भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबनाओं में एक यह है कि जिस समाज में जाति व्यक्ति की सामाजिक स्थिति, सम्मान, पेशे, विवाह, राजनीतिक संबंध और अनेक मामलों में आर्थिक अवसरों तक को प्रभावित करती रही, उसकी राजनीति को लंबे समय तक केवल आर्थिक वर्गों के संघर्ष के रूप में समझने की कोशिश की गई। भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन की वैचारिक शक्ति और उसके अनेक ऐतिहासिक संघर्षों के बावजूद जाति और वर्ग के अंतर्संबंध को पर्याप्त गहराई से न समझ पाना उसकी बड़ी सीमाओं में रहा। बिहार इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है।
बिहार की ग्रामीण सामाजिक संरचना में भूमि, श्रम, जाति और सत्ता एक-दूसरे से गहरे जुड़े रहे हैं। यह भी देखना जरूरी है कि सामाजिक सम्मान किसके पास है, प्रशासन और शिक्षा के अवसर किसके पास हैं और राजनीतिक सत्ता तक किसकी पहुंच है। जाति और वर्ग हमेशा एक-दूसरे के पर्याय नहीं रहे, लेकिन बिहार में वे लंबे समय तक एक-दूसरे को मजबूत करने वाली संरचनाएं रहे। यहीं डॉ. राममनोहर लोहिया और बाद में जगदेव प्रसाद की राजनीति महत्वपूर्ण हो जाती है। लोहिया ने भारतीय समाज में जाति की विशिष्ट भूमिका को समझते हुए पिछड़ों की सत्ता में हिस्सेदारी का प्रश्न उठाया। जगदेव प्रसाद ने उस प्रश्न को और अधिक आक्रामक राजनीतिक रूप दिया। लोहिया का नारा था—“पिछड़ा पावे सौ में साठ”, जबकि जगदेव प्रसाद ने इसे आगे बढ़ाते हुए कहा—“सौ में नब्बे भाग हमारा है, नब्बे पर दस का शासन नहीं चलेगा।” इन दोनों नारों के बीच भारतीय सामाजिक न्याय की राजनीति के विकास की एक पूरी कहानी छिपी हुई है।
लोहिया का ‘साठ’ और जगदेव का ‘नब्बे’
लोहिया के लिए पिछड़ा प्रश्न महज चुनावी प्रतिनिधित्व का प्रश्न नहीं था। वह भारतीय समाज में सदियों से चली आ रही सामाजिक असमानता को राजनीतिक शक्ति के पुनर्वितरण से जोड़कर देखते थे। उनका प्रसिद्ध सूत्र—“पिछड़ा पावे सौ में साठ”—सत्ता और संस्थानों में पिछड़े वर्गों की पर्याप्त भागीदारी की मांग था। लेकिन सवाल यह है कि 1967 में जब बिहार में पहली बार कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती देकर गैर-कांग्रेसी सरकार बनी, तब क्या समाजवादी राजनीति ने अपने घोषित सामाजिक न्याय के सिद्धांत को व्यवहार में उतारा? यहीं जगदेव प्रसाद का विद्रोह सामने आता है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार 1967 की गैर-कांग्रेसी सरकार में पिछड़े वर्गों को अपेक्षित राजनीतिक प्रतिनिधित्व न मिलने से जगदेव प्रसाद असंतुष्ट हुए। उन्होंने लोहिया की समाजवादी राजनीति से उम्मीद की थी कि सत्ता-संरचना में पिछड़ों को वास्तविक हिस्सेदारी मिलेगी, लेकिन सरकार के गठन में वह अपेक्षा पूरी नहीं हुई। इस प्रसंग का महत्व इसलिए है कि यहां जगदेव प्रसाद ने समाजवादी राजनीति के भीतर मौजूद एक अंतर्विरोध को चुनौती दी—सामाजिक न्याय का नारा और सत्ता के सामाजिक चरित्र में अंतर। यही वह बिंदु था जहां जगदेव प्रसाद ने केवल समाजवादी विचारधारा को दोहराने के बजाय उसकी व्यावहारिक परीक्षा शुरू की। उनकी राजनीति का संदेश साफ था कि यदि सत्ता के दरवाजे पर पिछड़ों के लिए जगह नहीं है तो केवल समाजवाद का नाम लेने से सामाजिक परिवर्तन नहीं होगा। यहीं से “साठ” का प्रश्न “नब्बे” की अधिक उग्र राजनीतिक भाषा में बदलता है। ‘नब्बे’ केवल संख्या नहीं, सत्ता-संबंधों की चुनौती थी।
