बहुजन परंपराओं का पुनर्जागरण

इतिहास और मिथकों पर आधारित यह संघर्ष न केवल एक नई जनसंस्कृति का निर्माण कर रहा है, वरन् सत्ता संघर्ष और चुनावी राजनीति में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।

बहुजन के जाति नायक

आज दलितों के राजनीतिक विमर्श का आधार, उनकी स्वयं की संस्कृति, जिसमें उनके जाति नायक और इन नायकों से जुड़ी सामूहिक स्मृतियां शामिल हैं, बन गया है। ये नायक और उनके आसपास बुने गए मिथक, दलितों की एक नई दासताभाव-मुक्त संस्कृति के विकास की दिशा में एक कदम हैं। यह नई संस्कृति, उस ब्राह्मणवादी संहिता की विलोम है, जो उन्हें ऊंची जातियों द्वारा स्वीकृत प्राचीन ग्रंथों के हवाले से रोज-बरोज अपमानित करती है।

ऐसे नायकों की तलाश, जो दलितों को एक नई पहचान दे सकें और उनका इस्तेमाल कर राजनीतिक सत्ता हासिल करने की कोशिश, निस्संदेह, दलित संस्कृति में एक क्रांतिकारी और मुक्तिदायी परिवर्तन है।

गिहार जाति एक शिल्पी समुदाय है, जिसका परंपरागत व्यवसाय पत्थरों से मूर्ति गढऩा है। वह अपने जातिगत इतिहास में महाराणा प्रताप व पृथ्वीराज चौहान (मध्यकालीन भारत के दो प्रसिद्ध राजपूत राजा) को शामिल कर रही है।

नीची जातियों के स्वयं को उच्च जातियों के नायकों से जोडऩे का एक और उदाहरण खटीकों का है। खटीक एक प्रमुख दलित जाति है, जिसके सदस्य उत्तरप्रदेश के लगभग सभी क्षेत्रों में फैले हुए हैं। खटीकों के रहवास के क्षेत्र, जिसे ‘खटीकाना’ कहा जाता है, उत्तरप्रदेश के सभी नगरों, कस्बों और गांवों में हैं। खटीकों को मेवाफरोश भी कहा जाता है, यद्यपि वे स्वयं को सोनकर कहलाना पसंद करते हैं, क्योंकि यह अधिक सम्माननीय लगता है। वर्तमान सामाजिक-आर्थिक वातावरण की मांग को पूरा करने के लिए, शहरी खटीकों ने मौखिक परंपरा में अपने जाति नायकों को खोजने का प्रयास किया। अपनी जाति के उदय के संबंध में गहन अनुसंधान करने के बाद वे स्वयं को महात्मा डरबलनाथ और संत किरोड़ीमल से जोडऩे में सफल हो गए। ये दोनों संत ऊंची जातियों के थे और इनका जिक्र हिन्दू धार्मिक ग्रंथों में मिलता है।

कानपुर के यतींद्र सोनकर इस समुदाय के गिने-चुने शिक्षित लोगों में से एक हैं। उन्होंने कड़ी मेहनत और गहन अनुसंधान के बाद अपनी जाति की वंशावली तैयार की है। उन्होंने इस वंशावली को अपने समुदाय में लोकप्रिय बनाने के लिए कई नाटक, कहानियां और उपन्यास भी लिखे हैं। इससे इस जाति के सदस्यों में आत्मसम्मान की भावना जागी है और वे अपनी इस नई पहचान पर गर्वित महसूस करते हैं। उन्होंने इन नायकों की जयंतियां भी मनाना शुरू कर दी हैं और इन अवसरों का उपयोग वे अपनी जाति की महिमा का वर्णन करने के लिए करते हैं।

हिन्दू जातिगत पदानुक्रम में भंगी सबसे नीचे की सीढ़ी पर खड़े हैं। चूंकि इस समुदाय के अधिकांश सदस्य साफ-सफाई का काम करते हैं, इसलिए उन्हें अत्यंत अपवित्र जाति माना जाता है। अलग-अलग राज्यों में उन्हें अलग-अलग नामों से जाना जाता है। उदाहरणार्थ, पंजाब में वे चूहड़ा कहलाते हैं जबकि उत्तरप्रदेश, बिहार और राजस्थान में उन्हें भंगी, मेहतर, झरमाली, हालाखोर, राउत, हेला, डोम, डोम्हर, बसोर आदि नामों से पहचाना जाता है।

