वार्ड नंबर 2/22, कुमार दिव्यम, पिता दयानंद यादव, जुलाई महीने के 7 दिनों तक मेरी यही पहचान रही। बेऊर जेल के चहारदीवारियों में मैं राज्य का दमन झेल रहा था। सरकार के सामने पेपर लीक के खिलाफ खड़े होने पर मुझ जैसे कई छात्र सरकार के लिए अपराधी बन चुके थे। मेरे और कई अन्य साथियों पर कुल 8 मुकदमे दर्ज हुए थे। हत्या के प्रयास की धारा में भी मुकदमा दर्ज हुआ था। सोच रहा था कि हम निहत्थे इतना खतरनाक कैसे हो सकते हैं। हक की आवाज उठाने वाले लोगों के साथ खड़े रहने, उसका नेतृत्व करने और सत्ता के सामने खड़े रहने वाले लोगों को राज्य अपराधी कैसे समझता है, इसे महसूस कर रहा था।
गोरख पांडे ने अपनी पंक्तियां – ‘वे डरते हैं कि तमाम निहत्थे एवं गरीब लोग उनसे डरना बंद कर देंगे’ – सरकार के इसी डर के लिए लिखी थीं। जेन-जी इनकी लाठियों से, इनकी गोलियों से नहीं डर रहे थे, और इस बात से राज्य भयभीत था।
जब गिरफ्तारी हुई
24 जुलाई की सुबह थी। लगभग दस बजे मेरी नींद खुली। देर तक सोना मेरी पुरानी आदत रही है। उठने के बाद सबसे पहले मैंने अपने और अपने साथियों पर दर्ज मुकदमों की जानकारी ली। एफआईआर की प्रति पढ़ी। सरकार ने दमन शुरू कर दिया था। सरकार आंदोलन में शामिल छात्रों की तस्वीरें जारी कर रही थी। उनपर इनाम भी रखे जा रहे थे। लग रहा था कि छात्र नहीं, ये अपराधी हैं। दृश्य ऐसा था मानो किसी संगठित अपराध गिरोह की तलाश चल रही हो। लेकिन जिन चेहरों को ‘वांटेड’ बताया जा रहा था, वे दरअसल विश्वविद्यालयों एवं स्कूलों के छात्र थे, जिन्होंने पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था की विफलता के खिलाफ आवाज़ उठाई थी। इतना स्पष्ट हो गया था कि 22 जुलाई को ऐतिहासिक राजभवन मार्च के बाद सरकार बिहार में क्रूर दमन की तैयारी में थी।
सरकार ने इस जन उभार को लोकतांत्रिक असहमति की तरह नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था की समस्या की तरह देखा। यहीं से दमन की पटकथा लिखी जाने लगी।
लगभग 11 बजे मैं फ्लैट से नीचे उतरा और सामने वाली सड़क पर मुश्किल से दस कदम चला ही था कि एक सफेद स्कॉर्पियो तेज़ी से आकर रुकी। सादे कपड़ों में कई लोग धड़ाधड़ उतरे और उन्होंने मुझे चारों तरफ़ से घेर लिया।
एक ने पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है?”
