले जाने की वजह से दुर्बल-निर्बल किसानों की भेड़-बकरियों के लिए धरती की पीठ पर जंगल की हवा खाने लायक भी जगह नही बची है।”[20] यानी अंग्रेजों ने वे तमाम हथकंडे अपनाए जिनसे आम किसान बद से बदतर हालातों में ज़िंदगी गुजारने को मजबूर हो।

लगान वसूली के मामले में भी पुलिस महकमे का रूप भी हमारे सामने उभर कर आता है– “सबसे पहले वहां के महार और पुलिस पटेल को मदद के लिए साथ में लेते हैं और गांव के दोनों ग्रुपों के लोगों को पकड़ कर लाते हैं और चौपाल में बंदी बना करके रखते हैं। उनकी देखरेख के लिए एक पहरेदार रख देते हैं।… पूछताछ करके उन सभी कैदियों को मुख्य थाने में लाकर फौजदार के सामने खड़े करके उनके आदेश के अनुसार उनकी पूरी जांच-पड़ताल होने तक उनको अस्थायी जेल में रखते हैं।”[21] कोई किसान गलती से अपने ऊपर हो रहे अन्याय के खिलाफ खड़े होने की हिमाकत करता और कचहरी में अपनी बात रखने का प्रयास करता तो फौरन ही धूर्त कर्मचारियों द्वारा तरह-तरह के सवालों में उलझा दिया जाता– “उनको आगे-पीछे के सवालों का संदर्भ लगाकर जवाब देने में झिझक होती है, इसकी वजह से उनकी गवाही के समय जब धूर्त कर्मचारी उनको डराते हैं, तो उसे आसमान दिखाई देने लगता है। वे कभी-कभी अज्ञानी किसानों की गवाही लेते समय उनसे तरह-तरह के सवाल करके उनको इतना डराते हैं कि उन्हें सचमुच में अपनी आंखों से जो कुछ दिखाई दिया होता है और कानों से जो सुनाई दिया होता है, वे सब कुछ भूल जाते हैं।”[22]

वहीं, सिंचाई विभाग का रवैया तो और भी क्रूर था; पानी के लिए तरसते किसान जब महीनों अर्जियां लगाने के बाद अफसरों के पास गुहार लगाने जाते तो उन्हें राहत देने के बजाय अपमानित किया जाता था। जोतीराव बताते हैं कि कैसे हजारों की तनख्वाह पाने वाले गोरे और काले इंजीनियर यह तक नहीं जानते कि कितना पानी सिंचाई के लिए आवंटित करना चाहिए। वे बताते हैं कि कैसे “हमेशा बहनेवाली नहर का पानी समाप्त होने से किसानों के खेतों की फसल सूख गई, तब भी उसकी जिम्मेदारी सिंचाई विभाग पर नहीं। अरे, जहां हजारों रुपया हर माह वेतन खानेवाले गोरे और काले इंजीनियर कर्मचारियों को इसका भी अंदाज नहीं होता कि बांध में फिलहाल कितना गैलन पानी है, इसकी गिनती करके वह पानी आगे अंत तक जितने खेतों को पर्याप्त होगा, उतने ही खेतों के मालिक को पानी का परवाना देना चाहिए कि नहीं?”[23] जिसका परिणाम यह हुआ कि किसानों की हालत खस्ताहाल होती गई, हालत घर की नीलामी तक आ गई– “हमारी न्यायप्रिय सरकार अपने अधिकार में काम करने वाले ऐशोआरामी और अन्य धूर्त कर्मचारियों पर पूरी तरह निर्भर रहने के कारण किसानों के खेतों को समय पर पानी देने की बजाय, पानी पर लगाया गया कर बढ़ा देती है। इसलिए आज किसानों का दीवाला निकल गया है, और सरकार को उनके घर-बार की नीलामी करके, वह सारा रुपया इन निर्दयी कर्मचारियों के पेट पालने के लिए देना पड़ता है।”[24]

