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इतिहास के पन्नों में डॉ. आंबेडकर की धर्मांतरण संबंधी विचार यात्रा

सवर्ण हिंदुओं को इस्लाम और ईसाई धर्म अपनाने की अपनी झिझक दिखाने में आंबेडकर ने जानबूझकर उन्हीं मुस्लिम और ईसाई विरोधी धारणाओं और अफ़वाहों का इस्तेमाल किया जिसे हिंदुत्ववादी तत्व राष्ट्रवाद और भारतीयता के नाम पर प्रचारित कर रहे थे। आंबेडकर को पता था कि वर्चस्ववादी मूल्यों वाले हिंदू समाज से कैसे मोलभाव करना है। पढ़ें, शाहनवाज आलम का यह आलेख

दलितों को अपने दायरे में समेटने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) इस बात को काफ़ी प्रचारित करता रहा है कि डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने इस्लाम और ईसाई धर्म से द्वेष के कारण इन धर्मों को नहीं अपनाया। दलितों के एक हिस्से में भी इस तर्क की स्वीकार्यता दिखती है, जो उन्हें अगर सीधे नहीं भी तो घुमा फिराकर मुसलमानों के ख़िलाफ़ खड़ा कर देती है।

ऐसे में डॉ. आंबेडकर के धर्मांतरण की दिलचस्प सार्वजनिक विचारयात्रा, जो 1927 से शुरू होकर 1956 में मुकम्मल हुई, को देखना और समझना बहुत ज़रूरी होगा।

मुक्ति की इच्छा

डॉ. आंबेडकर द्वारा हिंदू धर्म छोड़ने और अन्य धर्म अपनाने का पहला ज़िक्र 1927 के महाड़ सम्मेलन में दिखता है। जब उन्होंने कहा था कि “अगर ज़रूरत पड़ी तो इस निरर्थक हिंदू पहचान को लात भी मार देंगे और अगर हिंदू धर्म को छोड़ना लाज़िमी हो जाता है तो हमारे लिए मंदिरों की परवाह करना ज़रूरी नहीं होगा।” उसी साल कुछ दिन पहले जलगांव में डॉ. आंबेडकर की अध्यक्षता में आयोजित डिप्रेस्ड क्लासेज़ के कांफ्रेंस में इसी आशय का एक प्रस्ताव भी पारित किया गया था, जिसके कुछ दिन बाद क़रीब एक दर्जन महारों ने इस्लाम धर्म अपना लिया था। उनके हिंदू धर्म छोड़ने और इस्लाम अपना लेने के बाद रूढ़िवादी हिंदुओं में काफ़ी असंतोष फ़ैल गया और उनकी तरफ से दलितों को कुछ रियायत देने की भी बातें होने लगीं। इनमें अछूतों को अलग से बने कुओं के इस्तेमाल की छूट अहम थी। इससे डॉ. आंबेडकर यह समझ गए थे कि धर्मांतरण हिंदुओं से समानता हासिल करने की एक बेहतर संभावित रणनीति साबित हो सकती है।[1]

इसके क़रीब 8 साल बाद 1935 में येवला में डिप्रेस्ड क्लासेज़ की बैठक में उन्होंने कहा कि “मैं आपको सलाह देता हूं कि हिंदू धर्म के साथ अपने सारे ताल्लुक़ तोड़ लें और कोई नया धर्म अपनाएं। मेरा दुर्भाग्य है कि मैं एक हिंदू अस्पृश्य के रूप में पैदा हुआ… लेकिन मैं दृढ़तापूर्वक आपको यह आश्वासन देता हूं कि मैं एक हिंदू के रूप में नहीं मरूंगा।”

इस मीटिंग के बाद हिंदू धर्म त्यागने का आह्वान करते हुए एक प्रस्ताव भी पारित किया गया। इसके बाद 31 मई, 1936 को डॉ. आंबेडकर ने बंबई में धर्मांतरण के पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए एक और बैठक बुलाई। इस बैठक में उन्होंने कहा कि “अगर हम धर्मांतरण से मुक्ति पा सकते हैं तो हम हिंदू धर्म में सुधार की ज़िम्मेदारी क्यों ढोते रहें। इस बारे में कोई ग़लतफ़हमी न रहने दें कि हमारे संघर्ष का उद्देश्य है हिंदू धर्म से मुक्ति, न कि हिंदू धर्म में सुधार।