मैं अपना नाम बताता, उससे पहले ही उन्होंने मुझे जबरन स्कॉर्पियो में ठूंस दिया। वे मुझे पहचानते थे।
मैं लगातार चिल्लाता रहा कि तुम लोग कौन हो? मेरा अपहरण क्यों कर रहे हो? लेकिन किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। कुछ लोग मुझे दबोचे रहे और गाड़ी चल पड़ी। कुछ देर बाद आगे की सीट पर बैठे एक व्यक्ति, जिसे बाकी लोग ‘सर’ कह रहे थे, ने कहा– “हम एसटीएफ से हैं। आपको गिरफ्तार कर लिया गया है।” मैंने पूछा– “सादे कपड़ों में?” उसने संक्षेप में कहा– “हां।” उस क्षण मुझे पहली बार समझ में आया कि राज्य केवल अपनी शक्ति से नहीं, बल्कि अपनी अस्पष्टता से भी भय पैदा करता है।
मैं बार-बार पूछता रहा कि मुझे कहां ले जाया जा रहा है। वह कह रहा था– “दिव्यम मिल गया, टारगेट कम्प्लीट।” उसके चेहरे के भाव ऐसे थे मानो उन्होंने किसी खतरनाक अपराधी या आतंकवादी को पकड़ लिया हो। आंदोलनकारियों को स्टेट द्वारा देखने के नजरिए को नजदीक से अनुभव कर रहा था। शहर में मुझे काफी देर तक घुमाया गया। फिर मेरी आंखों पर पट्टी बांध दी गई और मुझे किसी अज्ञात स्थान पर ले जाया गया। वहां मेरे मोबाइल का लॉक खुलवाने के लिए लगातार दबाव बनाया गया। धमकियां दी गईं। अंततः थप्पड़ों, लाठियों और गालियों के बीच जबरन फोन का लॉक खुलवाया गया। मुझे शाम 8 बजे के आसपास पता चला कि ये नौबतपुर थाना है। मुझे जिस कमरे में रखा गया था, वह वहां के थाना प्रभारी का आवास था, जो थाना परिसर में ही था। इस बीच मुझसे पूछताछ चलती रही।
उनका पहला सवाल था कि फंडिंग कहां से होती है? आंदोलनों को बदनाम करने के चिर-परिचित आरोप थे, जो नौबतपुर थाने का थाना प्रभारी सवाल के रूप में मुझसे पूछ रहा था। कौन-कौन लोग शामिल हैं इस साजिश में? उसका अगला सवाल था। इन प्रश्नों ने मुझे चौंकाया नहीं। वे परिचित थे। हर जन-आंदोलन के सामने सत्ता लगभग यही शब्दावली रखती है– विदेशी फंडिंग, षड्यंत्र, मास्टरमाइंड, राष्ट्रविरोध।
पूछताछ के दौरान मुझे बार-बार महसूस हुआ कि पुलिस की भाषा और सत्तारूढ़ दल के सार्वजनिक वक्तव्यों के बीच कोई मौलिक अंतर नहीं रह गया है। ऐसा लग रहा था मानो एक ही राजनीतिक शब्दावली दो अलग-अलग संस्थानों से बोली जा रही हो। पुलिस कानून की नहीं, सत्ता की भाषा बोल रही थी।
शायद मैं मुस्लिम होता तो और स्पष्ट हो जाता। जैसा कि मेरे अन्य मुस्लिम साथियों के साथ हुआ। उन्हें आतंकवादी और अन्य इस्लामोफोबिक आदि बातें कही गईं।

देर रात मुझे गांधी मैदान थाने लाया गया। वहां के थानाध्यक्ष ने व्यंग्य करते हुए कहा– “नेता बनने का बहुत शौक है? तुम्हारे संगठन के सब लोगों को उठा लिया गया है। नेता बनने का शौक उतार देंगे।” फिर मेरे सामने दो और लोग खड़े थे। आइसा बिहार राज्य सचिव दीपांकर और उपाध्यक्ष सबा आफरीन। दोनों छात्र नेता हैं। इन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया था।
इसके कुछ घंटों बाद मैं, दीपंकर, आनंद और सबा बेऊर जेल की ऊंची चारदीवारी के भीतर थे।