जगदेव प्रसाद का नारा—“सौ में नब्बे भाग हमारा है, नब्बे पर दस का शासन नहीं चलेगा”—भारतीय राजनीति में प्रतिनिधित्व की बहस को एक तीखा मोड़ देता है। यह नारा उस समय की सामाजिक संरचना के बारे में एक राजनीतिक निष्कर्ष था। जगदेव प्रसाद का तर्क था कि यदि समाज का बड़ा हिस्सा सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित है, तो शासन, प्रशासन, शिक्षा, भूमि और आर्थिक संसाधनों पर एक छोटे सामाजिक समूह का असमान नियंत्रण लोकतांत्रिक नहीं माना जा सकता। इसलिए उन्होंने अपने संघर्ष को तीन शब्दों में समेटा— धन, धरती और राजपाट। यह सूत्र अत्यंत महत्वपूर्ण है। “धन” आर्थिक शक्ति का प्रतीक था।
“धरती” भूमि और उत्पादन के साधनों का। “राजपाट” राजनीतिक सत्ता का। अर्थात जगदेव प्रसाद की सामाजिक न्याय की अवधारणा केवल सरकारी नौकरियों में आरक्षण तक सीमित नहीं थी। वह आर्थिक संसाधनों और राजनीतिक सत्ता के पुनर्वितरण की भी मांग करती थी। यही कारण है कि आज जगदेव प्रसाद को केवल पिछड़े वर्ग की राजनीति के एक नेता के रूप में पढ़ना उनके राजनीतिक विचार को छोटा करना होगा।
जगदेव प्रसाद : ‘बिहार का लेनिन’
जगदेव प्रसाद को लोकप्रिय रूप से “बिहार का लेनिन” कहा गया। यह उपमा किसी औपचारिक राजनीतिक पदवी की तरह नहीं, बल्कि उनकी संघर्षशील राजनीतिक शैली और शोषण की संरचना को समझने की क्षमता के संदर्भ में इस्तेमाल होती है। उनके विचारों को सामाजिक न्याय, जाति-विरोध और आर्थिक-सामाजिक बराबरी के सवालों से जोड़कर देखा गया है। लेकिन इस उपमा का अर्थ समझने के लिए एक सावधानी जरूरी है। जगदेव प्रसाद को लेनिन का भारतीय संस्करण मान लेना ऐतिहासिक सरलीकरण होगा। भारतीय जाति-व्यवस्था और यूरोपीय औद्योगिक वर्ग-संरचना एक जैसी नहीं थीं। जगदेव प्रसाद की विशिष्टता इसी में थी कि उन्होंने भारतीय समाज की अपनी संरचना में शोषण को समझने की कोशिश की। उनके सामने प्रश्न था— यदि किसी व्यक्ति की गरीबी केवल उसकी आर्थिक स्थिति का परिणाम नहीं, बल्कि उसकी जातिगत स्थिति से भी जुड़ी है, तो केवल वर्ग-संघर्ष की भाषा उसके अनुभव को कैसे व्यक्त करेगी? यह प्रश्न आज भी प्रासंगिक है।
वाम राजनीति की सीमा
यह कहना उचित नहीं होगा कि बिहार में वाम राजनीति केवल इसलिए कमजोर हुई कि उसने जाति को नहीं समझा। वाम दलों ने भूमिहीनता, मजदूरी, भूमि-संबंध, सामंती हिंसा और गरीब किसानों-मजदूरों के प्रश्न पर लंबे और कठिन संघर्ष किए। बिहार के अनेक इलाकों में इन संघर्षों का महत्वपूर्ण इतिहास है। लेकिन समस्या कहीं अधिक सूक्ष्म थी। जाति और वर्ग को एक-दूसरे के विकल्प की तरह देखना ही समस्या थी।
