विवाह का मंत्र : तुम हो मेरी पूर्णता

कुछ अंतर ऐसे होते हैं जो एक दूसरे की कमी को पूरा करते हैं परन्तु कुछ ऐसे भी होते हैं जो एक दूसरे के विपरीत होते हैं। इस तरह के अंतरों से निपटने के लिए जरूरी है एक दूसरे का, विशेषकर एक दूसरे की वैयक्तिकता का सम्मान और आपसी चर्चा द्वारा, दोनों को स्वीकार्य किसी समझौते पर पहुंचने की जरूरत। विवाह का यह अर्थ नहीं है कि हम अपनी वैयक्तिकता खो दे बल्कि यह एक दूसरे के अनूठेपन का जश्न है

विवाह हमें हमारे जीवनसाथी के बारे में तो बहुत कुछ नया बताता ही है, वह हमारे स्वयं के बारे में भी हमारी आंखे खोलता है। कभी-कभी हमें लगता है कि काश, हमारा जीवनसाथी बिल्कुल हमारे जैसा होता और सभी काम ठीक उसी तरह करता जैसे हम करना पसंद करते हैं…क्या इससे हमारी जिदंगी बेहतर और आसान नहीं हो जाती? क्या ही अच्छा होता कि र्ईश्वर ने हम दोनों को एक दूसरे का क्लोन बनाया होता!

श्रीमती जी कहती हैं…

जब अभिषेक से मेरी शादी हुई तो हमें ऐसा लगा मानो हमने बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली हो! उपलब्धि इसलिए, क्योंकि हमारा समाज, विवाह को जीवन का एक बहुत महत्वपूर्ण पड़ाव मानता है। विवाह की संस्था को समाज की पूर्ण स्वीकृति प्राप्त है और विवाहित होने के पश्चात हमें ऐसा लगा मानो हमने अपने जीवन की एक मंजिल हासिल कर ली हो। परन्तु असली वैवाहिक जीवन शुरू होता है शादी के अगले दिन से। और जल्द ही हमें यह अहसास हो गया कि किसी मंजिल पर तो दूर हम कहीं भी नहीं पहुंचे थे। मेरा मतलब यह है कि हमने केवल एक नई शुरुआत की थी। शादी कोई मंजिल नहीं है वरन् एक यात्रा है, जिसे हम दोनों ने साथ मिलकर पूरा करने का निर्णय लिया था। अब हम एक टीम थे।

मेरे पति हमेशा जल्दी में रहने वाले एक अत्यंत कामकाजी किस्म के व्यक्ति हैं। जिस दिन वे दिनभर का अपना निर्धारित काम पूरा कर लेते हैं, उनके लिए वह दिन सार्थक हो जाता है। वे हमेशा ऐसे तरीके या रणनीति की खोज में रहते हैं जिससे कोई काम बेहतर, और बेहतर तरीके से किया जा सके। दूसरे शब्दों में, यात्रा शुरू करने के पहले, अभिषेक यात्रा की राह पर भरपूर नजर डालता है और यात्रा पूरी करने की रणनीति तैयार करता है। वह बिना सोचे-समझे किसी काम में हाथ नहीं डालता। दूसरी ओर मैं, अपने आसपास की दुनिया पर नजर रखती हूं, सोच-विचार करती हूं और पहले से कोई निर्णय लेने की बजाय किसी यात्रा पर निकल पडऩे के बाद, रास्ते में, परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय लेती जाती हूं।

तो, विवाह के शुरुआती दिनों में मैं अभि की ‘टू डू’ लिस्ट को पूरी करने में जुटी रहती थी। क्या आप अंदाजा लगा सकते हैं कि क्या हुआ होगा। मैं उसके साथ भागती रही। उसके कदम से कदम मिलाकर चलने की कोशिश करती रहती थी। मैंने काम पूरा हो जाने के बाद ‘टू डू’ लिस्ट में सही का निशान लगाना सीखा, मैंने गाड़ी चलाने का प्रशिक्षण लिया, मैंने घरेलू बजट बनाना शुरू किया और घर के लिए सामान की खरीदारी में अपना काफी वक्त लगाया। परन्तु मैं परेशान-सी हो गई थी। मुझे लग रहा था कि ऐसा लंबे समय तक नहीं चल सकता।

