अनुवादकीय टिप्पणी – मंडल कमीशन ने सिर्फ सरकारी सेवाओं/नौकरियों और शिक्षा संस्थाओं में अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिशें ही नहीं की थीं, बल्कि उच्च जातियों के सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, आर्थिक और राजनीतिक वर्चस्व को कैसे तोड़ा जाए और इस चौतरफा वर्चस्व की अधीनता में जीने वाले पिछड़े वर्गों को इस अधीनता से कैसे मुक्त किया जाए तथा इस अधीनता के चलते पिछड़े वर्गों के बीच पैदा हुई वंचना को कैसे खत्म किया जाए, इसके लिए कई ठोस सिफारिशें भी प्रस्तुत की थीं।
आरक्षण की जरूरत, सार्थकत्ता और महत्ता को स्वीकार करते हुए और इसके लिए पुरजोर सिफारिश करते हुए कमीशन भारतीय समाज में वर्ण–जाति आधारित श्रेणीक्रम की संरचना, वर्चस्व एवं अधीनता के रिश्ते और इससे बहुसंख्यक पिछड़े वर्गों की वंचना को खत्म करने में आरक्षण की सीमित भूमिका से परिचित था। आयोग ने साफ कहा है कि “जब तक पिछड़े वर्गों की मूल समस्या का समाधान नहीं होता है, तब तक सरकारी नौकरियों एवं शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण और वित्तीय सहायता केवल आंशिक राहत ही दे पाएगा।”
सवाल यह है कि फिर कमीशन की नजर में पिछड़े वर्गों की मूल समस्या क्या है? इस संदर्भ में आयोग कहता है कि “उत्पाद के साधनों पर उच्च जातियों का करीब–करीब पूर्ण नियंत्रण है, जिसके चलते ये जातियां पिछड़ों वर्गों को अपने वर्चस्व में बनाए रखने और नियंत्रित करने में सक्षम रही हैं।”
इस मूल समस्या का समाधान क्या है? इसका जवाब कमीशन इन शब्दों में देता है– “इसलिए जब तक वर्तमान उत्पादन संबंधों की जकड़बंदी को क्रांतिकारी भूमि सुधारों के माध्यम से नहीं तोड़ा जाएगा, तब तक वंचित और विशेषाधिकार–विहीन वर्गों की उच्च जातियों पर निर्भरता बनी रहेगी।” आयोग सुझाव देता है कि इस काम को अविलंब किया जाना चाहिए। ऐसा नहीं है कि आयोग को यह अहसास नहीं था कि औद्योगिक उत्पादन संबंधों में भी परिवर्तन की जरूरत है, लेकिन आयोग एक व्यवहारिक दृष्टि अपनाते हुए कहता है कि कम से कम यह काम भूमि संबंधों के मामले में तो तुरंत ही किया जा सकता है और किया जाना चाहिए।
क्रांतिकारी भूमि सुधारों के साथ ही कमीशन शिक्षा व्यवस्था में आमूल–चूल परिवर्तन का हिमायती है। आयोग साफ कहता है कि भारत की पूरी शिक्षा व्यवस्था शासक वर्गीय अभिजनों के लिए डिजाइन की गई है। बहुसंख्यक पिछड़े वर्गों लिए यह अनुकूल नहीं है। आयोग स्पष्ट तौर कहता है कि सच तो यह है कि अभिजन केंद्रित ब्रिटिश शिक्षा व्यवस्था को ही आजादी के बाद अपना लिया गया। इस संदर्भ में आयोग कहता है कि “हमारी शिक्षा व्यवस्था अपनी संरचना और स्वरूप में अभिजनवादी है। … यह शिक्षा व्यवस्था हमें ब्रिटिश शासन से विरासत के तौर पर प्राप्त हुई।… यह शिक्षा व्यवस्था पिछड़े वर्गों की आवश्यकताओं के लिए नहीं के बराबर उपयुक्त है।”
शिक्षा सभी वंचितों के लिए मुक्ति का द्वार खोलती है, इसे बहुसंख्यक पिछड़े वर्गों के सभी लोगों तक कैसे पहुंचाया जाए, इसके लिए कमीशन कई सारे सुझाव प्रस्तुत करता है।
कमीशन के सामने यह तस्वीर साफ है कि ओबीसी समुदाय में कई तरह के समूह हैं। इसका एक बड़ा समूह दस्तकारों–शिल्पकारों का है। मशीन आधारित औद्योगिक उत्पादन के चलते ओबीसी समुदाय के इस दस्तकार–शिल्पकार समुदाय की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। इन समुदायों की कैसे उन्नति–प्रगति हो, इसके बारे में आयोग कई ठोस सिफारिशें करता है।
पिछड़े वर्गों के आरक्षण के खिलाफ बार–बार दिए जाने वाले मूल तर्कों की कमीशन चर्चा करता है और उनका सूत्रबद्ध और ठोस जवाब देता है। आगे कहता है कि भारत में जाति आधारित व्यवस्था के भीतर पहले से ही आरक्षण की एक कठोर व्यवस्था रही है, “सच तो यह है कि हिंदू समाज में आरक्षण की एक अत्यंत ही कठोर व्यवस्था हमेशा से मौजूद रही है। हिंदू समाज में आरक्षण की व्यवस्था जाति–व्यवस्था के माध्यम से पूरे समाज के नस–नस में घुसी हुई थी। एकलव्य को जाति आधारित इस आरक्षण की व्यवस्था के नियमों का उल्लंघन करने के कारण अपना अंगूठा कटवाना पड़ा और शंबूक का सिर ही काट दिया गया, मतलब उसे जान ही गंवानी पड़ी।” जाति आधारित इस अत्यन्त कठोर आरक्षण की व्यवस्था को तोड़ने का ही तरीका वंचित तबकों के लिए आरक्षण है। सेवाओं/ नौकरियों और शिक्षा संस्थानों पिछड़े वर्गों को दिया जाने वाला यह आरक्षण कैसे जाति आधारित उस आरक्षण तोड़ता है, जिसमें एकलव्य को अंगूठा गंवाना पड़ा और शंबूक का गला ही काट दिया गया। आयोग इसकी भी विस्तार से चर्चा करता है।
ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण के साथ ही कमीशन ने इस आरक्षण को पदोन्नति तक विस्तारित करने, एससी–एसटी की तरह की उम्र सीमा में छूट देने, उम्मीदवारों को अधिक अवसर प्रदान करने आदि सुझाव भी दिए थे। खैर, जब एससी–एसटी समुदायों के पदोन्नति में आरक्षण के अधिकार को करीब–करीब छीन लिया गया है, तो ओबीसी को मिलने की बात ही कौन करे।
कमीशन ने ओबीसी की पहचान करते समय और उन्हें वंचना से मुक्ति दिलाने की सिफारिशें करते समय धर्म को कोई आधार नहीं माना। उसकी समझ यह है कि जाति व्यवस्था एक ऐसी संरचना है, अन्य धर्मावलंवियों के भीतर भी करीब–करीब उतनी ही मजबूती से मौजूद है, भले ही सतह पर दिखने वाले कुछ अंतर हो। इस तरह कमीशन ने ओबीसी की पहचान करते हुए और उनकी सूची बनाते समय सभी धर्मों के सामाजिक–शैक्षणिक रूप से पिछड़े लोगों को शामिल किया।