किसान गरीब हो सकता है, लेकिन वह जातिगत रूप से प्रभुत्वशाली भी हो सकता है। खेत मजदूर आर्थिक रूप से गरीब हो सकता है और साथ ही सामाजिक रूप से भी वंचित। इसी तरह पिछड़ी जातियों के भीतर भी आर्थिक असमानता हो सकती है। बिहार में बाद के दशकों में पिछड़ी जातियों के भीतर से अपेक्षाकृत संपन्न और प्रभावशाली समूह उभरे। इससे स्पष्ट हुआ कि “पिछड़ा” कोई एकसमान आर्थिक वर्ग नहीं है। क्रिस्टोफ जैफरलो ने उत्तर भारत में पिछड़ी जातियों के राजनीतिक उभार को एक व्यापक “मौन क्रांति” के रूप में देखा है—एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें लंबे समय तक राजनीतिक रूप से हाशिये पर रहे समुदाय सत्ता और प्रतिनिधित्व के केंद्र की ओर बढ़े। उनके अध्ययन में बिहार इस परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इसलिए सही सवाल यह नहीं है कि जाति महत्वपूर्ण है या वर्ग। सही सवाल यह है— भारतीय समाज में जाति किस तरह वर्ग-संबंधों को प्रभावित करती है और वर्गीय स्थिति किस तरह जातिगत सत्ता को बदलती है? जगदेव प्रसाद की राजनीति को इसी दृष्टि से पढ़ना अधिक उपयोगी होगा।
जगदेव प्रसाद सामाजिक वर्चस्व के धार्मिक और सांस्कृतिक आधारों की भी आलोचना करते थे। उनके लिए सामाजिक मुक्ति का अर्थ केवल आर्थिक सुधार नहीं था। यदि सामाजिक सम्मान, ज्ञान, धार्मिक अधिकार और सांस्कृतिक प्रतिष्ठा पर किसी विशेष समूह का वर्चस्व बना रहता है, तो आर्थिक अवसरों में परिवर्तन भी अधूरा रहेगा। यह दृष्टि उन्हें उस व्यापक भारतीय परंपरा से जोड़ती है जिसमें जोतीराव फुले, पेरियार, डॉ. आंबेडकर, लोहिया और अन्य सामाजिक परिवर्तनकारी विचारकों ने जातिगत वर्चस्व की आलोचना की। हालांकि इन सभी विचारकों की वैचारिकी एक जैसी नहीं थी, लेकिन एक साझा प्रश्न जरूर था— समानता केवल कानून में होगी या समाज की वास्तविक संरचना में भी?
कर्पूरी ठाकुर, बी.पी. मंडल और जगदेव प्रसाद की विरासत
बिहार में पिछड़ी जातियों की राजनीति का इतिहास किसी एक नेता से शुरू नहीं होता और न ही किसी एक नेता पर समाप्त होता है। कर्पूरी ठाकुर, बी.पी. मंडल, जगदेव प्रसाद और बाद के अनेक नेताओं ने अलग-अलग परिस्थितियों में इस राजनीति को आगे बढ़ाया। बी.पी. मंडल स्वयं बिहार के मुख्यमंत्री रहे और बाद में दूसरे पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष बने। मंडल आयोग ने सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन को पहचानने के लिए व्यवस्थित मानदंड विकसित किए और उसकी सिफारिशों ने आगे चलकर भारत की आरक्षण राजनीति को निर्णायक रूप से प्रभावित किया। इसलिए जगदेव प्रसाद को मंडल राजनीति का प्रत्यक्ष निर्माता कहना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा। लेकिन यह कहना उचित है कि जिस राजनीतिक चेतना ने पिछड़े वर्गों की हिस्सेदारी को बिहार की राजनीति के केंद्रीय प्रश्नों में बदला, उसमें जगदेव प्रसाद की भूमिका महत्वपूर्ण है। लोहिया ने प्रश्न उठाया, तो जगदेव प्रसाद ने उसे संघर्ष का नारा बनाया और कर्पूरी ने उसे प्रशासनिक-सामाजिक नीति से जोड़ा तथा मंडल आयोग ने उसे संस्थागत तर्क और आंकड़ों का आधार दिया और 1990 के दशक की राजनीति ने लालू प्रसाद एवं मुलायम सिंह के नेतृत्व में उसे व्यापक चुनावी शक्ति में बदल दिया।
मंडल के बाद : सत्ता बदली, क्या समाज भी बदला?
