लोरिक : राजपूत सामंतों को चुनौती देने वाला नायक

मंजरी यदुकुल की एक लड़की थी जिस पर अगोरी राज्य के राजपूत राजा मौलागत की बुरी नजर थी। मंजरी को बचाने के लिए लोरिक राजा से लड़ जाता है और अंतत: विजय प्राप्त करता है।

उत्तर भारत के समाज में हमेशा से दो धाराएं मौजूद रही हैं। एक ओर, प्रभुवर्ग के दैवीय अधिकारों को औचित्यपूर्ण साबित करने के लिए तर्क गढ़े जाते रहे हैं तो दूसरी ओर, वंचित तबकों से उन्हें कड़ी चुनौती भी मिलती रही है। यह चुनौती भौतिक भी रही है और बौद्धिक भी। यानी, एक ओर प्रभुवर्ग, समाज के अन्य तबकों को काबू में लाने के लिए बलप्रयोग के साथ-साथ वैदिक ग्रंथों का सहारा लेता रहा तो दूसरी ओर दमित तबकों से भी ऐसे नायकों का प्रादुर्भाव हुआ, जिन्होंने अपने रणकौशल से उन्हें कड़ी टक्कर दी तथा उनके अनुयायियों ने उनके इस पराक्रम को लोकगाथाओं में उकेरने तथा अपने ग्रंथों में सहेजने का उपक्रम किया। इन्हीं नायकों में से एक थे लोरिक, जिनके पराक्रम की गाथा को ‘लोरिकायण’ (रामायण की तर्ज पर) नाम से जाना जाता है।

 

लोरिकायन के अनेक संस्करण उपलब्ध हैं। इन विभिन्न रूपों में लोरिक के जन्मस्थान पर विवाद है। कोई इसे ‘गौरा’ गांव जिला-मिर्जापुर तो कोई इसे बलिया के हरदी (दोनों उत्तरप्रदेश में) को मानता है, लेकिन उत्तरप्रदेश सरकार के रिकार्ड में इसे बलिया बताया गया है, जहां उत्तरप्रदेश सरकार वीर लोरिक की प्रतिमा लगाने की पहल कर रही है। इनके पिता कुआ और माता खुल्हनी थी। कुआ पहलवान अपनी बिरादरी में और जवार भर के वरिष्ठ व्यक्ति थे।

डा. भोलाशंकर व्यास ने डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी के ऐतिहासिक उपन्यास ‘पुनर्नवा’ के आधार पर ऐतिहासिक वीर चरित्र लोरिक को समुद्रगुप्त का समकालीन माना है। वहीं डा. अर्जुनदास केसरी ने लोरिक-कथा को दसवीं शताब्दी का माना है, जबकि डा. रामकुमार वर्मा ने अपने ‘हिन्दी साहित्य के आलोचानात्मक इतिहास’ में लोरिक को राजा भोज (1010-1053) का समकालीन माना है।

लोरिक का क्षेत्र बंगाल, पंजाब से लेकर नेपाल तक फैला हुआ था। लोरिकायन में वीर लोरिक के कई विवाहों की चर्चा है। पहला विवाह अगोरी गांव की मंजरी से हुआ, जिससे भोरिक नामक पुत्र पैदा हुआ। दूसरा विवाह चनमा से हुआ, जिससे चनरैता नामक पु़त्र पैदा हुआ। तीसरा विवाह हरदीगढ़ की जादूगरनी जमुनी बनियाईन से हुआ, जिससे बोसारख नामक बेटा पैदा हुआ। इस पंवारा काव्य में लोरिक के एक भाई संवरू का भी वर्णन है। लोरिकायन की कथावस्तु मुख्यत: साबौर का जन्म प्रसंग, लोरिक अवतार, मंजरी का जन्म प्रसंग, लोरिक-मंजरी विवाह, राजा मौलागत और निरमालिया से युद्ध, सवरू और सतिया विवाह, झिमली और लोरिक युद्ध, चनैनिया-शिवहर विवाह तथा लोरिक-बेंठा चमार का युद्ध, लोरिक चनमा प्रेम और हरदीगढ़ प्रस्थान, रैया रणपाल और महिपत से लोरिक के युद्ध, लोरिक और चनमा का हरदीगढ़ में निवास, लोरिक-गजभिमला युद्ध, नेऊरपुर की चढ़ाई और लोरिक-हरेबा-बरेबा-युद्ध, सवरू और कोल युद्ध में संवरू की मृत्यु, लोरिक का बोहा बथान आगमन, पीपरीगढ़ की चढ़ाई तथा लोरिक और देवसिया युद्ध, लोरिक का देह त्याग और भोरिक का सफल नेतृत्व पर आधारित है।

डा. लक्ष्मी प्रसाद श्रीवास्तव अपने शोधग्रंथ ‘यदुवंशीय लोकदेव लोरिक’ में कहते हैं कि लोरिकायन का हरदीगढ़ और लोरिक का कर्मक्षेत्र बिहार के सहरसा जिला का हरदीस्थान है। वहीं डा. परशुराम चतुर्वेदी, ‘लोरिकायन एक अध्ययन’ में पेज संख्या 56 पर लिखते हैं कि “लोरिकायन से संबंधित हरदी उत्तरप्रदेश में नहीं बल्कि बिहार में ही कहीं स्थित है। लोरिकायनों में हरदीगढ़ भी अनेक प्रकार से वर्णित है इसलिए प्रत्येक क्षेत्र के लोरिकायन गायक, अपने-अपने क्षेत्र के हरदीस्थान को लोरिकायन वाला हरदीगढ़ मानकर युक्ति गढ़ लेते हैं।”