जो कोई व्यक्ति भारतीय संविधान की प्रस्तावना के अनुसार समता, स्वतंत्रता, बंधुता आधारित भारत, सबके लिए हर स्तर पर न्याय प्रदान करने वाला भारत बनाना चाहता हो, भारत को एक सच्चे लोकतांत्रिक राष्ट्र और समाज के रूप में देखना चाहता हो उसे मंडल कमीशन की संपूर्ण रिपोर्ट न सही, तो कम–से–कम उसकी सिफारिशों के बारे में जरूर ही जानना चाहिए। समय के साथ इसमें कुछ नई चीजे शामिल की जा सकती हैं, कुछ जोड़ा–घटाया जा सकता है। इसके बावजूद भी इन सिफारिशों को लागू करना वर्ण–जाति आधारित वर्चस्व और अधीनता के रिश्ते को तोड़ने और भारत को एक सच्चा लोकतंत्र बनाने की अनिवार्य शर्त है। प्रस्तुत है मंडल कमीशन रिपोर्ट के पहले भाग के तेरहवें अध्याय में उद्धृत सिफारिशों का हिंदी अनुवाद – डॉ. सिद्धार्थ रामू

मंडल कमीशन की सिफारिशें[1]
13.1 यह किसी को लग सकता है कि ओबीसी (अन्य पिछड़े वर्ग) की उन्नति-प्रगति का प्रश्न जन-सामान्य में व्याप्त गरीबी के खात्मे के कार्यक्रम का ही हिस्सा है, जो गरीबी हमारे देश की एक व्यापक राष्ट्रीय समस्या है। यह बात केवल आंशिक तौर पर ही सही है।
ओबीसी का वंचित होना वास्तव में इस व्यापक राष्ट्रीय समस्या का एक बिलकुल ही भिन्न रूप है। यहां बुनियादी बात यह है कि सामाजिक एवं शैक्षणिक पिछड़ापन और गरीबी जैसी, ये दो पंगु बना देने वाली चीजें जाति से पैदा हुई अक्षमताओं-बाधाओं का प्रत्यक्ष नतीजा हैं। चूंकि ये अक्षमताएं-बाधाएं हमारी सामाजिक संरचना में गहराई से जड़ जमाई हुई हैं, इसलिए इन्हें दूर करने के लिए दूरगामी संरचनात्मक परिवर्तन लाना अनिवार्य आवश्यकता है। इससे किसी भी तरह कम महत्वपूर्ण यह बात नहीं है कि देश के शासक वर्ग ओबीसी की समस्याओं के प्रति अपनी सोच और दृष्टिकोण में परिवर्तन लाए।
आरक्षण
13.2 अभिजात्य शासक वर्ग के दृष्टिकोण में ऐसे ही एक परिवर्तन की जरूरत सरकारी सेवाओं और शैक्षणिक संस्थानों में ओबीसी के अभ्यर्थियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था से संबंधित है। आमतौर पर यह दलील दी जाती है कि ओबीसी की विशाल जनसंख्या (52 प्रतिशत) है को देखते हुए कुछ उम्मीदवारों के लिए सरकारी सेवाओं और शैक्षणिक संस्थानों में नौकरियां और सीटें आरक्षित कर देने से उनकी समग्र स्थिति पर कोई प्रभावकारी, निर्णायक और साफ-साफ दिखाई देने वाला असर नहीं पड़ेगा। दूसरी ओर यह भी तर्क दिया जाता है कि आरक्षित सीटों द्वारा बड़ी संख्या में कर्मचारियों की नियुक्ति से सरकारी सेवाओं की गुणवत्ता और कार्यकुशलता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इसके साथ ही यह भी तर्क दिया जाता है कि ऐसे आरक्षण का फायदा ओबीसी के उन्हीं वर्गों तक सीमित रह जाएगा, जो पहले से अपेक्षाकृत संपन्न हैं, जबकि वास्तव में सबसे अधिक पिछड़े वर्ग इससे वंचित रह जाएंगे। वंचित तबकों को आरक्षण देने की नीति के खिलाफ एक अन्य तर्क यह भी दिया जाता है कि बड़े पैमाने पर आरक्षण लागू करने से उन प्रतिभावान अभ्यर्थियों में गहरा असंतोष होगा, जिनका सरकारी सेवाओं में प्रवेश इस आरक्षण के चलते रूक जाएगा।
13.3 ओबीसी आरक्षण के विरोध में दिए जाने वाले उपरोक्त तर्क ऊपर से देखने में काफी उचित प्रतीत होते हैं, लेकिन ये वही तर्क हैं जो आभिजात्य शासक वर्ग अपने विशेषाधिकारों को बनाए रखने के लिए देता रहता है। इसलिए वंचित तबकों के आरक्षण के विरोध में दिए जाने वाले अन्य तर्कों की तरह ये तर्क भी पक्षपातपूर्ण नजरिए पर आधारित हैं। वंचित तबकों के आरक्षण के विरोध में दिए जाने वाले ये तर्क हालांकि कुछ तात्कालिक चिंताओं को तो सामने लाते हैं, लेकिन उससे/कहीं-न-कहीं उन अधिक बड़े सवालों की उपेक्षा करते हैं, जो राष्ट्रीय महत्व के हैं।
13.4 हमारा यह बिलकुल दावा नहीं है कि ओबीसी उम्मीदवारों को आरक्षण के माध्यम से कुछ हजार नौकरियां देकर हम भारत की 52 प्रतिशत आबादी को तुरंत ही राष्ट्र की अग्रिम पंक्ति में खड़ा कर देंगे। लेकिन इस बात को हमें निश्चित तौर पर स्वीकार करना होगा कि सामाजिक पिछड़ेपन के खिलाफ जो संघर्ष होना है, उसका एक बहुत ही अहम हिस्सा ऐसा होगा जो स्वयं पिछड़े लोगों के मन-मस्तिष्क के भीतर लड़ा जाएगा।
भारत में सरकारी सेवा हमेशा प्रतिष्ठा और शक्ति का प्रतीक रही है। सरकारी सेवाओं में ओबीसी का प्रतिनिधित्व बढ़ाकर हम इस देश के शासन-प्रशासन में भागीदारी का अहसास उन्हें तुरंत ही करा सकते हैं। ज्योंही किसी पिछड़े वर्ग का उम्मीदवार जिला अधिकारी (कलेक्टर) या पुलिस अधीक्षक बनता है, तो उसे उस पद के प्राप्त करने से जो भौतिक फायदा होता है, वह उसके परिवार तक सीमित होता है। लेकिन इस परिघटना का मनोवैज्ञानिक प्रभाव बहुत व्यापक होता है। जिस पिछड़े वर्ग से कोई व्यक्ति जिला अधिकारी या पुलिस अधीक्षक बनता है, उस पिछड़े वर्ग के उम्मीदवार का पूरा समुदाय सामाजिक रूप से ऊपर उठा हुआ महसूस करता है। भले ही पूरे समुदाय को कोई प्रत्यक्ष या ठोस लाभ न मिले। इसके बावजूद पूरे समुदाय के भीतर यह भावना एवं बोध पैदा होता है कि अब सत्ता के गलियारों में ‘अपना व्यक्ति’ मौजूद है। यह भावना और बोध पूरे समुदाय के मनोबल को बढ़ाने का कार्य करती हैं।
13.5 लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक समुदाय को इस देश के शासन में हिस्सेदारी पाने का वैध अधिकार है और इसकी उसके भीतर आकांक्षा भी होती है। ऐसी कोई भी स्थिति जिसके चलते देश की लगभग 52 प्रतिशत आबादी इस अधिकार से करीब-करीब वंचित हो जाए, उसका अविलंब समाधान किया जाना आवश्यक है।
