बौद्ध उन्नायक जगदीश काश्यप

प्रेमकुमार मणि बता रहे हैं बौद्ध भिक्षु जगदीश कश्यप के बारे में। उनके मुताबिक बिहार के आधुनिक इतिहास में बौद्ध दर्शन के पुनरुद्धार का श्रेय जिस एक व्यक्ति को जाना चाहिए वे हैं भिक्षु जगदीश काश्यप। लेकिन यह दुर्भाग्य ही है कि इस महान साधक के नाम से ज्यादातर लोग अपरिचित हैं

बिहार के आधुनिक इतिहास में बौद्ध दर्शन के पुनरुद्धार का श्रेय जिस एक व्यक्ति को जाना चाहिए वे हैं भिक्षु जगदीश काश्यप। लेकिन यह दुर्भाग्य ही है कि इस महान साधक के नाम से ज्यादातर लोग अपरिचित हैं। नव नालंदा महाविहार, जिसे सामान्य तौर से पालि इंस्टीट्यूट के रूप में जाना जाता है, भिक्षु जगदीश काश्यप के प्रयत्नों का ही प्रतिफल है। आज एक बार फिर नालंदा में विश्व स्तर के विश्वविद्यालय की स्थापना की कोशिश हो रही है। यदि यह हुआ तो इसे काश्यपजी के सपनों का साकार होना ही कहेंगे।

 

भिक्षु जगदीश काश्यप का जन्म रांची में 2 मई, 1908 को एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। इनका कुल नाम जगदीश नारायण था। जब वे राहुल सांकृत्यायन से मिले तो उनकी मेधा से बहुत प्रभावित हुए। काश्यपजी राहुलजी के द्वारा बुद्ध से कुछ-कुछ परिचित हो चुके थे। साम्राज्यवाद-विरोधी संग्राम में वे कांग्रेस के मंच से सक्रिय भी हो चुके थे। मन में विद्रोही भावनाएं थीं। इन सबकी संगति और राहुल सांकृत्यायन का सान्निध्य। काश्यपजी बौद्ध धर्म दर्शन और खासकर पालि भाषा के अध्ययन के लिए उत्सुक हुए। उस समय पालि त्रिपिटक के अध्ययन का सबसे बड़ा केंद्र श्रीलंका का विद्यालंकार महाविहार था। काश्यपजी ने विद्यालंकाराधिपति को पत्र लिखा और वहां आने की अनुमति मांगी। लेकिन वहां जाने का मार्ग प्रशस्त किया राहुलजी ने। पटना में उन दिनों काशी प्रसाद जायसवाल विद्वानों के आकर्षण का केन्द्र हुआ करते थे। राहुलजी से काश्यपजी की मुलाकात इन्हीं के घर हुई। राहुलजी ने काश्यपजी को पत्र देकर श्रीलंका विदा किया।

श्रीलंका में जगदीश नारायण ने धम्म की प्रव्रज्या ग्रहण कर ली और जगदीश काश्यप हो गए। कहते हैं जगदीश काश्यप नारायण ने मां और अन्य पारिवारिक सदस्यों से इस प्रवज्या के लिए इजाजत ली थी। काश्यपजी ने कठिन परिश्रम से जल्दी ही त्रिपिटाकाचार्य में उत्तीर्णता प्राप्त कर ली। पालि भाषा पर अधिकार प्राप्त कर इन्होंने श्रीलंका मे बौद्धधर्म की स्थिति का अध्ययन किया और संस्कृत में इस विषय पर एक किताब लिखी। वहां के विद्वानों के बीच इनकी प्रतिष्ठा थी। राहुलजी भी इन पर नजर रखे हुए थे। 1934 में काश्यपजी जब भारत लौटे तो राहुलजी इन्हें साथ लेकर जापान चले गए। पूरब के अनेक बौद्ध देशों में घूमकर दोनों विद्वानों ने अपना ज्ञान बढाया। इस यात्रा में काश्यपजी ने चीनी भाषा सीख ली और दीघनिकाय का अनुवाद कार्य पूरा लिया। इसके साथ-साथ बौद्धों के ध्यानयोग जिसे विपस्यना कहते हैं, में काश्यपजी ने निपुणता प्राप्त कर ली। उन पर ज्यादा-से-ज्यादा काम करने का धुन सवार था। जल्दी ही उन्होंने प्रमुख बौद्धग्रंथ मिलिन्दपन्हों का भी हिंदी में अनुवाद कर दिया।