यानी हम देख सकते हैं कि 1936 तक डॉ. आंबेडकर ने हिंदू धर्म छोड़ने का मन तो बना लिया था, लेकिन किस धर्म को अपनाना है, इस निष्कर्ष तक वे अभी नहीं पहुंचे थे। लेकिन इस बीच उन्होंने धर्मों का तुलनात्मक विश्लेषण करना शुरू कर दिया था। उनका मानना था कि अगर मुसलमान और ईसाई अपने-अपने धर्मों में जाति-व्यवस्था के उन्मूलन के लिए आंदोलन छेड़ें तो उनके धर्मों की तरफ से इसके रास्ते में कोई रुकावट पैदा नहीं होगी। मगर हिंदू अपने धर्म को ध्वस्त किए बिना जाति-व्यवस्था को ध्वस्त ही नहीं कर सकते।[2]

विकल्पों की तलाश

यानी डॉ. आंबेडकर अब हिंदू धर्म को छोड़ने का मन बनाने के साथ वैकल्पिक धर्म की तलाश यात्रा शुरू कर रहे थे। उन्हें तीन विकल्प दिख रहे थे– इस्लाम, ईसाई और सिख धर्म। सन् 1936 में लिखे एक खुले पत्र में उन्होंने इन तीनों धर्मों में जाने के लाभ-हानि पर विचार प्रस्तुत किया।

इस्लाम के बारे में उनकी राय थी कि “इसमें डिप्रेस्ड क्लासेज़ को वह सब दिखाई पड़ता है, जिसकी उन्हें ज़रूरत है। आर्थिक धरातल पर देखें तो इस्लाम के पीछे संसाधन भी असीमित हैं। सामाजिक धरातल भी भरपूर है क्योंकि मुसलमान पूरे भारत में फैले हैं। राजनीतिक स्तर पर इस्लाम में डिप्रेस्ड क्लासेज़ को वो सारे अधिकार मिलेंगे जो मुसलमानों को मिलते हैं।”[3]

डॉ. आंबेडकर ईसाइयत को भी समान रूप से आकर्षक धर्म मानते थे। उनका मत था कि “अगर भारतीय ईसाई संख्या की दृष्टि से इतने कम हैं कि वे डिप्रेस्ड क्लासेज़ के धर्मांतरण के लिए ज़रूरी आर्थिक संसाधन मुहैया नहीं करा सकते तो भी अमेरिका और इंग्लैंड जैसे ईसाई देश बेहिसाब संसाधन जुटा सकते हैं। सामाजिक रूप से भले ही ईसाई समुदाय बहुत छोटा हो और डिप्रेस्ड क्लासेज़ के धर्मांतरण करने वालों को ज़्यादा मदद न दे सकता हो मगर ईसाई धर्म के पीछे पूरी सरकार खड़ी हुई है। राजनीतिक तौर पर ईसाई धर्म भी अपने भीतर आने वालों को वही अधिकार देगा जो इस्लाम देता है।”[4]

ईसाइयत और इस्लाम के मुक़ाबले सिख धर्म में डॉ. आंबेडकर उतने आकर्षित नहीं दिखे। उनका मानना था कि “लगभग 40 लाख लोगों का छोटा समुदाय होने के कारण सिख कोई ख़ास आर्थिक सहायता नहीं दे सकते। वे पंजाब में ही सिमटे हुए हैं, लिहाज़ा डिप्रेस्ड क्लासेज़ के लोगों को कोई सामाजिक सहायता नहीं दे सकते। राजनीतिक रूप से सिख धर्म में इस्लाम या ईसाइयत के मुक़ाबले एक घाटे की स्थिति भी दिखाई देती है। पंजाब के बाहर सिखों को विधायिका और नौकरियों में विशेष प्रतिनिधित्व का अधिकार नहीं मिलता।”[5]

यानी डॉ. आंबेडकर शुरुआती दौर में एक विशुद्ध सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक लाभ के नज़रिए से धर्म बदलने पर विचार कर रहे थे।

