हिन्दू धर्म भारत को एक राष्ट्र क्यों नहीं बना सका

बैरकपुर में एक ब्राह्मण सिपाही मंगल पांडे द्वारा 1857 में चलाई गई पहली गोली के साथ ब्रिटिश राज के विरुद्ध ‘सैन्य विद्रोह’ शुरू हुआ। इसे व्हीडी सावरकर ने अपनी पुस्तक ‘द इंडियन वार ऑफ इन्डीपेंडेंस’ और सुरेंद्रनाथ सेन ने ‘एट्टीन फि फ्टी सेवन’ में इसे ‘भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम’ बताया है

ईस्वी सन् 1000 से 1026 के बीच महमूद गजनी ने भारत पर कम से कम 16 बार हमला किया। उसने गंगा तक के अपने रास्ते में पडऩे वाले भव्य मंदिरों को नष्ट किया और संपत्ति लूटी। हर बार उसकी सेना खैबर दर्रा पार कर भारतीय उपमहाद्वीप में प्रवेश करती थी। किसी भारतीय राजा ने क्यों ऐसी कोई रणनीति नहीं बनाई कि गजनी पांच नदियों को पार न कर सके? किसी के मन में भारत की महान दीवार बनाने का विचार क्यों नहीं आया ? हमारे राजा गजनी से लडऩे के लिए एक क्यों नहीं हो सके?
एक उत्तर है : उस समय हमारे किसी शासक की कल्पना में भी भारत का एक राष्ट्र के रूप में अस्तित्व नहीं था। सौभाग्यवश, महमूद की रुचि शासन करने में नहीं थी वह केवल लूटपाट करना चाहता था। इससे हमारे शासकों को भविष्य में होने वाले आक्रमणों को रोकने की व्यवस्था करने के लिए 200 सालों का समय मिल गया-सिवाय इसके कि किसी को खैबर दर्रे के खतरे का ख्याल नहीं रहा।

हमारे कई शासक अत्यंत साहसी थे। परंतु उनके बाद की पीढ़ी किसी भी हमले के लिए इसलिए तैयार नहीं रहती थी क्योंकि उस वक्त किसी हिन्दू या बौद्ध ने इतिहास नहीं लिखा। अगर आज हम महमूद गजनी के भयावह हमलों के बारे में इतना कुछ जानते हैं तो उसका कारण यह है कि भारत का पहला इतिहास एक ईरानी अलबरूनी ने लिखा था, जो गजनी के साथ रहता था।

सन् 1191 में दिल्ली, अजमेर और सांभर के आखिरी हिन्दू राजा पृथ्वीराज चौहान ने राजपूत राजाओं का एक गठबंधन बनाकर मोहम्मद गौरी को तराइन की लड़ाई में पराजित कर दिया। कुछ ही महीनों बाद, 1192 में, मोहम्मद गौरी फिर तराइन आया और उसने पृथ्वीराज चौहान को युद्ध में हराकर मार डाला। इसके साथ ही शुरुआत हुई भारत के बड़े हिस्से पर इस्लामिक शासन की जो लगभग सात शताब्दियों तक कायम रहा। पृथ्वीराज की हार क्यों हुई ? इसलिए क्योंकि उसके मौसेरे भाई, कन्नौज के राजा जयचंद राठौर ने मुस्लिम आक्रांता का साथ दिया।
सन् 1527 में खानवा में भारतीय राजाओं (हिन्दू और मुस्लिम राजपूत) की कहीं बेहतर सेना ने बाबर की हतोत्साहित सेना को पूरी तरह घेर लिया था। परंतु इसके बावजूद वे क्यों हार गए? उनकी हार से देश में मुगल साम्राज्य की शुरुआत हुई। आगे चलकर महाराणा प्रताप के भाईयों ने महानतम मुगल बादशाह अकबर की सेना में अधिकारी बतौर काम क्यों किया?

भारतीय इतिहासकार इन प्रश्नों का उत्तर देने से बचते हैं। दरअसल, भारत को जिस एक कारक ने राष्ट्र बनने से रोका, वह था हिन्दू धर्म द्वारा जनित और उस पर आधारित सामाजिक-राजनीतिक संस्कृति। महाराणा प्रताप (1540-1597) भारत के लिए नहीं लड़ रहे थे, वे अपने छोटे से चित्तौड़ राज्य के लिए लड़ रहे थे। तब आखिर क्यों अन्य राजा उनके किले की खातिर अपनी जान की बाजी लगाते ? न तो महाराणा प्रताप और ना ही अन्य किसी ने कभी भारत को ‘एक राष्ट्र के रूप में देखा’।