पंजाब में जिन चूहड़ों ने सिख धर्म अपना लिया है वे मजहबी सिख व रंगरेटा कहलाते हैं। उत्तरप्रदेश में भंगियों ने स्वयं को रामायण के लेखक वाल्मीकि से जोडऩा शुरू कर दिया है। वाल्मीकि को ऊंची जातियां अत्यंत श्रद्धा की दृष्टि से देखती हैं। भंगी स्वयं को वाल्मीकि कहने लगे हैं और जोर-शोर से वाल्मीकि जयंती भी मनाते हैं। वाल्मीकि जयंती किस दिन होनी चाहिए, यह उन्होंने स्वयं तय कर लिया है।

पासियों ने स्वयं को परशुराम के साथ जोडऩे के अलावा, मध्यकाल में अपने कई जाति नायकों की खोज व अविष्कार कर लिया है। उनका दावा है कि इन नायकों ने देश के इतिहास व स्वाधीनता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिकाएं अदा की थीं। इन जाति नायकों का इस्तेमाल वे अपनी जाति पर गर्व करने और उसकी महिमा का गुणगान करने के लिए कर रहे हैं। लखनऊ, बहराइच, बाराबंकी, जौनपुर और इलाहाबाद के पासियों में बिजली महाराज की गाथा बहुत लोकप्रिय है। बहराइच में सुखदेव पासी नामक एक अन्य पासी चरित्र काफी लोकप्रिय है। दालदेव महाराज की जीवनगाथा, रायबरेली, जौनपुर और इलाहाबाद के पासी एक दूसरे को सुनते-सुनाते हैं। कौशांबी और इलाहाबाद में बालीदीन की किंवदंती लोकप्रिय है तो प्रतापगढ़, सुल्तानपुर और इलाहाबाद में बीरा पासी की दंतकथा इस जाति में गर्व का संचार करती है। अवध के इलाके में दालदेव पासी और उनके भाई बलदेव और काकोरन की कहानी प्रचलित है। ऐसा बताया जाता है कि ये तीनों भाई रायबरेली जिले के रहवासी थे।

चमार समुदाय इस तथ्य पर बहुत गर्वित महसूस करता है कि संत रविदास उनकी जाति के थे। संत रविदास, भक्तिकाल के सबसे लोकप्रिय व्यक्तित्वों में से एक हैं और वे सभी दलित जातियों के नायक हैं। यद्यपि चमार, जातिगत पदानुक्रम में काफी नीचे हैं तथापि वे मानते हैं कि संत रविदास केवल उनकी जाति के नायक हैं। यह जाति राजनीतिक दृष्टि से काफी जागरूक है, क्योंकि इसके सदस्य स्वयं को आम्बेडकर से जोड़ते हैं, जो महाराष्ट्र की महार जाति के थे। महाराष्ट्र के महार, उत्तरप्रदेश के चमारों के समकक्ष माने जाते हैं। जिन अन्य नायकों से चमार स्वयं को जोड़ते हैं उनमें संत कबीर और गौतम बुद्ध शामिल हैं (नाथ 2000: 3)।

धानुक, समाज के हाशिए पर जी रही एक अन्य छोटी-सी अछूत जाति है, जिसने अपनी जातिगत पहचान को मजबूती देने के लिए अपने नायक की तलाश में अपनी जाति की मौखिक परंपराओं को खंगाला। धानुकों को उनका नायक मिल गया। वे हैं पन्नाधाई जो चित्तौड़ के महाराजा राणासांगा के महल में काम करती थीं और महाराजा के उत्तराधिकारी कुंवर उदय सिंह की देखभाल की जिम्मेदारी संभालती थीं। ऐसा बताया जाता है कि उदय सिंह की जान बचाने के लिए पन्नाधाई ने अपने इकलौते पुत्र चंदन को कुर्बान कर दिया और इस तरह, चित्तौड़, अपने शत्रुओं के हाथों में जाने से बच गया। पन्नाधाई इस पूरे समुदाय की जाति नायक बन चुकी हैं। इस जाति की बस्तियां मुख्यत: कानपुर, इटावा, मैनपुरी, एटा और फीरोजाबाद में पाई जाती हैं। इसके सदस्य पन्नाधाई की स्मृति में हर साल कार्यक्रम व विभिन्न गतिविधियां आयोजित करते हैं (नाथ 2000: 4)।