13.6 अनुसूचित जातियों (एससी), अनुसूचित जनजातियों (एसटी) तथा अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) के उम्मीदवारों को बड़े पैमाने पर सरकारी सेवाओं के आरक्षित पदों पर नियुक्त किए जाने से सरकारी सेवाओं की गुणवत्ता में गिरावट आने की आशंकाएं कुछ सीमा तक उचित मानी जा सकती हैं। लेकिन इसका मतलब यह है कि यह मान लिया जाए कि केवल योग्यता (मेरिट) के आधार पर चुन गए सभी उम्मीदवार ईमानदार, कुशल, मेहनती और समर्पित ही साबित होते हैं? वर्तमान समय में सरकारी सेवाओं के शीर्ष पदों पर मुख्यत: खुली प्रतियोगिता चयनित उम्मीदवार ही कार्यरत हैं। इस नौकरशाही को कार्यकुशलता को कोई मापदंड माना जाए, तो वह मापदंड कोई गौरवशाली नहीं है। निस्संदेह, इसका यह अर्थ नहीं है कि आरक्षित पदों पर चुने गए उम्मीदवार इनसे बेहतर ही होंगे। यह संभव है कि अपने सामाजिक और सांस्कृतिक वंचनाओं के चलते आरक्षित पदों से आने वाले नौकरशाह कुछ कम दक्ष हो सकते हैं। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि उन्हें समाज के पिछड़े वर्गों की दुख-दर्द, कठिनाईयों और समस्याओं का प्रत्यक्ष अनुभव होगा। यह चीज जमीनी स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों और सर्वोच्च स्तर पर काम कर रहे नीति निर्माताओं के लिए भी कोई कम मूल्यावन उपलब्धि/योग्यता नहीं है।
13.7 इसमें कोई संदेह नहीं है कि आरक्षण और अन्य कल्याणकारी उपायों का मुख्य रूप से लाभ ओबीसी के अपेक्षाकृत अधिक उन्नत वर्गों को ही पहले मिलेगा। यह एक सार्वभौमिक सामाजिक परिघटना है। यह हर सामाजिक सुधारवादी उपायों पर लागू होती है। हमें यह स्वीकार करना पड़ता है कि धीरे-धीरे ये सुधारवादी उपाय सामाजिक श्रेणीक्रम के सभी दायरों तक विस्तारित होंगे। सामाजिक सुधारों में कोई चमत्कारिक छलांग नहीं लगाई जा सकती।
इसके अलावा एक बात यह भी है कि मानव स्वभाव कुछ ऐसा है कि वर्गहीन समाजों में भी आखिरकार एक ‘नया वर्ग’ उभर आता है। ओबीसी के लिए आरक्षण की व्यवस्था का मतलब यह नहीं है कि वह इस वर्ग के भीतर समानता स्थापित कर देगा, जबकि शेष भारतीय समाज अनेक प्रकार की असमानताओं से ग्रसित है। हां, यह जरूर है कि आरक्षण निश्चित तौर पर ही सरकारी सेवाओं में उच्च जातियों के प्रभुत्व को कम करेगा। इसके साथ ही आमतौर पर ओबीसी समुदायों को अपने देश के शासन-प्रशासन में भागीदारी का अनुभव कराएगा।
13.8 यह निश्चित तौर पर सही है कि ओबीसी के लिए आरक्षण अन्य लोगों के दिलों को काफी जलाएगा और उनके भीतर असंतोष पैदा करेगा। तो क्या सिर्फ इसके चलते कि कुछ लोगों का दिल इससे दुखेगा या जलेगा सामाजिक सुधार के इस उपाय को छोड़ दिया जाए? कुछ लोगों के दिल के जलने को उनका नैतिक वीटो पॉवर (अमोघ शक्ति) मानकर स्वीकार कर लिया जाए और ओबीसी को आरक्षण न प्रदान किया जाए?
जब ब्रिटिश लोगों को भारत छोड़ना पड़ा, तो उन लोगों का दिल भी बहुत दुखा था, जला था। उन्हें भी पीड़ा और असंतोष हुआ था। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद (अपार्थाइड) के विरूद्ध जब अश्वेतों ने आंदोलन खड़ा किया, तब इससे भी श्वेतों का दिल बहुत दुखा, बहुत जला। उनके भीतर भी असंतोष पैदा हुआ। इसी तरह जब हमारे देश की 20 प्रतिशत से भी कम आबादी वाली उच्च जातियों ने शेष समाज को हर प्रकार के सामाजिक अन्याय का शिकार बनाया, तो इसके चलते पक्के तौर पर निम्न जातियों का मन दुख और पीड़ा से भरा होगा, उनके भीतर भी असंतोष पैदा हुआ होगा।
13.8 सच तो यह है कि हिंदू समाज में आरक्षण की एक अत्यंत ही कठोर व्यवस्था हमेशा से मौजूद रही है। हिंदू समाज में आरक्षण की व्यवस्था जाति-व्यवस्था का माध्यम से पूरे समाज के नस-नस में घुसी हुई थी। एकलव्य को जाति आधारित इस आरक्षण की व्यवस्था के नियमों का उल्लंघन करने के कारण अपना अंगूठा कटवाना पड़ा और शंबूक का तो सिर ही काट दिया गया, मतलब उसे अपनी जान ही गंवानी पड़ी।
सच यह है कि आज की तारीख में ओबीसी आरक्षण के विरूद्ध जो तीखा विरोध दिखाई दे रहा है, वह वास्तव में आरक्षण के सिद्धांत के खिलाफ नहीं है। बल्कि आरक्षण का लाभ कुछ नए वर्ग उठाने जा रहे हैं, उसके खिलाफ है। इस विरोध की वजह यह है कि वे (ओबीसी) उन अवसरों में अपने हिस्से की मांग कर रहे हैं, जिन पर अब तक उच्च जातियों का एकाधिकार बना हुआ था।
आरक्षण की सीमा और इसकी आधिकारिक योजना
13.10 अनुसूचित जातियां (SC) और अनुसूचित जनजातियां (ST) देश की कुल जनसंख्या का 22.5 प्रतिशत हैं। तदनुसार, आनुपातिक आधार पर 22.5 प्रतिशत आरक्षण उनके लिए केंद्र सरकार की सभी सेवाओं तथा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में प्रदान किया गया है। राज्यों में भी अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण प्रत्येक राज्य में उनकी जनसंख्या के अनुपात में निर्धारित किया गया है।[2]
13.11 जैसा कि पिछले अध्याय (पैरा 12.22) में बताया गया है कि हिंदू और गैर-हिंदू दोनों प्रकार के अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) की जनसंख्या भारत की कुल जनसंख्या का लगभग 52 प्रतिशत है। इसलिए, केंद्र सरकार के अधीन सभी पदों में से 52 प्रतिशत पद उनके लिए आरक्षित होने चाहिए। किंतु ऐसा प्रावधान सर्वोच्च न्यायालय के अनेक निर्णयों द्वारा स्थापित विधि के विरुद्ध हो सकता है, जिनमें यह कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के अंतर्गत आरक्षण की कुल मात्रा 50 प्रतिशत से कम होनी चाहिए।
