आगाज ओबीसी राजनीति का

देश की राजनीति के मैदान में इस समय दो प्रमुख खिलाड़ी हैं, यूपीए और एनडीए, जो क्रमश: कांग्रेस और भाजपा के नेतृत्व में हैं। इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि इन दो शीर्ष पार्टियों के अंत:पुर में सामाजिक न्याय की क्या स्थिति है। यूपीए और एनडीए में भी उसकी स्थिति का आकलन करना होगा।

अगला आम चुनाव अब नजदीक आता जा रहा है और राजनीतिक गलियारों में इसे लेकर सरगर्मी तेज हो चली है। पिछले साल केंद्र सरकार भ्रष्टाचार के मामलों में लगातार घिरती रही और मध्यम वर्ग में उसकी काफी बदनामी भी हुई। 2जी के बाद कोयला घोटाला और उसके बाद रेल घूस कांड। ये सब आर्थिक अपराध के मामले थे। लेकिन, नैतिकता और पारदर्शिता के अभाव को लेकर सीबीआई की जो साख गिरी वह अपने आप में आश्चर्यजनक है। ऐसे मामले किसी यूरोपीय या अमेरिकी देशों में हुए होते तो सरकार को इस्तीफा देना पड़ता। लेकिन हमारे यहां केवल मंत्रियों के इस्तीफे से ही काम चल जाता है।

क्या भ्रष्टाचार का मुद्दा आगामी लोकसभा चुनाव का मुख्य मुद्दा बनेगा? या कोई अन्य मुद्दा प्रभावकारी होगा? पिछले दिनों कर्नाटक विधानसभा चुनाव हुए और वहां कांग्रेस को बड़ी सफलता मिली। माना जा रहा है कि कर्नाटक चुनाव में भाजपा को इसलिए हार झेलनी पड़ी, क्योंकि वहां पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा की भ्रष्टाचार में संलिप्तता ने पार्टी की साख धूल में मिला दी थी। लेकिन क्या यह एक आसान और घिसा-पिटा जवाब नहीं है। कर्नाटक में भाजपा के पराभव के कई कारण हैं और कांग्रेस की विजयश्री के भी उतने ही कारण हैं। लेकिन भारत का उच्च जातियों का मीडिया कर्नाटक की हार के लिए येदियुरप्पा को केंद्र में रखना चाहता है। इसके भी अपने कारण हैं।

हम येदियुरप्पा जैसे लोगों का समर्थन नहीं करना चाहते। बल्कि हम उनके भ्रष्टाचार की कड़े से कड़े शब्दों में निंदा करना चाहेंगे। लेकिन जब हम विश्लेषण करेंगे तब हम गहराई में जाना पसंद करेंगे न कि गलतबयानी करने में। कर्नाटक में येदियुरप्पा के नेतृत्व में भाजपा ने यह चुनाव नहीं लड़ा। येदियुरप्पा ने भाजपा को त्याग दिया था और उन्होंने अपनी अलग पार्टी बना ली थी। इस पार्टी (केजेपी) को इस चुनाव में सीटें तो केवल छह मिलीं, लेकिन उसने दस प्रतिशत से कुछ अधिक मत हासिल कर भाजपा को इतना नीचे गिरा दिया कि संख्यागणित में वह कांग्रेस की एक-तिहाई हो गई। वह बुरी तरह हार गई। दक्षिण भारत में भाजपा की पहली राज्य सरकार बनवाने में येदियुरप्पा की मुख्य भूमिका थी और उनके हटते ही भाजपा मुंह के बल गिर पड़ी।

येदियुरप्पा ने आखिर ऐसा क्या किया जिसने भाजपा को सत्ता में ला दिया और उनके हटते ही भाजपा का किला ढह गया। येदियुरप्पा ने उस ओबीसी लिंगायत तबके को भाजपा से जोड़ा, जो भाजपा का पारंपरिक वोट बैंक नहीं था। दूसरे शब्दों में कहें तो येदियुरप्पा ने भाजपा को सामाजिक न्याय की शक्तियों से जोड़ा और उनके बल पर भाजपा वहां सत्ता में आई। सत्ता में आने पर येदियुरप्पा ने सार्वजनिक धन की लूटपाट की। भ्रष्टाचरण किए। भाजपा ने अंतत: येदियुरप्पा को पद से तो हटाया लेकिन राज्य भाजपा पर ब्राह्मणवादी नेतृत्व व ब्राह्मणवादी मानसिकता को लादना चाहा। साफ शब्दों में कहें तो दिल्ली में बैठे भाजपा ब्राह्मण नेता कर्नाटक के ब्राह्मण नेता अनंत कुमार को चोरी-छिपे सत्ता सौंपना चाहते थे। कर्नाटक भाजपा विधायक दल के जातिगत चरित्र के कारण यह संभव नहीं हो सका। लेकिन, भाजपा ने वहां अपना सामाजिक आधार और चरित्र खो दिया। वह ब्राह्मणों की तरह पवित्र और उन्हीं की तरह अल्पसंख्यक हो गई। स्वाभाविकत: चुनावों में वह पिट गई।

