भोजपुरी के महान लोक कलाकार भिखारी ठाकुर भारतीय लोक-संस्कृति के ऐसे अनमोल रत्न थे, जिनका योगदान समय के साथ और अधिक महत्वपूर्ण होता जा रहा है। वे सिर्फ़ लोगों का मनोरंजन करने वाले कलाकार नहीं थे, बल्कि वे बिहार की लोक-संस्कृति, पहचान और जनचेतना के बड़े प्रतीक थे। जिस समय कला और साहित्य पर केवल अमीर और उच्च वर्ग का अधिकार माना जाता था, उस समय भिखारी ठाकुर ने अपनी कला को गरीबों, दलितों, पिछड़ों और समाज के वंचित लोगों की आवाज़ बनाया। उनके नाटक इतने लोकप्रिय थे कि जब उनका मंचन होता था, तो उन्हें देखने के लिए आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग पहुंच जाते थे। उनकी लोकप्रियता का कारण यह था कि वे आम लोगों के जीवन, उनकी समस्याओं और उनकी भाषा को अपनी रचनाओं में जगह देते थे। उनके साहित्य, रंगकर्म और सामाजिक सोच को समझने तथा उनके रचनात्मक कार्यों में मौजूद दलित-बहुजन विमर्श पर चर्चा करने के लिए फॉरवर्ड प्रेस ने बीते 9 जुलाई, 2026 को उनकी स्मृति दिवस की पूर्व संध्या पर एक ऑनलाइन संगोष्ठी का आयोजन किया। इसका विषय था—‘भिखारी ठाकुर के साहित्य-कर्म में दलित-बहुजन विमर्श’। इस संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रो. वीरेंद्र नारायण यादव (सदस्य, बिहार विधान परिषद) ने की। अपने संबोधन में उन्होंने भिखारी ठाकुर को राष्ट्रीय चेतना का उद्घोषक बताया। गोष्ठी के मुख्य वक्ता वरिष्ठ लेखक प्रो. हरिनारायण ठाकुर, वरिष्ठ लेखक डॉ. संतोष पटेल तथा युवा समालोचक अरुण नारायण रहे। फारवर्ड प्रेस के हिंदी संपादक नवल किशोर कुमार ने इसका संचालन किया।
गोष्ठी में यह सवाल भी उठा कि भिखारी ठाकुर की रचनाओं को संरक्षित करने, उनके नाट्य कला, और लोक कला को समृद्ध करने के लिए कोई शोध संस्थान और उनके नाम पर कोई विश्वविद्यालय क्यों नहीं है। इस संबंध में प्रो. वीरेंद्र नारायण यादव ने कहा कि वे विधान परिषद में कई बार यह प्रस्ताव बिहार सरकार के समक्ष रख चुके हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जल्द ही वे इस संबंध में बिहार के मुख्यमंत्री से भी मिलेंगे।
भिखारी ठाकुर ने तत्कालीन भारत के दोहरे चरित्र को पहचाना था
गोष्ठी के आरंभ में युवा समालोचक अरुण नारायण ने भिखारी ठाकुर के समय और उनके युग की ऐतिहासिक परिस्थितियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भिखारी ठाकुर का जीवनकाल 1887 से 1971 तक का रहा, जो भारत के इतिहास में एक अत्यंत उथल-पुथल और संक्रमण का दौर था। यह वह कालखंड था जिसमें भारत न केवल ब्रिटिश हुकूमत की औपनिवेशिक गुलामी से लड़ रहा था, बल्कि आंतरिक रूप से सामंतवाद, जातिवाद और लैंगिक असमानता जैसी सामाजिक-आर्थिक गुलामी से भी जूझ रहा था।
अरुण नारायण के अनुसार, भिखारी ठाकुर की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने तत्कालीन भारत के इस दोहरे चरित्र को बहुत गहराई से पहचाना। अपने संबोधन में उन्होंने निम्नांकित बिंदुओं पर रोशनी डाली :
- कला के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन : भिखारी ठाकुर ने कला को केवल विलासिता या मनोरंजन का साधन न मानकर उसे सामाजिक बदलाव का एक धारदार हथियार बनाया। उनकी रचनाओं के केंद्र में जाति, वर्ग और लिंग (जेंडर) जैसे बुनियादी और तीखे सवाल थे।
