बॉलीवुड में जला पहला दलित चिराग

वस्तुत: चिराग “पहले दलित नायक” के रूप में राज्यभिषेक करवाने के लिए तैयार हैं यही कारण है कि उन्होंने अपने दलित सरनेम ‘पासवान’ के साथ ही फिल्म जगत में उतरना जरूरी समझा

दलित हजारों साल से वर्ण-व्यवस्था के कानूनों के तहत शक्ति (आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक) के प्राय: सभी केंद्रों से बहिष्कृत रहे। किंतु बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर के प्रयत्नों से आजाद भारत में उन्हें जो संविधान प्रदत्त अवसर मिले उससे कई क्षेत्रों में उनका बहिष्कार दूर हुआ। इस अवसर का लाभ उठाकर अनेक दलितों ने राजनीति, मेडिकल सांइस, इंजीनियरिंग, साहित्य, पत्रकारिता, अध्यापन इत्यादि के साथ व्यवसाय-वाणिज्य के क्षेत्र में विशिष्ट उपलब्धि हासिल कर राष्ट्र को विस्मित किया। किंतु कई ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ इनका बहिष्कार पूर्ववत है। ऐसा ही एक क्षेत्र है हिंदी सिनेमा, जहाँ दलित लगभग पूरी तरह अस्पृश्य बने हुए हैं। इस क्षेत्र में ऐसा कोई चेहरा नहीं है जिसकी दलित पहचान हो।

विगत डेढ़ दशकों से लेखन के माध्यम से बहुजन आंदोलन से जुड़े रहने के दौरान मैंने अपने साथी लेखकों और एक्टिविस्टों, जो सामान्यतया क्रिकेट और फिल्मों के प्रति उदासीन भाव रखते हैं, में किसी फिल्म विशेष के प्रति ऐसा उत्साह दूसरी बार देखा। पहली बार ऐसा जब्बार पटेल के निर्देशन में बनने वाली फिल्म, ‘डॉ. अंबेडकर’ के लिए हुआ था, जिसकी वे बड़ी आतुरता से प्रतीक्षा करते रहे। पर, भारत सरकार और महाराष्ट्र सरकार के सहयोग से बनने वाली उस फिल्म का व्यवसायिक प्रदर्शन कायदे से न होने के कारण, उन्हें सीडी से ही फिल्म देख कर संतोष करना पड़ता था। उसका मामला ही और कुछ था। दलित उस फिल्म को देखकर बाबसाहेब के प्रति श्रद्धा प्रदर्शित करने के लिए बेचैन थे। लेकिन ‘मिले न मिले हम’ (एमएनएचएम) के पीछे आकर्षण का एक ही कारण रहा और वह था चिराग पासवान की हीरो के रूप में उपस्थिति। उन्हें चिराग की एक्टिंग से कुछ लेना-देना नहीं था। उनके लिए तो इतना ही काफी था कि उनका दलित हीरो देखने में किसी भी हीरो से कम नहीं लगता और वह एक नहीं, तीन-तीन हिरोइनों से रोमांस करता है।

बहरहाल कई अखबारों में इस फिल्म की समीक्षा प्रकाशित हो चुकी है। समीक्षकों ने पति-पत्नी के तनाव के बीच बच्चे की जिंदगी की मुश्किलों को गहराई से समझने की कोशिश करती इस फिल्म को दो-ढाई स्टार दिए हैं। जहाँ तक अभिनेता चिराग पासवान की एक्टिंग का सवाल है, समीक्षकों ने सराहा है। उनके अनुसार पहली फिल्म होने के बावजूद उनके अभिनय में सहजता है। उनकी आवाज अच्छी है और उनमें भरपूर स्टार मैटेरियल है, लेकिन उन्हें अपनी संवाद अदायगी और बॉडी लैंग्वेज पर ध्यान देना होगा। कुल मिलाकर उन्होंने इसे देखी जाने लायक एक औसत फिल्म करार दिया है। प्रचलित समीक्षकीय दृष्टिकोण से यह भले ही औसत दर्जे ही फिल्म हो, सामाजिक प्रतिनिधित्व के लिहाज से एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। यह पहली हिंदी फिल्म है जिसमें कोई दलित नायक की भूमिका में है। हो सकता है इससे पहले भी किसी दलित ने हीरो, डायरेक्टर, गीतकार-संगीतकार इत्यादि के रूप में काम किया हो। भारत की विभिन्न भाषाओं में बननेवाली असंख्य फिल्मों की विभिन्न विधाओं में कुछ दलित भी होंगे।

