साँप

उनकी आंखों में आश्चर्य तैरने लगा था। नेवला सांप को पछाड़ देने वाला। नाग को मार गिराने वाला नेवला। पतली सी एक रस्सी में कैद है। बेबस नेवले का दोनों पैरों पर यूं खड़ा हो जाना, उनके स्वागत की बेला थी, या विरोध की कड़ी

पहले की बात है। आजादी का सूरज शैशवकाल की देहरी लांघ, पगिया-पगिया चलता बड़ा होने लगा था। वह वक्त और शब्द पहचानने लगा था।

लखीनाथ सपेरा का डेरा था एक। वहां आंगन में एक बकरी बंधी हुई थी। चितकबरी। बियायी हुई थी, बकरी। दो बच्चे दिए थे, उसने। जैसे
रंग-रूप, काया की मां, वैसे ही उसके बच्चे। पांचेक दिन के वे बच्चे उछलते, कूदते, फांदते, कुलांचते रहे थे, देर तक। अब थके-मांदे बेधड़क सोये पड़े थे, खटौले पर, जैसी कि बच्चों की फि तरत होती है, उछलना, कूदना, छकना, छकाना और गहरी नींद सो जाना। निस्शंक।

अपनी संतान को निरख-निरख बकरी का अंतस पुलकता था। मानो वह इस भव-सागर में आज के दिन सबसे सुखी और संतुष्ट जीव है।
सेठ मुकुंददास के पैरों की आहट कानों पड़ते ही बच्चे जाग गए थे। चौकन्ना बच्चों की नजर उस ओर गई। पराया आया देख, दोनों बच्चे खटौले पर ही कुलांचते, फांदते, कूदते रहे। कभी आकाश की ओर देखते। कभी अवनि की ओर निहारते। कभी अपनी मां की ओर टुकुरटु
कुर देखने लगते, तो कभी वहां बंधे कुत्ते की ओर निरखते।

वे दोनों एक साथ खटौले से नीचे कूद पड़े थे। दोनों में बरबस ही भय-सा कुछ व्याप गया था। वे अपनी मां के पास उसकी छाती तले आ खड़े हुए थे। मां का आंचल, सुरक्षा का साया। ना खौफ। ना कूफ्र। वे बकरी के थन लबडऩा चाहते थे, लेकिन लबड़े नहीं।

वहां पड़ी एक खाट के पाये से कुत्ता बंधा हुआ था। दंतैल। लंबा मुंह। लंबी पूंछ। पीठ-पेट एक। दोनों बगल पसलियां खड़ी हुई थीं, बांस की खपच्चियों सी। बारह इस बगल। बारह उस बगल। एक-एक कर चौबीस की चौबीस गिन लो पूरी। सूत की रस्सी से सुते शरीर के उस श्वान का रंग सफेद था। उसकी आंखें बकरी के उन दोनों बच्चों की ओर देखती और सेठ जी की ओर टिक जाती थीं।

ऐसा खतरनाक और विचित्र कुत्ता सेठ जी पहली दफा देख रहे थे। उन्होंने कुत्ते की ओर देखा कि देखते रहे। अपलक। भय और कौतूक
से। उनके तन-बदन झुरझुरी थी। नेत्र अचंभित थे। बकरी के वे दोनों बच्चे अपनी मां की छाती तले से निकलकर कुत्ते के पास आ खड़े हुए थे। अगल-बगल। वे याचना से उसकी ओर निहारने लगे थे। कुत्ते ने ऊपर-नीचे, दाएं-बांए मुंह से सूंघ कर नजरों से सेठ जी के अंतस-का एक्सरे सा लेते आकलन कर लिया था। आदमी काइयां-राइयां नहीं है। कुत्ते ने बच्चों की ओर मुंह उठाकर उन्हें दिलासा दी- ‘बच्चों, घबराने की कोई जरूरत नहीं है। कहीं खेलो, कहीं-कूदो। मेरे बूते तुम्हारा कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता।’

सेठ जी वहीं खड़े रह गए थे। दाएं-बाएं टकटका रहे थे, टिटहरे से। सेठ जी की आंखें विस्मय से खड़ी रह गई थीं, वहीं की वहीं। डेरे की दीवार की जड़ में लोहे की एक मजबूत खूंटी ठोककर गाड़ी हुई थी। वहां सन की पतली सी एक रस्सी से नेवला का पंजा बंधा हुआ था। जितनी रस्सी, उतनी ही नेवले की दुनिया। जैसे पिंजरे के पक्षी का घरस संसार पिंजरा ही होता है। नवागंतुक देख, नेवला व्यग्रता से दोनों पैरों पर खड़ा हो गया था, सीधा सट्ट। वह कातर नेत्रों से सेठ जी की ओर निगाह बांध कर देखता रहता था। कौन हैं? कहां से आए हैं? क्या काम हैं, इन्हें?