राज्य की सुनियोजित रणनीति थी कि किसान अशिक्षित रहें, ताकि वे अपने अधिकारों को न समझ सकें और विद्रोह न कर सकें। यह रिश्ता ‘गुलाम-मालिक’ जैसा था– “सीखने से क्या-क्या फायदे होते हैं। लेकिन यह बात किसानों के ध्यान में लाने की बजाय किसानों को हमेशा गुलामों की तरह उनके वर्चस्व में रहना चाहिए, इसी उद्देश्य से किसानों को पढ़ना-लिखना सीखने की मनाही की गई थी। अब जब कि उस तरह की दुष्ट भावना हमारी आज की सरकार नहीं दिखा रही है, फिर भी उसके बाहर के तमाम व्यवहारों से पता चलता है कि किसानों को जानकार-समझदार बनाने के लिए शिक्षा विभाग के सरकारी कर्मचारियों के मन से उस तरह की अपनेपन की भावना व्यक्त नहीं हो रही है; क्योंकि आज तक ज्ञान देने के उद्देश्य से सरकार ने लोकल फंड के मातहत किसानों के लाखों रुपए अपने पेट में उड़ेल लिये हैं। जितना पैसा आज तक खर्च हुआ, उसके हिसाब से किसानों में से एक को भी कलेक्टर का पद संभालने योग्य ज्ञान नहीं दिया गया।”[25]

फुले ताकीद करते हैं कि यदि अंग्रेजों को अपने कर की दर को बेहतर करना है तो उसके लिए उन्हें शूद्रों के बच्चों को शिक्षित करना होगा ताकि वे नौकरियों में आ सकें– “सरकार को पूरी तरह यह मान लेना चाहिए कि हिंदुस्तान में ब्राह्मण सरकारी काम करने लायक बिलकुल है ही नहीं, बल्कि शूद्र किसान सरकारी स्कूलों में पढ़कर जैसे-जैसे लायक होंगे, वैसे-वैसे उनको तहसीलदार आदि पदों पर सरकारी कचहरियों में छोटी-बड़ी नौकरियां देकर उनको उस काम को करने के लिए प्रशिक्षित किए बगैर किसानों के कदम जमीन पर रूकनेवाले नहीं और सरकार की वसूली भी बढ़नेवाली नहीं।”[26]

स्पष्ट है कि फुले के अनुसार सत्ता और तंत्र न केवल किसानों से दूर थी, बल्कि सक्रिय रूप से उनका शोषण, दमन और उपेक्षा कर रही थी। यह संयोग नहीं, बल्कि एक सुनियोजित सत्ता-व्यवस्था का परिणाम था। सरकारी अधिकारी चाहे वे अंग्रेज हों या ब्राह्मण, किसानों के हित में नहीं, बल्कि अपने और अपनी जाति के हित में काम करते हैं। पटवारी, तहसीलदार, जज, वकील सब मिलकर एक ऐसा तंत्र बनाते थे जो किसान को निचोड़ता था और उसे यह भी नहीं जानने देता था कि उसके साथ क्या हो रहा है। इनका मूल ध्येय ऊपरी तौर पर खुद को उदार दिखाने का था, लेकिन भीतर ही भीतर विभेदकारी संरचना को पोषित करते रहना था। पूरा का पूरा तंत्र आज की तरह ही गर्दन तलक कीचड़ में किस तरह सना था, यह फुले दिखाने की कोशिश करते हैं। वे कहते हैं कि जिन शूद्रों के पढे-लिखे बच्चों में अपने शोषण तंत्र को समझने का विवेक पैदा होता है, वे चुप्पी मार जाते हैं क्योंकि वे जानते थे कि इतने बड़े भ्रष्ट तंत्र से लड़ना नामुमकिन है– “यदि इन्होंने ब्राह्मणों के साथ इस तरह का स्वांग न रचा तो वे लोग अपनी किताबों के अलावा अखबारों में इनके बारे में गलत सलत झूठी खबरें छपवाकर, इन पर किस समय और कहां क्या दोष लगाएंगे, इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। इसके अलावा मामलेदार, सिरस्तेदार, मजिस्ट्रेट, इंजीनियर, डॉक्टर आदि सभी ब्राह्मण कर्मचारी हैं और अंत में सरकारी रिपोर्टर धर्म से ईसाई होने के बावजूद वह खून से ब्राह्मण है। इन तमाम ब्राह्मण कर्मचारियों का सरकारी विभागों में जमाव होने की वजह से वे लोग इन अधूरे विपत्तिग्रस्त लोगों को अपनी-अपनी कचहरियों के सामने किसी न किसी कारण से खड़ा नहीं करते; बल्कि उनके हाथ मौका लग जाए तो वे उनके पेट पर भी लात मारने में कोई कसर बाकी नहीं रखेंगे। इसी डर की वजह से ये लोग ब्राह्मण कर्मचारियों का नाम सुनते ही घबरा जाते हैं।”[27]

