कैसे डॉ. आंबेडकर चाहिए? लोकतंत्र की चेतना, संविधान के मूल्यों से जोड़ने वाले आंबेडकर या फिर भक्ति की भावना पैदा करने वाले डॉ. आंबेडकर?
केंद्र सरकार और भाजपा के नेतागण डॉ. आंबेडकर से जुड़े स्थानों को तीर्थ स्थानों में बदलने और उनकी बड़ी-से-बड़ी प्रतिमाएं स्थापित करने के दावे करते हैं। लेकिन डॉ. आंबेडकर के विचारों को लोगों तक पहुंचाने और लोगों को डॉ. आंबेडकर के विचारों के लिए संगठित प्रयास करने वालों के लिए पुरस्कारों पर केंद्र सरकार ने रोक लगा दी।
डॉ. आंबेडकर के विचारों के लिए काम करने वालों के लिए केंद्र सरकार द्वारा स्थापित राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार क्यों नहीं दिए जा रहे हैं। वह वर्ष 2022 था जब डॉ. आंबेडकर अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार और डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कारों के लिए बड़े-बड़े विज्ञापन जारी किए गए, लेकिन पुरस्कार नहीं दिए गए। वर्ष 2015 में भी ऐसा ही हुआ था। विज्ञापन जारी तो किए गए, लेकिन पुरस्कार नहीं दिए गए।
डॉ. आंबेडकर के नाम पर पुरस्कार देने की शुरुआत 1992 में की गई थी। तब यह केवल राष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार था। वर्ष 1995 में डॉ. आंबेडकर के नाम से एक नए पुरस्कार की घोषणा की गई, जिसे डॉ. आंबेडकर इंटरनेशनल अवार्ड के नाम से जाना जाता है। वर्ष 2022 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार और डॉ. आंबेडकर अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार देने का अब तक का आखिरी विज्ञापन डॉ. आंबेडकर फाउंडेशन की तरफ से 9 मार्च, 2022 को दिया गया। लेकिन केवल विज्ञापन ही जारी किया गया। विज्ञापन कारपोरेट का ही औजार नहीं है, बल्कि सरकारों ने भी लोकतंत्र को चलाने के लिए अपना औजार बना लिया है। विज्ञापनों को देखकर लोगों को लगता है कि कुछ हो रहा है। विज्ञापन भोगी और किसी कार्यक्रम से जुड़े वास्तविक लोग अलग-अलग होते हैं। वास्तविक लोग यदि कमजोर हों तो विज्ञापन भोगी विज्ञापनों के डंडे से उन्हें चुप करा देते हैं।
डॉ. आंबेडकर के नाम से दिए जानेवाले राष्ट्रीय पुरस्कार के रूप में दस लाख रुपए और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार के रूप में 15 लाख रुपए निश्चित किए गए। राष्ट्रीय पुरस्कार उन्हें दिए जाने की बात कही गई जो भारत में डॉ. आंबेडकर के विचारों को समाज में आगे बढ़ाने के लिए काम करते रहे हैं। इसी तरह से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह पुरस्कार उन्हें दिए जाने की बात कही गई जिन्होंने दुनिया भर में गैर-बराबरी और अन्याय के खिलाफ संघर्ष करके या रचनात्मक काम करके अपनी पहचान बनाई।
ये दोनों पुरस्कार डॉ. आंबेडकर फाउंडेशन की तरफ से दिए गए और इसे दिए जाने की तारीख 14 अप्रैल रही है। सरकारी दस्तावेजों का अध्ययन करें तो उसमें यह बात पाई जाती है कि वर्ष 2015 से 2021 तक डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार ‘प्रशासनिक कारणों’ से तय नहीं किए जा सके। साथ ही इस योजना पर सरकार द्वारा पुनर्विचार करने की बात भी बताई गई। इसी तरह अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी 2001 से नहीं दिए गए और उनके न दिए जाने की वजह भी ‘प्रशासनिक’ बताई गई।

डॉ. आंबेडकर फाउंडेशन की नियमावली यह बताती है कि पुरस्कारों के लिए व्यक्तियों या संस्थाओं के नाम हर वर्ष नवंबर महीने में मांगे जाएंगे और 31 दिसंबर तक यह नाम भेजे जा सकते हैं। राष्ट्रपति के रूप में रामनाथ कोविंद के लिए अपने कार्यकाल में संभवत: अपने हाथों से डॉ. आंबेडकर के नाम पर स्थापित पुरस्कार देने के लिए 2022 में आखिरी मौका था। लेकिन वे नहीं दे सके। हरी झंडी नहीं मिली। भाजपा ने काेविंद को सामाजिक तौर पर दलित पृष्ठभूमि का बताकर अपना राजनीतिक आधार बढ़ाने में इस्तेमाल किया।
सन् 1992 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार दिए जाने की घोषणा के बाद से अब तक महज सात बार यह पुरस्कार दिया गया। अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार केवल दो बार अब तक दिए गए हैं। सन् 1999 में यह पुरस्कार मुरलीधर देवीदास उर्फ बाबा आमटे को दिया गया था और इसके बाद सन 2000 में यह पुरस्कार स्पेन के रेमी फर्नाड क्लाउडे को दिया गया।
इस पुरस्कार का एक दिलचस्प पहलू है कि पिछले बारह वर्षों में पुरस्कार देने की कवायद शुरू की गई और यह संभवत: दो बार की गई और पुरस्कार देने के लिए विज्ञापन निकाले गए। लेकिन शायद केवल विज्ञापनों से खुश करने के लिए ही यह कवायद शुरू की गई। एक अनुमान के अनुसार एक बार में विज्ञापनों पर पचास लाख रुपए से ज्यादा का खर्च आता है। दूसरी दिलचस्प बात यह है कि ‘प्रशासनिक’ कारणों से यह पुरस्कार नहीं दिया जा रहा है, लेकिन प्रशासनिक कारणों के रहस्य को आज तक खोला नहीं किया जा सका।
अटल बिहारी वाजपेयी की 1999 से 2004 वाली पांच साल की सरकार में भी हर साल दिए जाने वाला यह पुरस्कार नहीं दिया गया। यह सिलसिला कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में भी बरकरार था। यूपीए-दो की सरकार में तीन वर्षों में केवल राष्ट्रीय पुरस्कार दिए गए।
यह भी कम दिलचस्प नहीं है कि डॉ. आंबेडकर के नाम की राजनीति सभी संसदीय पार्टियां करती हैं लेकिन इतने वर्षों तक इन पुरस्कारों के न दिए जाने के कारणों को लेकर कोई सवाल खड़े नहीं करता।
पुरस्कार से प्रोत्साहन का संचार होता है। शायद दलितों के बीच काम करने वालों को प्रोत्साहन की राजनीतिक जरूरत नहीं रह गई है। उनके बीच बनी चेतना को भोथरा करना राजनीति का उद्देश्य है। चेतना नहीं, भक्ति चाहिए। यह दूरगामी राजनीतिक उद्देश्य का ही हिस्सा हो सकता है।
(संपादन : नवल/अनिल)
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