अभारतीयकरण का तर्क और दबाव की रणनीति

एक परिपक्व राजनीतिक व्यक्ति के बतौर उन्हें पता था कि वे जिस दुकानदार से मोलभाव कर रहे हैं, वह अपने प्रतिद्वंद्वियों से कितना डरता है। इसलिए उन्होंने दबाव को बढ़ाने, कभी हल्का करने और कभी दुकानदार को रिझाने की रणनीति अपनाई। इसीलिए 1936 में ही डॉ. आंबेडकर ने कहा कि “इस्लाम या ईसाइयत में धर्मांतरण डिप्रेस्ड क्लासेस का ‘अभारतीयकरण’ कर देगा। अगर वे इस्लाम को अपनाते हैं तो मुसलमानों की संख्या दोगुनी हो जाएगी और मुस्लिम वर्चस्व की आशंका बहुत ठोस रूप ले लेगी। अगर वे ईसाई धर्म को अपनाते हैं तो ईसाइयों की संख्या 5-6 करोड़ तक जा पहुंचेगी। तब देश पर अंग्रेज़ों का क़ब्ज़ा और मज़बूत हो जाएगा। परंतु अगर वे सिख धर्म अपनाते हैं तो इससे न तो देश की नियति को कोई नुक़सान पहुंचेगा और न ही उनका ‘अभारतीयकरण’ होगा।”[6]

हिंदुत्ववादी संगठन आंबेडकर द्वारा इस्लाम और ईसाइयत में धर्मांतरण को ‘अभारतीयकरण’ बताने को ही उनको अपनी तरह मुस्लिम और ईसाई विरोधी प्रचारित करने में इस्तेमाल करते हैं। लेकिन यह दुष्प्रचार और तथ्यों का ग़लत विश्लेषण है। क्रिस्टोफ़ जैफरलो के अनुसार इस तथ्य से “ज़ाहिर हो जाता है कि अभी भी उन्होंने ‘पृथकतावादी’ विमर्श को पूरी तौर पर नहीं अपनाया था, जो आने वाले समय में तेज़ी से मुखर होने वाला था।”[7]

दरअसल, सवर्ण हिंदुओं को इस्लाम और ईसाई धर्म अपनाने की अपनी झिझक दिखाने में आंबेडकर ने जानबूझकर उन्हीं मुस्लिम और ईसाई विरोधी धारणाओं और अफ़वाहों का इस्तेमाल किया जिसे हिंदुत्ववादी तत्व राष्ट्रवाद और भारतीयता के नाम पर प्रचारित कर रहे थे। आंबेडकर को पता था कि वर्चस्ववादी मूल्यों वाले हिंदू समाज से कैसे मोलभाव करना है। इसीलिए, उन्होंने “धर्मांतरण के डर से बेचैन सवर्ण हिंदुओं को सुझाव दिया कि वे सिख धर्म को भी इस्लाम और ईसाइयत की तरह आकर्षक बनाने के लिए उसमें अस्पृश्यों के लिए सीटों के आरक्षण की व्यवस्था करें ताकि जो सिख धर्म अपनाना चाहते हैं वे ईसाई धर्म अपनाने के लिए बाध्य न हों।”[8]

उन्होंने सवर्ण हिंदुओं को सुझाव दिया कि “आपको बस इतना ही करना है कि पंजाब के अलावा शेष सभी प्रांतों में अनुसूचित जातियों की सूची में ‘सिख’ को भी जोड़ दें ताकि डिप्रेस्ड क्लासेज़ का जो व्यक्ति सिख धर्म अपनाता है, उसके वे सारे राजनीतिक अधिकार न छिन जाएं जो डिप्रेस्ड क्लासेज़ में बने रहने पर उसको मिल सकते थे।”[9]

यहां यह भी स्पष्ट है कि उस समय तक डॉ. आंबेडकर के लिए बौद्ध धर्म विकल्प नहीं था।

इसलिए यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि डॉ. आंबेडकर ने इस्लाम या ईसाई धर्म से द्वेष के कारण इन धर्मों को अपनाने से परहेज नहीं किया था।

अन्य धर्मों की प्रतिक्रियाएं

डॉ. आंबेडकर के धर्म परिवर्तन के प्रस्ताव पर अन्य धर्मों के नेताओं की प्रतिक्रियाओं को देखना दिलचस्प होगा।

“ईसाइयों के प्रतिनिधियों ने संस्थागत धर्मांतरण के विचार को अधिकृत रूप से ख़ारिज कर दिया। उनका तर्क था कि किसी भी आध्यात्मिक तत्व से रहित ऐसा धर्मांतरण केवल अस्पृश्यों की सामाजिक गतिशीलता को बढ़ाने का ज़रिया ही साबित होगा।”[10]

