सुषमा असुर झारखंड के गुमला जिले के विशुनपुर प्रखंड के सखुआपानी गांव में रहती हैं। उनका यह गांव नेतरहाट से कुछ किलोमीटर की दूरी पर है। वे असुर समुदाय से आती हैं, जिसे झारखंड में आदिम जनजाति की श्रेणी में रखा गया है। वे अपने समुदाय की पहली कवयित्री हैं, जो असुर भाषा और हिंदी में कविताएं लिखती हैं। उनका पहला काव्य संग्रह ‘मांजार’ (संगी/सहेली) हाल ही में केलुङ बुक्स, रांची से प्रकाशित हुआ है। हालांकि सुषमा पिछले एक दशक से असुर समाज की संस्कृति, परंपराओं, सवालों और चुनौतियों को कविताबद्ध करती रही हैं। वर्ष 2012 में उनकी कविता थी– ‘हम जरूर जियेंगे तुम्हारी तरह’। इस कविता में सुषमा ने लिखा था–
पठारी क्षेत्र में तुमने
हमें (असुरों को) जन्म दिया
पर जिंदा रहने के लिए रास्ता नहीं बतलाया
यहां सुषमा असुर अपने पुरखों से संवाद कर रही हैं और एक तरह से शिकायत कर रही हैं। इसमें यह अभिव्यक्ति भी शामिल है कि असुर पठार के इलाकों में रहते हैं। सखुआपानी, अमतीपानी, जोभीपाट सहित अनेक गांव हैं जहां असुर समुदाय के लोग रहते हैं। सुषमा असुर की यह शिकायत वर्तमान के सापेक्ष है। वह आगे कहती हैं–
पठारी क्षेत्र में तुमने
हमें (असुरों को) मजदूर बनाया
पर स्कूल जाने के लिए पैसा नहीं दिया
हमें आगे बढ़ने के लिए रास्ता नहीं बतलाया
अब तो हमारे पास भाषा नहीं है
हमारे पास संस्कृति नहीं है
हम तुम्हें कैसे पुकारें
हम तुम्हें किस विधि से याद करें
हे धरती के पुरखों
नेतरहाट के गांवों में जहां असुर समुदाय के लोग रहते हैं, वहां उनके ऊपर सांस्कृतिक प्रहार तेजी से हो रहे हैं। सुषमा इन्हें लेकर सजग रहती हैं। अपने नए काव्य संग्रह ‘मांजार’ में वह आदिवासी अध्यात्म को प्रस्तुत करती हैं। यह पहली मर्तबा है जब असुर समुदाय के अध्यात्म को वह सामने लेकर आती हैं। उनकी एक कविता है– ‘जहां जाओगी, वहीं जाएंगे’। वह लिखती हैं–
जहां जाओगी,
वहीं जाएंगे।
तुम्हें बायां देखना है
न दायां।
बीचों-बीच देखना है–
देखकर पार होना है।
फौरी तौर पर तो यही लगता है कि सुषमा बुद्ध के मध्यमार्ग की बात कह रही हैं, लेकिन यह बात तब सत्य होती यदि प्रारंभ की दो पंक्तियां नहीं होतीं– ‘जहां जाओगी, वहीं जाएंगे’। यहां वह प्रकृति से संवाद कर रही हैं और कह रही हैं कि उन्हें बस प्रकृति के साथ जाना है, उसकी दिशा में जाना है। न बाएं देखना है और न दाएं। वही रास्ता अपनाना है जो प्रकृति का है और एक दिन विलीन हो जाना है। आगे की पंक्तियों में वह इस विमर्श को और आगे बढ़ाती हैं–
न धर्म देखना है,
न जाति।
तुम्हें कागज-कलम
पकड़कर लिखना है।
यह अलहदा विचार है। धर्म और जाति का सवाल आदिवासियों पर थोप दिया गया है। आज आदिवासी भी अलग-अलग जातियों में बंट गए हैं। कोई अपने को मुंडा कहता है, कोई अपने संथाली कहता है, कोई स्वयं को हो मानता है। धर्म का आलम यह है कि यह मान ही लिया गया है कि आदिवासियों का कोई धर्म ही नहीं होता। वे किसी भी धर्म को मान सकते हैं। या कहिए कि उनके ऊपर कोई भी अपना धर्म थोप सकता है।
