राजस्थान के हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर जिलों में लंबे समय तक बावरी समाज को केवल एक वोट बैंक के रूप में देखा जाता रहा। लेकिन पिछले दो दशकों में संगठन, शिक्षा और महिला नेतृत्व के सहारे इस समुदाय ने अपनी राजनीतिक पहचान बदली है। चार महिलाओं का विधानसभा तक rपहुंचना इस बदलाव का सबसे दिखने वाला चेहरा है, लेकिन असली कहानी उस सामाजिक यात्रा की है, जिसने एक उपेक्षित दलित समुदाय को मतदाता से राजनीतिक दावेदार बना दिया।
राजस्थान के हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर जिलों में चुनाव आते ही बावरी समाज के वोटों का हिसाब हर राजनीतिक दल लगाता था। कई विधानसभा क्षेत्रों में इस समाज के मतदाताओं को जीत-हार का निर्णायक कारक माना जाता था, लेकिन जब टिकट वितरण की बारी आती तो लाखों की आबादी वाला यही समुदाय राजनीतिक दलों की प्राथमिकताओं से लगभग गायब हो जाता। लोकतंत्र में उसे मतदाता की भूमिका तो मिलती, लेकिन नेतृत्व की नहीं।
अब पिछले एक दशक में यह तस्वीर तेजी से बदली है। आज यही समाज केवल वोट देने वाला समुदाय नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व का दावेदार बनकर उभरा है। अनुसूचित जाति में शामिल बावरी समाज की आबादी हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर जिलों में लगभग पांच लाख मानी जाती है। अधिकांश परिवार खेतिहर मजदूर, चरवाहे या छोटे एवं सीमांत किसान हैं। शहरों में रहने वाले कुछ परिवार शिक्षा और सरकारी नौकरियों के सहारे अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति तक पहुंचे हैं, लेकिन गांवों में आज भी बड़ी संख्या में परिवार भूमिहीन हैं या उनके पास इतनी कम कृषि भूमि है कि उससे परिवार का गुजारा नहीं हो पाता। आर्थिक कठिनाइयों के साथ-साथ सामाजिक उपेक्षा भी इस समुदाय के जीवन का हिस्सा रही है।
बावरी समाज की वर्तमान राजनीतिक स्थिति को समझने के लिए उसके सामाजिक इतिहास को जानना जरूरी है। समाज के वरिष्ठ लोगों का कहना है कि लंबे समय तक यह समुदाय मुख्यधारा से कटा रहा। शिक्षा का अभाव, सीमित संसाधन और सामाजिक भेदभाव ने उसके विकास की गति को प्रभावित किया। समाज के भीतर देसी, पंजाबी और बीदावती जैसी तीन प्रमुख शाखाएं होने के कारण सामूहिक राजनीतिक पहचान विकसित होने में समय लगा। चुनावों में समाज की संख्या तो दिखाई देती थी, लेकिन उसकी सामूहिक राजनीतिक आवाज़ नहीं बन पाती थी। समाज को संगठित करने में अग्रणी भूमिका निभाने वाले सेवानिवृत्त सहायक निदेशक (अभियोजन) रामलाल रखावत कहते हैं, “हमारा समाज लंबे समय तक सामाजिक और आर्थिक रूप से बेहद पिछड़ा रहा। शिक्षा नहीं थी, जागरूकता नहीं थी और समाज का बड़ा हिस्सा अपनी रोजी-रोटी के संघर्ष में ही उलझा रहता था। ऐसे माहौल में राजनीतिक नेतृत्व तैयार होना आसान नहीं था।”
रखावत के अनुसार, वर्ष 2000 के आसपास समाज के कुछ शिक्षित लोगों ने महसूस किया कि यदि शिक्षा और संगठन पर काम नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां भी इसी स्थिति में रहेंगी। इसी सोच के साथ श्रीगंगानगर में राजस्थान बावरी समाज विकास संस्था का गठन किया गया। संस्था का उद्देश्य केवल सामाजिक सम्मेलन आयोजित करना नहीं था बल्कि समाज को शिक्षा, संगठन और नेतृत्व के लिए तैयार करना था।
