5 जून कवि-कथाकार सुरेंद्र स्निग्ध का जन्म दिन है। 5 जून विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। यह महज इत्तेफाक नहीं है कि सुरेंद्र स्निग्ध की रचनाओं में धरती और पर्यावरण के अनगिनत चित्र आए हैं। परंतु अभी चर्चा के केंद्र में है उनका कहानी संग्रह ‘क्यूटिकिल्स एवं अन्य कहानियां’। यह उनका पहला कहानी संग्रह है, जो उनके निधन के 8 वर्ष बाद अब प्रकाशित हो रहा है। यह अभिधा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर से प्रकाशित हुआ है। सुरेंद्र स्निग्ध ने लगभग हर विधा में रचनाएं की हैं। उनके जीवन काल में छह कविता संग्रह, दो उपन्यास, चार आलोचना की पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। पत्र-पत्रिकाओं में ढेरों टिप्पणियां, साक्षात्कार और आलेख छपे हैं।
इस संग्रह में कुल 10 कहानियां हैं। उसके अतिरिक्त भी कुछ कहानियां हो सकती हैं, जो पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हों। यह संग्रह उपलब्ध कहानियों के आधार पर ही है। कहानियों की संरचना और विषय अलग-अलग हैं। लेकिन इन कहानियों के विषय को गहराई से देखा जाए तो इसमें कथाकार के खुद के जीवन की छाप स्पष्ट दिखाई पड़ती है। सामाजिक संघर्ष, दुःख, प्रेम, करुणा, तथा आंतरिक द्वंद्व तथा बीते जीवन की स्मृतियों आदि के बिंब बार-बार इन कहानियों में उभर कर आते हैं। अधिकांश कहानियों में सूत्रधार अक्सर अपने कॉलेज के पढ़ाई-लिखाई के दिनों की स्मृतियों को सामने लाता है जिसमें ग्रामीण जीवन के संघर्ष, उनकी आर्थिक तंगी, फटेहाली के बीच बड़ी होती सपनों की दुनिया तथा पारिवारिक रिश्तों के बीच की गहराई को उकेरा गया है।
इस संग्रह की पहली कहानी ‘कूड़े का ढेर’ का संदर्भ पटना का मुसल्लहपुर इलाका है। कहानी में इस इलाके की बजबजाती जिंदगी की डिटेलिंग है। इस कहानी का सूत्रधार एक छात्र है जो लॉज पर रह रहा है जिसे इसका नायक रिटायर्ड फौजी-सिकंदर ‘विद्यार्थी जी’ कहता है। यहां वर्णित समाज ऐसा है जहां एक हुलिगनिज्म जन्म ले रहा है, जो स्पष्टतः आर्थिक असमानता के कारण है। जहां निम्नवर्गीय जीवन में अभाव को शराब के नशे में भुलाया जा रहा है। रिटायर्ड फौजी सिकंदर अब दारू के नशे में डूबा रहता है। उसके पूरे परिवार में एक तनाव और संवादहीनता है। कहानी में गधे का भी संदर्भ आता है जो कूड़े के ढेर का कचरा खाता रहता है। निम्नर्गीय जीवन की विसंगतियों को उकेरा गया है। कहानी में पिता सिकंदर जिसे लोग बादशाह कहते हैं और पुत्र किसना के बीच तनाव की पराकाष्ठा पुत्र द्वारा पिता की हत्या से होती है। पिता अपने पुत्र से उसी मोहल्ले की एक संभ्रांत लड़की को बलात्कार से बचाते हुए शहीद होता है। लेखक ने लिखा है– “बादशाह दम तोड़ चुका था। फर्श के लिजलिजे तरल पर गाढ़ा खून फैल गया था। बदबू उठ रही थी। नंगी बरखा अभी भी बेहोश पड़ी थी। वह छोटी कोठरी कूड़े का ढेर लग रही थी।” कूड़े का ढेर मोहल्ले से लेकर जिंदगी तक में बिखरा हुआ है, जो जिंदगी को विषाक्त कर रहा है।

इस संग्रह की दूसरी कहानी ‘शंटिंग’ है। मालगाड़ी ट्रेन में ‘शंटिंग’ की प्रक्रिया के प्रतीक का इस्तेमाल कहानी के नैरेशन में किया गया है, जिसमें इंजन द्वारा डिब्बे को पीछे ढकेला जाता है। युवा स्त्री सुनीता की आत्महत्या का प्रसंग उठाते हुए लेखक स्त्री मन की गुत्थियों की तह में जाता है। युवा पुरुष प्रेमी से प्रेम का नाटक और अंकल कहे जाने वाले अपने पिता के दोस्त टी.टी.ई. के साथ ‘अवैध संबंध’ और उसकी परिणति सुनीता के गर्भधारण और आत्महत्या, यही इस कहानी का मुख्य विषय है। यह कहानी नैतिकता-अनैतिकता से परे आधुनिक शहरी समाज की एक विसंगति की ओर संकेत करती है। कहानी का अंत अत्यंत ही दुखद है।