हालांकि बौद्ध धर्म अभी तक डॉ. आंबेडकर के लिए संभावित विकल्पों में नहीं था, लेकिन येवला में दिए गए उनके भाषण के कुछ समय बाद बनारस स्थित महाबोधि सोसाइटी के सचिव ने यह संकेत दिया था कि उनका समुदाय अस्पृश्यों का स्वागत करने को तैयार है। उनका स्वर लगभग विज्ञापन जैसा था– “हम सभी धर्मांतरितों को समान हैसियत की गारंटी देते हैं।”[11]

भारत और भारत के बाहर के मुस्लिम पक्ष की भी प्रतिक्रिया सकारात्मक थी। इजिप्ट (मिस्र) की राजधानी काहिरा स्थित विश्व प्रसिद्ध अल अज़हर यूनिवर्सिटी के कुलपति ने कहा कि “मुसलमान बनने के लिए ख़तना कराना या पर्दा/बुर्क़ा पहनना भी अनिवार्य नहीं होगा। दिसंबर, 1936 में उन्होंने एक प्रतिनिधिमंडल भी भेजा था। भारत की ख़िलाफ़त सेंट्रल कमेटी के नेता मौलाना मोहम्मद इरफ़ान डॉ. आंबेडकर को समझा रहे थे कि वे इस्लाम अपनाकर देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय का नेता बनने का अवसर पा सकते हैं।[12]

सबसे ज़्यादा उत्सुकता सिख समुदाय की प्रतिक्रिया को लेकर थी। “अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर प्रबंधन समिति के उपाध्यक्ष सरदार दलीप सिंह दोआबिया ने आंबेडकर को ख़त लिखकर बताया कि सिख धर्म उन सारी उम्मीदों पर खरा उतरता है जो अंबेडकर किसी संभावित धर्म से रखते हैं।”[13]

मुसलमानों, बौद्धों और सिखों की सकारात्मक प्रतिक्रियाओं के बाद सवर्ण हिंदुओं की प्रतिनिधि संस्था हिंदू महासभा को डर था कि अगर अस्पृश्य कोई दूसरा धर्म अपनाते हैं तो हिंदू समुदाय जनसांख्यिकीय दृष्टि से और चुनावी दृष्टि से भी कमज़ोर हो जाएगा। उनका यह डर इसलिए भी वास्तविक था क्योंकि दूसरे गोलमेज सम्मेलन में आंबेडकर मुसलमानों तथा अन्य अल्पसंख्यक नेताओं के साथ मिलकर एक माइनॉरिटी पैक्ट लिख चुके थे जिसमें मुसलमानों, ईसाइयों, एंग्लो इंडियंस, यूरोपियनों और डिप्रेस्ड क्लासेज़ के लिए पृथक निर्वाचक मंडल और वेटेज की मांग की गई थी।

बौद्ध धर्म अपनाने के बाद अपनी पत्नी सविता आंबेडकर संग डॉ. आंबेडकर

ब्राह्मणवादियों की प्रतिक्रिया

इस संभावित चुनौती से निपटने के लिए हिंदू महासभा के एक प्रतिनिधिमंडल ने डॉ. आंबेडकर से मुलाक़ात की, जिन्हें उन्होंने आश्वासन दिया कि “कोई भी अंतिम फैसला लेने से पहले हिंदू महासभा और अन्य हिंदू संगठनों के नेताओं से बात ज़रूर करेंगे।” ज़ाहिर है, डॉ. आंबेडकर जिनसे हिस्सेदारी चाह रहे थे, वे अब ख़ुद उनके पास आने को मजबूर हो गए थे। हालांकि हिंदू महासभा अधिक से अधिक डैमेज कंट्रोल करने और डॉ. आंबेडकर को अलग-थलग करने की रणनीति पर काम जारी रखे हुए थी। उसने 29 अक्टूबर, 1935 को बंबई में मदन मोहन मालवीय की अध्यक्षता में सम्मेलन किया और डॉ. आंबेडकर को अलग-थलग करने के लिए बहुत सारे अस्पृश्य नेताओं को भी अपने संगठन में शामिल किया, जिसमें प्रमुख नाम थे– जगजीवन राम, जे.एन. मंडल, उत्तर प्रदेश के धर्म प्रकाश, पी.एन. राजभोज, एमसी राजा और पूर्व क्रिकेटर पालवंकर बालू।

