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महिलाओं की आज़ादी से क्यों डरते हैं पुरुष?

आम तौर पर पुरुषों को सिद्धांत और अवधारणा के स्तर पर महिलाओं की आज़ादी से कोई शिकायत या परेशानी नहीं होती। मगर वे महिलाओं की आज़ादी से डरते इसलिए हैं क्योंकि उसके चलते उन्हें अपने में बदलाव लाने होते हैं। उन्हें प्रभुत्व, पुरुषत्व, परिवार में विभिन्न सदस्यों की भूमिका, यौनिकता, प्रतिष्ठा, सम्मान, और यहां तक कि प्रेम की भी, अपनी समझ को बदलना होता है। बता रहे हैं विकास शमशेर

हाल में मैंने पुणे में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी का भाषण सुना। उनके भाषण की खूब चर्चा हुई, विशेषकर इसलिए क्योंकि उन्होंने ‘मनुस्मृति’ की जम कर आलोचना की और महिलाओं से आह्वान किया कि वे पितृसत्तात्मक ढांचों को चुनौती दें, खुद को कैद करने वाली परंपराओं को तोड़ें और अपनी स्वतंत्र पहचान विकसित करें।

आप चाहे राहुल गांधी या उनकी राजनीति को पसंद करते हों या नहीं, मगर इससे कोई इंकार नहीं कर सकता कि उन्होंने अपने भाषण में हम सभी – विशेषकर पुरुषों – के सामने कुछ मूलभूत प्रश्न उपस्थित किए। मसलन, आखिर क्या कारण है कि आजादी के करीब 80 साल बाद भी हमारे देश में महिलाएं अपने परिवारों और समुदाय में हिंसा का शिकार हो रही हैं? क्या कारण है कि महिलाओं को सामाजिक और सार्वजनिक जीवन में सुरक्षित, सम्मानपूर्ण और गरिमामय मुकाम हासिल करने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता है? क्या कारण है कि राजनीतिक संगठनों और संवैधानिक संस्थाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व आज भी पुरुषों की तुलना में बहुत कम है?

यह केवल आंकड़ों का सवाल नहीं है। इंटरनेट के जरिए महिलाओं के खिलाफ हिंसा, राजनीतिक संस्थाओं में उनके प्रतिनिधित्व, रोजगार और शिक्षा से संबंधित आंकड़े चुटकियों में हासिल किए जा सकते हैं। असल सवाल थोड़ा टेढ़ा है। और वह यह है कि संविधान प्रदत्त अधिकारों, ढेर सारे कानूनों, शिक्षा के प्रसार और महिलाओं की समानता पर दशकों से हो रहे सार्वजनिक विमर्श के बाद भी महिलाओं के हालात ऐसे क्यों बने हुए हैं?

मैं इस पूरे मसले को तनिक अलग परिप्रेक्ष्य से देखना चाहूंगा। जब महिलाओं की स्वतंत्रता, स्वायत्तता और समानता पर चर्चा होती है तो हम पुरुष असहज क्यों महसूस करते हैं? क्या कारण है कि असल मायनों में आजाद महिला हम पुरुषों में घबराहट, चिंता और कभी-कभी गुस्से का भाव जगाती है? क्या कारण है कि यह उन पुरुषों के मामले में भी होता है जो दिल से यह मानते हैं कि महिलाएं देश की बराबर की नागरिक हैं?

यह विरोधाभास जितना महत्वपूर्ण नजर आता है, उससे भी कहीं ज्यादा महत्व रखता हैं। हमने संविधान पढ़ा है। समानता क्या होती है, यह हमें मालूम है। हम शिक्षा, विज्ञान, राजनीति, खेल और सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की उपलब्धियों की सराहना करते हैं। हम बार-बार दोहराते हैं कि नागरिक के रूप में महिलाओं का दर्जा पुरुषों से कमतर नहीं है। हम संवैधानिक और राजनीतिक संस्थाओं में उनकी भागीदारी का समर्थन करते हैं। हम में से कई अपने आपको इसलिए प्रगतिशील मानते हैं क्योंकि हम यह स्वीकार करते हैं कि महिलाओं को अपने हिसाब से जीने और अपनी राय व्यक्त करने का पूरा हक है।

