‘लव मैरिज करो, मगर चमार-पासी से नहीं’ : मैत्रेयी

मैं कल्पना करती थी कि काश कभी लड़कियां जींस पहनें। अपने सामने ही मैंने इस कल्पना को साकार होते देखा, मगर सिर्फ कपड़े बदले, मानसिकता नहीं। सोच के स्तर पर लड़कियां आज भी वहीं खड़ी हैं, जहां उन्नीसवीं सदी में थीं। आज मॉर्डन लुक में लड़कियां जींस के साथ करवाचौथ मना रही हैं, चूड़ा पहन रही हैं। आधुनिक कपड़ों के साथ सोच के स्तर पर भी आधुनिकता की जरूरत है

 वरिष्ठ लेखिका मैत्रेयी पुष्पा से प्रेमा नेगी की बातचीत क्या

क्या एक ऐसे साहित्य की अवधारणा संभव है जिसकी एक ही छतरी के नीचे शूद्र, अतिशूद्र, महिला और आदिवासी साहित्य के लिए जगह बनाई जा सके। क्या इसे बहुजन साहित्य कहा जाए ?

बहुजन साहित्य की अवधारणा का स्वागत किया जाना चाहिए। सबसे अच्छी बात तो यह है कि इसी बहाने हाशिए के लोगों को मुख्यधारा के साहित्य में स्थान मिलेगा। चूंकि साहित्य समाज का दर्पण होता है तो साहित्य के बहाने ही बहुजन समाज के साथ हुई नाइंसाफि यों का पता चलेगा। उनके हक-हकूकों की बात उठेगी। खुद दलित भी अपने हकों-अधिकारों के प्रति जागरूक होंगे। बहुजन साहित्य की अवधारणा में विशेषकर आदिवासियों को शामिल करना अच्छी पहल कदमी है। उनके जल, जंगल, जमीन के अधिकारों की बातें होंगी, नहीं तो अब
तक मुख्यधारा के साहित्य से वो बिल्कुल अलग-थलग रहे हैं।

जहां तक बहुजन साहित्य में महिलाओं को शामिल करने का सवाल है, इसका हम महिलाओं को खुले दिल से स्वागत करना चाहिए। महिलाओं की स्थिति दलितों से भी बदतर है। असल में महिलाएं सवर्ण बनती हैं, होती नहीं। दलित कौन होता है, वह जिसका ‘दलन’ होता है। औरतों से ज्यादा इस समाज में किसका ‘दलन’ हुआ है। मैंने अपने उपन्यास ‘अलमा कबूतरी’ और ‘कस्तूरी कुंडली बसे’ में काफी हद तक औरतों की सामाजिक स्थिति बताने की कोशिश की है। औरत अपने हक का दावा नहीं कर सकती। जब भी औरतों ने अपने हक-हकूक की बात की है, उसे समाज ने कठघरे में खड़ा कर दिया है। ‘रामायण’ के प्रसंग को ही देखें, केकैयी जैसे ही हक की बात करती है सरेआम बदनाम हो जाती है। उसे दुनिया का सबसे स्वार्थी प्राणी ठहरा दिया जाता है।

कुछ ऐसी ही स्थिति दलितों की भी है। दलित यदि अपने हक की बात करता है वह सजा का हकदार होता है। दलितों के लिए बिना आरक्षण के हक की बात करना संभव ही नहीं है। इसे सबसे बड़े प्रजातंत्र कहलाने वाले भारत की संसदीय चुनाव प्रणाली के माध्यम से भी समझा
जा सकता है। हमारे देश में किसी को कहीं से भी चुनाव लडऩे का अधिकार है, मगर आमतौर पर बिना आरक्षण के दलित और महिलाएं किसी सीट से चुनाव नहीं लड़ सकते। ‘दलन’ से निकलने के लिए जरूरी है कि आरक्षण की मानसिकता में भी बदलाव आए। वैसे भी फायदे के लिए आरक्षण की मानसिकता गलत है। लेखक बिरादरी में भी जातिवाद गहरे तक पैठा है। मैंने अपने आसपास के ही लेखक-लेखिकाओं को अपने बच्चों से ही कहते सुना है कि ‘लव मैरिज करो, मगर किसी चमार-पासी से नहीं।’ जो सवर्ण लेखक खुद इस तरह की मानसिकता रखते हैं, उनसे समाज को दर्पण दिखाने की उम्मीद बेमानी है। इस पुरुष सत्ता को बढ़ावा देने में हम महिलाएं भी बराबर की भागीदार हैं। हमें पुरुष सरपरस्ती की आदत पड़ चुकी है। हमारा इस हद तक अनुकूलन हुआ है कि हम पुरुष वर्चस्व की सत्ता में ही खुश हैं। मैं कल्पना करती थी कि काश कभी लड़कियां जींस पहनें। अपने सामने ही मैंने इस कल्पना को साकार होते देखा, मगर सिर्फ कपड़े बदले, मानसिकता नहीं। सोच के स्तर पर लड़कियां आज भी वहीं खड़ी हैं, जहां उन्नीसवीं सदी में थीं। आज मॉर्डन लुक में लड़कियां जींस के साथ करवाचौथ मना रही हैं, चूड़ा पहन रही हैं। आधुनिक कपड़ों के साथ सोच के स्तर पर भी आधुनिकता की जरूरत है।