आश्चर्य की बात है कि इन नामों ने, जिसमें से लगभग सभी या तो डॉ. आंबेडकर के पूर्व सहयोगी थे या कांग्रेसी थे, उन्होंने भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के उद्देश्य से काम करने वाली हिंदू महासभा के साथ जाने से इनकार नहीं किया।[14]

धर्मांतरण का हिंदू धर्म का आंतरिक मामला बन जाना

इससे एक ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई कि डॉ. आंबेडकर का धर्मांतरण करने का मुद्दा हिंदू समाज का आंतरिक मुद्दा बन गया। शायद वे भी यही चाहते थे। इसीलिए उन्हें नागपुर के हिंदू महासभा के नेता बी.एस. मुंजे से तीन दिन की गुप्त वार्ताएं करने, जिसमें जी.डी. बिरला के भाई जे.के. बिरला भी मौजूद थे, में कोई आपत्ति नहीं थी। मुंजे ने डॉ. आंबेडकर को सलाह दी कि महाराष्ट्र के प्रमुख धार्मिक व्यक्ति करवीर पीठ के शंकराचार्य की सहमति से अस्पृश्य समुदाय के लोग सिख या आर्य समाज में शामिल हो जाएं। इससे उन्हें हिंदू संस्कृति के भीतर रहने की सुविधा भी मिल जाएगी।[15]

इस बीच कुछ मुस्लिम नेताओं ने इस्लाम में अस्पृश्यों के बड़ी संख्या में शामिल होने पर आपत्ति जताते हुए दलील दी कि इससे अल्पसंख्यक होने के नाते उन्हें मिल रहे लाभों में कमी आ जाएगी। इसके बाद डॉ. आंबेडकर सिख धर्म अपनाने के नफे-नुकसान पर बहुत सावधानी से विचार करने लगे।[16]

इसके बाद डॉ. आंबेडकर ने बी.एस. मुंजे के सामने सिख धर्म में शामिल होने के लिए एक और शर्त जोड़ दी कि सिख धर्म अपनाने वाले अस्पृश्यों को वे सुविधाएं मिलती रहें, जो पूना पैक्ट में उन्हें दी गई है, जिसे 19 जून, 1936 को आंबेडकर के साथ हुई बातचीत में मुंजे ने स्वीकार कर लिया और तब भारत के सबसे प्रभावशाली सिख राजा, पटियाला के महाराजा से इसकी मंजूरी भी ले ली कि वे ही आंबेडकर और सिखों के प्रतिनिधियों के बीच समझौते के मध्यस्थ रहेंगे।[17]

इस्लाम न अपनाने का ऐलान

इस घटनाक्रम के बाद डॉ. आंबेडकर ने अगस्त, 1936 में ऐलान किया कि वह अस्पृश्यों के इस्लाम अपनाने की संभावनाओं को ख़ारिज करते हैं। हिंदू महासभा के नेता मुंजे इसे अपनी व्यक्तिगत कामयाबी मानते थे। ‘आंबेडकर-मुंजे पैक्ट’ नामक दस्तावेज़ में आंबेडकर ने इस पर सहमति दी कि “वे सिख धर्म अपनाने के लिए आंदोलन चलाएंगे और अस्पृश्यों में मुस्लिम और ईसाई धर्मांतरण के विरुद्ध हिंदुओं और सिखों के साथ मिलकर काम करेंगे।” बदले में मुंजे ने भी आश्वासन दिया कि सिख धर्म अपनाने वाले अस्पृश्यों को 1932 के पूना पैक्ट के तहत मिल रहे राजनीतिक अधिकारों में कोई कटौती नहीं हो, इसके लिए हिंदू महासभा भी अपना समर्थन देगी।[18]

हालांकि, अल्पसंख्यकों के हितों के संरक्षण के लिए गठित संविधान सभा की उपसमिति को दिए गए अपने ज्ञापन जो ‘राज्य और अल्पसंख्यक’ नाम से प्रचलित रही है, में मुसलमानों के प्रति सरकार और बहुसंख्यक समुदाय के सांप्रदायिक रवैये को उन्होंने जिस तरह व्यक्त किया है, इस्लाम न अपनाने की एक अहम वजह मानी जा सकती है। उन्होंने कहा कि “दुर्भाग्य से अल्पसंख्यकों के लिए राष्ट्रवाद का एक ऐसा संस्करण विकसित हो गया है जहां अल्पसंख्यकों पर शासन करना बहुसंख्यक अपना दैवीय अधिकार मानते हैं। अल्पसंख्यकों द्वारा सत्ता में भागीदारी के किसी भी दावे को सांप्रदायिकता कह दिया जाता है जबकि बहुसंख्यकों द्वारा सारी शक्ति पर नियंत्रण कर लिए जाने को देशभक्ति कह दी जाती है।”[19]