इसके पहले गांधी मैदान थाना पहुंचने पर मैंने कहा कि मुझे परिजनों को सूचित तो करने दिया जाए कि मैं गिरफ्तार हूं। उसके बाद एक पुलिसकर्मी जिसके पास मेरा फोन था, उसने कहा– नंबर बताओ। और फिर रात 10 बजे मैने भाकपा माले के राज्य कार्यालय को सूचित किया। सुबह 11 बजे से रात के 10 बजे तक मेरे परिजनों, मित्रों या पार्टी साथियों को कोई सूचना नहीं थी कि मैं कहां हूं।
जेल परिसर के अंदर
दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन पर हुए पुलिसिया दमन ने पूरे देश के छात्रों के भीतर सत्ता के प्रति गहरा आक्रोश पैदा कर दिया था। पटना की सड़कों पर वह आक्रोश साफ दिखाई दे रहा था। बैरिकेड छोटे पड़ रहे थे। छात्र हर कीमत पर आगे बढ़ना चाहते थे। कई जगह पुलिस और छात्रों की झड़प हुई। लेकिन पूरे आंदोलन के दौरान कहीं से यह खबर नहीं आई कि छात्रों ने किसी आम नागरिक, दुकानदार, ठेला चालक या राहगीर को नुकसान पहुंचाया हो। उनका गुस्सा सत्ता, पुलिसिया दमन और सत्ता के वर्चस्व वाली मीडिया की भूमिका के खिलाफ था। भाजपा के प्रति इस आक्रोश को आंदोलन द्वारा पूरे समाज के प्रति हिंसात्मक होने का ढोल पीटा गया और ऐसा दिखाया गया कि छात्रों ने आमजनों के साथ हिंसा की है।
यह जेन-जी का आंदोलन था। यह पीढ़ी परंपरागत आंदोलनों की भाषा में बात नहीं करती। इसके पास समाजशास्त्रीय शब्दावली नहीं है। यह अपने पोस्टर चैट की भाषा में बनाती है। हिंदी के नारे रोमन लिपि में लिखती है, जिसे कुछ लोग उपहास में ‘हिंग्लिश’ कहते हैं। लेकिन यही भाषा लाखों युवाओं तक सबसे तेज़ी से पहुंची। जो लोग इस भाषा का मज़ाक उड़ाते थे, वे उसके प्रभाव को समझ ही नहीं पाए। यह पीढ़ी मीम, स्लैंग और सोशल मीडिया की अपनी संस्कृति के माध्यम से आंदोलन को आगे बढ़ा रही थी। वह अपनी ही पीढ़ी से उसी की भाषा में संवाद कर रही थी। मुझे लगता है कि यदि यह आंदोलन पूरी तरह पारंपरिक राजनीतिक भाषा में होता, तो शायद इतना व्यापक और सफल नहीं होता। इस आंदोलन में छात्रों ने मीडिया के भरोसे का इंतजार नहीं किया बल्कि स्वयं जंतर-मंतर से लेकर देश भर में हो रहे आंदोलनों को फोन से रिकॉर्ड करके सोशल मीडिया पर डालने लगा। इस तरह इस आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने का माध्यम जेन-जी स्वयं रहा।
जेन-जी की सबसे बड़ी विशेषता उसकी स्वायत्तता है। यह आसानी से भयभीत नहीं होती। पुलिस की लाठी चलते ही यह पारंपरिक आंदोलनकारियों की तरह व्यवहार नहीं करती। मैंने छात्रों को वाटर कैनन के सामने नाचते देखा। जेल के भीतर भी उनका वही आत्मविश्वास बना हुआ था। बेऊर जेल में दिन के समय कैदी बाहर निकलकर परिसर में बैठते, एक-दूसरे से मिलते और बातें करते थे। सौ से अधिक छात्र जेल भेजे गए थे। मैंने किसी के चेहरे पर हार या निराशा नहीं देखी। वे हंसते थे, ठहाके लगाते थे, एक-दूसरे का हौसला बढ़ाते थे। उनके भीतर भय से अधिक गर्व था कि वे एक बड़े आंदोलन का हिस्सा हैं। 