इसी कारण ओबीसी के लिए प्रस्तावित आरक्षण को ऐसे स्तर पर निर्धारित करना होगा कि जब उसे अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के 22.5 प्रतिशत आरक्षण में जोड़ा जाए, तब कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से कम रहे। इस कानूनी बाध्यता को ध्यान में रखते हुए आयोग ओबीसी के लिए केवल 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश करने के लिए बाध्य है, जबकि उनकी जनसंख्या इस प्रतिशत से लगभग दोगुनी है।[3]
13.12 जिन राज्यों ने पहले से ही ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत से अधिक आरक्षण लागू कर रखा है, वे इस सिफारिश से अप्रभावित रहेंगे।[4]
13.13 आरक्षण की मात्रा के संबंध में उपर्युक्त सामान्य सिफारिश के साथ आयोग ओबीसी के लिए निम्नलिखित समग्र आरक्षण योजना प्रस्तावित करता है–
(1) अन्य पिछड़े वर्गों के वे अभ्यर्थी जो खुली प्रतियोगिता में अपनी योग्यता (मेरिट) के आधार पर चयनित होंगे, उन्हें 27 प्रतिशत आरक्षण के कोटे में समायोजित (एडजस्ट) नहीं किया जाएगा।
(2) उपर्युक्त आरक्षण व्यवस्था को सभी स्तरों पर पदोन्नति के कोटे पर भी उसी प्रकार लागू किया जाना चाहिए।[5]
(3) आरक्षित कोटे की जो रिक्तियां भर नहीं पाती हैं, उन्हें तीन वर्ष की अवधि तक आगे (कैरी फाॅरवर्ड) ले जाया जाए और उसके बाद उन्हें अनारक्षित कर दिया जाए।
(4) प्रत्यक्ष भर्ती (डायरेक्ट रिक्रूटमेंट) के लिए अधिकतम आयु-सीमा में दी जाने वाली छूट ओबीसी अभ्यर्थियों को भी उसी प्रकार दी जानी चाहिए, जैसे वर्तमान में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अभ्यर्थियों को दी जाती है।[6]
(5) प्रत्येक श्रेणी के पदों के लिए रोस्टर प्रणाली संबंधित प्राधिकारियों द्वारा उसी प्रकार अपनाई जानी चाहिए, जैसी वर्तमान में एससी और एसटी अभ्यर्थियों के संबंध में अपनाई जाती है।
13.14 उपर्युक्त समग्र आरक्षण योजना को केंद्र तथा राज्य सरकारों के अधीन सभी सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) तथा राष्ट्रीयकृत बैंकों में होने वाली सभी भर्तियों पर भी लागू किया जाना चाहिए।
13.15 निजी क्षेत्र के वे सभी उपक्रम, जिन्हें किसी भी रूप में सरकार से वित्तीय सहायता प्राप्त हुई है, उन्हें भी उपर्युक्त आधार पर कर्मचारियों की भर्ती करने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए।
13.16 सभी विश्वविद्यालयों तथा उनसे संबद्ध महाविद्यालयों को भी उपर्युक्त आरक्षण योजना के दायरे में लाया जाना चाहिए।
13.17 इन सिफारिशों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए यह आवश्यक है कि सरकार पर्याप्त वैधानिक प्रावधान करे तथा जहां तक आवश्यकता हो, वर्तमान कानूनों, नियमों और प्रक्रियाओं में संशोधन करे ताकि वे इन सिफारिशों के अनुरूप हो सकें।
शैक्षणिक रियायतें
13.18 हमारी शिक्षा व्यवस्था अपनी संरचना और स्वरूप में अभिजनवादी है, जिसके नतीजे के तौर बड़े पैमाने पर संसाधनों की बर्बादी होती है। यह शिक्षा व्यवस्था हमारे देश जैसी अधिक जनसंख्या वाले और विकासशील देश की आवश्यकताओं के लिए सबसे कम उपयुक्त है। यह शिक्षा व्यवस्था हमें ब्रिटिश शासन से विरासत के तौर पर प्राप्त हुई। ब्रिटिश विरोधी स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इस शिक्षा व्यवस्था की तीखी आलोचना की गई थी। इस शिक्षा व्यवस्था की संरचना और स्वरूप में बिना कोई बुनियादी परिवर्तन किए हमने उसे अपना लिया।
यह शिक्षा व्यवस्था पिछड़े वर्गों की आवश्यकताओं के लिए नहीं के बराबर उपयुक्त है, लेकिन कोई दूसरा विकल्प न होने के कारण इन वर्गों को भी इसी प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ (रैट-रेस) में भाग लेने के लिए विवश होना पड़ता है।
चूंकि ‘शैक्षणिक सुधार’ इस आयोग के विचारार्थ विषय/कार्यक्षेत्र (टर्म्स ऑफ रेफरेंस) में शामिल नहीं था, जिसके चलते हम शिक्षा सुधार संबंधी व्यापक बहस के दायरे में हस्तक्षेप नहीं कर सकते। हम वर्तमान शिक्षा व्यवस्था के भीतर ही केवल कुछ तात्कालिक राहत देने वाले उपाय ही सुझाने के लिए मजबूर हैं।
13.19 विभिन्न राज्य सरकारें ओबसी के विद्यार्थियों को अनेक प्रकार की शैक्षणिक रियायतें प्रदान कर रही हैं। जैसे–
- शिक्षण शुल्क (ट्यूशन फी) से छूट,
- पुस्तकों और वस्त्रों की निःशुल्क आपूर्ति,
- मध्याह्न भोजन (मिड डे मिल),
- छात्रावास की विशेष सुविधाएं,
- छात्रवृत्तियां (स्टाइपेंड्स) आदि।
ये रियायतें एक सीमा तक उचित और उपयोगी हैं, किंतु ये पर्याप्त नहीं हैं। आवश्यकता शायद अतिरिक्त धन उपलब्ध कराने से भी अधिक इस बात की है कि ऐसी एकीकृत (integrated) योजनाएं बनाई जाएं, जो अध्ययन के लिए उपयुक्त वातावरण तैयार करें तथा विद्यार्थियों को गंभीर और उद्देश्यपूर्ण अध्ययन के लिए आवश्यक प्रोत्साहन (incentives) प्रदान करें।
13.20 यह साफ-साफ सभी को दिखने वाला तथ्य है कि पिछड़े वर्गों के छात्र-छात्राएं स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई के मामले में अनमने और अनियमित होते हैं। स्कूली शिक्षा पूरा करने से पहले ही स्कूल छोड़ देने (ड्रॉप-आउट) की उनकी दर बहुत अधिक होती है। इस अनमनेपन, अनियमितता और स्कूल छोड़ने की दर अधिक होने के दो मुख्य कारण हैं। पहला कारण यह है कि ये बच्चे अत्यंत सामाजिक एवं सांस्कृतिक वंचना के परिवेश में पले-बढ़े होते हैं। इसके चलते उनके भीतर शिक्षा प्राप्त करने जरूरी प्रेरणा की कमी रहती है। दूसरा कारण यह है कि इनमें से अधिकांश बच्चे बहुत ही गरीब परिवारों से आते हैं और ऐसे में उनके माता-पिता उन्हें बहुत ही कम उम्र में कई सारे घरेलू और अन्य नियमित कामों में लगा देते हैं।