एक अन्य स्रोत, जिसमें से दलित समुदायों ने अपने नायक खोज निकाले हैं वह है लोककथाएं। ये अधिकतर प्रेम कथाएं होती हैं, जिनके नायकों की ऐतिहासिक, सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिका का महिमामंडन किया जाता है। ऐसी ही एक कहानी का नायक है सोभानायक बंजारा, जो उत्तरी बिहार और नेपाल से लगे इलाके में रहने वाले बंजारा जाति के लोगों में प्रचलित एक कहानी का केन्द्रीय पात्र है। उत्तरप्रदेश के गोंडा और बहराइच में रहने वाले बंजारे भी सोभानायक को अपना नायक मानते हैं। इस मध्यकालीन प्रेम कथा में नायक अपने समुदाय के अन्य सदस्यों के साथ व्यवसाय करने दूर-दूर के स्थानों पर जाता है। उसकी राह में कई कठिनाइयां आती हैं परन्तु वह उन सब पर विजय प्राप्त करते हुए अंतत: अपने विरोधियों को परास्त करता है और उसका अपनी प्रेमिका से मिलन होता है।

मुसहर (एक अर्ध-घुमंतू समुदाय जो चूहे खाकर जीवित रहता है), बिहार के मिथिला क्षेत्र में रहते हैं। इनके बीच दीना-भदरी की कथा अत्यंत लोकप्रिय है। दीना और भदरी दो वीर भाई हैं जो सामाजिक स्तर पर संघर्ष करने के अलावा, मध्यकाल में उच्च जातियों की कई सेनाओं के दांत खट्टे कर देते हैं। लोककथाओं के दो अन्य नायकों देवसी और सवारी को भी मुसहर अपने पूर्वज मानते हैं। ये दोनों अलग-अलग क्षेत्रों में लोकप्रिय हैं। उत्तरप्रदेश के पिपरी और मिर्जापुर क्षेत्र में रहने वाले मुसहर, स्वयं को कोल जनजाति, जिसे चेरू के नाम से जाना जाता है, की एक शाखा मानते हैं। उनकी मान्यता है कि वे देवसी नामक प्रसिद्ध चरित्र के वंशज हैं। बिहार के गया और मगध क्षेत्र में सावरी का मिथक, मुसहरों को सावरी या सेवरी नाम के एक प्राचीन समुदाय से जोड़ते हैं, जो इतिहास के अंधकार में गुम हो गया है। इन तीनों मिथकों और उनसे जुड़े जाति नायकों का गीतों और कथाओं के जरिए प्रचार किया जाता है। बिहार के तीन अन्य गाथागीत नायक, जिनसे दुसाध जाति स्वयं को जोड़ती है वे हैं चूहड़मल, सलहेश व कुंवर विजयमल। दुसाध, मेलों और उत्सवों में गाए जाने वाले गीतों के माध्यम से अपने इन नायकों की स्मृति को जीवित रखते हैं। बिहार और उत्तरप्रदेश में इन नायकों की मूर्तियां भी लगाई गई हैं और इनके नाम से जुड़े सामाजिक-राजनीतिक संगठनों का गठन भी हुआ है।

विभिन्न दलित समुदायों के जाति नायकों में से केवल कुछ ही हैं जो दलितों की अलग पहचान का प्रतीक बनने का माद्दा रखते हैं। और ये सम्पूर्ण दलित समुदाय के नायक बन गए हैं। इनके जरिए दलित समुदाय स्वयं को गर्वित महसूस करता है और उसके आत्मसम्मान में वृद्धि होती है। जाति व सांस्कृतिक नायकों के अतिरिक्त, उत्तरप्रदेश के दलितों ने राष्ट्रीय आंदोलन से भी अपने कई नायक ढूंढ निकाले हैं और इनका इस्तेमाल दलितों के राजनीतिक एकीकरण के लिए किया जा रहा है।