भारत लौटने पर काश्यपजी ने सारनाथ को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। उस समय वहां अनेक बौद्ध विद्वान रहते थे। यहीं पर इन्होंने प्रकांड विद्वान धम्मानंद कोसाम्बी से अभिधम्म और विसुद्धिमग्ग जैसे ग्रंथों का अध्ययन किया। उनकी विद्वता की चारों ओर प्रतिष्ठा हो रही थी, किन्तु काश्यपजी को थोथे विद्वान बना रहना स्वीकार नहीं था। बौद्धधर्म को लेकर एक सांस्कृतिक आंदोलन की बात उनके मन में थी और वे एक सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में काम करना चाहते थे। उनके मन में यह भी था कि उनके अपने बिहार प्रांत में ही बौद्धधर्म की कोई चर्चा नहीं है। बोधगया का मंदिर भी तब जर्जर हाल में था। जनता में बुद्ध का कोई नामलेवा नहीं था। यह सब सोचकर काश्यपजी ने वाराणसी से अपना आसन उठाया और मगध क्षेत्र में आकर जम गए। वे गांव-गांव घूमते। मगही भाषा में लोगों को बुद्ध व उनके विचारों के बारे में बतलाते और कोई न कोई केंद्र अथवा कुटी बनाने का जुगाड़ तलाशते। इसी बीच वे नालंदा में जमे। वहां नालंदा कालेज में पालि के अध्ययन की व्यवस्था की। कोई शिक्षक न मिला तो वे स्वयं शिक्षक बन गए। इसी बीच तत्कालीन शिक्षा सचिव जगदीशचंद्र माथुर से मिलकर उन्हें नालंदा में एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का पालि अध्ययन संस्थान खोलने के लिए राजी कर लिया। इसके बाद वे स्वयं नालंदा में आकर संभावनाओं की तलाश करने लगे। सैकड़ों लोगों से इन्होंने मुलाकात की। वह भी ऐसे कार्य के लिए जिसे जनता जानती तक नहीं थी कि पालि और त्रिपिटक क्या बला है। इसी क्रम में वे इस्लामपुर के मुस्लिम जमींदार से मिले और कहा कि आपके पूर्वजों ने कभी नालंदा को जलाया था, मैं आपसे उसे फिर से बसाने के लिए दान मांगने आया हूं। मुस्लिम जमींदार काश्यपजी से बहुत प्रभावित हुए और तुरंत ग्यारह एकड़ जमीन पालि संस्थान के लिए काश्यपजी को दे दिया। इसी जमीन पर 20 नवंबर, 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद ने नव नालंदा विहार की आधारशिला रखी। नव नालंदा महाविहार काश्यपजी की देन है। इसे खड़ा कर उन्होंने एक बार फिर बिहार में बौद्धधर्म के अध्ययन-अध्यापन की शुरुआत कर दी। आज यह संस्थान उनकी कीर्ति के रूप में खड़ा है और बार-बार हमें उस प्राचीन विश्वविश्रुत विश्वविद्यालय की याद दिलाता है।

उस महाविहार की स्थापना के बाद काश्यपजी का ध्यान लुप्त पालि वांड्मय की ओर गया। संपूर्ण पालि वांड्मय कई विदेशी लिपियों में तो था, लेकिन नागरी लिपि में ही नहीं था। पालि टेक्स्ट सोसाइटी लंदन ने सिंहली से रोमन लिपि में पालि वांड्मय का अनुवाद कराया था। इस अनुवाद से नागरी में अनुवाद करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था। जगदीश काश्यप ने इसे पूरा किया। संपूर्ण पालि वांड्मय आज इकतालीस खंडों में नागरी लिपि में उपलब्ध है। राज्य और केन्द्र सरकार से निवेदन कर इसके प्रकाशन की भी व्यवस्था काश्यपजी ने की। यह एक ऐसा कार्य है जिसके लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा।

काश्यपजी का नाम राहुल सांकृत्यायन और भदंत आनंद कौशल्यायन के साथ आधुनिक भारत में बौद्धधर्म के उन्नायकों में लिया जाता है। तीनों मिलकर एक त्रयी बनाते हैं। इन तीनों ने मिलकर महान बौद्धभिक्षु धम्मपाल अनागरिका के मिशन को पूरा किया। आज फिर देश और बिहार प्रदेश में बौद्धधर्म की चर्चा है। इस चर्चा के बीच भिक्षु जगदीश काश्यपजी का स्मरण तालाब के जलतंरगों के बीच शुभ्रकमल की तरह खिलता प्रतीत होता है। आने वाले समय में जब बिहार और प्रबुद्ध होगा तब काश्यपजी के महत्व को हम और गंभीरता से समझ सकेंगे।

काश्यपजी का निधन 28 जनवरी, 1976 को राजगृह में हुआ। नालंदा में उनकी अंत्येष्टि हुई। नव नालंदा महाविहार के प्रांगण में उनकी स्फटिक प्रतिमा लगी है। कभी मगध के ही एक भिक्षु शीलभद्र ने नालंदा की कीर्ति में चार चांद लगाया था। मगध के इस आधुनिक भिक्षु ने भिक्षु महाकश्यप और शीलभद्र की परंपरा को इस जमाने तक खींच लाया।

(फारवर्ड प्रेस के मई 2013 अंक में प्रकाशित)

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  1. Jitendra Reply

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