मगर हमारा रोजाना का व्यवहार हमारी इन मान्यताओं से मेल नहीं खाता। कोई पुरुष, महिला शिक्षा का जबरदस्त हामी हो सकता है, मगर जब उसके परिवार की कोई महिला घर से दूर रहकर पढ़ाई करना चाहे तो उसे यह अच्छा और औचित्यपूर्ण नहीं लगता। पुरुष इस बात के तो हामी होते हैं कि महिलाओं को घर के बाहर कामकाज करना चाहिए, मगर वे यह भी चाहते हैं कि महिलाएं अपनी घरेलू जिम्मेदारियों को प्राथमिकता दें। वे महिलाओं की स्वतंत्रता के समर्थक होते हैं, मगर यदि कोई महिला अपने पुरुष परिजनों की मंजूरी के बिना कोई रिश्ता बनाती है, कहीं आती-जाती है या अपनी निजी जिंदगी अपने तरीके से जीती है तो वे अपने मन में उस महिला के प्रति संदेह पाल लेते हैं। इस विरोधाभास से ऐसा लगता है कि महिलाओं के प्रति हमारा दृष्टिकोण केवल हमारी सचेतन सोच से निर्धारित नहीं होता। हमारे परिवार का वातावरण, हमारा सामाजिक अनुभव, हमारी सांस्कृतिक अपेक्षाएं और हमारा मानस किस तरह गढ़ा गया है – ये सब इसका निर्धारण करते हैं।

परिवार समानता की पहली पाठशाला

परिवार वह जगह है, जहां हम सबसे पहले जानते और सीखते हैं कि समानता और असमानता क्या होती है। हम अक्सर मान लेते हैं कि बच्चे को स्कूल भेजने से वह शिक्षित और रोशन-खयाल बन जाएगा। मगर बच्चे जितना किताबें पढ़कर सीखते हैं, उससे कहीं ज्यादा अपने माता-पिता के व्यवहार से सीखते हैं। वे देखते हैं कि घर में फैसले कौन लेता है। वे देखते हैं कि घर में किसकी राय को ज्यादा गंभीरता से लिया जाता है। किसे कहीं भी आने-जाने की इजाजत होती है। किससे हमेशा त्याग की उम्मीद की जाती है और किसकी इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं को अहमियत दी जाती है।

मैंने बचपन से अपने आसपास यह अंतर देखा है। मेरे और पड़ोसी गावों में लड़कों को प्रोत्साहित किया जाता है कि वे उच्च या व्यावसायिक शिक्षा हासिल करने के लिए घर से दूर रहकर पढ़ाई करें। अगर लड़का दूर के किसी शहर में डाक्टरी, इंजीनियरिंग या कोई अन्य व्यवसायिक पाठ्यक्रम में दाखिला लेता है तो पूरा परिवार उसका साथ देता है, उसकी मदद करता है। मगर यह आज़ादी लड़कियों को नहीं मिलती।

लड़कियों से अक्सर अलग किस्म के प्रश्न पूछे जाते हैं। मसलन, तुम जहां पढ़ने जा रही हो क्या वह जगह महफूज़ है? वहां तुम्हारी सुरक्षा कौन करेगा? लोग क्या कहेंगे? तुम्हारी शादी का क्या होगा? यहां परिवार की देखभाल कौन करेगा? यह दरअसल चिंता और प्रेम की शक्ल में बेड़ियां होती हैं। माता-पिता को सचमुच ऐसा लगता है कि वे अपनी लड़कियों को खतरे से बचा रहे हैं, उसका भला कर रहे हैं। परंतु कई बार ज़रूरत से ज्यादा चिंता और सुरक्षा भी नियंत्रण का एक औजार बन जाती है और महिलाओं को अपनी जिंदगी के फैसले स्वयं लेने की आजादी से महरूम कर देती है।

यहीं से लैंगिकता की हमारी समझ विकसित होनी शुरू होती है। लड़के को लगता है कि किसी नई जगह पर जाना, कुछ करने की महत्वाकांक्षा पालना और जोखिम उठाना उसके लिए जरूरी है, उसे यह सब करना चाहिए। दूसरी तरफ लड़की सीखती है कि उसे अपनी पसंद-नापसंद का निर्धारण परिवार की अपेक्षाओं के आधार पर करना चाहिए। बच्चों से कोई यह नहीं कहता कि पुरुष महिलाओं से श्रेष्ठ होते हैं, लेकिन रोज़ाना की जिंदगी के अपने अनुभव से वे यही सीखते और जानते हैं कि महिलाएं निम्न हैं और पुरुष उच्च।

सन् 2021 में आंध्र प्रदेश के तिरुपति में पुलिस विभाग द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में खींचे गए इस छायाचित्र में पुलिस निरीक्षक वाई. श्याम सुंदर अपनी डीएसपी पुत्री वाई जेस्सी प्रशांति को सेल्यूट कर रहे हैं।

पुरुषों का असली डर क्या है?