डॉ. आंबेडकर का इस्लाम को धर्मांतरण के विकल्प के बतौर न देखने की एक वजह मुस्लिम समाज का लगातार हिंदू वातावरण के दबाव में रहना भी था। उनका मानना था कि “हिंदू वातावरण मुस्लिम समाज को अपरिवर्तनशीलता की ओर ले जाता है। इसी कारण भारत का मुस्लिम समाज दूसरे देशों के मुसलमानों की तुलना में अधिक पिछड़ा हुआ है। उसकी सारी शक्ति हिंदू वातावरण के दबाव से लड़ने में और जैसे-तैसे अतीत को बनाए रखने में ख़र्च होती है चाहे वह अतीत उसके लिए लाभदायक हो या हानिकारक।”[20]

सिख धर्म अपनाने का ऐलान

इसके बाद डॉ. आंबेडकर ने अगस्त, 1936 में सिख धर्म अपनाने के फैसले का ऐलान किया, जिसके बाद नवंबर, 1936 में वे यह पता लगाने के लिए लंदन गए कि जो अस्पृश्य सिख धर्म अपनाएंगे उन्हें सरकार किस तरह के आश्वासन देने के लिए तैयार है। तब शासन के प्रतिनिधियों ने जवाब दिया कि इस तरह के प्रावधान केवल पंजाब के सिखों के लिए ही प्रभावी होंगे।[21]

ज़ाहिर है कि डॉ. आंबेडकर की नज़र में इतनी मामूली रियायत का कोई मतलब नहीं था। इसके बाद सिख धर्म में धर्मांतरण के सवाल पर वे खामोश रहने लगे।

बौद्ध धर्म की तरफ झुकाव

वर्ष 1936 में डॉ. आंबेडकर ने अपने राजनीतिक दल ‘इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी’ का गठन किया और 1937 के चुनावों में सक्रिय रहे। अन्य राजनीतिक गतिविधियों में व्यस्त डॉ. आंबेडकर ने इस दौरान धर्मांतरण पर कोई गंभीर बहस नहीं संचालित की। 1940 के दशक के मध्य में उन्होंने फिर से धर्मांतरण पर विचार करना शुरू किया, जिसके केंद्र में सिर्फ़ बौद्ध धर्म था। इसका संकेत इससे मिलता है कि उन्होंने 1946 में अपने द्वारा बनवाए गए कॉलेज का नाम बुद्ध के बचपन के नाम पर ‘सिद्धार्थ कॉलेज’ रखा। संभावित धर्मांतरण को ध्यान में रखते हुए ही उन्होंने 1947 में के.एम. मुंशी के उस संशोधन प्रस्ताव का विरोध किया जिसमें नाबालिगों के धर्मांतरण पर पाबंदी का प्रस्ताव रखा गया था ताकि धर्मांतरण की व्यावहारिक संभावना को ही समाप्त किया जा सके। बौद्ध धर्म के प्रति उनके स्पष्ट रुझानों को अधिकृत अवकाशों की सूची में बुद्ध जयंती को शामिल करने और 1947 से 1950 के बीच बहुत सारे सरकारी प्रतीकों में बौद्ध प्रतीकों जैसे राष्ट्रीय ध्वज में धर्मचक्र, अशोक स्तंभ को राष्ट्रीय चिह्न के बतौर स्वीकार्य करवाने में भी देखा जा सकता है।

यानी डॉ. आंबेडकर अब बौद्ध धर्म अपनाने के वैचारिक धरातल पर खड़े हो रहे थे। लेकिन उनकी एक गंभीर चिंता ब्राह्मणवादियों द्वारा बौद्ध धर्म को हिंदू धर्म की ही एक अन्य शाखा के बतौर प्रचारित कर दिए जाने का था, जिसके तहत ब्राह्मणवादियों द्वारा बुद्ध को विष्णु का अवतार बताया जाता है।

