फॉरवर्ड थिंकिंग, अप्रैल 2014

ऑम्वेट लिखती हैं, ‘अब समय आ गया है कि हम एक नए भारत के निर्माण के दलित-बहुजन विकल्प पर विचार करें और ऐसे आदर्शों का निर्माण करें, जो हमें वर्तमान के दलदल से मुक्त होने के संघर्ष के लिए प्रेरित कर सकें और रास्ता दिखा सकें’

अप्रैल हमेशा से फारवर्ड प्रेस के लिए एक विशेष महीना रहा है। हम फुले और आम्बेडकर जयंतियों को, अगर आवरण कथा नहीं, तो कम से कम उन पर केन्द्रित विशेष लेख प्रकाशित कर, मनाते आए हैं। फिर, पिछले दो वर्षों से अप्रैल का अंक हमारी बहुजन साहित्य वार्षिकी बन गया है। परंतु, पांच साल पहले, जब हमने प्रकाशन शुरू किया था, तब 2009 के आम चुनाव नजदीक थे और हमारी पहली आवरण कथा, ओबीसी कारक पर थी, जिसके बारे में तब तक कोई बात भी नहीं करता था।

राजनीतिक विश्लेषणों और लेखों से भरे इस चुनाव 2014 विशेषांक में भी, हमारे पहले अंक की तरह, हम गेल ऑम्वेट द्वारा फुले और आम्बेडकर के सपनों के भारत पर  लेख प्रकाशित कर रहे हैं। हमारे आज के अधिकांश पाठक यह लेख नहीं पढ़ सके होंगे और इसलिए हम उसे दुबारा प्रस्तुत कर रहे हैं। इससे आने वाले चुनाव को बहुजन नजरिए से देखने में मदद मिलेगी। ऑम्वेट लिखती हैं, ‘अब समय आ गया है कि हम एक नए भारत के निर्माण के दलित-बहुजन विकल्प पर विचार करें और ऐसे आदर्शों का निर्माण करें, जो हमें वर्तमान के दलदल से मुक्त होने के संघर्ष के लिए प्रेरित कर सकें और रास्ता दिखा सकें।’

‘वर्तमान का दलदल’ आज की स्थिति को, पांच साल पहले की स्थिति से भी बेहतर परिभाषित करता है। आश्चर्य नहीं कि बहुजन मतदाता दुविधाग्रस्त है। मुझे यह विश्वास है कि सन् 2009 की तरह, इस बार भी बहुजन-जो अब पहले की तुलना में अधिक जागरूक हैं- यह तय करेंगे कि अगली सरकार किसकी बनेगी। अधिकांश बहुजन, फारवर्ड प्रेस के इस चुनाव 2014 विशेषांक को नहीं पढेंगे परंतु मुझे यह विश्वास है कि फारवर्ड प्रेस के पाठक हमारी बात को उन तक पहुंचाएंगे, विशेषकर, उत्तर भारत में।

जब मैं अपनी आवरण कथा आधी लिख चुका था तब प्रेमकुमार मणि का लेख हमें मिला। मैंने जब इस लेख का सार पढ़ा तो मैं यह देखकर चकित रह गया कि दोनों लेखों में कितनी अधिक समानताएं हैं। यहां तक कि कई मामलों में भाषा भी एक-सी है। मणि के लेखन का आधार होता है आजाद भारत के राजनीतिक इतिहास का उनका गहरा ज्ञान और राजनीति के मैदान के कुछ खिलाडिय़ों से उनके रिश्ते। उनकी छठी इन्द्रिय भी उनकी मदद करती है। मुझे वही ज्ञान प्राप्त करने के लिए बहुत मेहनत से अनुसंधान और विश्लेषण करना पड़ता है। हम दोनों के लेख बहुजन मतदाता की दुविधा के बारे में है और मुझे विश्वास है कि आप उन्हें एक-दूसरे का पूरक पाएंगे।

अंत में, भारत में चुनाव का मौसम ‘आयाराम-गयाराम’ का मौसम भी होता है। जहां पहले के चुनावों में ‘पेड न्यूज’ की चर्चा होती थी वहीं इस बार ‘खरीदे हुए मीडिया’ और ‘चमचा मीडिया’ की चर्चा हो रही है। इंदिरा गांधी के आपातकाल के बाद, पत्रकारों से बात करते हुए लालकृष्ण आडवानी ने कहा था कि ‘आप लोगों से झुकने को कहा तो आप लोग दंडवत हो गए।’ उस समय मैं उन दो समाचारपत्र समूहों, जिन्होंने आपाताकाल के दौरान लगाई गई प्रेस सेंसरशिप का विरोध किया था, में से एक में युवा पत्रकार था। हमारी पत्रिका को इस विरोध की कीमत चुकानी पड़ी और उसमें ताले पड़ गए। आज जब मीडिया में भी मानो ‘मोदी की लहर’ चल रही है, ऐसे पत्रकार हैं, जिन्हें मोदीनामा लिखने के लिए और मोदी के सिंहासनारूढ़ होने के पहले ही, सन् 2002 में मोदी के बारे में व्यक्त की गई खुद की राय से पीछे हटने के लिए, खरीदा नहीं जा सकता (राज्यसभा की सीट के बदले भी नहीं)।

पुनश्च : मुझे नहीं पता कि क्या वरिष्ठ पत्रकार एमजे अकबर एक बार फिर वह दुहरा सकते हैं जो उन्होंने मार्च, 2008 में ‘द एशियन एज’ छोडऩे के बाद अपने साथियों को लिखा था, ‘हम सबसे बड़े भले ही न रहे हों परंतु हम अपना सिर उठाकर चल सकते हैं क्योंकि हमारे परिवार में एक चीज ऐसी थी जिसे कोई खरीद नहीं सकता था-और वह थे हम। हमें खरीदा नहीं जा सकता था, हम स्वतंत्र थे, हम मुक्त थे, हम अपना सिर उठाकर चलते थे। अपना सिर कभी मत झुकने दो, कम से कम तब तक नहीं जब तक तुम पत्रकार हो।’ फारवर्ड प्रेस में हम यह कह सकते हैं।

(फारवर्ड प्रेस के अप्रैल 2014 अंक में प्रकाशित)


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