यह महत्वपूर्ण है कि दलित मौखिक परंपरा में कुंवर सिंह, तात्याटोपे और नाना साहेब जैसे कुलीन राष्ट्रवादी नायकों के लिए कोई स्थान नहीं है। इस परंपरा में जिक्र है चेतराम जाटव, बल्लू मेहतर, बांके चमार, वीरा पासी, झलकारी बाई, उदादेवी, उनके पति मक्का पासी, अवंतीबाई लोधी, महावीरी देवी, मातादीन भंगी व उदैया चमार। ये सभी वे शहीद हैं, जिनका जन्म भारतीय समाज के निचले तबके में हुआ था। दलितों का दावा है कि उदादेवी और उनके पति मक्का पासी पूरे विश्व के इतिहास में एकमात्र विवाहित दंपत्ति हैं, जिन्होंने अपने देश की खातिर 1857 की क्रांति के दौरान, लखनऊ के सिकंदराबाद में अपनी जानें न्योछावर कर दीं थीं। दलितों का कहना है कि केवल पासियों को ही नहीं वरन् पूरे देश को स्वाधीन भारत के निर्माण में उनके योगदान पर गर्व करना चाहिए। दलित यह भी दावा करते हैं कि 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ हुए विद्रोह की शुरुआत मातादीन भंगी ने की थी। कुलीन राष्ट्रवादी मंगल पांडे, जिन्होंने बैरकपुर कैण्ट में अंग्रेजों के विरुद्ध सबसे पहले विद्रोह का झंडा उठाया था, को ऐसा करने की प्रेरणा मातादीन भंगी ने ही दी थी। इन नायकों की कथाओं का प्रचार किया जाता है, उन पर लोकगीत रचे जाते हैं, उनकी मूर्तियां स्थापित की जाती हैं और उनकी स्मृति को सुरक्षित रखने के लिए उत्सवों और मेलों का आयोजन किया जाता है।

ये नायक अपने-अपने इलाकों की लोकपरंपरा का हिस्सा बन गए हैं। उदाहरणार्थ उदैया चमार की कथा, अलीगढ़ क्षेत्र में लोकप्रिय है। मुजफ्फरनगर के आसपास के इलाके में महावीरी देवी वह दलित नायिका हैं, जो मौखिक परंपरा का हिस्सा बन गई हैं। झलकारी बाई बुंदेलखण्ड व मध्य उत्तरप्रदेश में लोकप्रिय हैं। वीरांगना उदादेवी की कथा उत्तरप्रदेश के मध्य क्षेत्र में प्रचलित है। मध्यप्रदेश से जुड़े इलाके अर्थात उत्तरप्रदेश का बघेलखंड, उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश में फैला बुंदेलखण्ड, दोनों राज्यों के बीच स्थित चित्रकूट का क्षेत्र और इलाहाबाद के आसपास के मध्यप्रदेश से जुड़े क्षेत्रों में दलित समुदायों में अवन्ती बार्ई लोधी का मिथक, लोककथाओं का अभिन्न हिस्सा बन गया है और बहुत मकबूल है।

सन् 1857 के स्वाधीनता संग्राम से जुड़ी कहानियों में से बसपा ने मायावती की छवि को चमकाने के लिए कुछ नायिकाओं जैसे झलकारी बाई, उदादेवी, महावीरी देवी, अवन्तीबाई लोधी इत्यादि को चुना है और इन नायिकाओं को संपूर्ण दलित समुदाय की नायिकाओं के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। उत्तरप्रदेश में बसपा के शासनकाल में इन नायिकाओं की मूर्तियां प्रदेश में कई जगहों पर स्थापित की गई हैं। झांसी में झलकारी बाई की मूर्ति, रानी लक्ष्मीबाई के किले के ठीक सामने स्थापित की गई है। इन नायिकाओं की स्मृति में कई मेले और उत्सव आयोजित किए जाते हैं और उनके नाम पर अनेक जाति संगठनों की स्थापना की गई है।

