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हाशिए से घोषणापत्र

अगर गांधी जी द्वारा आम्बेडकर पर लादे गए पूना पेक्ट ने भारत में दलित क्रांति की संभावना को धूमिल किया था तो संघ परिवार व स्वघोषित धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के बीच हुए नए पूना समझौते ने साम्प्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई को कमजोर किया है

मध्य ओडिशा के कंधमाल के निवासी शायद ही किसी राजनीतिक पार्टी के घोषणापत्र में जगह पा सकेंगे। सन् 2008 के अगस्त महीने में संघ परिवार द्वारा प्रशिक्षित गुंडों के आक्रमण के कारण 50,000 से अधिक स्थानीय पुरुषों और महिलाओं को अपने घर-बार छोड़कर भागना पड़ा था। लगभग 6,000 ईसाई, जिनमें से अधिकतर जंगलों में रहने वाले दलित सीमांत कृषक और आदिवासी हैं, चुनाव प्रक्रिया में भाग नहीं ले सकेंगे, क्योंकि वे भारत के विभिन्न शहरों की झुग्गी बस्तियों में रह रहे हैं। भारत के चुनाव आयोग को उनकी कोई फिक्र नहीं है। उसे अन्य शरणार्थियों और विस्थापितों की भी कोई परवाह नहीं है।

इनमें शामिल हैं गुजरात (मुख्यत: मुसलमान) और मध्यप्रदेश के विस्थापित, झारखंड और ओडिशा की दस लाख लड़कियां, जो उत्तर भारत के विभिन्न नगरों में घरेलू नौकरानी के रूप में काम कर रही हैं, और भूमिहीन श्रमिक, जो अपने से ज्यादा भाग्यशाली लोगों के लिए एक नए, आधुनिक, शहरी भारत का निर्माण कर रहे हैं।

ये सब लोग भारत की ऐसी घास-फूस हैं, जो कभी भी आग पकड़ सकती है। अधिकांश पार्टियां उन्हें उनकी बेहतरी के लिए किए जा रहे कामों की लंबी-चौड़ी फेहरिश्त सुनाकर संतुष्ट रखना चाहती हैं। परंतु इससे उनमें आशा नहीं जागती बल्कि वे और आहत होते हैं। उनसे जो वायदे किए जाते हैं, उनकी असलियत वे समझते हैं। पारदर्शिता के पूर्ण अभाव और दिन-दूना रात चौगुनी गति से बढ़ते भ्रष्टाचार का यह नतीजा है कि मध्यान्ह भोजन और मनरेगा जैसी योजनाएं, उन लोगों की गरीबी और असहायता का अपमान करती सी दिखती हैं, जो अपनी बदहाली के चलते इन पर निर्भर हैं। आज से लगभग 25 साल पहले, प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि दिल्ली से जो एक रुपया भेजा जाता है उसमें से 15 पैसे ही जनता तक पहुंचते हैं। शायद अब 5 पैसे ही पहुंच रहे हों या शायद उतने भी नहीं।

साम्प्रदायिकता, गरीब को गरीब से लड़ाती है। विशेष निर्यात प्रक्षेत्र (एसईजेड) और उन्हें सफल बनाने के लिए लागू की जा रही आर्थिक नीतियों के कारण ग्रामीण अपनी जमीनें और अपने घर खो रहे हैं। इसके बदले उन्हें कोई रोजगार भी हासिल नहीं हो रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों के भयावह होते संकट, सड़ांध मारते शहरों और हिन्दुत्वादी फासीवाद की चुनौती जैसी समस्याओं से निपटने में चुनाव से कोई मदद मिलेगी, इसकी आशा कम ही है। नागरिक समाज, दक्षिणपंथी अतिवाद का प्रतिरोध करने में सक्षम नहीं है। उसमें हिन्दुत्ववादियों और इस्लामवादियों, दोनों ने घुसपैठ कर ली है और वह नंदीग्राम के बाद वामपंथियों पर आए संकट से भी दिग्भ्रमित है।