13.21 किसी समाज, परिवार या बच्चों के सांस्कृतिक वातावरण को उन्नत करना एक बहुत ही धीमी प्रक्रिया है। देश में वर्तमान समय में संसाधनों की जो स्थिति है, उस स्थिति में इन बच्चों को सचेत तौर पर तैयार किए गए सांस्कृतिक तौर पर उन्नत परिवेश में ले जाने की स्थिति नहीं है। इसलिए यह सिफारिश की जाती है कि इस समस्या का समाधान सीमित और चयनित आधार पर दो मोर्चों पर किया जाए।
13.22 पहला, जहां ओबीसी की आबादी अधिक हो, उनमें से किसी क्षेत्र को चुना जाए और उन क्षेत्रों मे प्रौढ़ शिक्षा का एक सघन कार्यक्रम चलाया जाए। यह कार्यक्रम एक निश्चित समय में पूरा होना चाहिए। यह बुनियादी प्रेरणा पैदा करने वाला उपाय है, क्योंकि ऐसे माता-पिता ही अपने बच्चों की शिक्षा में तहेदिल से रूचि लेंगे।
दूसरा, ओबीसी की अधिक आबादी वाले इन चुने हुए क्षेत्रों में आवसीय स्कूल स्थापित किए जाएं, ताकि इस वर्ग के बच्चों को ऐसा परिवेश मिल सके जो गंभीर अध्ययन के लिए विशेष तौर पर उनके अनुकूल हो। इन स्कूलों में भोजन एवं आवास सहित सभी सुविधाएं नि:शुल्क दी जानी चाहिए, जिससे गरीब और पिछड़े परिवारों के छात्र-छात्राएं इन स्कूलों की ओर आकर्षित हों। इन सारी उपर्युक्त सुविधाओं को प्राप्त करने वाले ओबीसी विद्यार्थियों के लिए अलग से सरकारी छात्रावास स्थापित करना इस दिशा में उठाया जाने वाला एक उचित कदम होगा।
13.23 प्रौढ़ शिक्षा और आवासीय स्कूलों – दोनों की शुरूआत सीमित स्तर पर और चयनित करके करनी होगी, क्योंकि संसाधन सीमित हैं। लेकिन जैसे-जैसे संसाधन उपलब्ध हों, इन कार्यक्रमों का विस्तार किया जाना चाहिए। चयनित आधार पर शुरू किए गए प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम और आवासीय विद्यालय ओबीसी के पूरे समुदाय में जागरूकता के केंद्र के रूप में कार्य करेंगे। इसका प्रभाव कई स्तरों पर और बड़े पैमाने पर पड़ेगा। हालांकि कई राज्यों ने पिछड़े वर्गों के छात्र-छात्राओं के लिए अनेक प्रकार की शैक्षणिक रियायतें प्रदान की हैं, लेकिन इन सुविधाओं को एक मुकम्मल समग्र योजना में जोड़कर ओबीसी विद्यार्थियों के शैक्षिक परिवेश में गुणात्मक सुधार लाने के गंभीर प्रयास बहुत कम किए गए हैं।
13.24 कुल मिलाकर कहा जाए तो शिक्षा बदलाव का सबसे प्रभावी साधन है और पिछड़े वर्गों को शिक्षित करना खुद की नजर में उनके गौरव एवं महत्ता को स्थापित करने और उनकी सामाजिक स्थिति को ऊंचा उठाने का सबसे पक्का उपाय है। चूंकि ओबीसी हमारे वर्तमान शिक्षा व्यवस्था के भारी-भरकम फालतू खर्चों का भार वहन नहीं कर सकते हैं, इसलिए यह बहुत ही जरूरी है कि उनकी शिक्षा को पेशेवर/ व्यवसायिक कुशलता की ओर (वोकेशनल ट्रेनिंग) विशेष रूप से उन्मुख किया जाए। आखिरकार, सरकारी सेवाओं में आरक्षण केवल शिक्षित पिछड़े वर्गों के बहुत ही छोटे हिस्से को समाहित कर सकेगा। शेष लोगों को पेशेवर कौशल प्रदान किया जाना चाहिए, जिससे उन्होंने शिक्षा पाने के लिए जो कई वर्ष लगाए हैं, उसका उन्हें प्रतिफल प्राप्त हो सके।
13.25 इन सबके बावजूद यह भी स्पष्ट है कि उपर्युक्त सभी सुविधाएं ओबीसी विद्यार्थियों को प्रदान भी कर दी जाएं, तो भी वे शिक्षण संस्थानों में प्रवेश पाने की प्रतियोगिता में अन्य विद्यार्थियों के साथ समान स्तर पर प्रतियोगिता करने में सक्षम नहीं होंगे। इसलिए यह सिफारिश की जाती है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारों द्वारा संचालित सभी वैज्ञानिक, तकनीकी और व्यवसायिक शिक्षण संस्थानों में ओबीसी विद्यार्थियों के लिए सीटें आरक्षित की जाएं।
13.26 आरक्षण के प्रावधान को लागू करते समय यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि आरक्षित कोटे के अंतर्गत प्रवेश पाने वाले अभ्यर्थी उच्च शिक्षा का पूरा का पूरा लाभ उठा सकें। सामान्यतः यह देखा गया है कि निर्धन तथा सांस्कृतिक रूप से वंचित पृष्ठभूमि से आने वाले इन ओबीसी के विद्यार्थियों के लिए अन्य विद्यार्थियों के साथ कदम मिलाकर चलना कठिन होता है। इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि हमारे तकनीकी तथा व्यावसायिक शिक्षण संस्थानों में ऐसे सभी विद्यार्थियों के लिए विशेष कोचिंग की व्यवस्था की जाए। संबंधित अधिकारियों को स्पष्ट रूप से समझना चाहिए कि आरक्षित कोटे के अंतर्गत विद्यार्थियों को विभिन्न संस्थानों में प्रवेश दिला देने मात्र से उनका कार्य समाप्त नहीं हो जाता। वास्तव में उनका वास्तविक दायित्व उसके बाद ही शुरू होता है। यदि इन विद्यार्थियों को विशेष कोचिंग एवं शैक्षणिक सहायता देने के लिए जरूरी बाद के कदम (फॉलो-अप) नहीं उठाए गए, तो न केवल ये युवा निराश और अपमानित महसूस करेंगे, बल्कि देश को भी अपर्याप्त रूप से प्रशिक्षित तथा निम्न स्तर के इंजीनियर, डॉक्टर और अन्य पेशेवर मिलेंगे।
वित्तीय सहायता
13.27 ओबीसी के वंशानुगत पेशों से जुड़े पेशेवर समुदाय औद्यागीकरण, मशीनीकरण एवं सिंथेटिक सामग्री के मेल से बनाई गई सामग्री के प्रचलन में आने और उनके उपयोग के चलते बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। परंपरागत शिल्पगत और दस्तकारी से उत्पादित वस्तुओं के स्थान पर मशीनों एवं सिंथेटिक सामग्री के उपयोग के चलते गांव के कुम्हार, तेली, लोहार, बढ़ई आदि को उनकी पारंपरिक आजीविका से वंचित होना पड़ा है। इन वर्गों का कंगालीकरण गांवों में सबका जाना-पहचाना तथ्य है।