लोरिकायन के सभी कथारूपों में हरदी के साथ महीचन्द्र साहू, राजा महबैर, नेऊरपुर, नौहट्टा, गंजेरीपुर (गौरीपुर) खेरा नदी आदि का वर्णन मिलता है तथा रहुआ गांव, चन्द्रायन गांव, मैना गांव, बैराघाट, तिलाबे नदी, बैरागाछी, महबैरिया गांव आदि की चर्चा है। भाषा वैज्ञानिक तथा पुरातात्विक खोजों से स्पष्ट है कि बिहार के सुपौल से पांच किलोमीटर दूर, पूरब में हरदी नामक स्थान है।

डॉ. लक्ष्मी प्रसाद श्रीवास्तव ने अपने शोध निबंध ‘लोरिकायन’, जो पटना से प्रकाशित ‘आर्यावर्त’ अखबार में 2011 में छपा था, के माध्यम से बताया है कि लोरिक के स्थान बैराघाट में प्राप्त ईंटों और हरदी हाईस्कूल से सटे इलाके में खुदाई में प्राप्त ईंटों के आकार, प्रकार एवं स्वरूप एक जैसे हैं। इस शोध में यह उल्लेखनीय है कि सुपौल रेलवे स्टेशन पर रेलवे की ओर से एक बोर्ड लगाया गया है, जिसपर लिखा हुआ है कि “यहां से पांच किलोमीटर पूरब हरदी दुर्गास्थान में भगवती दुर्गा और वीर पुरुष लोरिक का ऐतिहासिक स्थल दर्शनीय है।”

बहरहाल, लोरिक की कहानी राजपूत क्षत्रियों के अत्याचार से समाज को उबारने की कहानी है। जैसा कि वीर लोरिक को काव्य और कथाओं से बाहर निकाल, समाज में एक स्तंभ के रूप में स्थापित करने वाले ददन सिंह यादव (पूर्व मंत्री, बिहार) बताते हैं, “भोजपुरी में लोरिकायन या लोरिक-चंदा की कहानी प्रेमगीत के रूप में गाई जाती है। मंजरी यदुकुल की एक लड़की थी जिस पर अगोरी राज्य के राजपूत राजा मौलागत की बुरी नजर थी। मंजरी को बचाने के लिए लोरिक राजा से लड़ जाता है और अंतत: विजय प्राप्त करता है।”

भारतीय पुरातत्ववेत्ता डा. वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार, “चंदायन हिन्दी का पहला प्रेमाख्यानक काव्य है जो मलिक मोहम्मद जायसी से दो सौ वर्ष पहले लिखा गया था। वह लोरिक-चंदा पर आधारित था। उसकी भाषा अवधी थी और यह कथा दोहों और चौपाईयों में लिखी गई थी। इस प्रेमाख्यानक काव्य यानी चंदायन के लेखक मुल्ला दाऊद चौदहवीं शताब्दी में फीरोजशाह तुगलक के समकालीन थे। इसकी जानकारी ‘तवारीख-ए-फीरोजशाही’ से ज्ञात होती है।” कपिलमुनि श्रीवास्तव ने ‘भोजपुरी’ पत्रिका के फरवरी, 1956 और जून,1958 अंकों में लोरिक वृत्तांत के उल्लेख क्रम में बंगाल की प्रसिद्ध जादूगरनी हिरिया-जिरिया को भी लोरिक पर समर्पित होने की चर्चा की है।

वस्तुत: लोरिकायन अज्ञात नाम गोत्रोत्पन्न जनकवि प्रणीत अहीर जाति के वीर पुरुष की कथा है। कालांतर में इसका प्रवाह जनभाषाओं में हुआ। आभीर जाति (अहीर) ने कृष्ण के बाद अपने इस एकमात्र प्रतिमान पुरुष को ईश्वर जैसा मान दिया तथा इसकी गाथा को गाया। लेकिन अभिजात-कुलीन विद्वानों ने इसकी उपेक्षा की। लोरिक कुलीन तबकों के मान-मर्दक थे इसलिए भी उन्हें लोरिकायन सुनना पसंद नहीं रहा होगा। इसके विपरीत, अहीर जाति के लोग इसे गा-कर आज भी प्रसन्न होते हैं तथा इस समाज में आज भी इस गाथा का गायन, रामायण सदृश्य अहीरायण समझा जाता है। इस जाति के लोग अपने पूज्य लोरिक का छांक पूजा से सम्मान करते हैं। यह पूजा ब्राह्मणरहित होती है। इस तरह की पूजा लोकांचलों में अनेक रूपों यथा लोरिकायन, वसावन, बखतौर, राजा सलहेस, दीना-भदरी, नटुवा दयाल, राह बाबा, कारिख बाबा और सोखा बाबा के रूपों में की जाती है। इन पर आधारित गाथाओं में नायक और नायिका मुख्यत: किसी न किसी शूद्र जाति से ही आते हैं और आर्यों के देवी-देवताओं के चक्रव्यूह को भेदते नजर आते हैं। लोरिक और लोरिकायन, बिहार, बंगाल, झारखंड, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिसा, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के साथ युगोस्लाविया, चेक गणराज्य, स्लोवाक, मॉरीशस, फिजी, गुयाना, नेपाल, हालैंड आदि में रह रहे अहीरों के बीच लोकप्रिय है। लोरिक का व्यक्तित्व लोकरक्षक का रहा है। उन्होंने एक व्यक्ति के रूप में एक युग को नेतृत्व प्रदान किया था। उन्हें आर्यों द्वारा बनाए गए असामाजिक समकालीन परिवेश से जूझना पड़ा था।

(फारवर्ड प्रेस के अक्टूबर 2013 अंक में प्रकाशित)


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