कांशीराम बने नए सामाजिक न्याय की प्रेरणा

शक्तिसंपन्न तबकों ने धीरे-धीरे दलित, आदिवासियों को मिले आरक्षण को झेलने की तो मानसिकता विकसित कर ली, किन्तु जब मंडल की सिफारिशों पर 1990 में पिछड़ों को आरक्षण मिला तो शक्तिसंपन्न तबके के युवाओं ने आत्मदाह से लेकर राष्ट्रीय संपत्ति की दाह तक का सिलसिला शुरू कर दिया। बता रहे हैं एच. एल. दुसाध

वर्ण व्यवस्था में शक्ति के सारे स्रोत चिरस्थाई तौर पर ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों से युक्त सवर्णों के लिए आरक्षित रहे, जबकि शुद्रातिशूद्र कही जाने वाली बहुसंख्यक आबादी इनसे पूरी तरह वंचित रही। फिर शक्तिसंपन्न तीन उच्च वर्णों की सेवा का भार भी उस पर थोप दिया गया, वह भी पारिश्रमिक रहित। अगर मार्क्स के अनुसार, दुनिया का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है तो भारत में वह संघर्ष वर्ण-व्यवस्था के संपन्न तथा वंचित वर्गों के मध्य होता रहा है।

आधुनिक भारत के निर्माताओं ने वंचित बहुसंख्यकों को शक्ति के स्रोतों में उनका प्राप्य दिलाने के लिए एक नई मानवतावादी आरक्षण जैसी व्यवस्था को जन्म दिया, लेकिन इसके बावजूद इसे लेकर शक्तिसंपन्न तथा वंचित समूहों के बीच लगातार, कभी प्रत्यक्ष तो कभी परोक्ष रूप से संघर्ष चलता रहा है। यह संघर्ष प्राय: इकतरफा, शक्तिसंपन्न तबकों की तरफ से होता रहा है। गुलाम भारत में जब पूना-पैक्ट के रास्ते अछूतों को आरक्षण मिला, तब उसके प्रमुख शिल्पी भारत रत्न आंबेडकर को क्या-क्या कहकर गाली नहीं दी गई?

बहरहाल, शक्तिसंपन्न तबकों ने धीरे-धीरे दलित, आदिवासियों को मिले आरक्षण को झेलने की तो मानसिकता विकसित कर ली, किन्तु जब मंडल की सिफारिशों पर 1990 में पिछड़ों को आरक्षण मिला तो शक्तिसंपन्न तबके के युवाओं ने आत्मदाह से लेकर राष्ट्रीय संपत्ति की दाह तक का सिलसिला शुरू कर दिया। एक पार्टी विशेष ने रामजन्मभूमि मुक्ति के नाम पर आजाद भारत का सबसे बड़ा आन्दोलन ही खड़ा कर दिया, जिसके फलस्वरूप बेशुमार संपदा नष्ट हुई और अनेक लोगों की मौत हुई। बाद में, 2006 में जब पिछड़ों को उच्च शिक्षण संस्थाओं के प्रवेश में आरक्षण मिला तो शक्तिसंपन्न समुदाय के युवाओं ने एक बार फिर गृह-युद्ध की स्थिति पैदा कर दी।

इस बार जुलाई-अगस्त में उत्तरप्रदेश लोक सेवा आयोग में नई आरक्षण नीति लागू करने को लेकर जो संघर्ष शुरू हुआ उसकी पहलकदमी भी शक्तिसंपन्न तबके के छात्रों ने ही की। 11 जुलाई, 2013 को यूपी राज्य लोक सेवा आयोग से नई आरक्षण व्यवस्था लागू करते हुए प्राथमिक से लेकर मुख्य परीक्षा एवं साक्षात्कार तीनों में आरक्षण और ओवरलैपिंग कर कटआफ सूची जारी की गई, जिससे सफल उम्मीदवारों में आरक्षित वर्ग का प्रतिशत 76 हो गया। सामान्य श्रेणी के अभ्यार्थियों ने इस मामले का यह कहकर विरोध करना शुरू किया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण नहीं लागू होना चाहिए। उन्होंने आयोग के निर्णय के खिलाफ इलाहबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दी, जिस पर कोर्ट ने 15 जुलाई को आयोग तथा राज्य सरकार को नोटिस भी जारी कर अपना पक्ष रखने को कहा, किन्तु, आरक्षण विरोधी छात्र यहीं नहीं रुके। उन्होंने दबाव बनाने के लिए मंडल-1 और 2 की भांति तोड़-फोड़ तो शुरू की ही, किन्तु इस बार उनके हमले का नया पहलू यह रहा कि उन्होंने एक जाति विशेष से जुड़े पेशे, पशुओं और भगवान तक को निशाना बना डाला।