13.28 इसके चलते यह बहुत ही जरूरी हो गया है कि ओबीसी समुदाय के ग्रामीण पेशेवर समुदायों के सदस्यों को जरूरी संस्थागत एवं तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई जाए, ऐसे लोगों के लिए जो स्वयं छोटे पैमाने के उद्योग-धंधे स्थापित करना चाहते हैं। इसी तरह ओबीसी के उन होनहार अभ्यर्थियों को भी इसी तरह की सहायता उद्योग-धंधे स्थापित करने के लिए की जाए, जिन्होंने विशेष पेशेवर प्रशिक्षण प्राप्त किया है।
13.29 इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है कि अधिकांश राज्य सरकारों ने लघु एवं मध्यम उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न वित्तीय और तकनीकी एजेंसियां स्थापित की हैं। लेकिन यह सर्वविदित है कि इन एजेंसियों का फायदा मुख्यत: सिर्फ अधिक प्रभावशाली समुदायों के लोग ही उठा पाते हैं। इसके चलते यह अत्यंत जरूरी है कि पिछड़े वर्गों के लिए वित्तीय एवं तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने हेतु अलग से वित्तीय संस्थाएं स्थापित की जाएं। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे कुछ राज्य पहले ही ओबीसी के लिए अलग से वित्तीय निगम स्थापित कर चुके हैं।
13.30 ओबीसी के विभिन्न वंशानुगत दस्तकार एवं शिल्पकार पेशेवर समूहों की सहकारी समितियां भी उपर्युक्त कामों के लिए बहुत सहायक साबित होंगी। लेकिन इस मामले में यह विशेष तौर पर ध्यान रखा जाना चाहिए कि ऐसी समितियों के सभी पदाधिकारी एवं सदस्य संबंधित पेशेवर समूहों से ही हों। इन सहकारी समितियों में बाहरी लोगों के घुसपैठ करने और उनका शोषण करने की अनुमति न दी जाए।
13.31 देश के औद्योगिक तथा व्यवसायिक जीवन में ओबीसी का हिस्सा नहीं के बराबर है। यह स्थिति इस तथ्य की व्याख्या करती है कि इस वर्ग की आर्थिक आय इतनी कम क्यों है।
संरचनागत बदलाव
13.32 जब तक पिछड़े वर्गों की मूल समस्या का समाधान नहीं होता है, तब तक सरकारी नौकरियों एवं शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण और वित्तीय सहायता केवल आंशिक राहत ही दे पाएगा। छोटे किसान, काश्तकार, कृषि मजदूर, गरीब ग्रामीण दस्तकार-शिल्पकार, अकुशल श्रमिकों आदि का बहुलांश हिस्सा अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों से संबंधित हैं। वर्चस्व की सामाजिक परंपरा के साथ ही ऊपरी श्रेणी के किसान अपना वर्चस्व अनौपचारिक बंधुआ व्यवस्था के माध्यम से कायम रखते हैं। यह अनौपचारिक बंधुआ व्यवस्था मुख्य रूप से सूदखोरी, थोड़ी-सी जमीन बटाई पर देकर और गरीब किसानों को रहने के लिए जमीन देकर स्थापित की जाती है। चूंकि सरकारी अधिकारी और उच्च श्रेणी के किसान वर्ग अधिकांशत: इन्हीं जातियों से आते हैं, जिसके चलते सरकार और ऊपरी किसान वर्ग के बीच संबंध मजबूत बने रहते हैं। इसके चलते सामाजिक-राजनीतिक शक्ति-संतुलन का पलड़ा भी इसी ऊपरी किसान वर्ग के पक्ष में झुका रहता है और अन्य वर्गों पर उनका वर्चस्व कायम रहता है।
13.33 इन उपरोक्त हालातों का नतीजा यह है कि देश की आबादी में बहुसंख्यक होने के बावजूद भी पिछड़े वर्ग उच्च जातियों के आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभुत्व के अधीन बने हुए हैं। देश में वयस्क मताधिकार के लागू हुए तीन दशक से अधिक समय बीत चुका है। इसके बावजूद भी अनुसूचित जातियां, अनुसूचित जनजातियां और अन्य पिछड़े वर्ग राजनीतिक शक्ति का केवल सीमित हिस्सा ही प्राप्त कर सके हैं, जबकि इनकी आबादी देश की कुल आबादी का करीब तीन-चौथाई है।[7]
उत्पादन के साधनों पर उच्च जातियों का करीब-करीब पूर्ण नियंत्रण है, जिसके चलते ये जातियां पिछड़ों वर्गों को अपने वर्चस्व में बनाए रखने और नियंत्रित करने में सक्षम रही हैं। और पिछड़ा वर्ग को अपने हितों के खिलाफ जाने के लिए जाने को मजबूर कर रहे हैं। इसलिए जब तक वर्तमान उत्पादन संबंधों की जकड़बंदी को क्रांतिकारी भूमि सुधारों के माध्यम से नहीं तोड़ा जाएगा, तब तक वंचित और विशेषाधिकार-विहीन वर्गों की उच्च जातियों पर निर्भरता बनी रहेगी। भूमि सुधारों के मामले में जमींदारी उन्मूलन, लैंड-सीलिंग कानून और भूमिहीनों को भूमि वितरण जैसे अनेक कानून पहले से ही बने हुए हैं। जमीन पर व्यवहार में इनका क्रियान्वयन आधा-अधूरा और सतही रहा है। कर्नाटक, केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में अपेक्षाकृत अधिक गंभीरता से प्रयास किए गए हैं। इस चीज ने इन राज्यों में पिछड़े वर्गों को भौतिक मदद पहुंचाई है। इसके बदले में इन राज्यों में राजनीतिक फायदा भी उठाया गया है।
13.34 आयोग का दृढ़ विश्वास है कि वर्तमान उत्पाद संबंधों में व्यापक परिवर्तन सभी पिछड़े वर्गों के कल्याण और उन्नति-प्रगति के लिए सबसे महत्वपूर्ण कदम है। यदि विभिन्न कारणों से औद्योगिक क्षेत्र में ऐसा परिवर्तन संभव न हो, तो कृषि क्षेत्र में इस प्रकार का परिवर्तन न केवल संभव, बल्कि यह कार्य अविलंब होना चाहिए।
13.35 इन स्थितियों को देखते हुए आयोग दृृढ़तापूर्वक यह सिफारिश करता है कि सभी राज्य सरकारें प्रगतिशील भूमि सुधार के लिए कानून बनाएं और उनका क्रियान्वयन करें। जिससे कि ग्रामीण इलाकों में वर्तमान समय में मौजूद उत्पादन संबंधों में सरंचनागत बदलाव आए।
13.36 वर्तमान समय में अधिशेष भूमि (सरप्लस) को अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को आवंटित किया जाता है। लैंड सीलिंग (भूमि-सीमा) के कानूनों के लागू होने से भविष्य में जो अतिरिक्त भूमि उपलब्ध होगी, उसका एक हिस्सा ओबीसी के भूमिहीन खेतिहर मजदूरों को भी दिया जाना चाहिए।
कुछ अन्य बातें