रखावत बताते हैं कि “हमने सबसे पहले समाज के पढ़े-लिखे लोगों को साथ जोड़ा। गांव-गांव जाकर लोगों से कहा कि अगर सम्मान चाहिए तो बच्चों को पढ़ाना होगा। हमें लगा कि शिक्षा के बिना न समाज बदलेगा और न राजनीति में उसकी हिस्सेदारी बढ़ेगी।” संस्था ने केवल शिक्षा पर ही नहीं बल्कि समाज के भीतर बिखराव को कम करने पर भी काम किया। देसी, पंजाबी और बीदावती जैसी शाखाओं के बीच संवाद बढ़ाने का प्रयास किया गया। पहले जहां सामाजिक कार्यक्रम अलग-अलग आयोजित होते थे, वहीं धीरे-धीरे साझा सम्मेलन होने लगे। शिक्षा, रोजगार, सामाजिक सम्मान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे पूरे समाज के साझा एजेंडे का हिस्सा बनने लगे। यह परिवर्तन धीरे-धीरे आया, लेकिन इसी ने आगे चलकर राजनीतिक एकजुटता की मजबूत नींव रखी। समाज के लोगों का कहना है कि उस समय सबसे बड़ी समस्या यह नहीं थी कि राजनीतिक दल टिकट नहीं देते थे बल्कि यह थी कि समाज स्वयं भी संगठित होकर टिकट मांगने की स्थिति में नहीं था। चुनावों के दौरान अलग-अलग समूह अलग-अलग दलों के साथ चले जाते थे। संगठन बनने के बाद पहली बार यह सोच विकसित हुई कि यदि आबादी के अनुपात में राजनीतिक भागीदारी चाहिए, तो समाज को साझा पहचान के साथ आगे आना होगा।
करीब एक दशक तक चले इन प्रयासों का असर वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में दिखाई दिया। उन्हीं दिनों श्रीगंगानगर के उद्योगपति (दिवंगत) डी.डी. अग्रवाल ने जमींदारा पार्टी का गठन किया और विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों के लिए उम्मीदवार तलाशने शुरू किए। राजस्थान बावरी समाज विकास संस्था के प्रतिनिधियों ने उनसे आग्रह किया कि यदि उनकी पार्टी वास्तव में नए सामाजिक समीकरणों की राजनीति करना चाहती है तो उसे उन समुदायों को भी प्रतिनिधित्व देना चाहिए, जिन्हें मुख्यधारा की राजनीति लगातार नजरअंदाज करती रही है। इस आग्रह पर अग्रवाल ने रायसिंहनगर सुरक्षित विधानसभा क्षेत्र से बावरी समाज की सोना देवी बावरी को उम्मीदवार बनाया। यह केवल एक चुनावी फैसला नहीं था। पहली बार बावरी समाज की तीनों प्रमुख शाखाओं को एक साझा राजनीतिक लक्ष्य मिला। चुनाव प्रचार के दौरान गांव-गांव यह संदेश दिया गया कि यह किसी एक महिला का चुनाव नहीं बल्कि पूरे समाज के राजनीतिक सम्मान का सवाल है।

इसी बीच पड़ोसी अनूपगढ़ सुरक्षित विधानसभा क्षेत्र में अप्रत्याशित घटनाक्रम हुआ। भाजपा ने पहले प्रियंका बेलाण को उम्मीदवार बनाया था, लेकिन नामांकन प्रक्रिया के दौरान उनकी आयु निर्धारित सीमा से कम होने का पता चला। पार्टी को तत्काल नया प्रत्याशी चुनना पड़ा। रायसिंहनगर में बावरी समाज की उम्मीदवारी पहले ही चर्चा का विषय बन चुकी थी और अनूपगढ़ में भी इस समाज का प्रभावी मतदाता आधार था। भाजपा ने रणनीति बदलते हुए शिमला देवी बावरी को टिकट दिया। जब चुनाव परिणाम आए तो सोना देवी बावरी और शिमला देवी बावरी दोनों विधानसभा पहुंच चुकी थीं। यह केवल दो महिलाओं की जीत नहीं थी। पहली बार एक ऐसे दलित समुदाय ने स्वयं को विधानसभा में प्रतिनिधित्व करते हुए देखा, जिसे दशकों तक केवल मतदाता माना जाता रहा था। राजनीतिक दलों के लिए यह दो सीटों का परिणाम था, लेकिन बावरी समाज के लिए यह उसके राजनीतिक आत्मविश्वास का पहला सार्वजनिक उद्घोष था।