किसान, जो इस देश की रीढ़ हैं वे थोड़ी इज्जत के हकदार तो हैं ही। लेकिन ऐसा होता नहीं है। फुले कहते हैं– “अरे, जिनकी मेहनत पर सरकारी फौजी लवाजमा, बारूद-गोला, गोरे कर्मचारियो की हद से ज्यादा अय्याशी और काले कर्मचारियों का हद से ज्यादा वेतन, पेंशन, और दान-दक्षिणा मिलता है, उन किसानों को क्या पान-बीड़ी का भी सम्मान नही मिलना चाहिए? भैया, जो सभी देशवासियों के मुख का आधार हैं, उनके इतने बुरे हाल हैं।”[28]

ब्रिटिश सत्ता के आगमन के साथ ही कृषि की रीढ़ कहे जाने वाले पशुधन पर भी भीषण वज्रपात हुआ। तंदुरुस्त गायों, बछड़ों और भारवाहक बैलों का बड़े पैमाने पर वध होने लगा, जिसने भारतीय कृषि की कमर ही तोड़ दी और खेतों की जोताई के लिए अच्छे बैलों का अकाल पड़ गया। इस समस्या को लेकर फुले का सुझाव कुछ इस प्रकार है– “सरकार को सभी किसानों को यूरोपियन किसानों की तरह ज्ञानी बनाना चाहिए। उन्हें पढ़ना-लिखना सिखाना चाहिए। इनको जब तक यूरोपियन किसानों की तरह यंत्रों द्वारा खेती के काम करने लायक समझ नही आती, तब तक सभी गोरे लोगों को, मुस्लिमों को और अन्य लोगों को हिंदुस्तान के पशुधन को, जो खेती के लिए उपयोगी हैं, ऐसे गौ-बैल और उनके बछड़ों को काट करके नहीं खाना चाहिए; बल्कि उन्हें उनकी जगह पर यहां की भेड़-बकरियों को मार करके खाना चाहिए या विदेशों से गौ-बैल आदि खरीद करके यहां लाकर उनको मार करके खाना चाहिए। इसके लिए कानून बनाकर अमल में ला करके ही यहां के शूद्र किसानों के पास बैलों का आवश्यकता के अनुरूप संचय होगा।”[29]