अगर मैं साम्प्रदायिकता की समस्या, महिलाओं, दलितों, पिछड़ों व अल्पसंख्यकों की सुरक्षा या युद्धोन्माद जैसे मुद्दों को केन्द्र में रखना चाहूं तब भी यह साफ  है कि ग्रामीण भारत पर छाया घनघोर संकट इस समय की सबसे बड़ी त्रासदी है और इससे निपटने के लिए उन लोगों को, जो हम पर शासन करना चाहते हैं, बिल्कुल नए तरीके से विचार और काम करना होगा।

‘किसानों का ‘विशेष विलोपन प्रक्षेत्र’

किसानों की बढ़ती आत्महत्याएं इस संकट का एक पहलू भर हैं। इस संबंध में पी साईंनाथ द्वारानेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रपट ‘भारत में दुर्घटनाओं से मौत व आत्महत्याएं 2006’ का विश्लेषण आंखें खोलने वाला है। रपट बताती है कि अकेले महाराष्ट्र में, जो कि गन्ना, कपास, मूंगफ ली और अब अंगूर की खेती का बड़ा केन्द्र है, उस वर्ष 4,453 किसानों ने आत्महत्या की। यह पूरे देश में आत्महत्या करने वाले 17,060 किसानों का लगभग एक-चौथाई है। किसानों की आत्महत्या के मामले में महाराष्ट्र के बाद आंध्रप्रदेश का नंबर है। एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, उन राज्यों, जिन्हें अब मीडिया ‘विशेष किसान विलोपन प्रक्षेत्र’ कहता है, में किसानों की आत्महत्या की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। इनमें से तीन-चौथाई घटनाएं महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में हुईं। एनसीआरबी के अनुसार, 1997 से लेकर 2006 तक के 10 वर्षों में 1,66,304 किसानों ने आत्महत्या की। इनमें से 78,737 घटनाएं 1997 से 2001 के बीच हुईं।

उसके बाद के पांच वर्षों में(2002-06) स्थिति और बिगड़ी और 87,567 किसानों ने अपनी जान स्वयं ले ली। ‘इसका अर्थ यह है कि भारत में 2002 से, हर 30 मिनट में एक किसान आत्महत्या कर रहा है।’

पिछले एक वर्ष के दौरान मैं सिक्किम को छोड़कर देश के अधिकांश राज्यों में गया हूं और मैंने स्वयं यह महसूस किया है कि किसानों को कितनी कम मदद मिल रही है। भूमिहीन श्रमिकों की संख्या बढ़ती जा रही है और उनके हालात दिन पर दिन बदतर होते जा रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती गरीबी के संदर्भ में इन लोगों की बात तक नहीं की जाती। इस दृष्टि से भाजपा-शासित राजस्थान और मध्यप्रदेश में हालात सबसे खराब हैं परंतु कांग्रेस-शासित आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र में भी ग्रामीण जनता की स्थिति कोई बहुत बेहतर नहीं है। लगभग यही हाल एआईएडीएमके-शासित तमिलनाडु में है। गांव-गांव में मनरेगा के नाम पर हो रहा मखौल साफ  देखा जा सकता है। बेलगाम भ्रष्टाचार, पर्यवेक्षण का अभाव और राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते श्रमिकों को न तो निर्धारित न्यूनतम अवधि का रोजगार मिल पाता है और ना ही वह मजदूरी जो मिलनी चाहिए। जगह-जगह अधूरी पड़ी योजनाएं देखी जा सकती हैं।