वर्ष 2013 में सोना देवी बावरी और शिमला देवी बावरी की जीत ने एक ऐसा राजनीतिक संदेश दिया, जिसे न केवल बावरी समाज बल्कि सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने गंभीरता से लिया। लंबे समय तक जिस समुदाय को केवल वोट बैंक माना जाता था, उसने पहली बार यह साबित किया कि यदि उसे प्रतिनिधित्व का अवसर मिले और वह संगठित होकर उसके पीछे खड़ा हो जाए तो चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। इन दोनों जीतों ने बावरी समाज के भीतर वर्षों से मौजूद राजनीतिक आकांक्षाओं को पहली बार सार्वजनिक अभिव्यक्ति दी।
इसका असर अगले कुछ वर्षों में स्पष्ट दिखाई देने लगा। वर्ष 2018 में नागौर जिले की मेड़ता सुरक्षित विधानसभा सीट से इंदिरा बावरी विधायक चुनी गईं। इससे यह धारणा भी टूटी कि बावरी समाज का राजनीतिक उभार केवल श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ तक सीमित है। 2018 में अनूपगढ़ विधानसभा क्षेत्र से भाजपा की टिकट पर संतोष बावरी के विधानसभा पहुंचने के साथ यह संदेश और मजबूत हुआ कि बावरी समाज अब राजनीतिक दलों की रणनीति में स्थायी स्थान बना चुका है। एक दशक के भीतर राजस्थान विधानसभा में बावरी समाज की चार महिलाओं का पहुंचना किसी संयोग का परिणाम नहीं था, बल्कि उस सामाजिक और राजनीतिक प्रक्रिया का विस्तार था जिसकी नींव वर्षों पहले संगठन और शिक्षा के माध्यम से रखी गई थी।
राजस्थान बावरी समाज विकास संस्था के प्रदेश सचिव कृष्ण चौहान कहते हैं, “अक्सर लोग कहते हैं कि चार महिलाओं के विधायक बनने से समाज में राजनीतिक चेतना आई। राजनीतिक चेतना तो पहले भी थी लेकिन उसे दिशा और प्रतिनिधित्व नहीं मिला था। इन जीतों ने समाज को यह विश्वास जरूर दिया कि वह केवल वोट देने वाला समुदाय नहीं, बल्कि नेतृत्व करने की क्षमता भी रखता है।”
चार महिला विधायकों के विधानसभा पहुंचने का प्रभाव केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रहा। दोनों जिलों में पंचायत चुनावों के दौरान समाज की दावेदारी पहले की तुलना में कहीं अधिक मुखर होकर सामने आने लगी। कई गांवों में बावरी समाज के लोग सरपंच चुने गए। पंचायत समितियों और जिला परिषदों में भी उनकी भागीदारी बढ़ी। राजनीतिक दलों के सामने टिकट वितरण के समय समाज की दावेदारी को पहले की तरह नजरअंदाज करना आसान नहीं रहा। समाज के वरिष्ठ लोगों का मानना है कि पहले चुनावों के समय राजनीतिक दल केवल वोट मांगने आते थे, लेकिन अब वे उम्मीदवार तय करते समय भी समाज के प्रभाव को ध्यान में रखने लगे हैं। यह परिवर्तन केवल इसलिए संभव हुआ क्योंकि समाज ने यह दिखा दिया कि यदि वह संगठित होकर मतदान करता है तो चुनावी परिणामों पर असर डाल सकता है। संख्या पहले भी थी, लेकिन संगठन और साझा नेतृत्व ने उसे राजनीतिक शक्ति में बदलने का काम किया।
राजस्थान बावरी समाज विकास संस्था के प्रदेशाध्यक्ष डॉ. बलदेव सिंह चौहान कहते हैं, “किसी भी समुदाय की संख्या अपने आप राजनीतिक शक्ति नहीं बनती। संख्या तब ताकत में बदलती है, जब उसके साथ संगठन, नेतृत्व और साझा उद्देश्य जुड़ जाते हैं। पिछले दो दशकों में हमारा सबसे बड़ा प्रयास समाज को इसी दिशा में तैयार करना रहा है।”