क्या बहुजन साहित्य से महिला विमर्श की कोई कड़ी जुड़ती है ?

बिलकुल जुड़ती है, ये बात अलग है कि हमारे सवर्ण बाहुल्य साहित्य जगत की तरफ से अब तक ऐसी कोई कोशिश नहीं की गई है। नहीं तो महिला तो हर घर में है और हर घर में उसकी स्थिति बहुत बुरी है। सवर्ण हों या दलित समाज, ये वर्ग सिर्फ पुरुषों के लिए निर्धारित किए गए हैं, महिला की कैटेगरी सिर्फ महिला तय की गई है। अतिशूद्रों, शूद्रों, आदिवासियों और महिलाओं के बीच बहुत बड़ी समानता तो यह है कि ये सभी ब्राह्मणवादी व्यवस्था द्वारा सताए गए हैं।

जोतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले आधुनिक युग के वे दो नाम हैं, जिन्होंने जाति व्यवस्था और ब्राह्मणवादी जड़ता का विरोध किया और किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार का समर्थन किया। मगर क्या कारण है कि प्रगतिशील आलोचकों की भरमार के बावजूद उनके लेखन में ये दोनों विचारक स्थान नहीं पा सके?

असल में हिन्दी साहित्य में जितने भी महान लेखक-साहित्यकार हुए हैं, उनमें से ज्यादातर सवर्ण जातियों से संबंध रखते हैं, जबकि जोतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले बहुजन समाज के प्रतिनिधि हैं। हिन्दी साहित्य में जोतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले को स्थान न मिलने का एक प्रमुख कारण उनका मराठी साहित्य से ताल्लुक रखना तो है ही, साथ ही हिंदी पट्टी का दलितों और महिलाओं को दीन-हीन समझना भी है। हिंदी के मुकाबले इस मामले में मराठीसाहित्य ज्यादा समृद्ध है। वहां दलित और महिला विमर्श को भरपूर जगह मिली है। हिंदी पट्टी के लेखकों ने दलितों-महिलाओं पर सिर्फ दया, करुणा दिखायी, उनके हकों की बात नहीं की। उनको हकदारी का रास्ता नहीं दिखाया। उन्होंने
उनकी दयनीय दशा का वर्णन अपने लेखन में जरूर किया, मगर उन्हें दिशा दिखाने का काम नहीं किया। प्रेमचंद भी इसके प्रतिनिधि उदाहरण हैं। ‘गोदान’ को किसानों की ऋण समस्या पर केंद्रित एक बहुत ही महत्वपूर्ण उपन्यास माना जाता है, मगर प्रेमचंद इसमें किसानों को समस्या से बाहर निकलने का रास्ता कहां दिखाते हैं। होरी तो ऋण की चकरघिन्नी में घिरकर अपने प्राण ही गंवा बैठता है। दूसरी तरफ जोतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने दलितों, किसानों, महिलाओं के हक-हकूकों की बात की, तो उन्हें मराठी कहकर अलग-थलग कर
दिया गया।

कड़े शब्दों में कहूं तो हिन्दी साहित्य में अगर दलित और महिला विमर्श को अपने लेखन में राजेंद्र यादव नहीं उठाते, तो इस पर कोई बात करने वाला ही नहीं था।

हिंदी पट्टी में अगर दलित और महिला विमर्श पर जो भी थोड़ी-बहुत बात हो पाई है उसका श्रेय राजेंद्र यादव को ही जाता है। नहीं तो दलितों और स्त्री को तो सवर्र्णों ने हर काम माने सेवा, सेक्स, श्रम आदि के लिए आसानी से उपलब्ध माना है, चाहे साहित्य हो या फिर समाज।

क्या कबीर को खंडन-मंडन का कवि मानकर उनकी न्यायसंगत और वस्तुपरक आलोचना की गई? कबीर के तर्कसंगत मूल्यांकन के लिए ओबीसी आलोचना जरूरी है?

