ओबीसी साहित्य पर उलझे लेखक

भाषाविद् डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने कहा कि ‘कामगार किसान, कारीगर, मजदूर और पशुपालकों का साहित्य ओबीसी साहित्य है। यदि भारतेन्दु से लेकर प्रसाद, रेणु और आजतक के ओबीसी कवि-साहित्यकारों तक के विपुल साहित्य का अध्ययन किया जाए, तो ओबीसी साहित्य का दायरा सबसे बड़ा है। हिन्दी साहित्य के सभी कालखंडों में इसकी पहचान की जा सकती है।’

‘अभिजन समाज के लोगों ने समाज को बांट रखा है। जब तक समाज में बंटवारा है, तब तक साहित्य में भी बंटवारा रहेगा। इसी बंटवारे के कारण दलित साहित्य, आदिवासी साहित्य, स्त्री साहित्य, ओबीसी साहित्य आदि का जन्म हुआ है, जिसका दायरा बहुत बड़ा है और यह पूरी मानवता का साहित्य है।’

ये बातें युद्धरत आम आदमी पत्रिका की संपादक और प्रसिद्ध लेखिका रमणिका गुप्ता ने बीआर आम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय के शिवदेनी राम अयोध्या प्रसाद महाविद्यालय, बारा चकिया में गत 24-25 मई को यूजीसी सम्पोषित सेमिनार में कहीं। उन्होंने कहा कि ‘अभिजन साहित्य स्वांत: सुखाय का शांतिपाठ है, जबकि बहुजन साहित्य सर्वजन हिताय का क्रान्तिपाठ। अभिजन साहित्य के आदर्श जहां तुलसीदास हैं, वहीं बहुजन साहित्य के आदर्श हैं कबीर।’

रमणिका गुप्ता के ओबीसी होने की ओर इशारा करते हुए प्रसिद्ध दलित लेखक मोहनदास नैमिशराय ने कहा कि ‘यद्यपि फुले ने स्त्रियों को भी शूद्रातिशूद्र की श्रेणी में गिना था, किन्तु मेरी दृष्टि में सभी स्त्रियों को दलित नहीं माना जा सकता। जो स्त्रियां अपने फैसले स्वयं लेती हैं, वे दलित नहीं हैं। इस दृष्टि से रमणिका गुप्ता दलित नहीं हैं। स्त्रियां भी जाति-निरपेक्ष नहीं होतीं। दलित साहित्य शुद्ध रूप से आम्बेडकर की विचारधारा पर आधारित साहित्य है, इसमें गांधी की कहीं कोई गुंजाइश नहीं है। जबकि ओबीसी साहित्य गांधी और बाबा साहब को लेकर कोई सकारात्मक सैद्धांतिकी नहीं खड़ा कर सका है।’

दूसरी ओर, सासाराम से आए सुपरिचित भाषाविद् डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने कहा कि ‘कामगार किसान, कारीगर, मजदूर और पशुपालकों का साहित्य ओबीसी साहित्य है। यदि भारतेन्दु से लेकर प्रसाद, रेणु और आजतक के ओबीसी कवि-साहित्यकारों तक के विपुल साहित्य का अध्ययन किया जाए, तो ओबीसी साहित्य का दायरा सबसे बड़ा है। हिन्दी साहित्य के सभी कालखंडों में इसकी पहचान की जा सकती है।’ डॉ. ललन प्रसाद सिंह ने कहा कि ‘5042 जातियों वाले साहित्य को ही हम ओबीसी साहित्य कहेंगे। संस्कृत में वैदिक साहित्य एवं लौकिक साहित्य के दो विभाजन है। वैदिक साहित्य ब्राह्मणों का है, जबकि लौकिक साहित्य (प्राकृत और अपभ्रंश सहित) ओबीसी का है। प्राचीन मगध साम्राज्य का सम्पूर्ण साहित्य ओबीसी साहित्य है।’

सेमिनार में ‘अभिजन बनाम बहुजन साहित्य’, ‘दलित साहित्य’, ओबीसी साहित्य समेत अनेक मुददों पर व्यापक चर्चा हुई। सेमिनार में श्योराज सिंह बेचैन, रमेश रितंभर, बुद्धशरण हंस, रमाशंकर आर्य, रिपुसूदन श्रीवास्तव, हरिनारायण ठाकुर, मुसाफिर बैठा, संजय कुमार आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

(फारवर्ड प्रेस के जुलाई 2013 अंक में प्रकाशित)

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