h n

बिहार में भरत भूषण तिवारी की ‘हत्या’, समाज, तंत्र और मीडिया

भरत भूषण तिवारी को मारने के आरोप के खिलाफ जो लोग बोल रहे हैं, वे कब किस मुठभेड़ के बाद नाचने-गाने व ताली बजाने वालों में रहे हैं। यह कोई शोध का विषय नहीं है। आंखों के सामने दिखता है। बता रहे हैं अनिल चमड़िया

भारतीय समाज में कोई भी घटना जनसंचार माध्यमों में किस तरह की जगह बना सकती है, इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। एक तरह की दो घटनाएं हों तो एक घटना जनसंचार माध्यमों के लिए नजरअंदाज करने वाली स्थिति में दिखती है तो दूसरी घटना कई-कई दिनों तक एक तरह की सत्ता संरचना पर दबाव बनाने की हद तक छांह जाती है। इसी के अनुरूप राजनीतिक पार्टियों के नेताओं व सामाजिक चेहरों का व्यवहार तय होता है। इस विश्लेषण का संदर्भ बिहार में गत 17 जून, 2026 को भोजपुर जिले के शाहपुर प्रखंड के बिलौटी गांव में 28 वर्षीय भरत भूषण तिवारी की मुठभेड़ के नाम पर हत्या करने के पुलिस पर आरोप की घटना है।

तिवारी की मुठभेड़ के नाम पर हत्या करने के आरोप से पहले मुठभेड़ के नाम पर हत्या का एक संक्षिप्त इतिहास जाना जा सकता है। बिहार में ही नहीं, पूरे देश में मुठभेड़ के नाम पर हत्या का इतिहास 1960 के दशक से लिखा जा रहा है। इन मुठभेड़ की घटनाओं में पुलिस के खिलाफ हत्या के मुकदमें दर्ज हुए इसका भी एक ढीला-ढाला शोध मिल जाता है। लेकिन कानून के हाथों फांसी जैसी सजा से मरे 98-99 प्रतिशत लोग सामाजिक तौर पर वंचित वर्ग से रहे हैं, यह मुक्कमल शोध उपलब्ध है।

भोजपुर में ही मुठभेड़ के नाम पर हत्या करने के आरोप की कई ऐसी शिकायतें दर्ज हैं, लेकिन उनमें जांच, शिकायतों के खिलाफ कार्रवाई और अदालत द्वारा सजा के अलग-अलग विवरण मिलते हैं। दरअसल, भारतीय समाज में कानूनी मशीनरी द्वारा लोगों के प्रति नजरिए में उतने ही तरह के भेद-विभेद हैं, जितने तरह के भेदों-विभेदों पर समाज का ढांचा टिका हुआ है। यही भेद-विभेद सत्ता संरचना के विभिन्न हिस्सों में भी दिखता है। वह चाहे पुलिस हो, मीडिया हो, अदालत हो, राजनीतिक पार्टियां हों।

नि:संदेह भरत भूषण तिवारी की हत्या लोकतंत्र जैसी संवैधानिक व्यवस्था के लिए चिंतित करने वाली है। यह पुलिस के बे-लगाम होने की प्रवृत्ति का एक उदाहरण है। लेकिन इस घटना को मोटे तौर पर तीन हिस्सों में देखा जाना चाहिए।

पहला, भारतीय समाज में भरत भूषण तिवारी जैसे युवा का निर्माण। दूसरा, पुलिस ढांचे का चरित्र व तीसरा, तिवारी की हत्या की घटना का मीडिया व राजनीतिक दलों के नेताओं द्वारा इस्तेमाल।

भोजपुर का शाहपुर का इलाका ब्राह्मण के प्रभाव वाला माना जाता है। गांव बिलौटी में भारत भूषण तिवारी की मां ने अखबारनवीस को बताया कि उनका बेटा सामाजिक सेवा का भाव रखता था। इस गांव के पास के गांव में पानी में बह जाने वाले दर्जनों घरों के लोग रहते है। उनके बीच भी तिवारी सक्रिय थे। उनकी चिंता करते थे। ये बयान खुद गंगा के पानी की मार से पीड़ित विस्थापितों ने बताई।

भारतीय परिवारों में बच्चों का पालन-पोषण तो होता है और उन पर सत्ता संरचना में शामिल होने का बोझ बना रहता है। बेहद अंतर्विरोधों से परिवार भरे होते हैं। मां और पिता के बीच उम्र की ही दूरी नहीं होती हैं बल्कि किसी बच्चे को पालने-पोसने में दोनों के बीच एक खींचतान की प्रवृति होती है। यह मां-बाप की अपनी संरचना की पृष्ठभूमि का भेद होता है।