क्यों? इसलिए क्योंकि मुझमें और अभिषेक में बहुत से अंतर हैं। मेरी भी ‘टू डू’ सूची होती थी लेकिन वह अभिषेक से काफी अलग होती थी। मैं काम और रिश्तों-दोनों में अर्थ ढूंढती थी। मेरे लिए अभिषेक से प्यार करने का अर्थ था उसके सपनों और उसके भय को जानना और उसका संबल बनना। उसके लिए मुझसे प्यार करने का अर्थ था मेरी इस तरह से मदद करना, ताकि मैं जीवन के व्यावहारिक पक्ष से जुड़े काम बेहतर से बेहतर ढंग से पूरा कर सकूं।

प्रश्न यह था कि किसकी लिस्ट ठीक थी-अभिषेक की या मेरी। इस प्रश्न का उत्तर यह है कि हम दोनों को ही एक दूसरे की जरूरत थी और हम दोनों यदि अलग-अलग की बजाय एक ही लिस्ट बनाते तो बेहतर होता। कुछ समय पहले मैंने एक लेख पढ़ा था, जिसमें यह कहा गया था कि जब हम अपने जीवनसाथी की तलाश करते हैं तब हम अनजाने में ऐसे व्यक्ति को ढूंढ रहे होते हैं जो हमारे जीवन को समृद्ध कर सके। कोई भी पुरुष या स्त्री एक ऐसे जीवनसाथी की तलाश करता है जो कुछ मामलों में उसके जैसे हो, परन्तु बाकी में उससे अलग हो। अक्सर मैं ऐसे व्यक्ति के प्रति आकर्षण महसूस करती हूं जो मुझसे विपरीत है। अनुसंधान से पता लगता है कि एक दूसरे से उलट स्वभाव या मानसिकता वाले लोग एक दूसरे को आकर्षित करते हैं, क्योंकि वे आपस में मिलकर एक दूसरे को पूर्णता प्रदान कर सकते हैं।

उसकी व्यावहारिकता ने मुझे कई तरह से लाभ पहुंचाया है। मुझे यह देखकर आश्चर्य होता है कि हम दोनों कितने अलग हैं…वो दौड़ता है, मैं चलती हूं ; मैं विचार देती हूं वह उसे लागू करता है; उसकी पथ प्रदर्शक है तार्किकता, मैं रचनात्मक हूं; वह हमारी छुट्टियों की योजना बनाता है और मैं सप्ताह के किसी भी दिन उसे सरप्राइज देती हूं…और इस तरह जिन्दगी चलती जा रही है।

अभी कुछ समय पहले की बात है। मैं खिलौने सलीके से जमा रही थी, कपड़े तह कर रख रही थी और दूसरे घरेलू कामकाज निपटा रही थी। मेरे पति हमारी बेटी महिमा को एक कहानी सुना रहे थे और उसके अनगिनत प्रश्नों का बड़े धैर्य से जवाब दे रहे थे। बीच-बीच में वे उसे कभी गले लगाते तो कभी चूम लेते। मैं अचानक ठिठक गई और फिर कुछ सोचकर मुस्कुराने लगी। मैं सोच रही थी कि हम दोनों ठीक वह कर रहे हैं जो हमारे स्वभावों के विपरीत है। थोड़ा सा अभिषेक मुझमें समा गया है और थोड़ी से मैं, उसमें।