आपने लेख के कुछ उद्धरणों में शिक्षा या ज्ञान का जिक्र बार बार देखा होगा। फुले की पूरी जीवन कहानी ही शिक्षा के प्रचार-प्रसार और अज्ञान से मुक्ति के लिए संघर्षरत रहने की है। किताब के प्रस्तावना की शुरुआत ही फुले कुछ इस तरह करते हैं– “विद्या के न होने से बुद्धि नहीं; बुद्धि के नहीं होने से नैतिकता न रही; नैतिकता के न होने से गतिमानता न आई; गतिमानता के न होने से धन-दौलत न मिली, धन-दौलत न होने से शूद्रों का पतन हुआ। इतना अनर्थ एक अविद्या से हुआ।”[30] फुले एक विज़न प्रस्तुत करते हैं। शिक्षा उनकी दृष्टि में मुक्ति का सबसे बड़ा हथियार है। वे चाहते हैं कि किसानों के बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले, ताकि वे जागरूक नागरिक बनें। उन्हें अपने अधिकारों का बोध हो। आज की शिक्षा-व्यवस्था को देखते हुए, फुले के चिंतन का महत्व और भी बढ़ जाता है। फुले जब यह कहते हैं कि किसानों के बच्चों को स्कूल में भेजने की हिम्मत नहीं होती क्योंकि ब्राह्मण मास्टर उन्हें हतोत्साहित करते हैं, तो हम उसमें आज की उस वास्तविकता की छाया देख सकते हैं, जहां पहली पीढ़ी के विद्यार्थियों को शिक्षा-संस्थानों में अनेक प्रकार की अदृश्य बाधाओं का सामना करना पड़ा। शिक्षा का अधिकार कानून बन जाने के बाद भी, जब दलित-आदिवासी बच्चों के साथ स्कूलों और विश्वविद्यालयों में भेदभाव की खबरें आती हैं और छात्र संस्थानिक अवहेलना और उदासीनता के शिकार होते हैं, तब फुले का यह विश्लेषण न केवल प्रासंगिक लगता है, बल्कि भविष्य के प्रति आगाह करता हुआ भी प्रतीत होता है।

किताब में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि श्रेष्ठताबोध से ग्रसित शिक्षक जो कि अक्सर भट्ट ब्राह्मण हुआ करते थे, जानबूझकर शूद्र किसानों के बच्चों को शिक्षा से दूर रखते ताकि किसान हमेशा नियंत्रण में रहें और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक न हो सकें। ऐसे भट्ट ब्राह्मण शिक्षकों के बारे में फुले की क्या राय है, यह भी देख लेते हैं– “जिनकी योग्यता कीचड़-मिट्टी का धंधा करनेवाले बेलदार कुंभारों से भी कम थी; जिनको यह मालूम नहीं कि किसानों के हल को किधर से पकड़ना पड़ता है। जो लोग केवल बकवास करने वाले, किसानों की कमाई पर मौज-मस्ती करने वाले मुफ्तखोर हैं, ‘फिर हम ही सभी मानवों में श्रेष्ठ हैं’, ऐसा गर्व से कहनेवाले शिक्षक, जिनके पूर्वजों ने किसानों को नीच का दर्जा दिया, वे कैसे किसानों के बच्चों को अच्छी शिक्षा और अनुशासन देंगे?”[31]

एक शिक्षित व्यक्ति ही शिक्षा के महत्व का ठीक-ठीक मूल्यांकन कर सकता है, लेकिन क्या हो यदि जिसे शिक्षा अथवा ज्ञान के महत्व को रेखांकित करना हो और उसकी नीयत में ही खोट हो क्योंकि ऐसे ही व्यक्ति को इस बात का अच्छी तरह से इल्म होता है कि असल शिक्षा आपको शक्तिशाली, न्यायप्रिय और उदार बनाती है। जाहिर है जब ऐसे मूल्यों की बढ़ोत्तरी होगी तो खुद-ब-खुद संरचनावादी समाज का अंत होगा और जो प्रिविलेज की स्थिति में होगा उसे अपनी सत्ता संरचना को साझा करना होगा। कोई ऐसा क्योंकर करेगा भला– “वे अपने अधीन हुए शूद्र किसानों से मनचाहा पैसा वसूल करते थे और उनके साथ मुंहदेखी मीठी बातें करते थे। लेकिन वे लोग उनको दिल से पढ़ाने के लिए टालमटोल करते हैं। इसका मूल कारण यह है कि यदि किसान विद्वान, समझदार हो गए, तो वे अपने कंधों से कोड़ा तज देंगे और दौलत कमाने के तरीके खोजने के प्रयास में लगेंगे। इसलिए इस डर की वजह से वे किसानों को पढ़ना-लिखना नहीं सिखा रहे है; क्योंकि यदि ऐसा हुआ तो उन सभी को भाग-भागकर अमेरिका में जाकर वहां रात और दिन मेहनत-मजदूरी करके अपना पेट भरना पड़ेगा।”[32]