1990 के दशक में मंडल की राजनीति ने भारतीय लोकतंत्र की सामाजिक संरचना बदल दी। उत्तर भारत में पिछड़ी जातियों का राजनीतिक आत्मविश्वास बढ़ा। बिहार में लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में सामाजिक न्याय की राजनीति सत्ता के केंद्र में आई। बाद में नीतीश कुमार ने अति पिछड़े वर्गों और अन्य सामाजिक समूहों को केंद्र में रखते हुए सामाजिक गठबंधन की नई राजनीति विकसित की। राजनीतिक दृष्टि से यह परिवर्तन ऐतिहासिक था। क्रिस्टोफ जैफरलो इसे निचली जातियों के राजनीतिक उभार और भारतीय लोकतंत्र के गहरे सामाजिककरण के रूप में देखते हैं। लेकिन यहां जगदेव प्रसाद का प्रश्न फिर लौटता है— राजपाट में हिस्सेदारी मिलने के बाद धन और धरती का क्या हुआ? यही वह जगह है जहां सामाजिक न्याय की राजनीति का गंभीर मूल्यांकन आवश्यक है। प्रतिनिधित्व बढ़ा, लेकिन क्या भूमि का वितरण पर्याप्त रूप से बदला? पिछड़ी जातियों के अनेक समूह राजनीतिक रूप से शक्तिशाली हुए, लेकिन क्या सभी अति पिछड़े समुदाय उसी अनुपात में आगे बढ़े? दलितों की राजनीतिक आवाज बढ़ी, लेकिन क्या भूमिहीनता और सामाजिक हिंसा की समस्या समाप्त हुई? और सबसे महत्वपूर्ण— क्या सामाजिक न्याय का राजनीतिक विमर्श धीरे-धीरे जातीय प्रतिनिधित्व की गणित तक सीमित नहीं हो गया? इन प्रश्नों का उत्तर आसान नहीं है
बिहार की जाति-गणना ने जगदेव के सवाल को फिर जीवित कर दिया है। 2023 में बिहार सरकार द्वारा जारी जाति-आधारित सर्वेक्षण ने सामाजिक न्याय की बहस को नए आंकड़े दिए। सर्वेक्षण के अनुसार बिहार की आबादी में अत्यंत पिछड़ा वर्ग 36.01 प्रतिशत और पिछड़ा वर्ग 27.12 प्रतिशत था—दोनों को मिलाकर लगभग 63.13 प्रतिशत। अनुसूचित जातियों की हिस्सेदारी 19.65 प्रतिशत और अनुसूचित जनजातियों की 1.68 प्रतिशत बताई गई, जबकि अनारक्षित श्रेणी 15.52 प्रतिशत थी। इन आंकड़ों ने एक पुराना सवाल फिर सामने ला दिया— जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी—लेकिन भागीदारी किसमें? केवल विधानसभा और संसद में? सरकारी नौकरियों में? विश्वविद्यालयों में? भूमि के स्वामित्व में? व्यवसाय में?न्यायपालिका और उच्च प्रशासन में? मीडिया और ज्ञान-उत्पादन में? ठेकेदारी और पूंजी में?
