नंगा यथार्थ हैं दलित आत्मकथाएं : तुलसीराम

दलित साहित्य के द्वारा समाज की कड़वी सच्चाई समाज के सामने उभरकर आई है। खासतौर से दलित आत्मकथाओं के द्वारा। समाज में जो कुछ हुआ उसका लेखा-जोखा दलित साहित्य के रूप में प्रकाशित हुआ। जो गैर-दलित साहित्य की तरह कोरी कल्पनामात्र नहीं है, बल्कि नंगा यथार्थ है। तुलसीराम से विशेष साक्षात्कार

(सुप्रसिद्ध दलित चिंतक तुलसीराम से इम्तियाज अहमद आजाद की बातचीत)

हुजन साहित्य की अवधारणा पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

देखिए, मेरे अनुसार बहुजन साहित्य नाम की कोई चीज नहीं है। साहित्य के संदर्भ में बहुजन नाम सुनकर अटपटा-सा लगता है और इससे साहित्य का रूप संकुचित-सा हो जाता है। बहुजन शब्द से राजनीति की बू आती है और लगता है कि यह भी मायावती की नई चाल होगी। वैसे बहुजन की अवधारणा, राजनीतिक क्षेत्र में माननीय कांशीरामजी की देन है। मायावती के राजनीति में आने और सन् 1984 से पहले पिछड़ा वर्ग, दलित एवं अल्पसंख्यकों को लेकर बने राजनीतिक संगठन को बहुजन के नाम से जाना गया। कांशीराम जी ने 70 के दशक में एससी, एसटी एवं ओबीसी को लेकर बामसेफ  बनाया, लेकिन इसके साथ सिर्फ दलित ही जुड़ते थे, ओबीसी नहीं जुड़ते थे। बाद में बामसेफ ने कहा कि हम कभी राजनीति में नहीं आएंगे, सिर्फ लोगों को जागरूक करने का काम करेंगे। किन्तु आगे चलकर सन् 1984 में बामसेफ दो धड़ों में बंट गया और इस प्रकार बीएसपी का प्रादुर्भाव हुआ। राजनीति में जाने वाले लोगों ने कांशीराम को अलग कर दिया। 6 दिसम्बर, 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद भारी संख्या में मुस्लिम कार्यकर्ता और मतदाता बीएसपी के साथ जुड़े और इस प्रकार मुलायम एवं कांशीराम के प्रयासों से दलित एवं मुस्लिम का गठजोड़ भारतीय सत्ता में पहली बार उत्तर प्रदेश में आया। आरक्षण को लेकर 1995 में यह सरकार गिर गई। मुलायम की तो गलती है ही लेकिन कांशीराम की भी गलती थी, जो महीने में सिर्फ एक बार आते थे। आगे चलकर मुलायम बहुजन से अलग हो गए। मायावती के सत्ता में आने के बाद का किस्सा तो सबको मालूम ही है। जिन मनुवादियों को वो कभी पानी पी-पीकर गालियां देती थीं, आगे चलकर सत्ता के लिए उन्हीं के साथ हो गईं। मुलायम सिंह की सत्ता जब-जब आती है, तब-तब सांप्रदायिक दंगे बढ़ जाते हैं और यादव जी लोगों का आतंक बढ़ जाता है। कुल मिलाकर मेरे विचार से बहुजन की अवधारणा अगर राजनीति में नहीं काम कर सकी तो साहित्य में कितना करेगी, यह भविष्य के गर्त में है। लेकिन साहित्य में इस विभाजन से मैं व्यक्तिगत रूप से सहमत नहीं हूं। दरअसल, द्विजवादियों ने देखा कि दलित-मुस्लिम का गठजोड़ अगर कामयाब हो जाता है तो पूरे भारत में ये ही लोग सत्ता के केंद्र में होंगे और हम लोग हाशिए पर चले जाएंगे।

साहित्य में दलित-विमर्श को किस नजरिए से देखते हैं?