फुले शिक्षा को कृषि सुधार का आधार मानते हैं। उनका मानना था कि बिना ज्ञान के न तो नई तकनीक आ सकती है, न उपज बढ़ सकती है। उनके कुछ सुझाव थे जो वे तात्कालिक सरकार को देना चाहते थे– “सरकार को सभी किसानों को यूरोपियन किसानो की तरह ज्ञानी बनाना चाहिए। उन्हें पढ़ना-लिखना सिखाना चाहिए।”[33] क्योंकि, “जिनको अक्षर भी पढ़ना नहीं आता, वे खेती के बारे में अन्य भाषाओं के ग्रंथ पढ़कर खेती में सुधार किस तरह कर सकते हैं? जिनको हमेशा ही भूखा सोना पड़ता है, उनको अपने बच्चों को बड़े-बड़े शहरों के कृषि-स्कूलों में पढ़ने के लिए किसके बल पर और किसके सहारे भेजना चाहिए?”[34]

फुले केवल आलोचना ही नहीं करते। वे उत्साहवर्द्धन की भी बातें करते हैं ताकि किसानों का हौसला बढ़े, वे बेहतर कर पाएं। वे कहते हैं कि सरकार को किसानों की वास्तविक स्थिति जांचकर उनके हित में नीतियां बनानी चाहिए न कि ब्राह्मण कर्मचारियों की रपटों पर भरोसा करना चाहिए। यह विजन आज भी लागू होना चाहिए। किसान-केंद्रित शिक्षा, ग्रामीण स्वास्थ्य-सेवा, कृषि-विस्तार सेवाएं जो वास्तव में किसानों तक पहुंचे, सिंचाई और जल-संरक्षण की नीतियां छोटे किसान को लाभ दें, ये सब फुले के उस विज़न के हिस्से हैं जो उनकी कृति के अंतिम परिच्छेदों में संकलित है।

जोतीराव फुले की इच्छा थी कि कागज़ी वायदे न किए जाएं, बल्कि ठोस कदम उठाएं जाएं– “सरकार सच्चे मन से अज्ञानी शूद्र किसानों का भला करके कृषि-उत्पादन को बढ़ाना चाहती है, तो उसे साल-हर साल श्रावण माह में किसानों का सम्मेलन करवाकर आश्विन माह में खेत के फसलों और हल जोतने की परीक्षाएं लेकर, अच्छे किसानों को इनाम-इकराम देने की परंपरा शुरू करनी चाहिए। हर तीन साल के अंतर पर अच्छे-अच्छे किसानों को उपाधियां देनी चाहिए। इसी तरह किसानों के पढ़े-लिखे बच्चों को अपनी खेती को अच्छी तरह संवारना चाहिए और इसके अलावा यदि उन्होंने अपना कुछ समय बचाकर लुहार और बढ़ई का काम सीखा और परीक्षाएं दीं, और सरकार ने उनको अपने खर्च से इंग्लैंड के कृषि स्कूलों में पढ़ने के लिए भेजने की व्यवस्था की तो यहां के किसान तुरंत अपने खेतों का सुधार करके सुखी होंगे।”[35]