13.37 (1) वर्तमान समय में कुछ परंपरागत पेशे करने वाले समुदाय, जैसे मछुआरे, बंजारा, बांसफोर, खटिक आदि देश के कुछ भागों में आज भी अस्पृश्यता के कलंक से पीड़ित हैं। आयोग ने इन्हें ओबीसी की सूची में रखा है, परंतु सरकार इन्हें अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति की सूची में रखने पर विचार कर सकती है।
(2) पिछड़ा वर्ग विकास निगम (बैकवर्ड क्लासेज डेवलपमेंट कारपोरेशन) केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर स्थापित किए जाने चाहिए, ताकि पिछड़े वर्गों के सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक विकास के लिए विभिन्न योजनाएं लागू की जा सकें।
(3) केंद्र और राज्यों में ओबीसी के हितों की रक्षा के लिए एक अलग मंत्रालय/विभाग स्थापित किया जाना चाहिए।
(4) ओबीसी के अत्यंत पिछड़े वर्गों को बेहतर प्रतिनिधित्व देने के लिए परिसीमन के समय अलग निर्वाचन क्षेत्र बनाए जाने की सिफारिश आयोग करता है। यह निर्वाचन क्षेत्र उन जगहों पर बनाया जाना चाहिए जहां इनकी आबादी पर्याप्त हो। इस तरह के अत्यन्त पिछड़े वर्गों के कुछ उदाहरण हैं– जैसे हिमाचल प्रदेश के गद्दी, महाराष्ट्र के नव-बौद्ध, तटीय क्षेत्रों के मछुआरे और जम्मू कश्मीर के गुर्जर।
केंद्रीय सहायता
13.38 वर्तमान समय में ओबीसी के कल्याण के लिए किसी भी राज्य सरकार को केंद्र से कोई आर्थिक सहायता उपलब्ध नहीं हो रही है। जो 18 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश ओबीसी के कल्याण के लिए विशेष कार्यक्रम चला रहे हैं। वे इन कार्यक्रमों के लिए अपने राज्य से संसाधन जुटा रहे हैं, उन्हें केंद्र की कोई सहायता नहीं मिल रही है। जब आयोग ने विभिन्न राज्यों में दौरा किया तो, सभी राज्यों ने कहा कि जब तक केंद्र सरकार ओबीसी की उन्नति-प्रगति के लिए चलाई जाने वाली विशेष योजनाओं के लिए उदारतापूर्व वित्तीय सहायता उपलब्ध नहीं कराती है, तब तक राज्यों के लिए अपने सीमित संसाधनों से कोई प्रभावी कार्यक्रम चला पाना संभव नहीं होगा।
13.39 आयोग राज्य सरकारों के इस विचार से पूर्णत: सहमत है। आयोग दृढ़तापूर्वक यह सिफारिश करता है कि ओबीसी के विकास के लिए बनाई गई सभी योजनाओं का वित्तपोषण केंद्र करे। यह वित्तपोषण उसी तरह और उसी सीमा तक किया करे, जैसा कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के मामलों में केंद्र द्वारा किया जाता है।
13.40 आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद पूरी योजना की 20 वर्षों के पश्चात समीक्षा की जानी चाहिए। आयोग का मत है कि एक पीढ़ी (लगभग 20 वर्ष) का समय उपयुक्त होगा, क्योंकि सामाजिक परिवर्तन एक पीढ़ीगत प्रक्रिया है। इससे कम समय की समीक्षा मनमानी होगी और ओबीसी की सामाजिक स्थिति एवं जीवन की हालातों पर आयोग की सिफारिशों के वास्तविक प्रभाव का सही आकलन नहीं हो सकेगा।
संदर्भ :
[1] इसका मूल नाम पिछड़ा वर्ग कमीशन है। चूंकि इस छह सदस्यीय कमीशन के चेयरमैन (अध्यक्ष) पूर्व सांसद बी.पी मंडल थे, इसके चलते इसका चर्चित और आमतौर पर इस्तेमाल होने वाला नाम मंडल कमीशन है। संविधान का अनुच्छेद 340 अन्य पिछड़े वर्गों की पहचान और उन्नति-प्रगति के लिए सुझाव देने के लिए एक आयोग के गठन का प्रावधान करता है। इस प्रावधान के तहत इसका गठन 1 जनवरी, 1979 को किया गया। इस कमीशन ने अपनी रिपोर्ट दिसंबर 1980 में सौंपी। कमीशन ने अपना काम 24 महीनों में पूरा किया।
इसे दूसरे पिछड़ा वर्ग कमीशन भी कहा जाता है, क्योंकि पहला पिछड़ा वर्ग कमीशन 29 जनवरी 1953 को गठित किया गया था। इस कमीशन ने अपनी रिपोर्ट 30 मार्च 1955 को सौंपी थी। इसकी सिफारिशों को स्वीकार नहीं किया गया। इस कमीशन का चर्चित और आमतौर इस्तेमाल किया जाने वाला नाम काका कालेलकर कमीशन है, क्योंकि इसके चेयरमैन (अध्यक्ष) काका कालेलकर थे।
काका कालेलकर और मंडल कमीशन दोनों का उद्देश्य अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) की सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ेपन का पता लगाना और इस पिछड़ेपन को दूर करने के लिए सिफारिशें प्रस्तुत करना था।
सामाजिक और शैक्षणिक तौर पर पिछड़े हुई सारी आबादी को सामान्य भाषा में पिछड़ा वर्ग कहा जाता रहा है और आज भी कहा जाता है। चूंकि संविधान सभा ने सामाजिक और शैक्षणिक तौर पर पिछड़े वर्गों के दो हिस्सों अनूसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की पहचान करके उन्हें सरकारी नौकरियों/ सार्वजनिक सेवाओं और शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण प्रदान कर दिया था।
इन दो समुदायों के अलावा शेष पिछड़े वर्गों को इसी वजह से अन्य पिछड़ा वर्ग नाम दिया गया। अनुसूचित जातियों और जनजातियों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण संविधान सभा ने संविधान में ही प्रदान कर दिया था। सामाजिक एवं शैक्षणिक तौर पर अन्य पिछड़े वर्गों की पहचान का दायित्य संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत भविष्य में गठित होने वाले आयोग के जिम्मे छोड़ दिया गया था।
मंडल कमीशन की रिपोर्ट 1980 में ही सरकार को सौंप दी गई थी, लेकिन 10 वर्ष बाद 7 अगस्त, 1990 को वी.पी. सिंह के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने इसकी एक सिफारिश सरकारी सेवाओं में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण को लागू करने की घोषणा की। सुप्रीम कोर्ट ने इसे स्थगित कर दिया। दो वर्ष बाद कुछ प्रतिबंधों के साथ लागू करने के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया। 1993 में इसे लागू करने का नोटिफिकेशन केंद्र सरकार ने जारी किया।