कबीर क्या कोई भी लेखक हो, उन्होंने जो लिखा है उसकी आलोचना-समीक्षा आज के परिप्रेक्ष्य में जरूरी है। वैसे भी समय के अनुसार परिभाषाएं-अर्थ बदलते हैं। कबीर का साहित्य पिछड़े वर्ग पर कहां तक लागू होता है, इसकी भी समीक्षा की जानी चाहिए। इससे निश्चित तौर पर नई आलोचना का जन्म होगा। सवर्ण वर्चस्ववादी हिंदी साहित्य में कबीर के साहित्य का पुनर्मूल्यांकन किए जाने की जरूरत है। इस मामले में प्रेमचंद के साहित्य की समीक्षा भी की जानी चाहिए। जैसे प्रेमचंद का उदाहरण देते हुए एक स्वनामधन्य साहित्यकार ने मुझसे कहा कि ‘बहादुर तो धनिया भी है, मगर तुहारी नायिकाएं मुखरता के साथ सीमाएं तोड़ती हैं।’ मैंने उनसे सवाल करते हुए लेख लिखा तर्कसहित कि धनिया किसके लिए बहादुर है, पति और पुत्र के लिए। खुद और बेटी के लिए तो वो साहस नहीं दिखाती। बेटी को बिक जाने देती है, तब आवाज क्यों नहीं उठाती। झुनिया को भी घर में यह कहते हुए रहने देती है कि उसके पेट में मेरे बेटे का अंश है। उसमें संघर्ष की चेतना थी, मगर पति और पुत्र के हित के लिए। ऐसे में किस दृष्टि से धनिया को बहादुर माना जा सकता है।

चंद्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था’ को भी महान प्रेम कहानी का दर्जा प्राप्त है, मगर यह किसकी प्रेम कहानी है सिर्फ पुरुष की ही तो। स्त्री को प्रेम का हक ही नहीं दिया गया है, प्रेम के मामले में भी वह महादलित ही है। ‘उसने कहा था’ कि नायिका प्रेम को जी भी कहां पाती है, कहां कह पाती है वह अपने पति यानी सूबेदार से कि जमादार लोहनासिंह को वह बचपन से जानती है उससे प्रेम करती है। जिस दिन स्त्री प्रेम को स्वीकारने का साहस करेगी, सही मायने में उसी दिन वह मुक्त होगी।

दलित, स्त्री और आदिवासी साहित्य सामाजिक न्याय और समतामूलक समाज के लिए संघर्षरत है, बावजूद इसके इन्हें अब तक हाशिए का साहित्य माने जाने के पीछे क्याकारण हैं?

दलित, स्त्री और आदिवासी साहित्य के सामाजिक और समतामूलक समाज के लिए संघर्षरत होने के बावजूद इसे हाशिए पर डालने का कारण हमारे तथाकथित सवर्ण साहित्य पुरोधाओं, नियंताओं, निर्णायकों का हिंदी साहित्य में असरकारी होना है। वे अपने साहित्य को श्रेष्ठ और दलितों, महिलाओं के साहित्य को दोयम दर्जे का मानते हैं। पर उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले दिनों में स्थितियां बदलेंगी, आखिर इन तथाकथित साहित्य पुरोधाओं की छत्रछाया से किसी न किसी दिन तो हिंदी साहित्य मुक्त होगा, इनकी भक्तमंडली आखिर कब तक पीछे नहीं हटेगी। हालांकि अब दलित और महिलाएं दोनों सीमाएं लांघ रहे हैं, मगर इसके लिए भी इनमें एकजुटता बहुत जरूरी है। इसकी एक बड़ी दिक्कत यह है कि दलित भी स्त्री विमर्श को अपने में नहीं मिलाना चाहता। अतिशूद्र, शूद्रों, आदिवासियों तथा स्त्रियों के बीच
मुख्य समानता उनका ब्राह्मणवादी व्यवस्था द्वारा प्रताडि़त होना तथा उसके विरुद्ध संघर्ष है। ये एक हो जाएं तथाकथित अभिजात्य सवर्ण लेखिकाएं एका रखें तो यह हाशिया जरूर खत्म होगा।

 

(फारवर्ड प्रेस, बहुजन साहित्य वार्षिक, मई  2014 अंक में प्रकाशित)


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