ईसा के 300 साल पूर्व यूनान ने चंद्रगुप्त मौर्य को विश्व को सिकंदर महान के जरिए साम्राज्य की अवधारणा दी। भारत में बाइबिल की शिक्षाओं ने साम्राज्य के अनिष्टकारी विचार के बदले राष्ट्र की पवित्र अवधारणा प्रस्तुत की। साम्राज्य में लोग केवल प्रजा होते हैं। राष्ट्र में वे नागरिक होते हैं। साम्राज्य में आपको टैक्स देना होता है परंतु आपसे इस बारे में कोई सलाह-मशविरा नहीं किया जाता कि आपसे कितना धन वसूला जाए और ना ही इस बात में आपका कोई दखल होता है कि आपके पैसे का क्या इस्तेमाल किया जाएगा-उससे ताजमहल बनेगा या सिंचाई के लिए बांध। राष्ट्र में आपके अधिकार और कर्तव्य होते हैं, आपकी जिम्मेदारियां होती हैं, आपको आगे बढऩे के अवसर मिलते हैं और राष्ट्र एक न्यायपूर्ण व समतामूलक समाजिक ढांचे की स्थापना में सहायक बनता है।

यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है कि छुआछूत की व्यवस्था को धार्मिक स्वीकृति प्राप्त होने के कारण, शूद्रों को ऊंची जाति के उन राजाओं की खातिर अपनी जान गंवाने की कतई इच्छा नहीं रहती थी, जो उन्हें मनुष्य ही नहीं मानते थे। पर राजा आपस में एक होकर अपने राज्यों का बचाव क्यों नहीं कर सकते थे ? इसका एक कारण था अश्वमेध यज्ञ-एक ऐसा धार्मिक अनुष्ठान जिससे छोटे-मोटे राजा भी स्वयं को विश्वविजेता समझने लगते थे। जाहिर है कि ऐसे में उनके लिए दूसरे राजाओं के साथ एकता स्थापित करना असंभव हो जाता था।

उत्तर भारत में जयचंद वे आखिरी हिन्दू राजा थे, जिन्होंने विश्व का शासक बनने की खातिर अश्वमेध यज्ञ किया। उनके वीर मौसेरे भाई पृथ्वीराज ने जयचंद की अन्य राजाओं को अपना जागीरदार बनाने की कोशिश का विरोध किया। जयचंद ने पृथ्वीराज को उसकी औकात बताने के लिए उसकी एक मिट्टी की मूर्ति बनाई और उसे द्वारपाल के स्थान पर रख दिया। पृथ्वीराज ने अपने इस अपमान का बदला लेने के लिए जयचंद की लड़की संयोगिता का अपहरण कर लिया और उसके साथ भाग गया। जयचंद की पुत्री अपने मौसा पृथ्वीराज से प्रेम करती थी।

इसके लगभग 700 साल बाद, जब मुगल साम्राज्य अंदर से जर्जर हो चुका था, एक अन्य हिन्दू राजा, जयपुर के महाराजा जयसिंह द्वितीय (1688-1743) ने उत्तर भारत का शासक बनने के लिए अश्वमेध यज्ञ किया। इसके मात्र 14 साल बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के क्लर्क राबर्ट क्लाइव ने प्लासी के युद्ध (1757) में जीत हासिल की। इसके साथ ही शुरू हुई वह प्रक्रिया, जिसका अंत भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना से हुआ।

बैरकपुर में एक ब्राह्मण सिपाही मंगल पांडे द्वारा 1857 में चलाई गई पहली गोली के साथ ब्रिटिश राज के विरुद्ध ‘सैन्य विद्रोह’ शुरू हुआ। इसे व्हीडी सावरकर ने अपनी पुस्तक ‘द इंडियन वार ऑफ  इन्डीपेंडेंस’ और सुरेंद्रनाथ सेन ने  ‘एट्टीन फि फ्टी सेवन’ में इसे ‘भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम’ बताया है। परंतु आरसी मजूमदार ने ठीक ही लिखा है कि ‘केवल अंग्रेजों के खिलाफ  युद्ध-भले ही उसका उद्देश्य उनको यहां से भगाना हो-को भारतीय स्वाधीनता संग्राम नहीं कहा जा सकता।’ उन्होंने यह भी लिखा, ‘कुल मिलाकर इस निष्कर्ष पर पहुंचना मुश्किल नहीं है कि 1857 का तथाकथित प्रथम राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम न तो प्रथम था, न राष्ट्रीय और न ही स्वाधीनता संग्राम।’