अपनी जाति की महिमा का वर्णन करते हुए निषाद, एकलव्य की कथा सुनाते हैं, जो प्रसिद्ध महाकाव्य महाभारत का एक चरित्र है। निषादों के एक अन्य मिथकीय नायक हैं कालू धीवर। वे मानते हैं कि कालू धीवर महान ऋषि नारद मुनि के गुरु थे। नारद, ब्राह्मण थे जबकि कालू धीवर मल्लाह थे। उनके पिता का नाम कोन्दव और माता का श्यामादेवी था। निषाद मानते हैं कि भगवान विष्णु ने नारद से कहा कि वे पृथ्वी पर जाएं और किसी मानव को अपना गुरु बनाएं। नारद ने भगवान से पूछा कि वे किसी मनुष्य को अपना गुरु कैसे बना सकते हैं क्योंकि धरती पर रहने वाले सभी मनुष्य देवताओं की आराधना करते हैं। इस पर भगवान विष्णु ने उनसे कहा कि धरती पर जिस भी मानव से उनकी सबसे पहले भेंट हो, वे उसे अपना गुरु बना लें। जब नारद मुनि धरती पर अवतरित हुए तो उनकी मुलाकात सबसे पहले कालू धीवर से हुई, जो गंगा नदी में मछली पकडऩे के लिए अपना जाल डाल रहा था। भगवान विष्णु के आदेश के कारण नारद, कालू धीवर को अपना गुरु स्वीकार करने के लिए मजबूर थे, परंतु उन्हें इसमें संदेह था कि वे अपने इस गुरु से कोई भी ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे। जब उन्होंने अपने इस संदेह से भगवान विष्णु को अवगत कराया तो भगवान ने उनसे कहा कि अपने गुरु से ज्ञान प्राप्त करना उनका कर्तव्य है और अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया तो उन्हें किसी महिला के गर्भ से 84 बार पुनर्जन्म लेना होगा। यह सुनकर नारद धरती पर वापस आए और कालू धीवर को अपने गुरु के रूप में स्वीकार कर लिया। इसलिए निषाद गर्व से दावा करते हैं कि भले ही सारे पृथ्वीवासियों के गुरु ब्राह्मण हों परंतु ब्राह्मणों का गुरु एक निषाद है।

अन्य धर्मों के विकास में अपने समुदाय की भूमिका पर भी निषाद गर्व महसूस करते हैं। अपने समुदाय के सदस्यों की वीरता और साहस का वर्णन करने के लिए वे हिम्मतराय धीवर के मिथक का इस्तेमाल करते हैं, जिन्होंने सिख धर्म की रक्षा की खातिर अपनी जान न्योछावर कर दी थी। फूलनदेवी, रानी रसमणी व अवन्तीबाई लोधी तीन अन्य नायिकाएं हैं जो निषादों की पौराणिकी का हिस्सा बन चुकी हैं। निषादों की महिमा का वर्णन करने वाली कथाओं को मुख्यत: ‘निषाद वंशावली’ नामक एक पुस्तक से लिया गया है, जिसके लेखक एक आर्यसमाजी देवी प्रसाद थे और जिसका प्रकाशन अंग्रेजों के राज के दौरान सन् 1907 में हुआ था।

यह स्पष्ट है कि हर जाति के सदस्यों की अलग-अलग राजनीतिक प्रतिबद्धताएं होती हैं। ऐसे में किसी एक-सा इतिहास या समान पहचान का निर्माण करना एक कठिन काम है। इस तथ्य के बावजूद यह स्पष्ट है कि मिथकों और जातिगत इतिहास की, दलित समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका है। ये समुदाय स्वयं को सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक दृष्टि से शक्तिशाली बनाना चाहते हैं। इतिहास और मिथकों पर आधारित यह संघर्ष न केवल एक नई जनसंस्कृति का निर्माण कर रहा है, वरन् सत्ता संघर्ष और चुनावी राजनीति में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।

(फारवर्ड प्रेस के अक्टूबर 2013 अंक में प्रकाशित)


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