1911 में जन्मे 35 उपन्यास और शताधिक नाटक और कहानियों के लेखक मशहूर मराठी दलित साहित्यकार अन्ना भाऊ साठे ने कभी बंबइया फिल्मों पर अपनी छाप छोड़ी थी। उनके उपन्यास पर ‘फकीरा’ जैसी हिट फिल्म बनी जिसमें बलराज सहनी और नर्गिस जैसे विख्यात सितारों ने काम किया था। ‘तीसरी कसम’ जैसी राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म के निर्माता और अनगिनत अविस्मरणीय गीतों के रचनाकार शैलेंद्र भी दलित समाज से ही थे। पर इन लोगों ने फिल्मों में मनुवादी प्रभुत्व के डर से हो या खुद को जातिमुक्त प्रमाणित करने की चाह में, अपने नाम के साथ तिवारी, दुबे, वाजपेयी, झा, गुप्ता, सिंह, खान, खन्ना जैसा अपना जाति संकेतक उपनाम नहीं लगाया। इसलिए इनकी जाति अगोचर रही और दलित भी यह सोचकर कुंठित होते रहे कि फिल्मों की ग्लैमरस दुनिया दलितों से पूरी तरह शून्य है। एमएनएमएच ने इस नजरिए से एक इतिहास बनाया है। इस फिल्म में चिराग ने अपने नाम के साथ ‘पासवान’ उपनाम लगाकर छोटे-मोटे रोल में नहीं, नायक के रूप में एंट्री ली है।

बहरहाल, चिराग पासवान अगर बॉलीवुड में नायक के रूप में एंट्री लेने में सफल हो गए हैं तो उसका एक बड़ा कारण यह है कि वे रामविलास पासवान जैसी विराट राजनीतिक हस्ती के पुत्र हैं। साक्षत्कारों में यह पूछे जाने पर कि क्या राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखने के कारण बॉलीवुड में काम पाना आसान रहा, चिराग ने कहा, ‘मुझे यह कहने में हिचक नहीं है कि राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखने के कारण सिर्फ फिल्मों ही नहीं किसी भी क्षेत्र में प्रवेश की राह आसान हो जाती है।’ वस्तुत: चिराग “पहले दलित नायक” के रूप में राज्याभिषेक करवाने के लिए तैयार हैं यही कारण है कि उन्होंने अपने दलित सरनेम ‘पासवान’ के साथ ही फिल्म जगत में उतरना जरूरी समझा तथा विभिन्न साक्षात्कारों में इस सरनेम को अपनी ‘पहचान’ बताया है। इस मामले में गर्मजोशी उनके पिता भी दिखाते हैं। वह कहते हैं कि “पूरे देश में, वंचित तबका गर्व महसूस कर रहा है कि एक ऐसे सुपरस्टार का उदय हो रहा है जो बिना किसी छूट या आरक्षण के सफल हुआ है।” हालाँकि चिराग कहते हैं कि “अंत में बात प्रतिभा पर आकर टिकती है। मैं जाति या धर्म में विश्वास नहीं करता। टेलेंट ही सब कुछ है। मुझे फिल्म इंडस्ट्री ने खुली बाहों के साथ अपनाया है।”

बहरहाल, ऐसी राजनीतिक हस्तियों के सहारे इक्के-दुक्के चिराग ही फिल्मों में प्रवेश कर सकते हैं। ऐसे में फिल्मों में अपने बहिष्कार से आहत दलित समाज अगर चिरागों से फिल्मी दुनिया को जगमगाते देखना चाहता है तो अमेरिका के कालों (अफ्रीकी-अमेरिकियों) में आए बदलाव के कारणों से प्रेरणा लेने से बेहतर कोई विकल्प नहीं हो सकता। कारण, अमेरिका के कालों और भारत के दलितों में काफी साम्यताएँ हैं और कालों ने फिल्म के क्षेत्र में भी अपनी कामयाबी के झंडे गाड़ दिए हैं।