ग्रामीण दलित व ओबीसी

सबसे ज्यादा परेशानहाल ग्रामीण दलित और ओबीसी हैं-चाहे वे सीमांत कृषक हों, पारंपरिक शिल्पकार या भूमिहीन मजदूर। और इसका एकमात्र कारण यह नहीं है कि वे जातिगत भेदभाव और मानवाधिकारों के उल्लंघन के शिकार हैं। इसका कारण यह भी है कि इन समुदायों में गरीबों का अनपात ज्यादा है और जो लोग गरीब हैं, वे बेहद गरीब हैं। इसके अतिरिक्त, वे अशिक्षा, भूख, बीमारी और भुखमरी जैसी समस्याओं से भी जूझ रहे हैं। उनका जीवन दूभर है। ग्रामीण दलितों में व्याप्त अशिक्षा, पूर्व व वर्तमान शासकदलों को शर्मिन्दा करने के लिए काफी है। ग्रामीण दलितों में से 58 प्रतिशत अशिक्षित हैं। लड़कियों में यह प्रतिशत 68.98 है। शिशु मृत्यु दर 11.3 है। आधे से अधिक बच्चों का वजन सामान्य से कम है और 78 प्रतिशत बच्चे खून की कमी अर्थात् एनीमिया से ग्रस्त हैं।

यह भी स्पष्ट है कि दलितों की क्रय क्षमता में लगातार गिरावट आ रही है और उनकी जोतों का आकार तेजी से घट रहा है। इसके पीछे सरकार द्वारा सेज व बांधों इत्यादि के लिए जमीन का अधिग्रहण तो है ही, ये लोग अपना कर्ज पाटने के लिए भी अपनी जमीनें बेचने पर मजबूर हैं। आंकड़े दिल दहलाने वाले हैं। सन् 1961 में 37.76 प्रतिशत ग्रामीण दलित स्वयं की भूमि पर खेती करते थे। सन् 1981 में यह आंकड़ा घट कर 28.17 रह गया। इसके नतीजे में भूमिहीन खेतिहर मजदूरों की संख्या में इजाफ ा हुआ। जहां सन् 1961 में 34.48 प्रतिशत दलित भूमिहीन, श्रमिक थे वहीं 1981 में उनका प्रतिशत बढ़कर 48.22 हो गया। वर्तमान में यह आंकड़ा क्या होगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। दलितों की बदहाली हर जगह देखी जा सकती है। आईआईटी, आईआईएम व एम्स के कैम्पसों में होने वाली हिंसा में, अदालतों में और मंदिरों में। दलितों के लिए गरिमा से जीना एक अंतहीन संघर्ष है। वे दलित जिन्होंने इस्लाम या ईसाई धर्म अपना लिया है, सन् 1950 से लेकर आज तक अपने अधिकारों से वंचित हैं।

आगे बढ़ता संघ परिवार

इन सब कारणों से पूरे देश में एक बेचैनी और रोष का वातावरण है। नंदीग्राम की हिंसा से लेकर माओवादी आंदोलन के बढ़ते प्रभाव से यह स्पष्ट है कि नेपाल की सीमा से लेकर आंध्रप्रदेश तक एक ऐसी पट्टी अस्तित्व में आ गई है जिसमें न तो राजनीतिक प्रक्रिया का दखल है और ना ही देश की सैन्य ताकत का। इसकी जगह हम देख रहे हैं कि दक्षिणपंथी हिन्दुत्ववादी कट्टरपंथियों की ताकत में तेजी से इजाफा हो रहा है। लाठियों की जगह अब उन्होंने बम और बंदूकें थाम ली हैं। वे अपने हथियारों का खुलेआम प्रदर्शन करते हैं और उनका इस्तेमाल करने से भी नहीं चूकते।

अगर हम केवल ओडिशा की चर्चा करें, जहां 22 जनवरी 1999 को आस्ट्रेलिया के निवासी ग्राहम स्टूवर्ट स्टेन्स और उनके दो पुत्रों को जिंदा जलाकर मार दिया गया था और जहां अगस्त 2008 की हिंसा में फॉदर बरनार्ड डीगल मारे गए थे, तो यह साफ  हो जाएगा कि दक्षिणपंथियों की ताकत कितनी तेजी से बढ़ रही है। ओडिशा में :

* पितृ संगठन आरएसएस की 6000 शाखाएं लगती हैं और इसके 1,50,000 से ज्यादा सदस्य हैं।

* विहिप के 1,25,000 प्राथमिक कार्यकर्ता हैं।

* बजरंग दल के 50,000 कार्यकर्ता हैं जो 200 शाखाओं में संगठित हैं।

* भारतीय जनता पार्टी, जो कि सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा थी, के सदस्यों की संख्या 4,50,000 है।