श्रीमान जी कहते हैं…

मुझे यह स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं है कि विपरीत स्वभाव वाले लोग एक दूसरे को आकर्षित करते हैं और यही वह बात है जो विवाह को इतना विशेष बनाती है। कभी-कभी मुझे यह देखकर आश्चर्य होता है कि दो लोग एक दूसरे से इसलिए विवाह करते हैं, क्योंकि उनके बीच ढेर सारी समानताएं हैं और इसलिए उनकी आपस में बहुत पटेगी। और कुछ ही महीने बाद, वे ‘असंगतता’ के आधार पर अदालतों में तलाक की अर्जी लगाते दिख जाते हैं। हमें यह मानकर चलना चाहिए कि हमारा जीवनसाथी हमसे अलग होगा और हमें इस अंतर को स्वीकार करने के लिए तैयार रहना चाहिए। हम दोनों में कितना अंतर है, इसका एहसास पहली बार तब हुआ जब हम दोनों विवाह के पूर्व की काउंसिलिंग में हिस्सा ले रहे थे। हमसे पूछा गया कि हमें अपने-अपने जीवनसाथी से क्या-क्या अपेक्षाएं हैं और हमें यह देखकर आश्चर्र्य हुआ कि हम दोनों की अपेक्षाओं की सूची एकदम अलग-अलग थी। परन्तु इसका लाभ यह हुआ कि हम शादी के पहले ही इस बात के लिए तैयार थे कि हम दोनों में बहुत से अंतर हैं और हमें उन अंतरों को स्वीकार करना है और उनके साथ जीना है।

समय के साथ हमने इन अंतरों का उपयोग एक दूसरे की कमियों को पूरा करने के लिए करना सीख लिया। स्तुति हमेशा से दूसरों के प्रति संवेदनशील रही है और दूसरों की भावनाओं को समझना उसे आता है। स्तुति ने मुझे सिखाया कि मुझे दूसरों से किस तरह का व्यवहार करना चाहिए और दूसरों के जीवन में बेजा हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए। किसी विवाह में देने के लिए उपहार का चुनाव करने जैसी छोटी-सी चीज में भी हम दोनों के अलग-अलग गुण उपयोगी साबित होते हैं। मैं ऐसी चीज चुनता हूं जो नवदंपती के जीवन में कुछ काम आएगी तो स्तुति एक लंबा-सा नोट लिखती है, जिसे हम अपने उपहार के साथ नवयुगल को देते हैं। मैं चकित हूं कि र्ईश्वर ने विवाह नाम की इस संस्था को कितनी चतुराई और समझदारी से गढ़ा है। अगर मेरा जीवनसाथी मेरे जैसा ही होता तो मैं अधूरा बना रहता। निस्संदेह, ईश्वर हमसे भी बेहतर जानता है कि हमारे लिए क्या अच्छा है।

हम कहते हैं…

हम जब विवाह करते हैं तब तक हम वयस्क हो चुके होते हैं। हमारा व्यक्तित्व विकसित हो चुका होता है। हम विभिन्न मुद्दों पर अपनी राय कायम कर चुके होते हैं और हमारे लिंग, रहने के स्थान, पारिवारिक पृष्ठभूमि आदि का भी हमारे दिलो-दिमाग पर असर पड़ चुका होता है। कहने का मतलब यह है कि विवाह करने वाले दो व्यक्तियों के स्वभाव और सोच में जमीन-आसमान का फर्क हो सकता है-इतना ज्यादा कि उसके साथ जीना असंभव-सा जान पडऩे लगे। यद्यपि कुछ अंतर ऐसे होते हैं जो एक दूसरे की कमी को पूरा करते हैं परन्तु कुछ ऐसे भी होते हैं जो एक दूसरे के विपरीत होते हैं। इस तरह के अंतरों से निपटने के लिए जरूरी है एक दूसरे का, विशेषकर एक दूसरे की वैयक्तिकता का सम्मान और आपसी चर्चा द्वारा, दोनों को स्वीकार्य किसी समझौते पर पहुंचने की जरूरत। विवाह का यह अर्थ नहीं है कि हम अपनी वैयक्तिकता खो दे बल्कि यह एक दूसरे के अनूठेपन का जश्न है।

विवाह का अर्थ है दो अपूर्ण व अधूरे मनुष्यों का मिलन, एक संतुलन बनाने की कोशिश और एक दूसरे के साथ जीवनयात्रा पूरी करने का संकल्प। क्या कोई भी विवाहित दंपती, अपने जीवन के किसी भी दौर में यह कह सकता है कि वह लक्ष्य पर पहुंच गया है और अब कुछ भी और करना बाकी नहीं रहा। हम तो यह चाहेंगे कि वह कहे कि हमारी यात्रा जारी है।

(फारवर्ड प्रेस के जुलाई 2013 अंक में प्रकाशित)

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