बहरहाल भरत भूषण तिवारी निम्न वर्गीय परिवार के सदस्य रहे हों, लेकिन समाज संरचना में उच्च माने जाने वाले जाति के सदस्य थे। ऐसी पृष्ठभूमि एक ऐसे व्यक्ति का निर्माण करती है, जिसे तात्कालिक परिस्थितियां किस धारा में मोड़ सकती हैं, यह तात्कालिक परिस्थितियों के पूरे चरित्र पर निर्भर करता है। राजनीति में विचार-सिद्धांत के मूल्य बेहद दबा दिए गए हैं और उस पर हर स्तर के सूक्ष्म हमले जारी हैं। ऐसी स्थिति किसी भी नई पीढ़ी के लिए बेहद जटिल और चुनौतीपूर्ण हो जाती है।

भरत भूषण तिवारी सोशल मीडिया के जरिए सत्ता शीर्ष को चेतावनी देता है। उसे चुनौती देता है। उसके सामने सोशल मीडिया एक तरह का हथियार है, जिसका एक लोकतांत्रिक चेहरा दिखता है। व्यक्ति खुद को संगठित ताकत समझने के भ्रम में बुरी तरह फंस जाता है। वह मोबाइल फोन के कैमरे का इस्तेमाल करता है और उसे चाहे-अनचाहे जो भी अपनी अभिव्यक्ति के लिए असंगठित प्रशिक्षण मिलता रहा है, उस भाषा का वह इस्तेमाल करता है। भारतीय समाज में हर उस व्यक्ति में भगत सिंह का रूपक दिखने लगता है जो कि सत्ता शीर्ष को चुनौती देते हैं। चाहे वह चुनौती और लक्ष्य बेहद भटकाव भरे या उलझे हों। दूसरी तरफ शीर्ष सत्ता संरचना के लिए मौतों की संख्या मायने नहीं रखती है। वहां सबसे ज्यादा असुरक्षा बोध गहराया रहता है, इसीलिए वह एक भी चुनौती को नाकाबिले बर्दाश्त समझती है। मानवीय प्रश्न और संवेदना समाज और उसकी संस्कृति का विषय होता है। सत्ता संरचना अपने अस्तित्व को ही प्राथमिक मानती है।

भारतीय सत्ता संरचना दमन के चरित्र से निर्मित हुई है। यह बात बार-बार दोहराई जाती रही रही है। लेकिन उसका इतिहास इतना छोटा नहीं है। वह बेहद विस्तारित है। सत्ता संरचना में एक विचार के रूप में हर मानव मानव नहीं है। मानव शरीर के रूप में वह दिखता भी हो तो वह सत्ता द्वारा दिए गए दर्जे के हिसाब और स्तर का शरीर है। इसमें कुछ स्तर बेहद घटिया भी हैं, जिनका कोई मूल्य नहीं है। उसकी परछाई तक नाकाबिले बर्दाश्त है।

भरत भूषण तिवारी के पुलिस एनकाउंटर का विरोध करते लोग

सत्ता संरचना में पुलिस का ढांचा समाज और सत्ता के बीच खड़ा होता है। उसके पास कई तरह के हथियार होते हैं। जेलें होती है। रस्सी-डंडे होते हैं। पुराने के साथ नए-नए तरह के हथियार भी होते हैं। वह समाज की तरफ तने रहते हैं। समाज की सुरक्षा के नाम पर लेकिन सत्ता की सुरक्षा की तरफ और सत्ता के खिलाफ चुनौतियों की तरफ मुखातिब होते हैं। अंग्रेजों ने जो सत्ता का ढांचा तैयार किया, वह पराए लोगों पर शासन करने के उद्देश्यों के लिए थे। उनमें भी मानवीय स्तर पर भेद करने के विचार रहे हैं। न जाने कितने विद्वानों ने, कितने भुक्तभोगियों ने, कितनी महिलाओं ने, कितने दलितों ने, कितने आदिवासियों ने, और न जाने किन-किन नाम वालों ने पुलिस के बारे में अपनी राय लिखी है।

अंग्रेजों के जाने के बाद पुलिस सुधार के नाम पर कितने आयोग बने। ऊंची अदालतों में पुलिस के बारे में राय आई। लेकिन न पुलिस का डंडा बदला और न ही रस्सी बदली। नए-नए हथियार जरूर दे दिए गए। दंड संहिता के नाम न्याय संहिता कर दिया गया। इस बात की कल्पना करें कि जिस राजनीतिक सत्ता को आजादी के आंदोलनों और शहादतों के बदले उपलब्धि के रूप में हासिल करने का दावा किया जाता है, वह कैसे खुलेआम लोगों को मुठभेड़ के नाम पर निपटने का सार्वजनिक आदेश देती है। जब कि वह संविधान की शपथ लेती है और लोगों के बीच किसी तरह का भेद-विभेद या पक्षपात व विद्वेष से परे रहने का शपथ लेती है। सबसे मुश्किल बात तो यह हो गई है कि आजादी का तराना गाने वाले लोगों की एक भीड़ मुठभेड़ पर तालियां बजाती है। नाचती, गाती और झूमती है। पुलिस के लोग भी इसी तरह से अपनी कामयाबी बताकर नाचते-गाते हैं। किसके खिलाफ, किसके लिए कामयाबी?