सुरेंद्र स्निग्ध की कहानियों में असफल प्रेम, स्त्री पात्र की होशियारी, युवा महिला प्रोफेसर और उसके युवा छात्र के बीच प्रेम और सेक्स की मनोग्रंथि के संदर्भ भी मिलते हैं। कई ऐसी विकृतियां जो आधुनिक जीवन और पूंजीवादी व्यवस्था के उप-उत्पाद हैं। उदाहरण के लिए इस संग्रह की शीर्षक कहानी को देखा जा सकता है। ‘क्यूटिकिल्स’ का तिलचट्ठे के संदर्भ में प्रयोग, इस कहानी के प्रतीकार्थ की सघनता में वृद्धि कर देता है। कहानी का पुरुष पात्र शशि सोचता है– “तिलचट्ठे को देखते ही मिस रेणुका दत्ता का चेहरा सामने आ जाता है।” महिला प्रोफेसर की सेक्स-कुंठाएं और अपनी शादीशुदा जिंदगी की असंतुष्टि उसे अपने एक युवा छात्र के करीब लाती है। छात्र उससे उसी तरह भागता है जैसे ‘प्रैक्टिकल ट्रे से भागा हुआ तिलचट्टा’ हो। यहां अपराध-बोध रहित विसंगति बोध प्रधान है।
सुरेंद्र स्निग्ध के इस संग्रह की कहानियों में अभिव्यक्ति की बेबाकी मौजूद है। इसमें स्त्री-पुरुष संबंधों की शिनाख्त करते हुए समाज द्वारा आरोपित संबंधों के प्रति विद्रोही तेवर दिखता है। चाहे वह भाई-बहन के संबंध क्यों न हों। दैहिक संबंधों में स्त्रियों की असंतुष्टि को भी मुखरता से दिखाया गया है। उनकी कहानियों की स्त्रियां बोल्ड एवं सशक्त कैरेक्टर के रूप में सामने आती हैं जो नए समय के अनुरूप काफी खुले मिजाज की हैं और अपनी इच्छाओं को प्रकट करना जानती हैं। कथाकार ने कहानियों में किसी तरह के टैबू या पाबंदी को स्वीकार नहीं किया है।
इस दृष्टि से कुछ कहानियों में साठोत्तरी कहानियों या समकालीन कहानियों के नकार के स्वर को इसमें महसूस किया जा सकता है। इन कहानियों में राजकमल चौधरी के तेवर की तरह सेक्स-विकृतियों को भी महसूस किया जा सकता है। इस दृष्टि से इस संग्रह की ‘नागफनी के फूल’, ‘रिक्त स्थान, ‘एक कच्ची प्रेमकथा’, ‘हम सब नंगे हैं’ आदि कहानियों को देखा जा सकता है।
इस संग्रह की दूसरी श्रेणी की कहानियों में लेखक के निजी जीवन के दुख और संघर्ष के बिम्ब दिखलाई पड़ते हैं। ‘सेमल के फूल’, ‘सिर्फ कहानी या…’ आदि कहानियां इस दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। ‘सेमल के फूल’ कहानी में एक गांव से आए एक असफल छात्र के जीवन के ढेर सारे पक्ष हैं जो अपने चारों ओर सपनों को मरते देखता है। आत्मकथात्मक शैली में लिखी गई इस कहानी के मुख्य पात्र के संघर्ष का एक पक्ष यह है कि उसका किशोर उम्र भतीजा ‘ल्यूकिमिया’ या ब्लड कैंसर जैसे भीषण रोग से लड़ रहा है। इस कहानी में आए इन प्रसंगों के विवरण सपाट होते हुए भी संवेदना को झकझोर डालते हैं।
इस संग्रह की तीसरी और अंतिम श्रेणी की कहानियां सामाजिक संघर्षों पर आकर ठहरती हैं। जो लेखक के लेखन का उत्स है। इन कहानियों में ‘लाल सलाम’ प्रमुख है। सुरेंद्र स्निग्ध की रचनाओं में सामंतवादी प्रवृतियों से संघर्ष करते कई किरदार नजर आते हैं। नक्षत्र मालाकार ‘छाड़न’ उपन्यास के प्रमुख किरदार के रूप में पाठकों के दिलों में जगह बना चुके हैं। ‘सुकनी की आंखों का सूरज’ कविता में भी जमीन पर मलिकाना हक की लड़ाई करती और अपने सुखद जीवन का सपना बुनती सुकनी के किरदार को हम जीवंत होता देख चुके हैं। ‘लाल सलाम’ कहानी में गैनू नामक हलवाहे के बहाने ग्रामीण जमींदार से संघर्ष करते खेतिहर मजदूर और उसकी अपराजेय मनोस्थिति का चित्रण है जो जमींदार के लठैतों के हमले से घायल होकर भी अपराजेय है और अपने गर्भस्थ शिशु के बहाने भावी जिंदगी के संघर्ष के फलीभूत होने के स्वप्न देखता है।
ये सभी दस कहानियां आकार में लगभग छोटी कहानियां ही हैं। इसलिए पुस्तकाकार प्रकाशन के लिए इस पुस्तक में सुरेंद्र स्निग्ध के दो संस्मरणों को ‘परिशिष्ट’ खंड में जोड़ दिया गया है। ‘दुख ही जीवन की कथा रही’, और ‘यह शहर तो लोहे का बना है’। ‘दुख ही जीवन की कथा रही’ शीर्षक संस्मरण पहले दैनिक ‘हिन्दुस्तान’ में धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुआ था। इसका पुनर्प्रकाशन रमणिका गुप्ता के संपादन और पंकज चौधरी के संपादन-सहयोग से निकलने वाली पत्रिका ‘युद्धरत आम आदमी’ में हुआ था।
पुस्तक – ‘क्यूटिकिल्स एवं अन्य कहानियां
लेखक – सुरेंद्र स्निग्ध
प्रकाशन – अभिधा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर
मूल्य – 250/- रुपए
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