राज्यसभा चुनाव में लिखी आम चुनाव की पटकथा

नरेंद्र मोदी के नाम पर भाजपा के अति पिछड़ा कार्ड से जद यू अपने आप को असुरक्षित महसूस कर रही है। वह किसी भी कीमत पर अति पिछड़ा वोट में सेंध लगने देने को तैयार नहीं है। इसलिए रामनाथ ठाकुर के साथ कहकशां परवीन को राज्य सभा में भेजा गया

राज्यसभा की पांच सीटों के लिए हुए द्विवार्षिक चुनाव ने बिहार की राजनीति की कई गांठे खोली हैं। भाजपा, सवर्ण के दायरे से बाहर नहीं निकल सकी तो जद यू ने दो अति पिछड़ा उम्मीदवारों को राज्यसभा में भेजकर नीतीश कुमार आगे भी अपने अति पिछड़ा कार्ड को और अधिक मजबूत बनाए रखना चाहते हैं। नीतीश कुमार ने वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश को राज्यसभा में भेजकर कई निशाने साधे हैं। पत्रकारिता में हरिवंश की छवि नीतीश कुमार के समर्थक की रही है। विशेष राज्य के दर्जे को लेकर जद यू के साथ ‘प्रभात खबर’ ने समानांतर हस्ताक्षर अभियान चलाया था। उस समय मीडिया के गलियारे में इस बात की चर्चा आम थी कि ‘प्रभात खबर’ जद यू का ‘मीडिया कोषांग’ है।

केंद्रीय गृह सचिव जैसे महत्वपूर्ण पद से सेवानिवृत्त होने वाले आरके सिंह (राजकुमार सिंह) ने जब भाजपा का दामन थामा तो राजपूत वोटों को लेकर जद यू में संशय की स्थिति उत्पन्न हो गई थी। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह राजपूतों को बांधे रखने में सफल नहीं हो रहे थे। वैसी स्थिति में हरिवंश जैसे चर्चित पत्रकार को लाकर नीतीश कुमार ने राजपूत वोटरों पर डोरे डाले हैं। हरिवंश की पत्रकारों और मीडिया जगत में अपनी विशेष पहचान रही है। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के मीडिया सलाहकार के रूप में उनकी छवि राष्ट्रीय राजनीति पर उभरी थी। जद-यू नेतृत्व को लगता है कि आरके सिंह की बेहतर काट हरिवंश ही हो सकते हैं। हरिवंश के रूप में पार्टी को एक अच्छा राजनीतिक विचारक, मीडिया घरानों के साथ संबंध को सुदृढ करने वाला और पार्टी की नीतियों का प्रवक्ता मिल गया है। हरिवंश का पार्टी एक साथ कई मंचों पर उपयोग कर सकती है।

नरेंद्र मोदी के नाम पर भाजपा के अति पिछड़ा कार्ड से जद यू अपने आप को असुरक्षित महसूस कर रही है। वह किसी भी कीमत पर अति पिछड़ा वोट में सेंध लगने देने को तैयार नहीं है। इसलिए रामनाथ ठाकुर के साथ कहकशां परवीन को राज्य सभा में भेजा गया। कर्पूरी ठाकुर के पुत्र होने का लाभ रामनाथ ठाकुर को मिला। इसका संबंध अति पिछड़ा वोटों से भी है। कुजरा डॉ एजाज अली को किनारे करने के बाद कहकशां परवीन को आगे बढ़ाकर इस जाति में अपना आधार पुख्ता करने की कोशिश की जा रही है। अंसारी जाति के अली अनवर राज्यसभा में और सलीम परवेज बिहार विधान परिषद् में पहले से ही उपसभापति हैं। हालांकि पसमांदा की बड़ी आबादी धुनिया को नीतीश कुमार अभी पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दे पाए हैं। कहकशां परवीन के बहाने नीतीश ने महिला प्रतिनिधित्व के साथ पसमांदा कार्ड भी खेला है।

भाजपा सीपी ठाकुर और भूमिहारों के बागी तेवर से अवगत रही है। सीपी ठाकुर पहले भी बगावत का झंडा उठा चुके हैं। बगावत का ही असर था कि उनके बेटे विवेक ठाकुर को बिहार विधान परिषद् में भेजने को पार्टी विवश हुई। जद यू से अलग होने के बाद भूमिहारों पर भाजपा की निर्भरता बढ़ गई है। वैसे में भूमिहारों की तिरछी नजर भाजपा के लिए महंगी पड़ सकती है। भाजपा के पहले ही दो सांसद पटना के कायस्थ थे। इसमें भाजपा के राज्यसभा में उपनेता रविशंकर प्रसाद और लोकसभा में शत्रुघन सिन्हा शामिल हैं। पटना के ही कायस्थ रविंद्र किशोर सिन्हा (आरके सिन्हा) को उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने साबित कर दिया है कि कायस्थ उसकी प्राथमिकताओं में है। इस प्रकार, भाजपा ने भूमिहार और कायस्थ, दोनों जातियों को साधने की कोशिश की है।