* दुर्गावाहिनी के 117 स्थानों पर 7,000 सदस्य हैं।

* राष्ट्रीय सेविका समिति के 80 केन्द्र हैं।

* भारतीय मजदूर संघ 171 ट्रेड यूनियनों को नियंत्रित करता है, जिनके सदस्यों की कुल संख्या 1,42,000 है। भारतीय मजदूर संघ एकाधिकारवादी उद्योग समूहों और अंतर्राष्ट्रीय खनन कंपनियों के विरोध में श्रमिकों के गुस्से को नियंत्रित करने का काम भी करता है।

* भारतीय किसान संघ के राज्य के 100 ब्लाकों में 30,000 किसान सदस्य हैं।

* इसके अतिरिक्त, संघ से जुड़े व उसके लिए परोक्ष रूप से काम कर रहे संगठनों में शामिल हैं फ्रेंड्स ऑफ ट्राइबल सोसायटी, समर्पण चेरीटेबल ट्रस्ट, सुकृति, यशोदा सदन, एकलव्य विद्यालय, वनवासी कल्याण आश्रम एवं परिषद्, विवेकानंद केंद्र, शिक्षा विकास समितियां व सेवा भारती।

ओडिशा की कुल जनसंख्या 3.68 करोड़ है जिनमें से केवल 2.4 प्रतिशत ईसाई और 2.1 प्रतिशत मुसलमान हैं।

पूरे देश में संघ परिवार ने पुलिस और न्याय व्यवस्था में घुसपैठ कर ली है। परंतु सबसे चौंका देने वाली और दुखद खबर यह है कि संघ ने सैन्यबलों में भी अपनी पैठ बना ली है। यह इससे भी स्पष्ट है कि सेवानिवृत्त जनरल, मार्शल और एडमिरल बड़ी संख्या में भाजपा के सदस्य बन रहे हैं। आधुनिक भारत के निर्माता और भारत के प्रथम प्रधानमंत्री व महान नेता पंडित जवाहरलाल नेहरु ने संघ परिवार की असलियत को शुरू में ही ताड़ लिया था। वे यह मानते थे कि संघ परिवार, साम्प्रदायिक और फासीवादी संगठन है और उस भारत के लिए बड़ा खतरा है जिसका निर्माण करने की जद्दोजहद में वे लगे हैं। पंडित नेहरु के अवसान के बाद हालात और खराब हुए हैं। अगर गांधी जी द्वारा आम्बेडकर पर लादे गए पूना पेक्ट ने भारत में दलित क्रांति की संभावना को धूमिल किया था तो संघ परिवार व स्वघोषित धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के बीच हुए नए पूना समझौते ने साम्प्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई को कमजोर किया है।

पुलिस बलों में ईसाईयों और मुसलमानों का प्रतिनिधित्व न के बराबर है। आतंकवाद के खिलाफ  तथाकथित युद्ध ने मुसलमानों की मुसीबतों को बढ़ाया है। यह तर्क दिया जा रहा है कि न्यायपालिका, कई प्रतिबंध लगाकर, जांच एजेंसियों की आतंकवाद से निपटने की रणनीति को सफ ल नहीं होने दे रही है। अब ऐसे नए कानून बनाए जा रहे हैं जिनके लागू हो जाने के बाद मानवाधिकारों का उल्लंघन आम बात हो जाएगी और राज्य अपनी मनमानी कर सकेगा।

भारत जैसे विविधता से भरे देश में मानवाधिकारों की अवधारणा बहुत व्यापक और जटिल है। इसमें शामिल हैं भोजन का अधिकार, ग्रामीण भारत में रहने का अधिकार, दलितों और आदिवासियों का गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार और अल्पसंख्यकों का सुरक्षा का अधिकार। ये सभी समुदाय वर्तमान भारत में हाशिए पर हैं।

(फारवर्ड प्रेस के मार्च 2014 अंक में प्रकाशित)


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लेखक के बारे में

जॉन दयाल

जॉन दयाल वरिष्ठ पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं।

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