कर्नाटक भाजपा ने येदियुरप्पा को हटाया, यह तो ठीक था लेकिन उसने उसके सामाजिक न्याय वाले चरित्र से भी वंचित कर दिया। इसकी जगह उसकी नकेल अनंत कुमार जैसे कुटिल ब्राह्मण नेताओं के हाथ में सौंप दी। इसके विपरीत कांग्रेस ने अपनी पार्टी को दलित-बहुजन नेताओं के हाथ में सौंप दिया। नतीजा सामने है। एक ओबीसी कुरुब नेता सिद्धरमैया कर्नाटक के मुख्यमंत्री हैं। वहां पार्टी बदल गई है। चेहरा बदल गया है। लेकिन धारा नहीं बदली है। कर्नाटक की जनता को बधाई कि उसने सामाजिक न्याय की राजनीतिक धारा को बनाए रखा।

जो लोग यह समझते हैं कि कर्नाटक चुनाव में भ्रष्टाचार मुख्य मुद्दा था, उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब वहां चुनाव हो रहे थे तब कांग्रेस की दिल्ली सरकार अनेक बड़े भ्रष्टाचारों में डूब-उतरा रही थी और काफी बदनाम भी थी। ये भ्रष्टाचार येदियुरप्पा के भ्रष्टाचार से भी ज्यादा बड़े थे। कर्नाटक की जनता ने इस पर ध्यान क्यों नहीं दिया? कर्नाटक में भाजपा ने अपनी पारंपरिक सामाजिक न्याय की राजनीति को किनारे कर अपनी पवित्र राजनीति का प्रस्ताव जनता के समक्ष रखा। जनता ने इसे खारिज कर दिया। कांग्रेस ने सामाजिक न्याय की राजनीति का एक और प्रस्ताव दिया जिसे स्वीकार किया गया। यदि भाजपा ने यही काम किया होता तो उसकी यह स्थिति नहीं होती। चुनाव में हार-जीत तो होती रहती है। लेकिन भाजपा तो वहां धराशायी हो गई है।

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजे बस एक ही संदेश देते हैं कि देश की राजनीति का शीर्ष मुद्दा सामाजिक न्याय के सवाल ही होंगे। हम इस बार इसी विषय पर केन्द्रित होना चाहेंगे।

देश की राजनीति के मैदान में इस समय दो प्रमुख खिलाड़ी हैं, यूपीए और एनडीए, जो क्रमश: कांग्रेस और भाजपा के नेतृत्व में हैं। इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि इन दो शीर्ष पार्टियों के अंत:पुर में सामाजिक न्याय की क्या स्थिति है। यूपीए और एनडीए में भी उसकी स्थिति का आकलन करना होगा। कांग्रेस ने कर्नाटक में जो प्रयोग किया, वह उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश आदि में क्यों नहीं करना चाहती। उसने कभी जानने की कोशिश की है कि इन राज्यों में उसके कमजोर होने के कारण क्या हैं। उत्तर भारत में कांग्रेस का आधार ब्राह्मण, दलित और मुसलमान वोट बैंक था। नब्बे के दशक में कांशीराम ने कांग्रेस के दलित आधार को छिटका दिया। इसी दशक में मुसलमानों ने सामाजिक न्याय की विचारधारा को लेकर खड़ी क्षेत्रीय पार्टियों से खुद को जोड़ऩे की कोशिश की। भाजपा की साम्प्रदायिक राजनीति तो एक बहाना थी। 1990 में भाजपा ने मंडल आंदोलन के दौरान जो खलनायकी की थी, उसे अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग भूलना नहीं चाहते थे। 2004 के लोकसभा चुनाव के वक्त जो यूपीए-1 बना, उसमें सामाजिक न्याय की शक्तियां मजबूत थीं। इन्हीं के बूते भाजपा के ब्राह्मण नेतृत्व (अटल विहारी वाजपेयी) को हटाना संभव हुआ। सोनिया गांधी के जाति-विहीन नेतृत्व ने दलित-पिछड़े तबकों को आश्वस्त किया था। लेकिन यूपीए-2 आते-आते सोनिया गांधी व उनकी कांग्रेस ने इन तबकों को निराश किया। कांग्रेस कुटिल ब्राह्मणवादी ताकतों से धीरे-धीरे घिरने लगी। इसके समानांतर भाजपा का ब्राह्मण नेतृत्व धीरे-धीरे धीरे कमजोर पडऩे लगा। अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने नेतृत्व में भाजपा में एक कुटिल ब्राह्मण नेतृत्व विकसित किया था। प्रमोद महाजन, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, मुरली मनोहर जोशी जैसे नेता इसके शीर्ष में थे। जिन कल्याण सिंह ने बड़ी मुश्किल से उत्तरप्रदेश में भाजपा को खड़ा किया था, उन्हें हटाकर कलराज मिश्र, लालजी टंडन जैसे नेतृत्व को खड़ा किया गया। नतीजा सामने है उत्तरप्रदेश में भाजपा कमजोर होते-होते अप्रासंगिक हो गई।