यदि “हिस्सेदारी” को केवल चुनावी टिकट और मंत्री पद तक सीमित कर दिया जाए, तो जगदेव प्रसाद के “धन, धरती और राजपाट” का अर्थ अधूरा रह जाएगा। पिछड़ों के भीतर भी एक नया सवाल : कौन पिछड़ा? सामाजिक न्याय की राजनीति की सबसे कठिन परीक्षा अब यही है। “पिछड़ा” कोई एकरूप समुदाय नहीं है। पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियों के बीच भी शिक्षा, भूमि, आय, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सरकारी योजनाओं तक पहुंच में अंतर है। बिहार में अति पिछड़ा वर्ग की आबादी 36 प्रतिशत से अधिक बताई गई है, लेकिन क्या राजनीतिक सत्ता और सामाजिक न्याय के लाभों में उसकी हिस्सेदारी उसी अनुपात में है?
यही कारण है कि आज सामाजिक न्याय की बहस को प्रतिनिधित्व से आगे बढ़ाकर वितरण के प्रश्न तक ले जाना होगा। किसे टिकट मिला—यह महत्वपूर्ण है। लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है— किसके बच्चे अच्छे विद्यालय में पढ़ रहे हैं?
किसके पास जमीन है? किसके पास पूंजी है? किसके पास स्थायी रोजगार है? किसके पास राजनीतिक और प्रशासनिक नेटवर्क है? किसके पास ज्ञान और सूचना की ताकत है? सामाजिक न्याय का अगला चरण इन्हीं सवालों से तय होगा।
जगदेव प्रसाद की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिन्हें व्यापक शोषित समाज की आवाज के रूप में पढ़ा जाना चाहिए, उन्हें कई बार जाति-विशेष के नेता में सीमित कर दिया जाता है। यह केवल जगदेव प्रसाद के साथ नहीं हुआ। भारतीय सामाजिक न्याय की राजनीति में यह एक व्यापक प्रवृत्ति रही है। जब कोई सामाजिक परिवर्तनकारी नेता अपनी जाति से निकलकर व्यापक समाज का नेता बनता है, तो बाद की राजनीति उसे फिर उसकी जाति के दायरे में बंद कर देती है। यह प्रक्रिया राजनीतिक रूप से सुविधाजनक है, लेकिन वैचारिक रूप से घातक। जगदेव प्रसाद यदि केवल अपनी जाति के नेता होते तो उनका नारा “धन, धरती और राजपाट” इतना व्यापक अर्थ नहीं रखता। उनका मूल प्रश्न था—सत्ता और संसाधनों पर किसका अधिकार है? और यही प्रश्न आज भी जीवित है।
‘सामाजिक न्याय’ बनाम ‘जातीय गणित’
आज सामाजिक न्याय की राजनीति के सामने एक बड़ा खतरा है—वह सामाजिक परिवर्तन की विचारधारा से हटकर केवल चुनावी जातीय गणित में बदल जाए। जातीय गणित लोकतंत्र का यथार्थ है, लेकिन सामाजिक न्याय उसका अंतिम लक्ष्य नहीं। यदि किसी दल का उद्देश्य केवल किसी जाति का वोट बैंक बनाना है, तो वह जगदेव प्रसाद की राजनीति का उत्तराधिकारी नहीं हो सकता। यदि किसी नेता की राजनीति में सत्ता में आने के बाद वही गरीब, भूमिहीन, खेत मजदूर और वंचित समुदाय फिर हाशिये पर चले जाते हैं, तो केवल जातीय पहचान उसे सामाजिक न्याय का नेता नहीं बना देती। यही वह कसौटी है जिस पर पिछले तीन-चार दशकों की बिहार की राजनीति का मूल्यांकन होना चाहिए। बिहार में पिछड़े वर्गों की राजनीतिक शक्ति में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। इस परिवर्तन को कम करके आंकना इतिहास के साथ अन्याय होगा। लेकिन प्रतिनिधित्व की उपलब्धि को सामाजिक-आर्थिक समानता की उपलब्धि मान लेना भी उतनी ही बड़ी भूल होगी। समकालीन अध्ययनों में भी बिहार की राजनीति में सामाजिक प्रतिनिधित्व बढ़ने के साथ-साथ असमानता, शासन और विकास के प्रश्नों के बने रहने की ओर संकेत किया गया है।