पिछली सदी के सत्तर के दशक में अमेरिका में डाइवर्सिटी नीति लागू हुई, जिसके तहत वहाँ के अश्वेत अल्पसंख्यकों (कालों, रेड इंडियंस, हिस्पैनिक्स, एशियन पैसिफिक मूल के लोगों) की, जिनकी आबादी लगभग 29 प्रतिशत है, सरकारी-निजी क्षेत्र की नौकरियों के साथ सप्लाई, डीलरशीप, ठेकों, ज्ञान उद्योग इत्यादि प्रत्येक क्षेत्र में ही संख्यानुपात में भागीदारी सुनिश्चित की गई। कुछ अंतराल के बाद यह नीति फिल्म-टी.वी. सहित मनोरंजन के अन्यान्य क्षेत्रों में भी लागू हुई।

फिल्मों में डाईवर्सिटी लागू होने के फलस्वरूप इसकी विभिन्न विधाओं — स्क्रिप्ट राइटिंग, टेक्निशीयन, डारेक्शन, एडिटिंग इत्यादि के साथ एक्टिंग के क्षेत्र में भी भारी संख्या में अश्वेतों को अवसर मिलने लगे। अभिनय के क्षेत्र में उन्हें किस परिमाण में मौके मिले इसकी जानकारी समय-समय पर प्रकाशित स्क्रीन एक्टर्स गिल्ड (सैग) की रिपोर्टों में देखा जा सकता है। 2001 की सैग की रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2000 में हॉलीवुड की फिल्मों में 22.9 प्रतिशत रोल अल्पसंख्यकों को मिले। छोटे-बड़े ऐसे रोलों की संख्या 11,930 थी। पिछले वर्ष अर्थात् 1999 में कुल 21.2 प्रतिशत रोल अश्वेतों को मिले थे। 2000 में कुल 22.9 में से 14.8 प्रतिशत रोल सिर्फ कालों को मिले, जिनकी आबादी 13 प्रतिशत है। इसका मतलब यह हुआ कि फिल्मों में डाइवर्सिटी लागू होने के 20—25 साल बाद कालों की अपनी संख्यानुपात में हिस्सेदारी पा ली।

डाईवर्सिटी के रास्ते जब भारी संख्या में अश्वेतों को फिल्मों में प्रवेश का अवसर मिला तो उसका परिणाम 15—20 साल बाद सामने आने लगे। 1990 के दशक में ऑस्कर में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता-अभिनेत्री, सह-अभिनेता-अभिनेत्री की श्रेणी में 19 अश्वेतों का नामांकन हुआ। और 2002 में दो अश्वेतों — डेंजिल वॉशिंगटन ने ‘ट्रेनिंग डेज’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और हैलेबेरी ने ‘मॉन्सटर्स बॉल’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का ऑस्कर पुरस्कार एक साथ जीता। उसके बाद तो हॉलीवुड पर अश्वेत रंग चढ़ता ही गया। आज हूपी गोल्डबर्ग, एंजेला बैसेट, क्यूबा गुडिंग (जू.), एडी मर्फी, डैनी ग्लोवर, क्रिस टकर, रिचर्ड प्रायर जैसे अनेक अमेरिकी दलित एक्टरों की हैसियत अगर श्वेत चर्म सितारों के लिए ईर्ष्या का कारण बन गई है तो उसके मूल में डाइवर्सिटी ही है। अप्रैल 2007 में न्यूजवीक पत्रिका ने कहा था कि विल स्मिथ हॉलीवुड के सबसे शक्तिशाली अभिनेता हैं। अब अगर भारत के दलित किसी बॉलीवुड में चिराग पासवान को उसी स्थान पर देखना चाहते हैं जो हॉलीवुड में अश्वेत विल स्मिथ का है तो उन्हें बॉलीवुड में ढेर सारे चिरागों के रोशन होने का उपाय करना होगा। तब जा कर इन्हीं में से कोई बनेगा दलित विल स्मिथ।

(फारवर्ड प्रेस के जनवरी 2012 अंक में प्रकाशित)


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