किताब के अंत में फुले सरकार को लगभग चेताते हुए कहते हैं कि– “किसानों के बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाने का गप मारना ठीक नहीं है। सरकार जितना लोकल फंड इकट्ठा कर रही है, उतना भी यदि किसानों के बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर ईमानदारी के साथ खर्च करे तो मैं यही कहूंगा कि मेरे इतने दिनों की मेहनत को फल मिला है और मुझे बड़ी खुशी होगी। लेकिन यदि सरकार ने ऐसा नहीं किया तो इसके लिए वही जिम्मेदार होगी।”[36]

1875 के दंगे की त्रासदी की सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि अंतहीन यातनाओं को सहने के बाद भी किसानों में अपने अधिकारों के प्रति कोई न्यूनतम जागरूकता या सामूहिक चेतना नहीं थी। दुख की बात तो यह थी कि जो गिने-चुने किसान पढ़-लिख भी गए, वे अपने शोषित भाइयों की ढाल बनने के बजाय शोषक तंत्र के ही चाटुकार और खिदमतगार बन गए। फुले ने ‘किसान का कोड़ा’ के माध्यम से इसी मूक, एकाकी और असहाय मानवीय चीख को एक क्रांतिकारी स्वर प्रदान किया है ताकि सदियों से सोई हुई चेतना को जगाकर इस शोषक और दमनकारी व्यवस्था पर करारी चोट की जा सके।

किताब से गुजरते हुए यह एहसास होता है कि यह पुस्तक जोतीराव फुले ने केवल एक लेखक के रूप में नहीं, बल्कि एक समाज सुधारक और पीड़ित किसान समुदाय के संरक्षक के रूप में लिखी थी क्योंकि वे खुद किसान परिवार से आते थे। किताब लिखने के पीछे उन स्थितियों को उजागर करना था जो उस तात्कालिक समाज में शूद्र किसानों के शोषण और उत्पीड़न का कारण बन रहे थे। उनका उद्देश्य किसानों को उनके शोषण के वास्तविक ‘कारणों’ का विश्लेषण देकर उन्हें सचेत करना था। 1883 के महाराष्ट्र में किसान एक बहुआयामी संकट में था – जाति, धर्म, राजनीति, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, प्रशासन और पशुधन – सभी स्तरों पर उसका शोषण हो रहा था। फुले ने इन्हीं परिस्थितियों के खिलाफ ‘किसान का कोड़ा’ लिखा था।

‘किसान का कोड़ा’ केवल उन्नीसवीं सदी के महाराष्ट्र का दस्तावेज़ नहीं है बल्कि आज के भारत की भी कहानी हैं। फुले ने जो प्रश्न उठाए, जैसे कि शोषण की संरचना कौन बनाता है? ज्ञान किसे मिलता है और किसे नहीं मिलता? सत्ता और तंत्र किसकी सेवा करती है? धर्म का उपयोग किसके हित में होता है? इन सवालों के जवाब सभी के सामने होते हैं, लेकिन ये प्रश्न आज भी अनुत्तरित रह जाते हैं।

जब हम किसान-आत्महत्याओं की खबरें पढ़ते हैं, जब हम कृषि-कानूनों के विरुद्ध लाखों किसानों का आंदोलन देखते हैं, जब हम पाते हैं कि जो किसान पूरे देश को खिलाता है वह खुद भूख और कर्ज़ से जूझ रहा है, तब फुले का वह कोड़ा जो उन्होंने उस व्यवस्था पर उठाया था, आज भी हवा में लहराता नज़र आता है। किसी भी महान रचना की कसौटी है कि वह हमें केवल अतीत की तरफ नहीं, वर्तमान और भविष्य की तरफ भी देखने पर विवश करती है। ‘किसान का कोड़ा’ इस कसौटी को पूरा करती है।