सुषमा आदिम जनजाति असुर समुदाय की वह पीढ़ी हैं, जो यह मानती है कि उनका इतिहास अब केवल मौखिक न रहे, वह लिखित में भी हो। वह इस देश में व्याप्त रंगभेद को भी उजागर करती हैं और कहती हैं–
रंग, रूप, चेहरा,
दर्पण–
सब बाहर के हैं।
तुम्हें अंदर का दर्पण
देखना है।
और आगे आह्वान करती हैं–
कैसे दिखते हैं–
यह भूल जाओ।
तुम्हें कागज-कलम
पकड़कर लिखना है।

दरअसल, अध्यात्म केवल हत्यारों का नहीं होता, अध्यात्म केवल आक्रमणकारियों का नहीं होता, अध्यात्म उनका भी होता है जो मारे जाते हैं या विस्थापित कर दिए जाते हैं। उनका अध्यात्म होता है और वही हूल विद्रोह और उलगुलान का स्रोत होता है। सुषमा अपने इस काव्य संग्रह में धर्म और अध्यात्म के सवालों से बार-बार लोहा लेती हैं। खास बात यह कि उनमें विक्टिमहुड की भावना नहीं है। ऐसा इसलिए कि सुषमा खुद अनैतिक धर्म को धर्म नहीं मानतीं। वह समता में विश्वास करती हैं। उनके लिए किसी तरह का अंतर मायने नहीं रखता है। उनकी कविता ‘हम असुर हैं, सुर नहीं’ में यह साफ-साफ देखा जा सकता है। हालांकि इस कविता में वह सुर यानी हिंदू धर्मग्रंथों में उल्लेखित देवताओं की बात करती हैं, लेकिन यह भेदभाव नहीं है। वह कहती हैं–
हम असुर हैं,
सुर नहीं।
असल में सुर-असुर का जिक्र हिंदू धर्म के ग्रंथों में युद्ध के प्रसंगों में मिलता है। इन प्रसंगों में यह जानकारी तो मिलती ही है कि पृथ्वी के इस भाग में जहां हमारा देश है, वहां बाहर से कुछ लोग आए, जो खुद को सुर की श्रेणी में रखते थे, और उन्होंने यहां के मूलनिवासियों का नरंसहार किया। हालांकि उन्हें इसके लिए युद्ध लड़ना पड़ा और इस युद्ध में उनकी जानें भी गईं। हिंदू धर्म के ग्रंथों में इसे देव-असुर युद्ध की उपमा दी गई है। सुषमा असुर अपनी कविता में मूलनिवासी आदिवासियों की बात कहती हैं और अत्यंत ही सहजता से सुर और असुर के बीच के अंतर को बताती हैं–
सुर वे हैं,
जो लोगों को
हर क्षण, हर पल
तड़पाते रहते हैं,
जिनका धर्म
लड़ाई और झगड़ा है।
सुषमा असुर वैज्ञानिक ढंग से सोचती हैं और यह विचार करती हैं कि किसने सभ्यता के विकास में किस तरह की भूमिका निभाई है। इसे ऐसे समझें कि हिंदू धर्म को माननेवाले लोगों ने सभ्यता के विकास में कौन-सी भूमिका निभाई है। चरवाहों ने मवेशीपालन तो किया ही, ज्ञान के वाहक भी बने। ऐसे ही वे जिन्होंने कपास को धागे में बदला और लोगों के लिए कपड़े बुने। और उन्हें भी जरूर याद करना चाहिए जिन्होंने मृत मवेशियों के खाल से इस दुनिया को समृद्ध कर दिया। एक ओर खालों से चप्पल-जूते बनाए तो दूसरी ओर मांदड़, ढोल, नगाड़े और डमरू बनाए। असुरों ने सभ्यता के विकास में अहम किरदार को निभाया है। सुषमा लिखती हैं–
हमने सिखाया–
लोहा कैसे गलता है,
पत्थर कैसे पिघलता है।
चपुवा, थोक, धुक-धुकी
धड़कन से
औजार जन्म लेते हैं।
यह रेखांकित किया जाना चाहिए कि सुषमा असुर औजारों की बात कहती हैं, हथियारों की नहीं। यह सही है कि जिस लोहे से कुदाल, हल, खुरपी, हंसुआ जैसे औजार बनाए जाते हैं, उसी लोहे से हथियार भी बनाए जाते हैं। लेकिन वे लोग, जो प्रकृति को जीतने की इच्छा नहीं रखते, उनके लिए हथियाराें का कोई महत्व नहीं। असुर किसी पर राज नहीं करना चाहते, किसी को गुलाम नहीं बनाना चाहते, किसी का घर नहीं उजाड़ना चाहते। इसलिए उन्हें हथियारों की आवश्यकता नहीं। अपनी कविता के अंत में सुषमा ईमान, यानी, नैतिकता की बात कहती हैं–
