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‘जय भीम’ का नारा लगा युवा पीढ़ी ने दी ‘जय श्रीराम’ के मनुवादी संस्कृति को चुनौती

वामपंथियों को केवल मार्क्स मंजूर थे; फुले, शाहू, आंबेडकर और पेरियार नहीं। उनके दिमागी जहर को निकालने का प्रभावी काम जंतर-मंतर पर पूरे देश से आए हर जाति-धर्म के युवाओं ने किया। उन्होंने ‘जय श्रीराम’ के नारे के विरुद्ध ‘जय भीम’ के नारे को स्थापित किया। बता रही हैं डॉ. लता प्रतिभा मधुकर

“मनुवाद की छाती पर बिरसा फुले आंबेडकर” का नारा लगाते हुए महाराष्ट्र में दलित और ओबीसी एक साथ विद्रोही परंपरा के साझेदार रहे हैं। लेकिन तथाकथित प्रगतिशील संगठनों ने ‘जय भीम’ और ‘जय ज्योति, जय सावित्री’ के नारे लगाने में करीब पचास साल लगाए। अगर उन्होंने अपनी जीवन धारा में पहले से ही फुले, शाहू और आंबेडकर को अपना लिया होता तो 1990 में पनपे ‘जय श्रीराम’ के नारे का इतना विस्तार नहीं होता। लेकिन युवाओं के आंदोलन ने चुनौती दी है। उन्होंने ‘जय भीम’ के नारे को पुनर्स्थापित किया है।

उत्तर प्रदेश के एक साथी ने युवाओं के आंदोलन में जब सभी को ‘जय भीम’ का नारा देते सुना तब टिप्पणी की कि पहली बार उन्होंने ओबीसी और सवर्ण लोगों को जय भीम का नारा लगाते सुना। यह हो सकता है कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार में ऐसी स्थिति हो कि वहां केवल दलित ही ‘जय भीम’ का नारा लगाते हों, ओबीसी नहीं।

लेकिन दिल्ली के जंतर-मंतर से प्रारंभ और देश के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचे युवाओं के आंदोलन में तो हरेक युवती और युवक, वे चाहे किसी भी समुदाय से आते हों, सभी ‘जय भीम’ का नारा पूरे जोश से लगा रहे थे। और यह देखना-सुनना भी सुखद रहा कि सभी एक-दूसरे का अभिवादन करने के लिए ‘जय भीम’ कह रहे थे, न कि नमस्कार कर रहे थे।

यहां यह बताना जरूरी है कि महाराष्ट्र की पृष्ठभूमि अन्य राज्यों से थोड़ी अलग है। यहां के दलित और ओबीसी सहित सभी बहुजन और मूलनिवासी आंदोलन का एक इतिहास रचनेवाले रहे हैं। इसमें कांशीराम जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसलिए मुस्लिम ओबीसी भी अपने आंदोलन में जोश के साथ ‘जय भीम’ का नारा लगाते रहे हैं। अगर वामपंथी संगठनों ने भी इस विचारधारा को अपनाया होता तो महाराष्ट्र में ढोल-ताशे के साथ ‘जय श्रीराम’ के नारे का विस्तार नहीं होता और न ही राजनीति में राष्ट्रवादियों का हिंदू राष्ट्रवाद की तरफ झुकाव होता।

‘जय भीम’ एक नारा भर नहीं है। यह ‘जय श्रीराम’ के खिलाफ मानवता, करुणा और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक है। मैंने देखा है कि हर जगह ब्राह्मणवादियों का वर्चस्व इस कदर था कि लगभग सारे कुलीन दलित भी ‘जय भीम’ कहने में संकोच महसूस करते थे। लेकिन आज स्थिति बदल गई है। ‘नमस्ते’, ‘गुड मॉर्निंग’ के साथ ‘जय भीम’ कहने में किसी को अब संकोच नहीं होगा। इस नारे को यह सम्मान युवाओं के आंदोलन ने पूरे देश में दिया है।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर युवाओं के आंदोलन की तस्वीर

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष कामरेड नेहा बोरा ने अपने एक सुंदर भाषण में बताया कि वे ‘जय भीम’ क्यों कहती हैं। काकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष अभिजीत दीपके ने कहा कि वे ‘जय भीम’ का नारा इसलिए नहीं लगाते हैं कि दलित हैं। इस नारे को समझने के लिए बाबा साहब डॉ. आंबेडकर ने सभी भारतीय नागरिकों को संविधान के साथ-साथ जो इंसान होने की पहचान दी, उसको समझना होगा। इसलिए यह नारा हर भारतीय को लगाना चाहिए।

इसके बावजूद यह कहना अतिरेक नहीं है कि वामपंथी और प्रगतिशील और स्त्री आंदोलन के तथाकथित उच्चवर्णीय नेता अभी भी सहजता से ‘जय भीम’, ‘जय ज्योति’, ‘जय सावित्री’ और ‘जय फातिमा’ नहीं कहते हैं। इनके मुंह से संविधान बचाने की बात भी केवल पांच साल पहले शुरू हुई। अगर उन्होंने फुले, शाहू और आंबेडकरवादी विचारधारा को अपना लिया होता तो उन्हें इन नारों को अपनी जुबान से लगाने में हिचकिचाहट नहीं होती। इनके अंदर के मनुवाद ने प्रगतिशील आंदोलन खोखले किए। उन्हें केवल मार्क्स मंजूर थे; फुले, शाहू, आंबेडकर और पेरियार नहीं। उनके दिमागी जहर को निकालने का प्रभावी काम जंतर-मंतर पर पूरे देश से आए हर जाति-धर्म के युवाओं ने किया। उन्होंने ‘जय श्रीराम’ के नारे के विरुद्ध ‘जय भीम’ के नारे को स्थापित किया।

हमारे महाराष्ट्र में मंडल आयोग लागू होने के पहले से ही दलित पैंथर के साथ काफी ओबीसी जुड़े रहे। वे दलित आंदोलन का हिस्सा रहे। यहां फुले, शाहू, आंबेडकर और पेरियारवादी संबोधन ही प्रगतिशील ओबीसी ने खुद के लिए अपनाया है। आप देखेंगे कि ओबीसी आंदोलनों में भी हमेशा ‘जय ज्योति’, ‘जय सावित्री’, ‘जय फातिमा’, ‘जय भीम’ और ‘जय संविधान’ आदि नारे लगाए जाते रहे हैं।

लेकिन यह भी सत्य है कि सवर्ण तथा ब्राह्मणवादी लोगों ने ओबीसी को बदनाम करने का एक भी अवसर नहीं छोड़ा। दूसरे अनेक राज्यों में दलित भूल जाते हैं कि डॉ. आंबेडकर तथागत बुद्ध, कबीर और जोतीराव फुले को अपना गुरु मानते थे। लेकिन महाराष्ट्र में जैसे ओबीसी आंदोलनों में हमेशा ‘जय भीम’ नारा गूंजता रहा है, वैसे ही यहां दलित आंदोलनों में भी जोतीराव फुले और सावित्रीबाई फुले को सम्मान दिया जाता रहा है। कहना होगा कि अगर अन्य प्रदेशों में भी दलित-ओबीसी यही व्यवहार करें, अपने महानायक व महानायिकाओं का सम्मान सार्वजनिक बैठकों में करें तो इसके दीर्घकालीन परिणाम मिलेंगे और इनका असर जेन-जी यानी युवा पीढ़ी पर भी दिखेगा।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

लता प्रतिभा मधुकर

डॉ. लता प्रतिभा मधुकर बहुजन स्त्रीवादी चिंतक, समीक्षक व लेखिका हैं

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