- पलायन की ऐतिहासिक त्रासदी : औपनिवेशिक काल में बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से बड़े पैमाने पर लोगों का कलकत्ता (कोलकाता), असम या असम के चाय बागानों और विदेशों में (गिरमिटिया मजदूर के रूप में) पलायन हो रहा था। इस पलायन ने परिवारों को तोड़ दिया, स्त्रियों को एकाकीपन के नर्क में धकेल दिया और समाज में एक अजीब तरह का बिखराव पैदा किया। भिखारी ठाकुर ने ‘बिदेसिया’ जैसे नाटकों के जरिए इस दर्द को जिस शिद्दत और गहराई से उठाया, उसकी मिसाल उनके समकालीन किसी अन्य बड़े साहित्यकारों में नहीं मिलती। यह समस्या आज भी बनी हुई है, जिससे भिखारी ठाकुर आज भी प्रासंगिक हो जाते हैं।
- प्रतिरोध का सतर्क मंच : भिखारी ठाकुर ने लोक नाट्य (नाच) को जन-जागरण और सामाजिक प्रतिरोध का एक सतर्क और सचेत मंच बना दिया। उन्होंने भोजपुरी को केवल एक बोली नहीं, बल्कि समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति की संस्कृति, चेतना और संघर्ष की भाषा के रूप में स्थापित किया।
बहुजन चेतना और संवैधानिक अधिकारों का अंतर्संबंध
वरिष्ठ लेखक डॉ. संतोष पटेल ने भिखारी ठाकुर के साहित्य-कर्म को एक बेहद अनूठे और तार्किक नजरिए से देखा। उन्होंने भिखारी ठाकुर के विचारों का विश्लेषण दलित-बहुजन चेतना के संवाहक बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों के सापेक्ष किया।
उन्होंने बताया कि भिखारी ठाकुर के कुल 12 प्रसिद्ध नाटक हैं, और इन सभी नाटकों में उन्होंने न केवल अपने समय की समस्याओं को उठाया, बल्कि अपने समय से काफी आगे की सोच को प्रदर्शित किया। डॉ. पटेल ने विशेष रूप से बाबा साहब द्वारा लाए गए ‘हिंदू कोड बिल’ और भिखारी ठाकुर के नाटकों के बीच एक गहरा वैचारिक और चेतनात्मक संबंध स्थापित किया। इस क्रम में उन्होंने कहा कि डॉ. आंबेडकर ने हिंदू कोड बिल में मुख्य रूप से चार क्रांतिकारी बातें कही थीं। पहली, बहु-विवाह प्रथा का पूरी तरह विरोध; दूसरी, लड़कियों की शादी के लिए एक न्यूनतम कानूनी उम्र तय करना; तीसरी, स्त्रियों को संपत्ति में पुरुषों के बराबर अधिकार देना और चौथी, समाज में महिलाओं को पुरुषों के समान आदर और गरिमा प्रदान करना।
डॉ. संतोष पटेल ने भिखारी ठाकुर के नाटक ‘बेटी-बेचवा’ (बेटी वियोग) का संदर्भ देते हुए बताया कि जब नाटक में बिटिया कहती है– “रोपेया गिनाइ लिहल, पगहा धराइ दिहल, चेरिया से छेरिया बनवलऽ ए बाबूजी!” – तो यह केवल एक विलाप नहीं, बल्कि एक कम उम्र की लड़की का पितृसत्तात्मक और सामंती व्यवस्था के खिलाफ एक प्रखर प्रतिरोध है। इसमें बेमेल विवाह (वृद्ध पुरुष के साथ धन के लालच में छोटी बच्ची की शादी) के खिलाफ आवाज उठाई गई है।
इसके अतिरिक्त, डॉ. आंबेडकर ने हिंदू कोड बिल में विधवाओं के पुनर्विवाह का पुरजोर समर्थन किया था, जिसका तत्कालीन रूढ़िवादी ताकतों (जैसे श्यामा प्रसाद मुखर्जी और तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद) ने कड़ा विरोध किया था। दूसरी ओर, भिखारी ठाकुर अपने नाटकों (जैसे ‘विधवा-विलाप’) के माध्यम से उसी दौर में विधवाओं के दर्द और उनके पुनर्विवाह की वकालत कर रहे थे। डॉ. पटेल ने कहा कि भले ही भिखारी ठाकुर ने बाबा साहब की किताबों को न पढ़ा हो, लेकिन शोषित समाज की जो ‘सामूहिक चेतना’ होती है, वह दोनों में समान रूप से प्रवाहित हो रही थी। समाज को सही मायने में समझने के लिए बाबा साहब के सिद्धांतों और भिखारी ठाकुर के नाटकों को एक साथ रखकर देखना जरूरी है।
