बसपा और सपा कांग्रेस की ए और बी टीम हैं : मातंग

बहुजन मुक्ति पार्टी दलित संकल्पना को मान्यता ही नहीं देती क्योंकि इस शब्द को डॉ बाबासाहेब आम्बेडकर ने कभी मान्यता नहीं दी। अगर डॉ आम्बेडकर ने दलित शब्द को मान्यता दी होती तो यह भी एक संवैधानिक शब्द होता

दलित-बहुजन हितार्थ बहुजन मुक्ति पार्टी (बीएमपी) अस्तित्व में आई है और अगले लोकसभा चुनाव की तैयारी में लगी हुई है। बीएमपी मानती है कि सभी राजनीतिक पार्टियां ब्राहमणवाद को मजबूत करने में जुटी हुई हैं जबकि उसका उद्देश्य वर्तमान व्यवस्था को उखाड़ फेंकना है। वह बसपा, सपा जैसी तथाकथित दलित-बहुजन पार्टियों को भी कठघरे में खड़ा करती है। वह दलित शब्द के प्रयोग पर भी आपत्ति व्यक्त करती है और कहती है कि यह एक असंवैधानिक शब्द है। आइए, जानते हैं कि ऐसे मुद्दों और सवालों पर बीएमपी के अध्यक्ष वीएल मातंग ने फारवर्ड प्रेस के मुख्य संवाददाता अमरेंद्र यादव से क्या कहा…    

बहुजन मुक्ति पार्टी की आवश्यकता क्यों पड़ी ?

वर्तमान द्विदलीय व्यवस्था में यूपीए और एनडीए की वजह से लोकतंत्र खत्म हो चुका है। इनमें से एक शासन में होता है और एक विपक्ष में। लेकिन दोनों पार्टियों की नीतियां एक ही हैं। निजीकरण, सेज, ओबीसी, क्रीमी लेयर, जाति जनगणना, शिक्षा का व्यापारीकरण, आरक्षण का बैकलॉग भरने, बेरोजगारी, कुपोषण और एफ डीआई के संदर्भ में उनकी नीतियां एक ही हैं। क्षेत्रीय दल भी उनके पिछलग्गू बन चुके हैं। कुल मिलाकर सभी राजनीतिक पार्टियों का चरित्र ब्राम्हणवाद को मजबूत करने वाला हो गया है। ब्राम्हणवादी व्यवस्था को खत्म करने के मुद्दे को कोई भी पार्टी नहीं उठा रही है। वर्तमान व्यवस्था को खत्म करने के लिए ही बहुजन मुक्ति पार्टी का निर्माण हुआ है।

बहुजन मुक्ति पार्टी का जन्म बामसेफ से हुआ है, जो मुख्यत: एक सामाजिक संगठन है। यह राजनीति में नहीं आने की घोषणा करता रहा है। ऐसे में चुनाव लडऩे की घोषणा करना क्या संगठन के कार्यकर्ताओं और समर्थकों की भावनाओं को आहत करना नहीं है ?

बहुजन मुक्ति पार्टी बामसेफ के उद्देश्य एवं विचारधारा से प्रेरणा लेकर बनाई गई है। यह बामसेफ द्वारा बनाई हुई पार्टी नहीं है, क्योंकि बामसेफ सरकारी कर्मचारियों का संगठन है। उसके सदस्य न तो कोई पार्टी बना सकते हैं और ना ही किसी पार्टी की सदस्यता ले सकते हैं। बामसेफ जिन मुद्दों पर समाज में जागृति ला रहा है, उन्हीं मुद्दों को बीएमपी चुनाव में उठा रही है। इसमें आहत होने का कोई कारण नहीं है।

भारत में कई पार्टियां आदिवासी, दलित और ओबीसी के नाम पर चुनाव लड़ती हैं, आप उनसे अलग कैसे हैं?

बहुजन मुक्ति पार्टी दलित संकल्पना को मान्यता ही नहीं देती क्योंकि इस शब्द को डॉ बाबासाहेब आम्बेडकर ने कभी मान्यता नहीं दी। अगर डॉ आम्बेडकर ने दलित शब्द को मान्यता दी होती तो यह भी एक संवैधानिक शब्द होता। राजनीतिक पार्टियां केवल दलितों और ओबीसी को गुमराह करके उनके वोट लेने में व्यस्त हैं। बहुजन मुक्ति पार्टी अनुसूचित जाति-जनजाति, ओबीसी एवं अल्पसंख्यकों में सच्चा प्रतिनिधित्व का निर्माण करने के एजेण्डे के तहत चुनाव लड़ेगी। बीएमपी के चुनावी मुद्दे ब्राम्हणवाद को मजबूत करने वाले नहीं बल्कि उसका ध्वंस करने वाले होंगे।

चुनाव लडऩे के लिए बहुत धन की आवश्यकता होती है। आप इसकी व्यवस्था कैसे करेंगे?