जिन्होंने इस लड़ाई में भाग लिया वे वीर और साहसी थे। उनके पास अंग्रेजों से नफरत करने के पर्याप्त कारण थे। वे अंग्रेजों से छुटकारा पाना चाहते थे। परंतु उनका साहसिक संघर्ष असफ ल हो गया क्योंकि उनके पास एक भी ऐसा नेता नहीं था जिसे स्वाधीनता या भारतीय राष्ट्र की अवधारणा की समझ हो। विद्रोही मेरठ से दिल्ली पहुंचे और बिना किसी विशेष कठिनाई के उन्होंने दिल्ली पर कब्जा कर लिया। दिल्ली को अंग्रेजों से ‘मुक्त’ कराने के बाद उन्होंने मुगलों के अत्यंत नाकारा वंशज बहादुरशाह जफ र को भारत का नया बादशाह घोषित कर दिया।

विपिन चंद्र व मृदुला मुखर्जी अपनी पुस्तक ‘इंडियाज स्ट्रगल ‘फॉर फ्रीडम’ में लिखते हैं, ‘विद्रोहियों में एक समानता थी वह यह कि वे सब विदेशी शासन से घृणा करते थे। परंतु उनकी न तो कोई राजनीतिक दृष्टि थी और ना ही भविष्य का कोई स्पष्ट खाका उनके दिमाग में था। वे तो स्वयं अपने ही अतीत के कैदी थे। वे अपने विशेषाधिकारों को फि र से पाने के लिए लड़ रहे थे। आश्चर्य नहीं कि वे एक नई राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना करने में असफ ल रहे।’ जॉन लारेन्स ने ठीक ही लिखा है कि ‘अगर उनमें से एक भी काबिल नेता उभर आता तो हम हमेशा के लिए हार जाते।’

इतिहासविद् पर्सिवल स्पीयर कहते हैं कि 1857 का विद्रोह मुगल/मराठा काल की ओर वापस लौटने का प्रयास था। इसका उद्देश्य पीछे जाना था न कि आगे बढ़कर आधुनिक भारत का निर्माण करना।

तब फि रइस विद्रोह की आधुनिक भारत के विकास में क्या भूमिका थी या क्या योगदान था? विद्रोह ‘के पीछे स्पष्ट धार्मिक उद्देश्य थे। विद्रोही गुजरे हुए समय को वापस लाना चाहते थे-उस युग को जब मुगल और मराठा साम्राज्य एक दूसरे से अनवरत युद्धरत रहते थे। किसानों के विद्रोह के पीछे सरकारी कार्यवाहियों के प्रति उनका असंतोष था। कहीं भी ऐसा नहीं लग रहा था कि विद्रोही दूरंदेशी हैं और एक मजबूत व एकीकृत भारत का निर्माण करना चाहते हैं…विद्रोह का चरित्र बिखरा हुआ था और वह पुराने दिनों के प्रति अतिशय मोह से ग्रस्त था।’

इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि भारतीय बुद्धिजीवियों और व्यापारियों ने विद्रोह का विरोध किया और अंग्रेजों की जीत के लिए सार्वजनिक प्रार्थना सभाएं आयोजित कीं। माइकल एडवर्डेस के शब्दों में इसका कारण यह था कि विद्रोहियों की पश्चिमी शासन के प्रति प्रतिक्रिया ‘सामंती’ थी, ‘राष्ट्रीय’ नहीं।

