क्यों नहीं है बहुजन नायकों के चेहरे पर मुस्कान?

दलितों, दरिद्रों, शोषितों और अछूतों के किसी भी नायक और मसीहा के चेहरे पर मुस्कान नहीं है। मुस्कान अगर है, तो शोषक वर्ग के नायकों के चेहरे पर है। हिन्दुओं के सारे देवताओं के चित्र मुस्कुराते हुए हैं। क्यों? इसलिए की वे शासक वर्ग से आते हैं। वे आजाद हैं, मुस्कुरा सकते हैं

‘फारवर्ड प्रेस’ ने साढ़े तीन साल सफलता के साथ पूरे कर लिए। इसके लिए आपको और आपकी पूरी टीम को हार्दिक बधाई !

यह जानते हुए भी कि आपने फारवर्ड प्रेस में पाठकों के पत्रों का प्रकाशन बंद कर दिया है, हालांकि पत्रों के छपने से पाठकों की भागीदारी बढ़ती है, इसलिए मैं अपनी पाठकीय प्रतिक्रिया आपको भेज रहा हूं।

फारवर्ड प्रेस का जनवरी, 2013 का अंक मेरे सामने है, जिसमें 2013 का कैलेंडर दिया गया है। निस्संदेह यह कैलेंडर बहुजन इतिहास को रेखांकित करता है, जो वस्तुत: प्रशंसनीय है। पर, इस कैलेंडर में एक भूल हो गई है कि इसमें दलित कवि और संत रैदास का जन्मदिवस छूट गया है, जो 25 फरवरी को है।

इस अंक की आवरण कथा सावित्रीबाई फुले पर है-‘सावित्रीबाई कब मुस्कुराएंगी?’ यह लेख इस अंक की निश्वित रूप से एक बड़ी उपलब्धि है। लेकिन मुझे इसके शीर्षक ने बहुत प्रभावित किया है। शायद दलित चिंतन के पूरे इतिहास में यह पहली बार हुआ है, जब बहुजन नायकों की मुस्कान पर विचार किया गया है। इस शीर्षक ने चिंतन की नई खिड़की खोली है। सिर्फ सावित्रीबाई फुले ही नहीं, शोषित समाज के किसी भी नायक के चेहरे पर मुस्कान नहीं है। कबीर, रैदास, जोतिबा फुले, आंबेडकर किसी के भी चेहरे पर मुस्कान नहीं है। क्यों ? क्या ईसा मसीह के चेहरे पर मुस्कान हैै?

दलितों, दरिद्रों, शोषितों और अछूतों के किसी भी नायक और मसीहा के चेहरे पर मुस्कान नहीं है। मुस्कान अगर है, तो शोषक वर्ग के नायकों के चेहरे पर है। हिन्दुओं के सारे देवताओं के चित्र मुस्कुराते हुए हैं। क्यों? इसलिए की वे शासक वर्ग से आते हैं। वे आजाद हैं, मुस्कुरा सकते हैं। बहुजन नायकों और लेखकों के चित्र तो आज भी आपको मुस्कुराते हुए नहीं मिलेंगे। वे ऐसे समाज से आते हैं, जहांं उन्होंने नर्क के सिवाय कुछ नहीं भोगा है। वे कैमरे के सामने कितना ही मुस्कुराने का बनावटी पोज बनाएंं, लेकिन क्लिक होते ही चेहरे पर विषाद आ ही जाता है। ऐसा नहीं है कि हम मुस्कुरा कर पोज नहीं देते हैं, पर हमारी सारी मुस्कान नकली होती है। बहुजन समाज आजादी के 65 साल बाद भी आजादी के साथ नहीं मुस्कुरा सकता, जैसा कि शासक वर्ग के लोग निद्र्वन्द्व मुस्कुराते हैं। मैंने तो अपने जीवन में कभी चन्द्रिकाप्रसाद जिज्ञासु को भी मुस्कुराते हुए नहीं देखा था। वे जब बात करते थे, तो हमेशा क्रोध और विद्रोह के भाव उनके चेहरे पर आते-जाते थे। फारवर्ड प्रेस हमेशा मौलिक विषय उठाता है और यही कारण है कि इसने काफी कम समय में ही अपना विशिष्ट स्थान बना लिया है।

आपका एक पाठक,
कंवल भारती

(फारवर्ड प्रेस के फरवरी, 2013 अंक में प्रकाशित)


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