इसलिए उनका ज़ोर इस बात को स्थापित करने पर था कि जो भी अस्पृश्य बौद्ध धर्म अपना रहे हैं वे सबसे प्रमुख प्रतिज्ञा यही लें कि वे “ब्रह्म, विष्णु और महेश को देवता नहीं मानते, राम और कृष्ण को भगवान नहीं मानते, गौरी और गणपति को भगवान नहीं मानते और ईश्वर के अवतार के सिद्धांत को नहीं मानते।” ये चार प्रतिज्ञाएं उस पांचवी प्रतिज्ञा का आधार निर्मित करने के लिए थीं जिसमें बुद्ध को विष्णु का अवतार मानने से इनकार किया गया है।

इसीलिए डॉ. आंबेडकर की 22 प्रतिज्ञाओं को अगर आप देखेंगे तो उसके शुरुआती चार एक जैसे और दोहराव भरे लगते हैं। यह लगता है कि सिर्फ़ उनकी पांचवी प्रतिज्ञा – “मैं बुद्ध को विष्णु का अवतार नहीं मानता” – से काम चलाया जा सकता था। लेकिन डॉ. आंबेडर हमेशा की तरह अपने विचारों में किसी भी तरह के संशय को नहीं रहने देना चाहते थे। यहां भी वे बहुत चौकन्ने थे। ख़ासकर हिंदू महासभा के नेता वी.डी. सावरकर के नजरिए से जिन्होंने डॉ. आंबेडकर के धर्मांतरण के बाद इंडियन एक्सप्रेस में यह टिप्पणी की थी कि “हमारे लिए यही संतोष की बात है कि परंपरागत हिंदू व्यवस्था से बाहर निकलने के बावजूद उन्होंने एक ऐसा पंथ चुना जो मूल रूप से भारतीय ही है, जो सिख धर्म, ब्राह्मणवाद और आर्यसमाज की तरह हिंदू धर्म का ही एक और संस्करण भर है।”[22]

आज जब दलितों के एक हिस्से में ब्राह्मणवादी मूल्यों के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है, आंबेडकरवाद के नाम पर बनी कुछ पार्टियां आरएसएस की सत्ता की सहयोगी बन चुकी हैं और इन सबके लिए डॉ. आंबेडकर को मुस्लिम विरोधी साबित करने की साज़िश रची जा रही है, तब डॉ. आंबेडकर के धर्मांतरण के दृष्टिकोण को तथ्यों के साथ समझना बहुत ज़रूरी है।

संदर्भ :

[1] क्रिस्टोफ जैफरलो, भीमराव आंबेडकर : एक जीवनी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ 144

[2] दस स्पोक आंबेडकर, वॉल्यूम 4, पेज 108 में उद्धृत; क्रिस्टोफ जैफरलो, उपरोक्त, पृष्ठ 146

[3] क्रिस्टोफ़ जैफरलो, उपरोक्त, पृष्ठ 146

[4] वही

[5] वही

[6] वही, पृष्ठ 147

[7] वही

[8] इंडियन एनुअल रजिस्टर, 1936, वॉल्यूम 1, कलकत्ता, पृष्ठ 278; क्रिस्टोफ जैफरलो, उपरोक्त, पृष्ठ 146

[9] वही

[10] धनंजय कीर, डॉ. आंबेडकर, पृष्ठ 254; क्रिस्टोफ जैफरलो, उपरोक्त, पृष्ठ 148

[11] क्रिस्टोफ जैफरलो, उपरोक्त, पृष्ठ 148

[12] वही, पृष्ठ 149

[13] वही

[14] वही, पृष्ठ 152

[15] वही, पृष्ठ 151

[16] वही, पृष्ठ 152, संदर्भ : पटियाला के राजा के नाम मुंजे का पत्र

[17] वही

[18] वही

[19] डॉ. बी.आर. आंबेडकर, स्टेट्स एंड माइनॉरिटीज़, पृष्ठ 77

[20] मधु लिमये, डॉ. अंबेडकर : एक चिंतन, मीडिया स्टडीज़ ग्रुप, पृष्ठ 122

[21] क्रिस्टोफ जैफरलो, उपरोक्त, पृष्ठ 155

[22] धनंजय कीर, डॉ. आंबेडकर, पृष्ठ 503; क्रिस्टोफ जैफरलो, उपरोक्त, पृष्ठ 162

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

शाहनवाज आलम

लेखक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सचिव हैं

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