भरत भूषण तिवारी को मारने के आरोप के खिलाफ जो लोग बोल रहे हैं, वे कब किस मुठभेड़ के बाद नाचने-गाने व ताली बजाने वालों में रहे हैं। यह कोई शोध का विषय नहीं है। आंखों के सामने दिखता है।

तिवारी की हत्या का आरोप दरअसल एक ऐसे ढांचे के निर्माण का हिस्सा है, जिसे बनाने में उनकी भी भूमिका और समर्थन रहा है जो कि केवल खास तरह की घटना का विरोध करते हैं। यह विरोध एक राजनीतिक अवसर भर होता है।

तिवारी की हत्या के बाद पुलिस की भूमिका पर सवाल खड़े नहीं होते यदि आसपास के लोगों ने उस पर सवाल खड़े नहीं किए होते। आसपास के लोगों का खड़ा होने की ऊर्जा और भरोसा किसी भी समाज के लिए एक पूंजी होती है। लेकिन यह पूंजी भारतीय समाज में हर किसी हिस्से के पास नहीं हैं। समाज के जिस हिस्से या लोगों का सवाल उठाने व पूछने का साहस बिल्कुल एक स्वभाविक हिस्सा होता है उसके सामने जाहिरातौर पर सत्ता को जवाब देना होता है। तिवारी की हत्या के आरोप की जांच का आदेश इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन इससे मुठभेड़ के लिए भेद और विभेद करने की राजनीति और विचार पर कितना फर्क पड़ सकता है और उसके लिए पुलिस ढांचे में भेद और विभेद का नजरिया कितना मिटेगा, यह समझने की मात्रा ही ऐसी घटनाओं की आशंकाओं को उसी मात्रा में दूर करेगा।

तिवारी की हत्या के बाद सोशल मीडिया पर बड़े जोर-शोर से विरोध हुआ। यह मीडिया की सत्ता संरचना का स्पष्टीकरण है। यह उन नेताओं व सामाजिक चेहरों पर भी दबाव बनाने में कामयाब हुआ जो कि मुठभेड़ के राजनीतिक आह्वान पर चुप्पी साधे रहे या उसका समर्थन किया। दरअसल जनसंचार के माध्यम सत्ता संरचना में वर्चस्व की प्रवृतियों का एक संगठक की भूमिका में होते है। जातिवाद वर्चस्व की प्रवृतियों का आधार है और यह राजनीतिक सत्ता का अवसरवाद भी है।

(संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

अनिल चमड़िया

वरिष्‍ठ हिंदी पत्रकार अनिल चमडिया मीडिया के क्षेत्र में शोधरत हैं। संप्रति वे 'मास मीडिया' और 'जन मीडिया' नामक अंग्रेजी और हिंदी पत्रिकाओं के संपादक हैं

संबंधित आलेख

राजस्थान : मतदाता से दावेदार बने बावरी समाज के राजनीतिक आत्मविश्वास की कहानी
बावरी (दलित) समुदाय की चार महिला विधायकों के विधानसभा पहुंचने का प्रभाव केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रहा। दोनों जिलों में पंचायत चुनावों...
बिहार : भरत तिवारी एनकाउंटर पर चढ़ा जाति का रंग
हालिया एनकाउंटर में मारे गए व्यक्ति का नाम भरत तिवारी है, जो ब्राह्मण जाति का है। एक ब्राह्मण की हत्या के बाद ब्राह्मण नेताओं...
किस ‘प्रशासनिक’ कारण से नहीं दिए जा रहे डॉ. आंबेडकर के नाम पर पुरस्कार?
पुरस्कार से प्रोत्साहन का संचार होता है। शायद दलितों के बीच काम करने वालों को प्रोत्साहन की राजनीतिक जरूरत नहीं रह गई है। उनके...
संगठित होने के बजाय बिखराव की राह पर आंबेडकरवादी संगठन
यदि शासक बनना है तो सबसे पहले काम यह करना होगा कि बहुजन जातियों में एकता लानी होगी, कम-से-कम बहुजन नेता आपस में एकजुट...
वर्ग-जाति अंतर्संबंध और सामाजिक न्याय आंदोलन की चुनौतियां
फुले, पेरियार और आंबेडकर के आंदोलन केवल पहचान के आंदोलन नहीं थे। उनके केंद्र में मनुष्य की गरिमा, बराबरी और अधिकार का प्रश्न था।...