सन् 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की विदाई के बाद नरेंद्र मोदी ने कल्याण सिंह के एजेंडे को अपने हाथ में लिया। आज मोदी देश की राजनीति में चर्चा में हैं तो हिन्दुत्व की राजनीति के बल पर नहीं। वह राष्ट्रीय स्तर के कल्याण सिंह और येदियुरप्पा बन रहे हैं। वे यदि कल्याण सिंह की तरह अक्खड़ और येदियुरप्पा की तरह भ्रष्ट होने से बचे रहे तब उनका एक भविष्य हो सकता है। हालांकि केंद्रीय भाजपा की आंतरिक राजनीति उन पर शिकंजे डालना चाहती है। जनता दल यू के नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अनजाने में भाजपा की कुटिल ब्राह्मण लॉबी के औजार बनते प्रतीत हो रहे हैं। कांग्रेस उन पर अलग डोरे डाल रही है। दूसरी ओर भाजपा बिहार में नरेन्द्र मोदी को ओबीसी बल्कि एमबीसी, अति पिछड़ा वर्ग नेता के रूप में प्रस्तुत कर रही है। लालू, मुलायम और मायावती अपनी-अपनी राजनीति को काग्रेस घराने में बंधक रखने को बेताब हैं।

इन सब के बावजूद 2014 के लोकसभा चुनाव का मुख्य मुद्दा सामाजिक न्याय ही होगा, इस विश्वास पर हम कायम हैं। इसका रास्ता भाजपा के बीच से विकसित होगा, या कांग्रेस के बीच से या फिर आम्बेडकरवादी अथवा लोहियावादी समाजवादी घरानों से यह तो समय ही बताएगा। नरेन्द्र मोदी एक चतुर राजनेता हैं और वे इन स्थितियों को अपने लिए अवसर के रूप में देख रहे हैं। दक्षिण की सामाजिक क्रांति के नायक श्रीनारायण गुरु के आश्रम से नरेन्द्र मोदी ने जिस अंदाज में सामाजिक परिवर्तन की चुनौतियों को रेखांकित किया है उससे उम्मीद बंधती है कि इस दिशा में उन्होंने ईमानदारीपूर्वक प्रयास जारी रखा तो अपने दल का भला करेंगे। उत्पीडि़त सामाजिक समूहों के सामूहिक स्वार्थ को चिन्हित करना, उन्हें विकास की रफ्तार और लोकतांत्रिक गतिविधियों से जोडऩा और इस तरह एक समानता, स्वतंत्रता और भाईचारामूलक समाज का निर्माण करना भविष्य की राजनीति का केन्द्रीय एजेंडा होना चाहिए।

जो भी गठबंधन यूपीए, एनडीए या तीसरा मोर्चा के इस यथार्थ को स्वीकार कर अपना चुनाव प्रचार अभियान चलाएगा वह बहुजनों के वोट पाने और अगली सरकार बनाने की उम्मीद कर सकता है।

(फारवर्ड प्रेस के जून 2013 अंक में प्रकाशित)

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