मूलत: विद्रोह के पीछे था बंगाल आर्मी में असंतोष। और यह असंतोष, ब्रिटिश शासन के दबाव पर सामंती प्रतिक्रिया थी। यह दबाव समाज के हर स्तर पर महसूस किया जा रहा था। विद्रोहियों के पीछे अपना-अपना हित साधने के इच्छुक कई समूह इकट्ठा हो गए थे। इनमें से कई के हित परस्पर विरोधाभासी थे। विद्रोह के ‘राष्ट्रीय चरित्र’ के मुद्दे पर बहुत मतविभिन्नता है-जिसे मुख्यत: भारतीय इतिहासविदें ने जन्म दिया है। विद्रोह का चरित्र कतई राष्ट्रीय नहीं था। जो सामंती तत्व इसमें शामिल थे, उनकी एकमात्र इच्छा यह थी कि चीजें फि र से सेवैसी ही हो जाएं जैसी अंग्रेजों के आने के पहले थीं। सिपाहियों ने, उनके विचार से, आत्मरक्षा में विद्रोह किया। स्वाभाविकत: अन्य तत्वों ने कानून और व्यवस्था भंग हो जाने का फायदा उठाया। कुछ क्षेत्रों में विद्रोहियों के तेवर आधुनिकता-विरोधी थे और उन्होंने फैक्ट्रियों और मशीनों पर हमले किए और उन्हें नष्ट कर दिया। यह एक तरह की वर्ग शत्रुता का नतीजा भी हो सकता है क्योंकि हमले मुख्यत: उन लोगों पर हुए जिन्हें ब्रिटिश शासन से लाभ हुआ था जैसे बैंकर, साहूकार आदि, जो व्यवसायी और उद्यमी भी थे। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘ए हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ में रोमिला थापर ऐसे एक दर्जन से अधिक कारणों की चर्चा करती हैं, जिनके चलते भारतीय राजा, महमूद गजनी, मोहम्मद गौरी और कुतुबुद्दीन जैसे हमलावरों को नहीं रोक सके। एक मुख्य समस्या यह थी कि हिन्दू शासक ‘आपसी झगड़ों’ में उलझे रहते थे।’विभिन्न राजपूत राजवंश 11वीं और 12वीं शताब्दियों में एक दूसरे से अनवरत युद्धरत रहे। राज्य कभी एक राजा के हाथों में रहता था तो कभी दूसरे राजा के। जमीन पर कब्जा करने की प्रतियोगिता लगातार चलती रहती थी। अपना शौर्य दिखाने का एक ही तरीका था-युद्ध लडऩा।’ बाद में मोहम्मद गौरी के हमले का प्रतिकार करने के लिए ‘राजपूत राजा किसी तरह (पृथ्वीराज के नेतृत्व में) इकट्ठा हुए परंतु वे तब भी आपसी शत्रुता और ईष्र्या को भुला न सके।’ नतीजा वही हुआ जो होना था। उनकी बुरी तरह हार हुई।

प्रश्न यह है कि महाराजा आपस में इस हद तक क्यों लड़ते थे कि उनका स्वयं का नाश हो जाए ?

राष्ट्र की अवधारणा की अनुपस्थिति एक समस्या थी। परंतु इससे भी गहरी समस्या आध्यात्मिक थी। उदाहरणार्थ, अश्वमेध यज्ञ का शासक वर्ग पर वही प्रभाव पड़ता था, जो कि जाति प्रथा का सामान्य जनों पर-महान वही है जो गर्वित और घमण्ड में चूर है, इस विचार ने जड़ पकड़ ली। इससे शासन की प्रकृति के बारे में जिस धारणा ने जन्म लिया, वह ईसा मसीह की शिक्षाओं के विरुद्ध थी, जिन्होंने कहा था ‘धन्य हैं ये, जो नम्र हैं, क्योंकि वे पृथ्वी के अधिकारी होंगे’ (मत्ती 5: 5)। ईसा की शिक्षाओं को समझाते हुए प्रचारक पीटर ने कहा, ‘तुम सब के सब एक दूसरे की सेवा के लिए दीनता से कमर बांधे रहो, क्योंकि परमेश्वर अभिमानियों का विरोधी है, परंतु दीनों पर अनुग्रह करता है (1 पतरस 5: 5)।

1000 साल पहले इंग्लैण्ड भी क्षुद्र राजाओं द्वारा शासित एक भौगोलिक क्षेत्र था। उन्होंने एक होकर राष्ट्र का स्वरूप ग्रहण किया और चैनल के उस पार से होने वाले आक्रमणों का प्रतिरोध किया। उनके स्वहित और उनकी पुरानी दुश्मनियां उन्हें छोटे-छोटे राज्यों में नहीं बांट सकीं क्योंकि मेग्नाकार्टा ने बाइबल की न्याय की अवधारणा को उनके राष्ट्र का आधार बना दिया था। इसके विपरीत, अश्वमेघ यज्ञ ने न्याय नहीं बल्कि शक्ति को भारतीय राज्यों का आधार बनाया।

भारत एक राष्ट्र तभी बन सका जब पंडित जवाहरलाल नेहरु जैसे हमारे नेताओं ने उस धार्मिक संस्कृति को खारिज किया, जिसने जयचंदों और पृथ्वीराजों को जन्म दिया था। नेहरु ने ईसा मसीह का अनुकरण किया, जिन्होंने यह सिखाया था कि महानतम बनने, प्रधानमंत्री बनने का अर्थ है लोगों का ‘प्रथम सेवक’ होना। अगले लेख में मैं बताऊंगा कि किस तरह बाइबल ने भारत को एक राष्ट्र बनाया और किस तरह वह उसे एक महान राष्ट्र बना सकती है।

(फारवर्ड प्रेस के फरवरी, 2014 अंक में प्रकाशित )


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