अब हम इस मसले के मनोवैज्ञानिक आयाम पर आते हैं। पुरुष जानते-बूझते या सचेतन रूप से महिलाओं की आजादी से नहीं डरते। मगर वे तब असहज महसूस करते हैं जब महिलाओं की आजादी पुरुषों की उन भूमिकाओं को चुनौती देती है जिसे वे अपना समझते आए हैं। कई परिवारों में पुरुषों से यह अपेक्षा की जाती है कि अंतिम फैसले वे लें, वे परिवार की सुरक्षा करें और उसके जीवनयापन के लिए जरूरी धन कमाएं। इसके विपरीत, महिलाओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वे गृहस्थी चलाएं, परिवार के सदस्यों की देखभाल करें और परिवार की ‘इज्ज़त’ बनाए रखें।

लेकिन जब इन भूमिकाओं को चुनौती दी जाती है तो पुरुषों को ऐसा लगता है कि उनके अधिकारों पर डाका डाला जा रहा है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हर पुरुष जानते-बूझते महिलाओं पर अपना वर्चस्व कायम करना चाहता है। इसका अर्थ यह है कि हममें से कई ने बड़े होते समय यह सीखा है कि पुरुष को कैसा होना चाहिए और महिलाओं को कैसा होना चाहिए। जब इन धारणाओं को चुनौती मिलती है तो हम असुरक्षित महसूस करते हैं, चिंतित हो जाते हैं और हममें अनिश्चितता का भाव पैदा होता है।

इसलिए महत्वपूर्ण प्रश्न केवल यह नहीं है कि क्या पुरुष बौद्धिक और सैद्धांतिक स्तर पर महिलाओं की समानता का समर्थन करते हैं? महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या हम महिलाओं की स्वायत्तता को बिना यह माने स्वीकार कर सकते हैं कि उससे हमारे अधिकारों, हमारे पुरुषत्व और परिवार में हमारी हैसियत पर चोट लगती है?

परिवार की इज्ज़त का बोझ

भारत में हम यह सब आसानी से देख सकते हैं। महिलाओं से यह अपेक्षा की जाती है कि परिवार और अपने समुदाय की ‘इज्ज़त’ की रक्षा करें। घर की बेटी कैसे कपड़े पहनती है, किससे रिश्ते बनाती है, किससे शादी करती है, कौन-सा करियर चुनती है – यह सब पूरे परिवार के सरोकार बन जाते हैं। पुरुषों के मामले में ऐसा नहीं होता। युवा पुरुषों के संबंधों को भूल या लड़कपन कह कर भुला दिया जाता है, लेकिन युवा लड़की के संबंध परिवार की इज्ज़त से जोड़े जाते हैं।

इन असमान अपेक्षाओं के कारण महिलाएं कठिन परिस्थितियों में फंस जाती हैं। उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी इच्छाओं, अपनी पसंद और यहां तक कि अपनी खुशियों को भी परिवार की ‘इज्ज़त’ की खातिर कुर्बान कर दें। पुरुषों के अवचेतन में यह बात बैठा दी जाती है कि महिलाओं के व्यवहार और उनके कार्यकलापों पर नियंत्रण रखना ज़रूरी है क्योंकि वे परिवार की ‘इज्ज़त’ की प्रतीक हैं। और यह सोच केवल एक व्यक्तिगत मनोवैज्ञानिक समस्या नहीं होती। यह पूरे समाज की सामूहिक सोच होती है और यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्थानांतरित होती रहती है।

हम अपने बच्चों को लैंगिकता के बारे में क्या सिखाते हैं?

इस समस्या का एक अहम कारण है– लैंगिकता से जुड़े मसलों पर हमारी चुप्पी। बच्चों के किशोर होते-होते भारतीय परिवार लड़कियों और लड़कों के बीच संबंधों के बारे में अत्यंत चौकन्ना हो जाते हैं। हम यह प्रयास नहीं करते कि युवावस्था की ओर बढ़ते लड़के-लड़कियां आपस में मिलें, एक-दूसरे के बारे में अपने भावनाओं को जानें, यह समझें कि अंतरंगता क्या होती है और ज़िम्मेदारी से युक्त व्यवहार किस चिड़िया का नाम है। उलटे, हम चुप्पी ओढ़ लेते हैं, उन्हें एक-दूसरे से अलग रखने की जुगत में लगे रहते हैं और उनके ऊपर कई तरह की बंदिशें लगा देते हैं।

