फिल्मी दुनिया में बहुजन कलाकार

बॉलीवुड की फिल्म इंडस्ट्री में कई ऐसे कलाकार हैं जो रंग, रूप और जाति से धनी नहीं हैं, पर वो आज के समय में एक उम्दा और कामयाब कलाकार हैं। दो बहुजन कलाकारों से खास बातचीत

अभिनेता कौन है? सिर्फ सिनेमा के पर्दे तक सिमटी हुई तस्वीर या कुछ और? कलाकार अपनी काबिलियत से नई कहानी गढ़ता है। फिल्में हिट होती हैं फ्लॉप भी होती हैं। लेकिन कलाकार का निजी जीवन भी इसके साथ ही चलता है। कैसा होता है उस कलाकार का जीवन जो भारत के बहुजन समाज से आता है? जिसका कोई गॉडफादर नहीं। ऐसे दो कलाकारों गगन निमेश और राहुल दक्ष से फारवर्ड प्रेस के संवाददता मुकेश की बातचीत।

गगन निमेश

फिल्म एंड टेलिविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया से अभिनय में पीजी के उपरांत इस क्षेत्र में संघर्षशील हैं। कुछ शॉर्ट फिल्मों और थियेटर से करियर की शुरुआत के बाद आज गगन तीन फिल्मों में भी काम कर चुके हैं। मणिशंकर की ‘नॉक आउट’, आनंद कुमार की ‘जिला गाजियाबाद’ और हाल ही में आई शेजल शाह की ‘हंसमुख पिघल गया’ में अपने अभिनय का लोहा मनवा चुके हैं। गगन का जन्म एक दलित परिवार में हुआ है। 

गगन निमेश

फारवर्ड प्रेस : आपकी नजर में फिल्म की दुनिया में किसका राज है? स्टारपुत्र का या धनाड्य का?

गगन निमेश : मेरे हिसाब से, फिल्म इंडस्ट्री या थिएटर का महारथी वह है, जो अच्छा कलाकार है, जो अपने आप को किसी भी सिचुएशन में ढाल लेता है। इससे फर्क नहीं पड़ता की वह फिल्म स्टार का बेटा है या कोई धनाड्य। फर्क इससे पड़ता है की वो कितना अच्छा कलाकार है। एक फिल्म स्टार के बेटे को या एक धनाड्य को ज़रूर फिल्म मिलेगी पर अगर वो अच्छा कलाकार नहीं है तो लोग उसे पसंद नहीं करेंगे। दूसरी तरफ, अगर कोई अच्छा कलाकार है, चाहे वो कोई फिल्म स्टार की संतान न हो और ना ही कोई धनाड्य, तो लोग उसे पसंद करेंगे और उसे काम मिलेगा।

फारवर्ड प्रेस : क्या कलाकार की जाति, उसका रंग-रूप उसकी कला के सामने चुनौती बनता है?

गगन निमेश : कभी भी नहीं। कला, जाति या रंग रूप से परे है। इस इंडस्ट्री में कई ऐसे कलाकार हैं जो रंग, रूप और जाति से धनी नहीं हैं, पर वो आज के समय में एक उम्दा और कामयाब कलाकार हैं। मैं नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी का उदहारण दूंगा, जिनसे मैं काफी प्रभावित हुआ हूं। वे एक मंजे हुए कलाकार हैं जिन्होंने अपने आप को साबित किया है। कलाकार की जाति और रंग रूप उसकी कला ही होती है। जातिवाद राजनीति में रुकावट हो सकता है कला के क्षेत्र में नहीं। हां, लोगों की पसंद पर कोई भी रोक नहीं लगा सकता। उदाहरण के तौर पर, अगर लोग किसी खान, बच्चन, कुमार या कपूर को पसंद करते हैं तो उनकी उम्मीद होती है कि उनकी संतानें उनके जैसी ही होंगी। इन सब लोगों ने जनता की उम्मीदों और उनके दिलों को जीतने के लिए काफी मेहनत की है। किसी भी जाति का इंसान मेहनत कर के लोगों में चर्चित और कामयाब हो सकता है।

फारवर्ड प्रेस : एक तरफ कई कलाकारों को फिल्मों-नाटकों में एक आसान एंट्री मिल जाती है तो दूसरी तरफ कई कतार में ही रह जाते हैं। क्या इसके लिए किसी पैमाने की जरूरत है?

गगन निमेश : फिल्मों-नाटकों में किस्मत और मेहनत साथ-साथ चलती हैं। किस्मत से आपको काम मिल सकता है पर अगर आपने मेहनत नहीं की तो आगे काम मिलना मुश्किल हो जाता है। आज के समय में जितने भी कामयाब कलाकार हैं उनकी कामयाबी के पीछे लगन और मेहनत छुपी है। हो सकता है कि कामयाबी मिलने में समय लगे पर लगन और मेहनत से आपको ज़रूर काम मिलेगा। कामयाबी का मंत्र यही है कि धीरज न खोएं और मेहनत करते रहें।

राहुल दक्ष

एक पिछड़ी जाति से आने वाले राहुल दक्ष ने यूपी के एटा जिले से मुंबई में कदम रखा और अब फिल्मी दुनिया में सफर तय कर रहे हैं। राहुल बीते 8 साल से रेडियो और फिल्म से जुड़े हैं।

राहुल दक्ष

फारवर्ड प्रेस : इंडस्ट्री में कामयाब कौन होता है? बहुजन समाज से आने वाले लोगों के लिए यहां राहें कितनी कठिन है? 

राहुल दक्ष : मैं एक पिछड़ी जाति से हूं और संघर्ष के दम पर एटा की गलियों से निकलकर मुंबई तक पहुंचा। दर्जनों प्ले, शॉर्ट फिल्मों के साथ राजनीति और आरक्षण जैसी दो बड़ी फिल्में कर चुका हूं। क्या अब भी आपके मन में कोई सवाल है? हां, कामयाब वही होता है जिसमें मेहनत करने की क्षमता और काबिलियत होती है। यह सही है कि बिना सहारे के वक्त ज्यादा अवश्य लग जाता है।

फारवर्ड प्रेस : क्या कलाकार की जाति, उसका रंग-रूप उसकी कला के सामने चुनौती बनता है?

राहुल दक्ष : कुछ हद तक ऐसा मेरे साथ हुआ लेकिन आज ऐसा है… मैं नहीं मानता।

फारवर्ड प्रेस : एक कलाकार के तौर पर आगे बढऩे में क्या आपकी जाति कभी संकट बनी है?

राहुल दक्ष : कभी नहीं, क्योंकि कला प्रतिभा देखती है…

फारवर्ड प्रेस : एक तरफ कई कलाकारों को फिल्मों-नाटकों में एक आसान एंट्री मिल जाती है तो दूसरी तरफ कई कतार में ही रह जाते हैं, क्या इसके लिए किसी पैमाने की जरूरत है?

राहुल दक्ष : जिन्हें आसानी से एंट्री मिलती है वो लंबी रेस के घोड़े साबित नहीं होते। हमें किसी पैमाने की आशा छोड़कर अपना संघर्ष सही दिशा में जारी रखना चाहिए।

(फारवर्ड प्रेस के अगस्त 2013 अंक में प्रकाशित)

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