हमारे बनाए लोहे में
जंग नहीं लगता–
क्योंकि उसमें
ईमान पिघला होता है।
यही ईमान वह कसौटी है जिसके आधार पर किसी को सभ्य और असभ्य कहा जा सकता है। सनद रहे कि असभ्य होने का मतलब यह नहीं है कि वे मनुष्य नहीं होते। सुषमा असुर अपनी कविताओं के माध्यम से असुर समाज के विविध आयामों को सामने लाती हैं। इनमें एक आयाम शृंगार का भी है। उनकी एक कविता का शीर्षक है– ‘हम जो सिंगार करते हैं’। इसके प्रारंभ में वह लिखती हैं–
खोपा में हम पहनते हैं
गंगा, नर्मदा।
सरिया कर खोंसते हैं
झरने और बहती नदियां।
यहां सुषमा असुर कहती हैं कि हम अपने बालों के जुड़े में गंगा और नर्मदा को धारण करती हैं। बहते झरने और बहती नदियों को सजाकर अपने बालों में लगाती हैं। दरअसल, यह चुनौती है एक असुर समुदाय की स्त्री का उस दर्शन व धर्म को जो यह मानता है कि गंगा शिव की जटा से बहती है। इसके बरअक्स सुषमा असुर आगे कहती हैं–
गले में टांगते हैं–
सूरज, चांद, नौ ग्रह,
आसमान के सभी सितारे
और धरती के जुगनू।
कानों में–
जीव-जंतु, फूल,
जीवन के झरने।
पैरों में–
नौका, जहाज।
उंगलियों में–
आगे के रास्ते,
पहाड़, नदी, झरना,
तीन सिमान।
इसी में झलकता है
कि हम कौन हैं।
यहां सुषमा असुर अपने पुरखों को भी याद करती हैं–
पुरखा समय में
सोना-चांदी था।
अपने ही हाथों
हम सिंगार बनाते थे
सांपों का बेरा बनाकर
महिलाएं
दोनों हाथों में पहनती थीं।
बारह तरह के सिंगार
सांपों को दे दिए।
तुम ही सिंगार करो,
हमलोग तुम्हें पहनेंगे
पीढ़ी-दर-पीढ़ी।
अपनी इस कविता के माध्यम से सुषमा यह अभिव्यक्त करती हैं कि वे सांस्कृतिक हमलों का मुकाबला करेंगी। वह कह उठती हैं–
अपने हाथों में
कांसे की बेरा
बनाकर पहनेंगे।
ऐसी थी असुर महिलाओं की हिम्मत–
खबरदारी थी,
और अभी भी है।
कह दिया तो
झपट ही लेती हैं
नहीं कहा तो
छोड़ देती हैं।
इसलिए सिंगबोंगा (सूरज देवता) भी डरते हैं
असुर महिलाओं से।
बहरहाल, सुषमा असुर की कविताएं बताती हैं कि जीवन कभी निरपेक्ष नहीं होता और यही चरित्र रहा साहित्य का भी। नदियाें की उपस्थिति दोनों को प्रभावित करती रही है। फिर चाहे वह सिंधु और गंगा जैसी कोई बड़ी नदी हो या झारखंड के शंख के जैसी छोटी नदी हो। नदियों के किनारे पर मनुष्यों ने अपना वास बनाया, अपने खेत बनाए, धर्म बनाए, अपने लिए ईश्वर की परिकल्पना की और इसी तरह जीवन जारी है। यह आगे भी जारी रहेगा। विमर्श चलते रहेंगे। सभी गतिमान रहेंगे।
समीक्षित पुस्तक : मांजार
कवयित्री : सुषमा असुर
प्रकाशक : केलुङ बुक्स, रांची
मूल्य : 230 रुपए
(संपादन : अनिल)
फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्त बहुजन मुद्दों की पुस्तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्य, संस्कृति व सामाजिक-राजनीति की व्यापक समस्याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in