इसके साथ ही डॉ. संतोष पटेल ने अपने वक्तव्य में भिखारी ठाकुर की बढ़ती वैश्विक पहचान का उल्लेख करते हुए एक महत्वपूर्ण जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी के डॉ. दीपक कश्यप और उनकी टीम ने मिलकर जिसमें वे स्वयं (डॉ. संतोष पटेल) भी शामिल थे, ने भिखारी ठाकुर के 12 प्रमुख नाटकों का अंग्रेजी में अनुवाद किया है। इन अनूदित नाटकों को एक जर्मन प्रकाशक प्रकाशित कर रहा है।

परंपरा के भीतर रहकर सांस्कृतिक क्रांति की त्रासदी और कला
वरिष्ठ लेखक प्रो. हरिनारायण ठाकुर का मानना था कि भिखारी ठाकुर को समझने के लिए सबसे पहले उनकी रचनाओं का गहन अध्ययन अनिवार्य है। प्रो. ठाकुर ने भिखारी ठाकुर की सबसे बड़ी जीवन-त्रासदी और उनकी सफलता के अंतर्विरोध को स्पष्ट करते हुए निम्नलिखित बिंदु रखे :
- परंपरा के भीतर रहकर संघर्ष : आमतौर पर जितने भी बड़े सामाजिक सुधारक हुए हैं, वे समाज से थोड़ा अलग हटकर, एक बौद्धिक मंच तैयार करते थे और फिर समाज में जाकर सुधार की बातें करते थे, जिसके कारण उन्हें भारी जन-विरोध झेलना पड़ता था। परंतु भिखारी ठाकुर की स्थिति बिल्कुल अलग थी। जिस रूढ़िवादी, सामंती और जातिवादी समाज से उनकी लड़ाई थी, जिसके भीतर व्याप्त कुरीतियों को उन्हें खत्म करना था, उसी समाज के बीच उन्हें रहना था, और उसी समाज के बीच रहकर उन्हें अपना जीवन-यापन भी करना था।
- बिना परंपरा तोड़े बड़ी क्रांति : भिखारी ठाकुर ने स्थापित सामाजिक परंपराओं को ऊपर से नहीं तोड़ा, बल्कि वे उस व्यवस्था और परंपरा के भीतर गहरे पैठे। उन्होंने समाज के भीतर रहकर, उनके उत्सवों और मेलों का हिस्सा बनकर अपने नाटकों के जरिए ऐसी आंतरिक क्रांति कर डाली कि समाज को पता भी नहीं चला और वह अंदर से बदलने लगा।
- सांस्कृतिक नवजागरण : भिखारी ठाकुर का काम केवल मनोरंजन करना नहीं बल्कि ‘सांस्कृतिक नवजागरण’ करना था, जिसमें समाजशास्त्र भी था और राष्ट्र के प्रति गहरी चेतना व देशभक्ति भी थी। उन्होंने समाज की नग्न सच्चाइयों को बिना किसी लाग-लपेट के, कला के माध्यम से आईना बनाकर समाज के ही सामने रख दिया।
देशज आधुनिकता, स्त्री की पीड़ा और कबीर की परंपरा
संगोष्ठी के अध्यक्ष प्रो. वीरेंद्र नारायण यादव (सदस्य, बिहार विधान परिषद) ने अपने अध्यक्षीय भाषण में भिखारी ठाकुर के साहित्य-कर्म का बहुत ही विस्तृत, दार्शनिक और राजनीतिक मूल्यांकन प्रस्तुत किया। उन्होंने भिखारी ठाकुर को समाज को संस्कारित करने वाला एक ‘ऋषि’ और मनुष्य का निर्माण करने वाला ‘क्रांतिकारी’ कहा।
व्यंग्य के माध्यम से वैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रसार