उच्च शैक्षणिक संस्थानों में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था 2006 में लागू हुई। इसी संदर्भ में 93वां संविधान संशोधन अधिनियम पारित हुआ। 2008 में केंद्र सरकार द्वारा स्थापित, संचालित या वित्तीय सहायता प्राप्त केंद्रीय शैक्षिक संस्थानों में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण प्रवेश के मामले में लागू हुआ।
[2] अनुसूचित जातियों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में आरक्षित सीटें पहली बार 1932 के पूना पैक्ट के तहत मिल गई थीं। यह पैक्ट गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस और डॉ. आंबेडकर और उनके साथियों के साथ समझौते के तहत हुआ था। 16 अगस्त, 1932 को ब्रिटिश सरकार ने दलितों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल और आरक्षित सीटें देने की घोषणा की थी। पूना पैक्ट के बाद पृथक निर्वाचक मंडल की जगह संयुक्त निर्वाचक मंडल के तहत दलितों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में आरक्षित सीटें प्राप्त हुईं। 1937 के विधान मंडल चुनावों में दलितों को आरक्षित राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्राप्त हो गया। कुछ प्रदेशों में सरकारी नौकरियों में एक निश्चित अनुपात में आरक्षण प्राप्त हुआ। केंद्रीय स्तर पर दलितों को 1942 में ही सरकारी नौकरियों में आरक्षण प्राप्त हो गया।
अनुसूचित जनजातियों को संविधान में एक ही साथ सरकारी सेवाओं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में आरक्षण प्राप्त हुआ। इसके पहले उन्हें आरक्षण या आरक्षित सीटें प्राप्त नहीं थीं, जबकि जैसा कि जिक्र किया जा चुका है, अनुसूचित जातियों को 1932 में आरक्षण या आरक्षित सीटें प्राप्त हो गई थीं, लेकिन जनसंख्या के अनुपात में राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सरकारी सेवाओं में आरक्षण संविधान सभा ने प्रदान किया।
वर्तमान समय में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को केंद्रीय स्तर पर उनकी जनसंख्या के अनुपात में राजनीतिक प्रतिनिधित्व, सरकारी सेवाओं/ नौकरियों और उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के मामले में उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण प्राप्त है। राज्यों में भी इन दोनों समुदायों को उस राज्य में इनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण प्राप्त है।
[3] सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार 1962 में एम.आर. बालाजी बनाम मैसूर राज्य मामले में आरक्षण के बारे में यह निर्णय दिया था कि आरक्षण की सीमा सामान्यत: 50 प्रतिशत से कम होनी चाहिए। यह निर्णय तब आया जब मैसूर राज्य (वर्तमान कर्नाटक) ने शैक्षणिक संस्थाओं में 68 प्रतिशत आरक्षण दिया था। सुप्रीमकोर्ट ने इसे असंवैधानिक ठहराया। आरक्षण संबंधी कई अन्य मामलों की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 50 प्रतिशत सीमा के निर्णय को दोहराया। हालांकि हम जानते हैं कि ईडब्ल्यूएस को आरक्षण देने के बाद कुल आरक्षण 60 प्रतिशत हो चुका है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे आरक्षण की तय सीमा (50 प्रतिशत) का उल्लंघन नहीं माना।
मंडल आयोग ने इस निर्णय को ध्यान में रखते हुए ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की ही सिफारिश की। हालांकि आयोग ने स्वयं अपनी सिफारिश में यह कहा है कि यह मजबूरी में की गई सिफारिश है।
[4] तमिलनाडु (50 प्रतिशत), पुडुचेरी (34 प्रतिशत), केरल (40 प्रतिशत), आंध्र प्रदेश (29 प्रतिशत), अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह (38 प्रतिशत), बिहार (33 प्रतिशत) और कर्नाटक (32 प्रतिशत) में ओबीसी के लिए आरक्षण 27 प्रतिशत से अधिक हैं।
[5] ओबीसी के लिए पदोन्नति में आरक्षण कोई आरक्षण नहीं है। कुछ शर्तों के साथ अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए पदोन्नति में आरक्षण का प्रावधान है।
[6] अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की तरह उम्र में छूट की मंडल आयोग की सिफारिश स्वीकार नहीं की गई। हां, कुछ छूट जरूर मिली। अधिकतम आयु सीमा में 3 वर्ष की छूट है। नौकरियों के लिए प्रयासों में भी कुछ-कुछ छूट हैं, जैसे कि यूपीएसी में सामान्य वर्ग को 6 प्रयास का अवसर मिलता है, तो ओबीसी के लिए 9 प्रयासों के अवसर प्राप्त हैं। हालांकि अलग-अलग मामलों में अलग-अलग नियम हैं। विभिन्न राज्यों में भी इसके लिए अलग-अलग नियम हैं।
[7] वर्तमान लोकसभा में ओबीसी सदस्यों की कुल संख्या करीब 138 है। यानि कुल लोकसभा सदस्यों का करीब 25 प्रतिशत, जबकि ओबीसी की आबादी कम-से-कम 50 प्रतिशत है। मतलब साफ है कि उन्हें अपनी आबादी की तुलना में आधा ही प्रतिनिधित्व प्राप्त है। इसके विपरीत द्विज-सवर्ण जातियों के लोकसभा सदस्यों की संख्या करीब 140 है, जबकि इनकी आबादी देश की कुल आबादी का अधिक से अधिक 15 प्रतिशत है। वह भी तब जब हम इसमें मुस्लिम अपर कास्ट (शेख, सैयद और पठान) को भी शामिल करके देखते है। चूंकि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण प्राप्त है, इसके चलते उन्हें अपनी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व प्राप्त है। आजादी के बाद के कई लोकसभाओं में तो ओबीसी का लोकसभा में प्रतिनिधित्व 10 प्रतिशत या उससे भी कम था।
(संपादन : नवल/अनिल)