नतीजा यह कि लड़के और लड़कियां एक-दूसरे की भावनाओं और यौनिकता की अधकचरी समझ के साथ बड़े होते हैं। जब स्वाभाविक और प्राकृतिक इच्छाओं और भावनाओं को शर्मिंदगी का सबब घोषित कर दिया जाता है, तब क्या होता है? होता यह है कि युवाओं की यौनिकता के बारे में समझ अपने साथियों से बातचीत, सामूहिक सामाजिक सोच और अश्लील साहित्य के ज़रिए विकसित होती हैं न कि एक-दूसरे का सम्मान करने और परस्पर सहमति के बारे में स्वस्थ चर्चा के ज़रिए। इसके कारण अंतरंगता, ज़िम्मेदारी, इच्छाओं और इंकार आदि के बारे में भ्रामक विचार उनमें घर कर जाते हैं। पुरुष, महिलाओं के बारे में ऐसी मान्यताएं पाल लेते हैं जिनका सच्चाई से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं होता। अगर हम ऐसा समाज चाहते हैं जिसमें पुरुष और महिलाएं एक-दूसरे का सम्मान करें तो हमें यौनिकता को एक ऐसा विषय मानना बंद करना होगा जिसे या तो नजरअंदाज़ किया जाए या दबा दिया जाए।

परंपराएं और महिलाओं के बारे में हमारी समझ

धर्म और परंपराओं का महिलाओं की स्थिति से संबंध जटिल है। विभिन्न धर्म और उनकी परंपराएं इनकी अलग-अलग ढंग से व्याख्या करते हैं और इस बारे में गंभीर मतभेद बने रहते हैं कि कोई विशिष्ट परंपरा, पुरुषों और महिलाओं के बीच समानता को बढ़ावा देती है या पुरुषों को ऊंचा और महिलाओं को निम्न दर्जा देती है। यह एक विस्तृत बहस का विषय है और इसमें पड़ने की बजाय हम एक सरल प्रश्न का उत्तर ढूंढ़ने की कोशिश कर सकते हैं। और वह यह कि हम अपनी परंपराओं से महिलाओं के बारे में क्या सीखते हैं?

कई समुदायों में महिलाओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वे पारिवारिक परंपराओं को बनाए रखें, रिश्ते निभाएं, बुजुर्गों की देखभाल करें और परिवार की इज्जत की रक्षा करें। उनकी कुर्बानियों को गुण बताया जाता है। परिवार के सदस्यों की देखभाल करने, अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियां निभाने और परिवार के प्रति वफ़ादारी और प्रतिबद्धता में कुछ भी गलत नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब यह सब करने की अपेक्षा केवल महिलाओं से की जाती है और अगर इसके चलते वे अपनी ज़िंदगी में वह नहीं कर पातीं, जो वह करना चाहती हैं तो उसे जायज़ ठहराया जाता है। अगर कोई महिला अपने परिवार की खातिर अपने सपनों की बलि चढ़ा देती है तो हो सकता है कि उसे कुछ सराहना मिले, लेकिन अगर कोई पुरुष ऐसा करता है तो उसे असाधारण माना जाता है। ऐसी अपेक्षाएं एक तरह की नैतिक असमानता को जन्म देतीं हैं, लेकिन हम उसे देख नहीं पाते क्योंकि वह प्रेम, कर्त्तव्य और परंपरा के परदे के पीछे छुपी रहती है।

संविधान कहता है कि हम सब बराबर हैं, मगर परिवारों में यह कब होगा?

इस प्रश्न के उत्तर में हम केवल पितृसत्तात्मकता को दोषी ठहराकर अपने हाथ नहीं झाड़ सकते। निस्संदेह, पितृसत्तात्मकता का ढांचा हमें महिलाओं की ऐतिहासिक और संरचनात्मक अधीनता को समझने में सहायक हो सकता है। लेकिन यदि हम महिलाओं की अधीनता के लिए केवल पितृसत्तात्मकता को कठघरे में खड़ा कर निवृत्त हो जाएंगे तो हम रोजाना की ज़िंदगी की उन प्रवृत्तियों और प्रक्रियाओं को संदेह का लाभ दे रहे होंगे जो लैंगिक असमानता को बनाए रखने में सहायक हैं।

संवैधानिक समानता केवल एक सिद्धांत है। ज़रूरी यह है कि समाज में सभी लोग समानता हासिल कर सकें, उसे महसूस कर सकें। हम संविधान में यह लिख सकते हैं कि महिलाएं और पुरुष बराबर हैं, हम लैंगिक असमानता को गैर-कानूनी घोषित कर सकते हैं, हम महिलाओं की सुरक्षा के लिए संस्थागत तंत्र स्थापित कर सकते हैं। लेकिन यदि कोई बड़ी होती लड़की यह मान कर चले कि उसके भाई को उससे ज्यादा आज़ादी हासिल होनी चाहिए, क्योंकि वह लड़का है, तो संवैधानिक समानता अधूरी रह जाएगी।