जद यू ने जिन तीन सांसदों को राज्यसभा से बेटिकट किया है, उनमें शिवानंद तिवारी, एनके सिंह और साबिर अली शामिल हैं। तीनों को लोकसभा चुनाव लडऩे का ऑफर दिया गया था,  लेकिन तीनों ने चुनाव लडऩे से मना कर दिया है। राजनीतिक गलियारे में भी इस बात को लेकर खूब चर्चा रही कि नीतीश कुमार बिहार में समाजवाद के दो मजबूत आधारस्तंभ कर्पूरी ठाकुर और रामानंद तिवारी के बेटों को बारी-बारी से राज्यासभा में भेजकर अपनी प्रतिबद्धता दर्शा रहे हैं।

कुल मिलाकर राज्य सभा चुनाव में दोनों पक्षों ने अपने आधार वोट का पूरा ख्याल रखा है और लोकसभा चुनाव की पटकथा लिखने की शुरुआत भी राज्य सभा के लिए उम्मीदवारों के चयन से हो चुकी है। इसमें सब अपनी सीमा और संभावना से बंधे हैं।

जननायक बने वोट नायक

पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर बिहार की वर्तमान राजनीति के अपरिहार्य तत्व हो गए हैं। बिहार में अति पिछड़ा राजनीति का ताना-बाना कर्पूरी ठाकुर को केंद्र में रखकर ही बुना गया है। समाजवादी आंदोलन के आधारस्तंभ रहे कर्पूरी ठाकुर आज 30 प्रतिशत से अधिक आबादी वाले अतिपिछड़ों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के पर्याय बन गए हैं। यही कारण है कि उनकी 90वीं जयंती के मौके पर 24 जनवरी से 26 जनवरी तक राजधानी पटना समेत राज्यभर में सत्तारूढ़ जद यू, राजद, भाजपा और अन्य पार्टियों की ओर से कार्यक्रम आयोजित होते रहे। इसमें सब ने अतिपिछड़ों के कल्याण का वादा किया और कर्पूरी ठाकुर की नीतियों एवं कार्यक्रमों के प्रति आस्था जताई।

सत्तारूढ़ जनता दल यू के लिए यह मौका विशेष महत्व का था। कर्पूरी जयंती के दिन ही जद यू ने राज्यसभा के अपने तीन उम्मीदवारों के नामों की घोषणा की। इनमें कर्पूरी ठाकुर के पुत्र व पूर्व मंत्री रामनाथ ठाकुर और कहकशां परवीन भी शामिल थे। ये दोनों अति पिछड़ी जातियों से हैं। अतिपिछड़े समाज के दो नेताओं को राज्यसभा में भेजकर जद यू ने कर्पूरी ठाकुर व अतिपिछड़ा के नाम पर होने वाली राजनीति को सींचने का प्रयास किया।

कर्पूरी ठाकुर के नाम पर अतिपिछड़ा राजनीति अपने परवान पर है। उनकी नीति, कार्यक्रम और कार्यशैली के आधार पर उन्हें ‘जननायक’ की संज्ञा दी गई थी, आज वह ‘वोट नायक’ हो गए हैं। काफी कमजोर मानी जानी वाली अति पिछड़ी जातियों की राजनीति कर नीतीश कुमार, बिहार की मजबूत ताकत बन गए। भाजपा के लिए अतिपिछड़े काफी समय तक हाशिए पर रहे लेकिन जद यू के साथ गठबंधन की वजह से अतिपिछड़ों में अपना आधार बढ़ाने का मौका भाजपा को मिला। बदलते राजनीतिक समीकरण में अति पिछड़ी जातियां भाजपा के लिए सबसे महत्वपूर्ण फैक्टर हो गई हैं। यही कारण है कि पटना में भाजपा की ओर से आयोजित कर्पूरी जयंती समारोह में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने स्वयं शिरकत की। कुल मिलाकर, जननायक कर्पूरी ठाकुर के नाम पर जिन राजनीतिक पार्टियों ने अपनी ताकत बटोरी, उस ताकत पर अब सबकी निगाह है। यह समय की जरूरत है और मांग भी। अब देखना यह है कि इससे कितना लाभ अतिपिछड़ा समाज को मिलता है।

(फारवर्ड प्रेस के मार्च, 2014 अंक में प्रकाशित )


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