डॉ. चौहान कहते हैं कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व अपने आप सामाजिक और आर्थिक बराबरी नहीं ला सकता। आज भी गांवों में बावरी समाज की बड़ी आबादी आर्थिक रूप से कमजोर है। अधिकांश परिवार भूमिहीन हैं या बहुत कम कृषि भूमि पर निर्भर हैं। खेतिहर मजदूरी, चरवाही और मनरेगा आज भी हजारों परिवारों की आजीविका का आधार हैं। सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में समाज की भागीदारी बढ़ी जरूर है, लेकिन आबादी के अनुपात में अभी भी बहुत कम है।
रामलाल रखावत कहते हैं, “राजनीतिक प्रतिनिधित्व ने समाज को आत्मविश्वास दिया है, लेकिन अब हमारी सबसे बड़ी लड़ाई शिक्षा की है। अगर बच्चे पढ़ेंगे नहीं तो राजनीतिक उपलब्धियों का लाभ भी सीमित रहेगा। इसलिए आज हम गांव-गांव जाकर लोगों से कहते हैं कि राजनीति जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी शिक्षा है।”
उनके अनुसार पिछले एक दशक में समाज के भीतर सबसे उल्लेखनीय परिवर्तन लड़कियों की शिक्षा को लेकर आया है। विधायक बनी महिलाओं ने समाज की नई पीढ़ी के सामने ऐसे उदाहरण रखे हैं, जिनसे परिवारों की सोच बदलने लगी है। पहले जहां अनेक परिवार बेटियों की पढ़ाई जल्दी छुड़वा देते थे, वहीं अब उन्हें कॉलेज भेजने और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। समाज के संगठन भी छात्रवृत्ति, कोचिंग, छात्रावास और शैक्षिक सहयोग जैसे प्रयासों पर पहले की तुलना में अधिक ध्यान दे रहे हैं। डॉ. बलदेव सिंह चौहान बताते हैं कि संस्था ने समाज की आर्थिक रूप से कमजोर एक सौ मेधावी छात्राओं की शिक्षा में सहयोग करने की पहल भी शुरू की है। उनका मानना है कि यदि राजनीतिक प्रतिनिधित्व को स्थायी सामाजिक परिवर्तन में बदलना है तो उसका आधार शिक्षा ही बनेगी।
बावरी समाज की कहानी केवल चार महिला विधायकों की सफलता की कहानी नहीं है। यह उस लंबी सामाजिक प्रक्रिया की कहानी है जिसमें संगठन ने बिखरे हुए समाज को जोड़ा, शिक्षा ने आत्मविश्वास पैदा किया और राजनीतिक प्रतिनिधित्व ने उस आत्मविश्वास को सार्वजनिक पहचान दी। यह यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है। आर्थिक विषमता, सीमित संसाधन, शिक्षा और रोजगार की कमी जैसी चुनौतियां आज भी समुदाय के सामने हैं लेकिन एक बुनियादी बदलाव आ चुका है। अब यह समाज केवल चुनावों में वोट डालने तक अपनी भूमिका सीमित नहीं मानता बल्कि सत्ता और नीतिनिर्माण में अपनी हिस्सेदारी को भी लोकतांत्रिक अधिकार के रूप में देखने लगा है।
हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर के बावरी समाज की यात्रा आत्मविश्वास के निर्माण की कहानी है। यह उस समाज की कहानी है जिसने संगठन को आधार बनाया, शिक्षा को परिवर्तन का माध्यम बनाया और महिला नेतृत्व के जरिए यह साबित किया कि लोकतंत्र में उसकी भूमिका केवल मतदाता की नहीं बल्कि दावेदार की भी है। इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि अब राजनीतिक दल बावरी समाज के लोगों को अपने संगठनात्मक ढांचे में भी तरजीह देने लगे हैं। मसलन, अनूपगढ़ में बावरी समाज की सक्रिय नेता रामी देवी बावरी को कांग्रेस ने प्रदेश सचिव बनाया है। वह अनूपगढ़ सीट से टिकट के लिए दावेदारी भी जता रही है। इसी प्रकार हनुमानगढ़ जिले की पीलीबंगा सीट पर भी बावरी समाज के लोग दावेदारी जता रहे हैं।
(संपादन : नवल/अनिल)
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