लोकतंत्र केवल संसद, अदालतों और चुनावों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। हमारे घरों में, हमारे परिवारों में भी लोकतंत्र होना चाहिए। हमें अपने-आप से यह पूछना होगा कि क्या हमारे घरों में फैसले लोकतांत्रिक ढंग से लिए जाते हैं? क्या महिलाओं की राय को उतना ही महत्व दिया जाता है जितना पुरुषों की राय को? क्या लड़कियां बिना बेअदब और गुस्ताख कहलाए अपने माता-पिता से असहमत हो सकती हैं? क्या पत्नियां स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकती हैं? क्या लड़कियों और लड़कों को एक-बराबर आज़ादी मिल सकती है? ये प्रश्न भले ही निजी जीवन से जुड़े हुए हों, लेकिन ये सियासी मुद्दे हैं।

क्या पुरुष, महिलाओं की आज़ादी के लिए तैयार हैं?

जिस प्रश्न से हमने शुरुआत की थी, उसका उत्तर बहुत सहज और सरल है। आम तौर पर पुरुषों को सिद्धांत और अवधारणा के स्तर पर महिलाओं की आज़ादी से कोई शिकायत या परेशानी नहीं होती। मगर वे महिलाओं की आज़ादी से डरते इसलिए हैं क्योंकि उसके चलते उन्हें अपने से जुड़ी कई चीज़ें बदलनी पड़ती हैं। उन्हें प्रभुत्व, पुरुषत्व, परिवार में विभिन्न सदस्यों की भूमिका, यौनिकता, प्रतिष्ठा, सम्मान – और यहां तक कि प्रेम की भी – अपनी समझ को बदलना होता है। इसका मतलब यह है कि पुरुषों को यह स्वीकार करना होगा कि महिलाओं की रक्षा करने का अर्थ उनपर नियंत्रण करना नहीं है; उनका ध्यान रखने, उनकी परवाह करने का अर्थ उनकी तरफ से फैसले लेना नहीं है; उनसे प्रेम करने का यह मतलब नहीं है कि आप उनके मालिक हैं।

इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि महिलाओं की आज़ादी को स्वीकार करने का मतलब यह स्वीकार करना है कि महिलाएं केवल मां, पुत्री या पत्नी नहीं है। वे परिवार की इज्ज़त का प्रतीक नहीं हैं। वे एक स्वतंत्र व्यक्ति हैं जिनकी अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं, अपनी चाहतें हैं, अपनी सोच है, अपनी असहमतियां हैं और अपनी जीवन दृष्टि है। कदाचित असली प्रश्न यह नहीं है कि क्या भारतीय महिलाएं आज़ादी के लिए तैयार हैं। वे तो कई पीढ़ियों से आज़ादी मांगती आई हैं। असली प्रश्न यह है कि क्या हम पुरुष, महिलाओं को अपने बराबर स्वीकार करने को तत्पर हैं – बिना यह महसूस किए कि इससे हम कुछ छोटे, कुछ कमतर हो जाएंगे?

एक ऐसा समाज जिसमें महिलाएं और पुरुष दोनों अपनी भावनाओं, अपनी राय, अपनी महत्वाकांक्षाओं और अपनी असहमतियों को बिना किसी भय के व्यक्त कर सकें तो यह केवल महिलाओं के हित में नहीं होगा, बल्कि यह पुरुषों को भी उन अपेक्षाओं से मुक्त करेगा जो पुरुषत्व उन पर लादता है। महिलाओं की आज़ादी को पुरुषों के लिए खतरे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। महिलाओं की आज़ादी एक ऐसा समाज का निर्माण करने का आमंत्रण है जिसमें न तो महिलाओं और न ही पुरुषों को भय, पदक्रम और सामाजिक अपेक्षाओं द्वारा उन पर लाद दी गई पहचानों के अनुरूप अपना जीवन जीना होगा।

(मेरी दादी मां और मेरी मां को समर्पित)

(मूल अंग्रेजी से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

विकास शमशेर

लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली के सेंटर फॉर पोलिटिकल स्टडीज में शोधार्थी हैं। उनकी रुचि भारतीय संविधान, डॉ. बी.आर. आंबेडकर, महात्मा गांधी, सामाजिक मनोविज्ञान, मनोभावनाएं और मानव यौनिकता आदि विषयों में है।

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