दलित साहित्य के द्वारा समाज की कड़वी सच्चाई समाज के सामने उभरकर आई है। खासतौर से दलित आत्मकथाओं के द्वारा। समाज में जो कुछ हुआ उसका लेखा-जोखा दलित साहित्य के रूप में प्रकाशित हुआ। जो गैर-दलित साहित्य की तरह कोरी कल्पनामात्र नहीं है, बल्कि नंगा यथार्थ है। गैर-दलित साहित्य चित्रण में सारे पात्र और घटनाएं काल्पनिक होती हैं। जैसे कविताओं के संबंध में कहा जा सकता है कि बिना कल्पना के कविताएं लिखी ही नहीं जा सकतीं। दूसरी महत्वपूर्ण बात आती है कि महात्मा बुद्ध, अश्वघोष, राहुल सांकृत्यायन, प्रेमचंद आदि ने द्विजवादी परंपरा का विरोध किया। उसी में दलित साहित्य के बीज छुपे हुए हैं। इसलिए इसके माध्यम से वर्ण-व्यवस्था और जाति-व्यवस्था का विरोध होना चाहिए। हिन्दू धर्म एवं उसके ग्रंथों का विरोध होना चाहिए। उसके कर्मकांडों का विरोध होना चाहिए। यहां तो प्राय: देखा जाता है कि सस्ते किस्म के दलित साहित्यकार सिर्फ  एकाध लेख लिखकर दलित साहित्यकारों का अगुआ बनना चाहते हैं, साथ ही कर्मकांडों में, ढोंग-पोंग में भी लिप्त रहते हैं। मेरा कहना है कि यदि आना है तो इन सारी चीजों को ताक पर रखकर आइए। जीर्ण-शीर्ण ब्राह्मणवादी विचारधारा को तिलांजलि दे दीजिए।

लेखन से बहुजन समाज को कितना फायदा पहुंच रहा है?

दरअसल, आज पूरे विश्व में एक धारा बह गई है। अफ्रीका, यूरोप में भी गोरों के बरक्स कालों का साहित्य आया। भारत में भी धीर-धीरे ही सही दलित साहित्य स्थापित हो चुका है। हरेक ओर इसकी चर्चा भी है। इसमें अब परिपक्वता भी आ रही है। उसी का परिणाम है कि यदि आज बड़ा से बड़ा गैर-दलित साहित्यकार भी आत्मकथा लिखे तो दलित लेखक की आत्मकथा ज्यादा पढ़ी जाएगी। आपको जानकर आश्चर्य और प्रसन्नता होगी कि तमाम विरोधों के बावजूद लगभग सभी विश्वविद्यालयों में दलित साहित्य पहुंच गया है। दलित साहित्य लेखन का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए वर्ण-व्यवस्था एवं जाति-व्यवस्था को समाप्त करना, ताकि दलितों को उनका अधिकार प्राप्त हो सके। जब ये रूढि़वादी एवं मनुवादी व्यवस्थाएं टूटेंगी तो दलितों को उनका अधिकार मिलेगा और फिर उसी के फलस्वरूप उनका सामाजिक एवं आर्थिक विकास संभव है।

आपकी आत्मकथा मुर्दहिया भी बहुचर्चित रही है, उसके बारे में कुछ बताएं?

मेरी आत्मकथा मुर्दहिया में मेरे बचपन के संस्मरण हैं। इसका दूसरा संस्करण भी राजकमल प्रकाशन, दिल्ली से शीघ्र ही प्रकाशित होने वाला है। इसमें मुर्दहिया के बाद की घटनाओं का विवरण मिलेगा। अभी तक 40 से ज्यादा लोग इस पर एमफिल, पीएचडी कर चुके हैं और कर रहे हैं। खासतौर से दक्षिण भारत में, जैसे, पांडिचेरी, एर्नाकुलम, हैदराबाद यूनिवर्सिटी, मौलाना आजाद उर्दू यूनिवर्सिटी, हैदराबाद, गुलबर्गा आदि में इस पर शोध कार्य चल रहे हैं और हुए भी हैं। महाराष्ट्र के विश्वविद्यालयों में, बीएचयू, जेएनयू में उसके सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर शोध हो रहे हैं। कमला नेहरू इंस्टिट्यूट में, पंजाब में, दिल्ली विश्वविद्यालय में तथा जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली में भी शोधार्थियों ने अपना शोध मुर्दहिया पर प्रस्तुत किया है और कर रहे हैं। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा तथा बर्धमान विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में भी मुर्दहिया को स्थान मिला है। कोलकाता के रवींद्र भारती में भी इस पर शोध कार्य चल रहा है। मुर्दहिया का देश-विदेश की अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।

आजादी के इतने वर्षों के बाद भी दलितों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में कोई खास परिवर्तन नहीं हो पाया है। आप क्या मानते हैं?