25 जुलाई को आइसा ने बिहार बंद का ऐलान किया था। उसी दिन खबर मिली कि धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया है। हम सबके भीतर खुशी की लहर दौड़ गई। लगा कि आंदोलन जीत गया। जिस आंदोलन को सरकार हिंसा का नाम देकर कुचलना चाहती थी, उसी आंदोलन के दबाव में उसे पीछे हटना पड़ा। यह भी खबर मिली कि मुकदमे वापस लेने और मृत छात्रों के परिवारों को मुआवजा देने की प्रक्रिया शुरू होगी। उस समय पहली बार मुझे लगा कि हम सिर्फ जेल में बंद लोग नहीं हैं; हम उस संघर्ष के सिपाही हैं जिसने सत्ता को झुकने पर मजबूर किया। हम लोकतंत्र की रक्षक पीढ़ी हैं।

भाजपा आरएसएस द्वारा पूरे आंदोलन के कॉन्सेप्ट को ही खारिज करने और हक-अधिकार के लिए लड़ने वाले लोगों को ‘आंदोलनजीवी’ कह कर दुष्प्रचारित करने के अभियान को भी धक्का लगा था। इस मूवमेंट के बुनियाद में भी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा हक के लिए लड़ने वाले लोगों को अपमानजनक शब्द कॉकरोच कहा जाना है। ‘आंदोलनजीवी’ और ‘कॉकरोच’ एक ही तरह की वैचारिकी को परिलक्षित करते हैं, जिसका उद्गम हिंदुस्तान में दक्षिणपंथ की धुरी आरएसएस है।
रिहाई की बेचैनी अब बढ़ने लगी थी। साथी पूछते– “अब कब निकलेंगे? मुकदमे तो वापस हो गए।” बेल कब होगी, इसकी कोई स्पष्ट जानकारी नहीं थी। बिहार सरकार सबको छोड़ेगी या कोई नया अड़चन लगाएगी या यह कि आंदोलन के नेताओं को नियंत्रित करने कि कोशिश सबक सिखाने तक तो नहीं जाएगी, जैसा वो अक्सर करती है, ऐसे सवाल उमड़ रहे थे। उमर खालिद, शारजील ईमाम जैसे लोग इसके उदाहरण हैं, जो सरकार के दमन और न्यायपालिका के धाराशायी होने की गवाही दे रहे हैं।
जेल में भगत सिंह बार-बार याद आते रहे। सोचता था कि हमसे भी कम उम्र का एक नौजवान देश की आज़ादी और परिवर्तन के लिए हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ गया। जेल की उस कोठरी में बैठकर पहली बार मैंने महसूस किया कि भगत सिंह होना केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक वैचारिक दृढ़ता है।
जेल : समाज का आईना
बेऊर जेल में मैंने राज्य-प्रायोजित भ्रष्टाचार को बहुत करीब से देखा। मेस का खाना जान-बूझकर इतना खराब दिया जाता था कि लोग मजबूर होकर बाहर से खाने-पीने का सामान मंगवाएं। फिर उस सामान को जेल के भीतर पहुंचाने के लिए रिश्वत ली जाती। जेल के भीतर भी पैसे और रसूख की अपनी ताकत होती है।
एक ही अपराध, एक जैसी धाराएं और एक जैसी सज़ा काट रहे दो व्यक्तियों की ज़िंदगी उनकी आर्थिक स्थिति और सामाजिक हैसियत के अनुसार बिल्कुल अलग हो जाती है। जेल में दिखा कि समाज के भीतर मौजूद आर्थिक, सामाजिक और जातिगत असमानताएं जेल की दीवारों के भीतर समाप्त नहीं होतीं, बल्कि कई बार वे वहां और अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगती हैं। जाति और वर्ग क़ैदियों में भी हैं।
बेऊर जेल मेरे लिए केवल जेल नहीं रह गया था। वह भारतीय राज्य, समाज, सत्ता, भ्रष्टाचार और प्रतिरोध सभी को एक साथ देखने की एक जीवित प्रयोगशाला के माफिक था।
(संपादन : नवल/अनिल)
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