फारवर्ड विचार, मई 2014

हिंदी क्षेत्र के बहुजन साहित्य को आगे बढऩे और परिपक्व होने के लिए देश के अन्य हिस्सों के बहुजन साहित्य का अध्ययन करना होगा। मैं जोर देकर कहना चाहूंगा कि इसकी शुरुआत मराठी से होनी चाहिए

पांच साल पहले, सन् 2009 के आम चुनाव की धूमधाम के बीच, ‘भारत के लाखों आकांक्षियों के लिए व उनके द्वारा’ एक नई द्विभाषी पत्रिका का जन्म हुआ था। अत: मई का यह अंक, फारवर्ड प्रेस की पांचवी वर्षगांठ के अवसर पर प्रकाशित किया जा रहा है। हम आज भी बहुजन के प्रति प्रतिबद्ध हैं-उनके मुद्दों और उनके हितों के प्रति। जिन्हें आज ‘पिछड़ा’ कहा जाता है, हम उन्हें जानकारियां तो देते ही हैं, हम उन्हें महत्वाकांक्षी बनने की प्रेरणा भी देते हैं। हम चाहते हैं कि वे आगे बढ़ें, ऊंचा उठें और आकाश को चूमें।

परंतु बहुजन कौन या क्या हैं, उनकी सबसे गहरी व्यथाएं क्या हैं और उनकी सबसे ऊंची आकांक्षाएं क्या हैं? केवल साहित्य और कला ही उन्हें आकार और आवाज दे सकती हैं। इसीलिए फारवर्ड प्रेस ने बहुजन साहित्य वार्षिकी का प्रकाशन शुरू किया और उसे जारी रखे हुए है। यह हमारी तीसरी वार्षिकी है। फारवर्ड प्रेस द्वारा शुरू किए गए विमर्श और बहस से जन्मी अवधारणा, शुरुआत में जिसका सघन विरोध हुआ था, शनै:-शने: आकार ले रही है और इस मुद्दे पर आम राय बन रही है कि बहुजन साहित्य एक ऐसी साहित्यिक श्रेणी है, जिसमें कई तरह की धाराएं शामिल हैं। हमारे सलाहकार संपादक प्रमोद रंजन, जिन्होंने इस वार्षिकी का संपादन और समन्वय किया है, ने बहुजन साहित्य की अवधारणा के विकास का संक्षिप्त विवरण अपने संपादकीय लेख में किया है। इस अंक को पढऩे से पहले आप यह लेख अवश्य पढ़ें। अब तक हम बहुजन साहित्य वार्षिकी का प्रकाशन अप्रैल माह में करते आ रहे थे, जब हम आधुनिक काल की महानतम बहुजन विभूतियों, महात्मा  फुले और बाबासाहेब आंबेडकर की जयंतियां मनाते हैं। इस वर्ष, अप्रैल का अंक, चुनाव विशेषांक होने के कारण, वार्षिकी का प्रकाशन मई माह में किया जा रहा है। परंतु हमारे लिए अब भी फुले प्रेरणा और बौद्धिक चुनौती का स्रोत बने हुए हैं। फुले की व उन पर केन्द्रित रचनाओं के अध्ययन के दौरान मैंने यह पाया कि फुले ने जाने-माने मराठी भक्ति कवियों की न सिर्फ आलोचना की है वरन् उनको एक तरह से खारिज भी किया है। मैंने इस मुद्दे का गहराई से अध्ययन करने का निर्णय लिया और यह पता लगाने की कोशिश की कि उन्होंने यह क्रांतिकारी कदम क्यों उठाया?

अनुसंधान के दौरान मैं फुले और उनसे जुड़े मराठी साहित्यिक व बौद्धिक मुद्दों पर लेखन की व्यापकता और श्रेष्ठता से चमत्कृत रह गया। इनमें से अधिकांश सामग्री का अंग्रेजी में अनुवाद हो चुका है। मुझे यह बताया गया है कि इसका दस प्रतिशत भी हिन्दी में उपलब्ध नहीं है। यह देखकर मैं यह सोचने पर विवश हो गया कि किस तरह हमारा साहित्य राज्यों की सीमाओंमें बंधकर रह गया है। भारत में जितनी नस्लीय व भाषायी विविधता है उतनी पूरे यूरोप महाद्वीप में भी नहीं है। परंतु यूरोप में कम से कम तीन भाषाओं-जर्मन, फ्रेंच व अंग्रेजी-में अन्य भाषाओं में लिखे साहित्य के अनुवाद की लंबी परंपरा है।

हिंदी क्षेत्र के बहुजन साहित्य को आगे बढऩे और परिपक्व होने के लिए देश के अन्य हिस्सों के बहुजन साहित्य का अध्ययन करना होगा। मैं जोर देकर कहना चाहूंगा कि इसकी शुरुआत मराठी से होनी चाहिए। बहुजन अध्येताओं को इस काम को हाथ में लेना होगा। मुझे उम्मीद है कि पुणे विश्वविद्यालय और वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय इस मामले में पहल करेंगे। इस बौद्धिक व साहित्यिक आदान-प्रदान से उत्तर भारत का बहुजन साहित्य समृद्ध होगा और अंतत: इसका प्रभाव पूरे राष्ट्र पर पड़ेगा। अगर ऐसा होता है तो इससे फुले, आंबेडकर और यहां तक कि गांधी भी प्रसन्न होंगे।

पुनश्च : लोकसभा चुनाव के नतीजों के आने के तीन सप्ताह पहले, चुनाव पर कोई टिप्पणी न करना मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव है। मोदी ने वाराणसी से अपना पर्चा दाखिल कर दिया है और उनके चेले शाह ने उत्तरप्रदेश में मोदी ‘लहर’ को ‘सुनामी’ बताना शुरू कर दिया है। हमारे
सूत्र हमें बताते हैं कि इस महत्वपूर्ण राज्य में अपेक्षाकृत शांत मायावती और उनकी बसपा को अनापेक्षित सफलता प्राप्त हो सकती है।

 

(फारवर्ड प्रेस के मई, 2014 अंक में प्रकाशित)


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