आम्बेडकर के प्रयासों से संसद एवं विधान सभाओं में जो भागीदारी दलितों को मिली, उसकी बदौलत कुछ सशक्तीकरण जरूर हुआ है, क्योंकि सत्ता हर ताले की चाबी है, इसीलिए आम्बेडकर भागीदारी की बात करते थे। मायावती की विचारधारा अलग है और वह जातिगत आधार पर सत्ता हथियाना चाहती हैं। जब तक दलितों की भागीदारी रहती थी, तब तक वे एक संरक्षित समूह के रूप में रहते थे, यानी उनका उपयोग वोट बैंक के रूप में किया जाता था। फिर भी सत्ता बनाने-बिगाडऩे में उनकी अहम् भूमिका होती थी, क्योंकि दलितों के वोट के बिना किसी भी राजनीतिक दल की सत्ता नहीं बन सकती थी। परन्तु मायावती ने अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए सत्ता-लोलुपता में उनका वर्चस्व खत्म कर दिया। नौकरियों और शिक्षण-संस्थाओं में प्रवेश के लिए आरक्षण से भी कुछ फर्क पड़ा है, लेकिन जितना आरक्षण मिलना चाहिए उतना कहां मिल पाया है दलितों को। दूसरी अहम् बात यह है कि दलित नेता उनका वोट लेकर सत्ता में आते हैं और अपनी स्वार्थ सिद्धि में लग जाते हैं तथा पूरे दलित समाज को उनकी हालत पर छोड़ देते हैं। इस तरह भला दलितों के हालात कैसे सुधरेंगे।

आम्बेडकर के बाद दलितों के अगुआ के रूप में सबसे प्रभावशाली व्यक्ति, जिसे दलितों का मसीहा कहा जा सके आप किसे मानते हैं?

आम्बेडकर की कोशिश से ही दलितों का सशक्तीकरण हुआ है। ज्यादातर लोग नौकरियों में आए, फिर उन्होंने अपने बच्चों को शिक्षित किया। एक चपरासी ने अपने बेटे को पढ़ा-लिखाकर प्रथम श्रेणी का अधिकारी बनाया और इस प्रकार पीढ़ीगत परिवर्तन हुआ। सामाजिक भेदभाव भी कुछ हद तक खत्म हुआ। आम्बेडकर से किसी भी दलित नेता, नेत्री की तुलना नहीं की जा सकती, क्योंकि कोई उनके व्यक्तित्व के करीब तक भी नहीं पहुंच सकता। उनके जैसा होना तो असंभव-सा है। खासतौर से राजनीतिक दलों के नेता, मुलायम जो पिछड़ों और दलितों का वोट लेकर सत्ता में आते हैं फिर भी आरक्षण के विरोध में संसद में बोलते नजर आते हैं। ये लोग दलगत सिद्धांतों पर चलते हैं। शाहनवाज हुसैन और मुख्तार अब्बास नकवी जैसे, तथाकथित मुस्लिम नेताओं से बीजेपी जैसी सांप्रदायिक और मुसलमानों को फूटी आंख भी न देखने वाली पार्टी अपनी तारीफ के पुल बंधवाती है, ऐसे वेष बदलने वाले और दोहरे चरित्र वाले राजनेताओं से दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का क्या भला हो सकता है।

एक प्रसिद्ध दलित चिंतक, दलित पूंजीकरण की बात करते हैं। साथ ही अंग्रेजी की वकालत करते हैं, लार्ड मैकाले का जन्मदिन मनाते हैं, इस पर आपकी टिपण्णी चाहेंगे?

किसी के व्यक्तिगत विचारों पर मैं क्या टिप्पणी करूं, लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि जिन दलितों के यहां रोजी-रोटी का कोई ठिकाना नहीं है उनके लिए पूंजीकरण की बात करना ठीक नहीं है। रही बात अंग्रेजी की, तो पढऩे-लिखने तक तो ठीक है लेकिन किसी का जन्मदिन मनाना और उसका प्रचार-प्रसार करना उचित नहीं जान पड़ता। अंग्रेजी पढऩा और जानना तो ठीक है लेकिन मातृभाषा में जब तक शिक्षा नहीं होगी तब तक उसका कल्याण नहीं हो सकता। अंग्रेजी वाले ज्यादातर लोगों में अंग्रेजियत आ जाती है और वे भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता को भूलकर इंग्लैंड और अमेरिका की बात करने लगते हैं। फिर आगे चलकर सामाजिक सरोकारों से भी उनका कोई लेना-देना नहीं रह जाता।

(फारवर्ड प्रेस के अप्रैल, 2013 अंक में प्रकाशित )

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