भिखारी ठाकुर ने अपने नाटकों (जैसे ‘बेटी-बेचवा’, ‘बिदेसिया’ आदि) के माध्यम से समाज की विसंगतियों और रूढ़ियों पर इतना सटीक, गहरा और मारक व्यंग्य किया कि सुनने वाला तिलमिला उठे। डॉ. राममनोहर लोहिया के विचारों का स्मरण करते हुए प्रो. यादव ने कहा कि भिखारी ठाकुर वास्तव में ‘मनुष्य को बनाने का काम’ कर रहे थे। वे समाज में अंधविश्वासों को खत्म कर एक तार्किक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पैदा कर रहे थे। डॉ. संतोष पटेल के शब्दों को दोहराते हुए प्रो. यादव ने इसे ‘देशज आधुनिकता’ का नाम दिया, यानी एक ऐसी आधुनिकता जो पश्चिम से उधार ली हुई नहीं थी, बल्कि हमारी अपनी माटी और चेतना से उपजी थी।
स्त्री विमर्श और दलित विमर्श का अंतर्संबंध
प्रो. वीरेंद्र नारायण यादव ने एक बेहद महत्वपूर्ण स्थापना दी कि स्त्री भी दलित होती है। उन्होंने कहा कि समाज में पुरुषों के मुकाबले स्त्रियों की स्थिति हमेशा से शोषितों जैसी रही है और इस सच को भिखारी ठाकुर ने बहुत नजदीक से देखा था। उनके द्वारा रचित ‘बारहमासा’ में स्त्री की जो मर्मभेदी पीड़ा, विरह, अकेलेपन और सामाजिक प्रताड़ना का चित्रण है, वह अद्भुत है। उन्होंने कहा कि भिखारी ठाकुर के ‘बारहमासा’ में जो संवेदना और दुख-दर्द के बिंब उभरते हैं, वे मलिक मोहम्मद जायसी के विश्वप्रसिद्ध ग्रंथ ‘पद्मावत’ के बारहमासे से किसी भी मायने में कम नहीं हैं, बल्कि यह उससे भी अधिक व्यावहारिक और यथार्थवादी है।
कबीर की साखी और श्रम का महत्व
भिखारी ठाकुर की तुलना संत कबीर से करते हुए प्रो. यादव ने कहा कि जिस प्रकार कबीर ने कोई औपचारिक किताबी शिक्षा ग्रहण नहीं की थी (मसि कागद छूयो नहीं, कलम गह्यो नहिं हाथ), ठीक उसी प्रकार भिखारी ठाकुर भी पारंपरिक रूप से उच्च शिक्षित नहीं थे। परंतु किताबी ज्ञान न होने के बावजूद, कबीर की ही तरह भिखारी ठाकुर ने समाज को बेहद ईमानदारी, गहराई और पैनी नजर से देखा था। कबीर की तरह ही भिखारी ठाकुर ने भी अपने नाटकों में जाति प्रथा की क्रूरता, धर्म के नाम पर पाखंड, बाह्य आडंबरों और सामाजिक खोखलेपन पर करारी चोट की। भिखारी ठाकुर ने अपने साहित्य में ‘श्रम के महत्व’ को स्थापित किया। बहुजन समाज जो दिन-रात हाड़-तोड़ मेहनत करता है, उसकी मेहनत को गरिमा प्रदान करने का काम भिखारी ठाकुर के रंगमंच ने किया।
राष्ट्रीय चेतना के उद्घोषक
प्रो. वीरेंद्र नारायण यादव ने निष्कर्षतः यह प्रतिपादित किया कि भिखारी ठाकुर समाज को सांस्कृतिक रूप से समृद्ध कर रहे थे। वे समाज को यह अहसास करा रहे थे कि स्त्री का दर्द क्या है, विधवा का विलाप क्या है और जातिवाद कितनी बड़ी क्रूरता है। एक सांस्कृतिक रूप से जाग्रत और संपन्न व्यक्ति या समाज कभी भी किसी की ‘गुलामी’ बर्दाश्त नहीं कर सकता। चाहे वह अंग्रेजों की गुलामी हो या सामंतों की। इसलिए, भिखारी ठाकुर केवल एक लोक कलाकार नहीं थे, बल्कि वे देश में ‘राष्ट्रीय चेतना के निर्माता और उद्घोषक’ थे।
बहरहाल, फॉरवर्ड प्रेस द्वारा आयोजित इस ऑनलाइन संगोष्ठी में यह बात सामने आई कि भिखारी ठाकुर का साहित्य-कर्म केवल भोजपुरी भाषी क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका फलक वैश्विक है। उनका साहित्य पूरी तरह से ‘दलित-बहुजन विमर्श’ का एक जीवंत दस्तावेज है।
(संपादन : नवल/अनिल)
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