एक ओर जहां आरक्षण विरोधियों का तांडव जारी था, वहीं दूसरी ओर उनके कुछ सदस्यों ने सपा की एक नेत्री (डॉ. रंजना वाजपेयी) के नेतृत्व में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव को अपनी पीड़ा से अवगत कराया। मुलायम उनसे प्रभावित हुए बिना न रह सके। मुलायम के इशारे के बाद उस दिन देर शाम तक परिदृश्य पूरी तरह बदल गया। आयोग ने नई आरक्षण नीति वापस लेकर आरक्षण विरोधियों को जश्न में डूबने का अवसर दे दिया।

आरक्षण पर आयोग द्वारा यू टर्न लेते ही जहां एक ओर आरक्षण विरोधी जश्न में डूबे, वहीं, आरक्षण समर्थकों का आक्रोश भी फट पड़ा। आरक्षण समर्थकों का गुस्सा राज्य की सत्तासीन सपा सरकार पर फूटा। उन्होंने शुरू में सपा के जिलाध्यक्ष के घर धावा बोला और फिर पथराव व वाहनों की तोड़-फोड़ की। उनके एक गुट ने 27 मई को उस सवर्ण सपा नेत्री के घर पर भी धावा बोला तथा पथराव किया, जिनके नेतृत्व में आरक्षण विरोधियों के सपा मुखिया से मुलाकात के बाद सब कुछ उल्टा-पुल्टा हो गया था। बाद में उन्होंने इलाहाबाद स्थित सपा के जिला कार्यालय पर कब्जा जमा लिया। वहां दो दिन रहने के बाद उन्होंने 30 जुलाई को लखनऊ घेरने की घोषणा कर दी। उनके उस घोषणा के बाद एक अखबार में छपी टिप्पणी ने मुझे आरक्षण समर्थकों को करीब से देखने के लिए बाध्य किया। 30 जुलाई को उस अखबार ने लिखा- ‘आरक्षण समर्थकों के निशाने पर सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव तो हैं ही, मायावती भी नहीं बच पाई हैं। किन्तु सबसे खास बात यह है कि आरक्षण समर्थक बसपा संस्थापक कांशीराम को दलितों और पिछड़ों का मसीहा बता रहे थे। वे कह रहे थे कि कांशीराम ने जो लड़ाई शुरू की उसकी रफ्तार धीमी नहीं पडऩे दी जाएगी। हालांकि मैंने फेसबुक पर भी कुछ ऐसी बातें देखी थीं, पर यकीन नहीं हो रहा था कि जिस पिछड़े वर्ग के हिरावल दस्ते के युवाओं के हाथ में आंदोलन का नेतृत्व है, वे कांशीराम को अपना मसीहा मानेंगे। ऐसे में, मैं 30 जुलाई को लखनऊ विधानसभा के विपरीत अवस्थित धरनास्थल पर पहुंचा और वहां जो कुछ देखा, उससे लगा अखबार की सूचना गलत नहीं थी। धरनास्थल पर आरक्षण समर्थक छात्रों ने जो ढेरों बैनर-पोस्टर लगा रखे थे उनमें कई पर लिखा था- ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी।’ यही नहीं डेढ़ घंटे रहने के दौरान छोटे-बड़े कई सामाजिक संगठनों तथा राजनीतिक दलों के लोगों एवं छात्रों के माहौल को उतप्त करनेवाला आक्रामक भाषण सुना। वे कल्पनातीत निर्ममता के साथ सपा और बसपा प्रमुखों की आलोचना कर रहे, परन्तु सभी वर्तमान आन्दोलन के एजेंडे महज नौकरियों तक सीमित न रखकर, हर क्षेत्र में ही कांशीराम का भागीदारी दर्शन, जिसकी जितनी संख्या भारी…लागू करवाने तक प्रसारित करने का आह्वान कर रहे थे और श्रोता छात्र तालियां बजाकर उनका समर्थन कर रहे थे। हालांकि फिलहाल कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रखते हुए फैसला सुनाए जाने तक नियुक्ति की प्रक्रिया पर रोक लगा दी है। लेकिन सारांश में अपने अनुभव के आधार पर यह कह सकता हूं कि आरक्षण समर्थकों का यह आन्दोलन सामाजिक न्याय के आन्दोलनों के इतिहास का एक नया आगाज है । यदि इससे जुड़े छात्र इसी संकल्प के साथ कांशीराम की भागीदारी दर्शन को लेकर आगे बढ़ते हैं तो न सिर्फ सामाजिक न्याय का अध्याय पूरा हो सकता है, बल्कि भारत में व्याप्त आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी के खात्मे का मार्ग भी प्रशस्त हो सकता है।

(फारवर्ड प्रेस के सितंबर 2013 अंक में प्रकाशित)


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