आपकी बात सही है। वर्तमान समय में चुनाव लडऩे के लिए भारी मात्रा में धन की आवश्यकता होती है और हम जिन लोगों के विरोध में चुनाव लड़ रहे हैं, उनके पास अकूत काला धन है। धन के आधार पर हम उनसे मुकाबला नहीं कर सकते लेकिन यह भी सच्चाई है कि उनके पास धन तो है परंतु जन नहीं हैं। इसलिए उन्हें वोट खरीदना पड़ता है। हम चुनाव अपने संगठन के दम पर लड़ेंगे और ऐसे मुद्दे उठाएंगे जो अन्य पार्टियां नहीं उठा सकतीं। फिर भी कुछ धन की आवश्यकता तो होगी ही, उतनी हमलोग व्यवस्था करेंगे। इसके लिए हम प्रत्येक लोकसभा क्षेत्र में कम से कम एक लाख सदस्य बनाने के लिए अभियान चला रहे हैं। हमलोग विधिसम्मत ढंग से धन की व्यवस्था करेंगे।

अगले लोकसभा चुनाव की तैयारी कैसे कर रहे हैं?

लोकसभा चुनाव की तैयारी हमने छह महीने पहले ही शुरू कर दी थी और उसी का परिणाम है कि पिछली 16 जनवरी को हमने 15 राज्यों में अपने 219 उम्मीदवार घोषित किए। बाकी उम्मीदवारों की घोषणा भी हम जल्द ही करेंगे। पूरे देश में बड़े उत्साह से कार्यकर्ता योजनाबद्ध तरीके से चुनाव की तैयारी में लगे हुए हैं।

बीएमपी का जनाधार क्या है ? क्योंकि आप अपने को दलित-बहुजन के लिए विकल्प मान रहे हैं?

बीएमपी का जनाधार अनुसूचित जातियां, नोटिफाइड ट्राइब्स, डी-नोटिफाइड ट्राइब्स, विमुक्त घुमंतू जनजातियां, अत्यंत पिछड़ी जातियां, अन्य पिछड़ी जातियां, अल्पसंख्यक एवं महिलाएं हैं। ये देश की जनसंख्या की 85 फीसदी हैं और ये बहुजन हैं। अन्य पार्टियां जैसे बसपा, सपा भी अपने आपको दलित-बहुजन का विकल्प मानती हैं लेकिन बसपा और सपा कांग्रेस की ए टीम और बी टीम के अलावा कुछ भी नही हैं।

बहुजन की बात सबसे ज्यादा बसपा करती है तो क्या आप उसके वोट बैंक में सेंध नहीं लगा रहे हैं?

एक समय था जब बहुजन की बात सबसे ज्यादा बसपा करती थी। लेकिन अब तो वह सर्वजन की बात करती है। अपने वोट बैंक में वह खुद ही सेंध लगा रही है। कभी पंजाब में वह मान्यता प्राप्त विपक्षी दल थी। मध्यप्रदेश में भी उसकी अच्छी स्थिति थी। लेकिन अभी चार राज्यों के विधानसभा चुनाव में बसपा का वोट प्रतिशत क्यों घट गया? वहां तो हमारी पार्टी चुनाव मैदान में भी नहीं थी। देखिएगा, बहुजन विरोधी नीतियों की वजह से बसपा का वोट बैंक आगे भी घटता जाएगा।

पार्टी का घोषणापत्र वर्तमान चुनाव प्रणाली में मूलभूत परिवर्तन की बात करता है, यह परिवर्तन क्या होगा?

हम रिप्रेजेन्टेटिव डेमोक्रेसी चाहते हैं, अर्थात् जिसकी जितनी संख्या है उतना ही उसका प्रतिनिधित्व होना चाहिए। किसी भी वर्ग विशेष का एकाधिकार नहीं होना चाहिए। चुनाव में उम्मीदवारों के खर्च की सीमा तय कर दी गई है। उसी तरह पार्टियों की भी सीमा तय होनी चाहिए। अभी पार्टियों के खर्च करने की कोई सीमा नही है। इसलिए कांग्रेस ने एक कंपनी से 500 करोड़ और भाजपा ने एप्को वल्र्डवाइड सेे 100 करोड़ का अनुबंध किया है और राहुल गांधी और मोदी की रैलियों में करोड़ों खर्च होते हैं। यह खत्म होना चाहिए।

 

(फारवर्ड प्रेस के मार्च, 2014 अंक में प्रकाशित )


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