धर्म, जाति और राजनीतिक चेतना
जगदेव प्रसाद की राजनीति का एक और महत्वपूर्ण पहलू था—सामाजिक चेतना का प्रश्न। सदियों से वंचित समाज को केवल राजनीतिक वोटर बना देना पर्याप्त नहीं है। लोकतंत्र में वास्तविक मुक्ति तभी संभव है जब वह व्यक्ति को नागरिक के रूप में अपने अधिकारों का बोध कराए। यदि कोई गरीब व्यक्ति राजनीतिक रूप से केवल इसलिए वोट देता है कि उम्मीदवार उसकी जाति का है, तो उसकी राजनीतिक चेतना अभी अधूरी है। लेकिन यदि वह पूछता है— मेरे बच्चे को शिक्षा क्यों नहीं मिली? मेरे गांव में अस्पताल क्यों नहीं है? मेरे पास जमीन क्यों नहीं है? मेरी मजदूरी इतनी कम क्यों है? मेरी जाति के लोग प्रशासन में इतने कम क्यों हैं? महिलाओं को समान अवसर क्यों नहीं मिलता? धर्म और जाति के नाम पर मेरी राजनीतिक चेतना को क्यों नियंत्रित किया जाता है? तो राजनीति का स्तर बदल जाता है। जगदेव प्रसाद की राजनीति को इसी व्यापक नागरिक चेतना की राजनीति के रूप में पुनर्पाठ की जरूरत है।
आज जगदेव प्रसाद होते तो वे क्या पूछते? यह एक काल्पनिक प्रश्न है, लेकिन इतिहास को वर्तमान से जोड़ने के लिए उपयोगी है। संभवतः वे पूछते—बिहार की आबादी में पिछड़े और अति पिछड़े 63 प्रतिशत से अधिक हैं; फिर भी आर्थिक शक्ति का वितरण कैसा है?
वे पूछते— राजपाट में हिस्सेदारी बढ़ी, लेकिन धन और धरती में कितनी बढ़ी?
वे पूछते— पिछड़ों के भीतर जो सबसे गरीब हैं, उन्हें सामाजिक न्याय का कितना लाभ मिला?
वे पूछते— दलितों और अति पिछड़ों के बीच सामाजिक न्याय की साझी राजनीति क्यों कमजोर हुई?
वे पूछते— सत्ता में पहुंचने के बाद सामाजिक न्याय की राजनीति ने शिक्षा, भूमि-सुधार, स्वास्थ्य, रोजगार और आर्थिक लोकतंत्र को कितनी प्राथमिकता दी?
और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न— क्या शोषित समाज राजनीतिक रूप से इतना सक्षम हो गया है कि वह अपनी ही जाति के नेता से भी सवाल पूछ सके? यदि नहीं, तो लोकतांत्रिक चेतना अभी अधूरी है।
जगदेव प्रसाद की विरासत
जगदेव प्रसाद का “नब्बे” आज एक नए अर्थ की मांग करता है। आज “नब्बे” को केवल जातियों की संख्या के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं। यह नब्बे प्रतिशत लोगों के अधिकार, सम्मान, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, भूमि, ज्ञान और राजनीतिक शक्ति का प्रश्न होना चाहिए। सामाजिक न्याय का अगला चरण केवल यह नहीं पूछे कि किस जाति के कितने विधायक हैं। उसे यह भी पूछना चाहिए—कितने भूमिहीन परिवारों के पास जमीन आई? कितने गरीब बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिली? कितने युवाओं को सम्मानजनक रोजगार मिला? कितनी महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता मिली? कितने अति पिछड़े परिवार सत्ता की वास्तविक संरचनाओं में पहुंचे? कितने दलित और आदिवासी परिवार सामाजिक अपमान से मुक्त होकर जीवन जी पा रहे हैं?
यही वे प्रश्न हैं जो सामाजिक न्याय के नारे और राजनीति तथा “राजपाट” को वास्तविक लोकतंत्र में बदल सकते हैं।
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