संभवतः फुले खुद को एक क्रूसेडर के रूप में देखते थे। यानी न्याय की लड़ाई लड़ने वाला एक पथ-प्रदर्शक। यही कारण रहा हो कि आंबेडकर में जो प्रवर्तक की भावना जागी, वह फुले से ही हासिल की हो। ‘किसान का कोड़ा’ पढ़ते हुए स्वाभाविक रूप से डॉ. भीमराव आंबेडकर की याद आती है। उन्होंनेने फुले को अपना गुरु माना था और यह संबंध केवल भावनात्मक नहीं, वैचारिक भी था। दोनों यह मानते थे कि जाति-व्यवस्था भारतीय समाज की मूलभूत बुराई है, दोनों यह मानते थे कि शिक्षा और जागरूकता ही मुक्ति का मार्ग है, दोनों यह मानते थे कि धर्म की आड़ में शोषण को न्यायसंगत ठहराना अनैतिक है। फुले और आंबेडकर को साथ पढ़ने पर भारतीय सामाजिक यथार्थ की एक अधिक समग्र और गहरी समझ उभरती है।

आज के समय में भी इसे समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि कृषि-संकट और जाति-उत्पीड़न को अक्सर अलग-अलग मुद्दों के रूप में अभी भी देखा जाता है। फुले और आंबेडकर दोनों यह बताते हैं कि ये दोनों अलग-अलग नहीं हैं जब तक जाति-आधारित असमानता बनी रहेगी, कृषि-संकट का समाधान अधूरा रहेगा। ‘किसान का कोड़ा’ फुले का एक ऐसा साहसिक प्रयास था जिसका उद्देश्य समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े किसान को यह एहसास दिलाना था कि उसकी बर्बादी का कारण उसका अपना भाग्य या ईश्वर नहीं, बल्कि मनुष्य द्वारा रचित सामाजिक और प्रशासनिक बेड़ियां हैं। यह किताब फुले की उस करुणा और संकल्प का प्रमाण है, जिसमें उन्होंने खुद को पूरी तरह से शोषितों के हक में समर्पित कर दिया था।

संदर्भ

[1] फुले, जोतीराव, अनुवादक संजय गजभिए, किसान का कोड़ा, सम्यक प्रकाशन, 2012, पृ. 10
[2] फुले, पृ. 351
[3] वही, पृष्ठ 289
[4] http://egyankosh.ac.in//handle/123456789/103750
[5] फुले, पृ. 289
[6] फुले, उपरोक्त, पृष्ठ 302
[7] वही
[8] वही
[9] वही, पृष्ठ 303
[10] वही, पृष्ठ 328
[11] वही, पृष्ठ 304
[12] वही, पृष्ठ 361
[13] वही, पृष्ठ 305
[14] वही, पृष्ठ 309
[15] वही, पृष्ठ 304
[16] वही, पृष्ठ 312
[17] जी.पी. देशपांडे (एडि.), सेलेक्टेड राइटिंग्स ऑफ जोतीराव फुले, लेफ्टवर्ड, दिल्ली, 2002, पृष्ठ 155
[18] फुले, उपरोक्त, पृष्ठ 337
[19] वही, पृष्ठ 306
[20] वही, पृष्ठ 307
[21] वही, पृष्ठ 312
[22] वही
[23] वही, पृष्ठ 333
[24] वही
[25] वही, पृष्ठ 348
[26] वही, पृष्ठ 371
[27] वही, पृष्ठ 348
[28] वही, पृष्ठ 353
[29] वही, पृष्ठ 371
[30] वही, पृष्ठ 289
[31] जी.पी. देशपांडे, उपरोक्त, पृष्ठ 163
[32] फुले, उपरोक्त, पृष्ठ 357
[33] वही, पृष्ठ 371
[34] वही, पृष्ठ 353
[35] वही, पृष्ठ 373
[36] वही, पृष्ठ 375

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

अनुज कुमार

मुजफ्फरपुर, बिहार के अनुज कुमार युवा कवि व समालोचक हैं। इनकी दो रचनाएं ‘नम माटी’ व ‘कागज का नमक’ बहुप्रशंसित रही हैं। कविताओं के अलावा इनके अनेक आलेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। संप्रति नागालैंड विश्वविद्यालय, कोहिमा में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।

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