सीताराम केसरी : नायकों के नायक

कांग्रेस में आज जो भी ओबीसी नेता हैं, उन्हें सीताराम केसरी ने ही आगे बढाया। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री धरम सिंह, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, वीरप्पा मोइली आदि नेताओं को उन्होंने ही आगे बढने में मदद की

रांची की बिरसा मुंडा जेल में बंद सामाजिक न्याय के अप्रतिम योद्धा लालू प्रसाद यादव को इन दिनों मरहूम सीताराम केसरी की याद सबसे ज्यादा आती होगी। उन्हीं सीताराम केसरी की, जो हर मुसीबत से लालू प्रसाद यादव को उबारने के लिए तत्पर रहते थे। कांग्रेस में रहते हुए केसरी ने सामाजिक न्याय के कारवां को आगे बढाने के लिए हरसंभव और बेमिसाल प्रयास किए। कांग्रेस जैसी पार्टी में आदिवासियों, दलितों और पिछड़ों की तरफदारी की शुरुआत सीताराम केसरी से ही मानी जाती है। इसीलिए उत्तर भारत में पिछड़ों तक अपनी पहुंच बनाने के लिए कांग्रेस पार्टी ने सीताराम केसरी को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया था।

24 अक्टूबर, 2000 को लम्बी बीमारी के बाद, नई दिल्ली के एम्स में केसरी का निधन हो गया। सीताराम केसरी का जन्म पटना जिला के दानापुर में 1916 में एक पिछड़ी जाति के बनिया परिवार में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा दानापुर में हुई। सीताराम केसरी, 13 वर्ष की उम्र में ही स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए थे। वे ढ़ोलक बजाकर दानापुर की गलियों में घूमते थे और आजादी का अलख जगाते थे। 1930 से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक, वे कई बार जेल गए और कई महीनों तक जेल में रहे। आजादी के पहले से ही वे कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता बन गए थे। सीताराम केसरी सन् 1967 में जनता पार्टी के टिकट पर बिहार के कटिहार से पहली बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए। इसके बाद उन्होंने फिर से कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली और आजीवन कांग्रेसी ही बने रहे। सीताराम केसरी को 1973 में कांग्रेस का बिहार प्रदेशाध्यक्ष बनाया गया। 1980 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कोषाध्यक्ष बने और लगभग 16 सालों तक इस पद पर रहे। उनके कोषाध्यक्ष कार्यकाल के दौरान यह उक्ति काफी प्रचलित हुई थी- ‘न खाता न बही, जो चाचा केशरी कहे, वही सही।’ केसरी जुलाई 1971 से अप्रैल 2000 तक बिहार से पांच बार राज्यसभा के सदस्य रहे। वे इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और नरसिंहाराव की सरकारों में केन्द्रीय मंत्री रहे। उल्लेखनीय है कि उन्हीं के कार्यकाल (सामाजिक न्याय एवं कल्याण मंत्रालय) में आम्बेडकर के समग्र लेखन और भाषण को अंग्रेजी और हिंदी में 20 से अधिक खंडों में ‘डा. आम्बेडकर : सम्पूर्ण वांड्मय’ के रूप में प्रकाशित किया गया था। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि 1991 में मंडल आयोग की संस्तुति के तहत, जिस पहले ओबीसी युवा को सरकारी नौकरी का नियुक्ति पत्र मिला था, वह नियुक्ति पत्र प्रदान करने वाले कोई और नहीं बल्कि सीताराम केसरी ही थे।

सीताराम केसरी को 3 जनवरी 1997 को बाकायदा कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया था। इस तरह वे बाबू जगजीवन राम के बाद कांग्रेस के सबसे बड़े गैर सवर्ण अध्यक्ष बने। सीताराम केसरी एक सधे हुए राजनीतिज्ञ थे। जिस समय उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष का कार्यभार संभाला था, उस समय कांग्रेस काफी मुश्किलों में थी। केन्द्र में एचडी देवेगौड़ा के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चा की सरकार थी। सीताराम केसरी ने सबसे पहले देवेगौड़ा की सरकार को गिराकर, इंद्रकुमार गुजराल को प्रधानमंत्री बनाया। नवम्बर 1997 के पहले सप्ताह में जैन आयोग (राजीव गांधी की हत्या की जांच करने वाला न्यायिक आयोग) की रिपोर्ट के कुछ अंश मीडिया में लीक हो गए, जिसमें करुणानिधि की पार्टी डीएमके और एलटीटीई के आपसी संबंधों की बात थी। गुजराल सरकार में डीएमके के तीन मंत्री शामिल थे। कांग्रेस ने डीएमके के मंत्रियों को हटाने के लिए दबाव डाला लेकिन प्रधानमंत्री गुजराल ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। उसके बाद सीताराम केसरी ने समर्थन वापस लेकर गुजराल सरकार को गिरा दिया। केसरी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और सांप्रदायिक ताकतों के कट्टर आलोचक थे। कोयम्बटूर में लालकृष्ण आडवाणी की सभा में बम विस्फोट हुआ, जिसमें 50 से ज्यादा लोग मारे गए। केसरी ने इन धमाकों में संघ का हाथ होने की बात कही थी।

सीताराम केसरी की मृत्यु पर ‘द हिन्दू’ ने 25 अक्टूबर 2000 के अंक में लिखा कि ‘सीताराम केसरी की मृत्यु से कांग्रेस ने मंडल आयोग की वकालत करने वाला अपना एकमात्र नेता खो दिया है। केसरी के कारण सामाजिक न्याय के साथ कांग्रेस का जो जुड़ाव था, वह टूट गया है। सीताराम केसरी, ओबीसी राजनीति को आगे बढाने वाले नेता के रूप में हमेशा याद किए जाएंगे।’

कांग्रेस में आज जो भी ओबीसी नेता हैं, उन्हें सीताराम केसरी ने ही आगे बढाया। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री धरम सिंह, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, वीरप्पा मोइली आदि नेताओं को उन्होंने ही आगे बढने में मदद की। कांग्रेस प्राय: केवल ब्राह्मणों को ही मुख्यमंत्री बनाती रही थी! अशोक गहलोत दुबारा मुख्यमंत्री इसीलिए बन पाए, क्योंकि सीपी जोशी विधानसभा का चुनाव हार गए थे। केसरी के घर के दरवाजे मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान, नीतीश कुमार और कांशीराम के लिए हमेशा खुले रहे। नीतीश कुमार तो उन्हें भारतीय राजनीति का ‘चाचा’ कहते थे। सामाजिक न्याय के झंडाबरदार होने के कारण, लालू प्रसाद यादव की उन्होंने काफी मदद की। जब नारायणपुर, बिहार में 11 दलितों की हत्या को मुद्दा बनाकर, भाजपा ने राबड़ी देवी की सरकार को बर्खास्त करने का प्रयास किया तब सीताराम केसरी ने ही राज्यसभा में संबंधित प्रस्ताव को पास नहीं होने दिया।

गांधी-नेहरू परिवार की अनुपस्थिति में सीताराम केसरी ने कांग्रेस को संभाला लेकिन जैसे ही सोनिया गांधी का पदार्पण हुआ, उनके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया गया। एक निर्वाचित अध्यक्ष को उसके पद से हटा दिया गया और सोनिया गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया गया।

(फारवर्ड प्रेस के नवंबर 2013 अंक में प्रकाशित)


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