उनकी आंखों में आश्चर्य तैरने लगा था। नेवला, सांप को पछाड़ देने वाला नेवला। नाग को मार गिराने वाला नेवला। पतली सी एक रस्सी की कैद है। बेबस नेवले का दोनों पैरों पर यूं खड़ा हो जाना, उनके स्वागत की बेला थी, या विरोध की कड़ी। सेठ जी की समझ से पर थी बात। इस आश्विस्त के बावजूद नेवले में विष नहीं होता है, वह आदमी को काटता फुंकारता नहीं है, सेठ जी निर्भय नहीं थे। जैसे दूसरे पालतू जानवरों के पास पानी पीने के पात्र रख दिए गए होते हैं, उसी प्रकार नेवले के सामने पानी भरी एक कटोरी रखी हुई थी। नेवला ने चौकन्ना नजरों से इधर-उधर, ऊपर-नीचे देखा और कटोरी से दो चार बूँद पानी पीने के बाद आंखें टिमटिमाता, मुंह झड़काता खूंटी की जड़ में सुस्ताने बैठ गया था।

सेठ जी के घूमते नेत्र एक जगह स्थिर हुए। डेरा के दूसरी ओर कूड़ी पड़ी हुई थी। ऊंची कलंगी और भारी पंखों वाला एक मुर्गा, तीन-चार मुर्गियां उनके चूजे पंजा-पंजा कूड़ा-कर्कट उकेरते चोंच मार-मार चुग्गा चुग रहे थे।

डेरे के गेट से थोड़ा हटकर चिकनी मिट्टी की एक पेहण्डी़ बनी हुई थी। उस पर पानी की मटकी रखी थी। पास ही दो टोकरियां धरी थीं। ये टोकरियां ठीक वैसी ही थीं, जैसी कि सपेरा लोग सांप बंद किए अपनी झोली में लिए होते हैं। गली-कूंचे, चौक-चाक बीन बजाते, भीड़ जुटाते, झोली से पिटारा खोल, सांप दिखाते-खेलते रोजी कमाते हैं। टोकरियों में स्पंदन था।लखीनाथ अपनी झोपड़ी में कच्छे में बैठा हुआ था। वह लूंगी लपेट उसकी अडूंस खोंस बाहर निकला। देखा, उसने एक कुर्सी लाकर सेठ जी के सामने रख दी थी।

सेठ जी ने कुर्सी पर बैठकर छुटते ही पूछा -‘कौन, लाखीनाथ
हो तुम ? मैं मुकुंददास सेठ हूं।’
‘हां।’
‘लखीनाथ सपेरा?’
‘हां-हां सेठ जी, लखीनाथ सपेरा ही हूं मैं।’
सेठ मुकुंददास अब बिल्कुल बेफिक्र थे कि यह शख्स लखीनाथ सपेरा ही है, वेश-परिवेश। मैं ठीये बैठा हूं। उनके चेहेरे पर उड़ती हवाइयां बैठने लगीं थीं। चिंता की लकीरें मिटने लगी थीं।

वे आगे कुछ पूछते-ताछते उनको शब्दों की धांस सी चली गई थी। टेंटुआ पपोलते रहे थे, धीरे-धीरे, देर तक। थावस हुआ। सांस जुड़ी। बोले -‘भई लखीनाथ सच बात कहूं एक।’
‘कहो।’
‘भई लखीनाथ झूठ की झाडू से सच की सफाई नहीं हो
सकती।’
‘सोलह आना। पर……………..।’
‘बताऊं ?’
‘हूं।’
‘माया के मोहपाश हूं मैं।’

लखीनाथ ने नाक के बल लंबी सांस खींची और मुंह की राह छोड़ता चुपा गया था। बस जिज्ञासावश उनकी ओर देखता रहा। सेठ जी अपनी रौ कहते गए-‘अपने भाई से न्यारा (अलग) हो गई दुकान बना रहा हूं मैं। मुहूर्त की जगह नाग निकल आया बिल में। मारने में नहीं आ रहा है।’

डेरा ने थोड़ा हटकर मिट्टी की एक चौतरी खड़ी कर गोगा पीर की मढ़ी बनाई हुई थी। वहां घोड़े पर सवार गोगा जी की मूर्ति प्राण-प्रतिष्ठित थी। पास ही लोहे के पतरों से बने फ न उठाए दो सांप रोपे हुए थे, मिट्टी में। पास ही दीपक जल रहा था।

लखीनाथ ने मढ़ी की ओर हाथ जोड़कर सेठ जी की बात मोड़ी -‘ना-ना साब। काला नाग कभी ना मारना चाहिजे। उसका (शास्ता) शिवजी महाराज और गोगा जी पीर हैं। हाथ जोड़ देता। परसादी बोल देता। नाग चुपचाप चला जाता अपने ठोर-ठीये।’

‘लखीनाथ हमने किया। वह तो बिल में घुसा बैठा है छोहभरा। मानो हम उसका कुछ हर रहे हों।’

‘उसे मारा-छेड़ा तो ना है ना, किसी ने।’लखीनाथ ने प्रायश्चित जैसा भाव मन में लिया।

सेठ जी अपराधबोध दबाते हुए बोले -‘नहीं-नहीं मारा-छेड़ा तो नहीं है, हां, एक दोष जरूर हुआ अनजाने।’

‘वह क्या? लखीनाथ जैसे पाप स्याप रहा हो।

‘नींव खोदते मजूर से उसकी पूंछड़ी कट गई है। कटी पूंछड़ी थोड़ी देर तक तिलमिलाई। अब टूटी जड़ सी पड़ी है, वहीं।’ फन काढ़कर फनफनाते आहत सर्प का वह रोद्ररूप सेठ जी की पुतलियों में घूमने लगा था। उनका अंतस कांपकर रह गया था जैसे भूकंप के दौरान भूगर्भ हिलता है।

कुत्ते के पास खड़े बकरी के वे दोनों बच्चे सूंघते-सांघते हौले-हौले टहलते सेठ जी के पास आ खड़े हुए थे। जब वे उनकी धोती के छोर सूंघने लगे तो उन्होंने अपनी धोती समेट ली थी। कुत्ते ने टेढ़ी नजर उनकी ओर देखा। तिरस्कृत बच्चों ने दो चार कुलांचें मारीं और लखीनाथ के पास आ खड़े हुए थे। वे उसकी लूंगी के किनारों को मुंहछुआने लगे थे। लखीनाथ ने दोनों बच्चों को अपनी गोदी में उठा लिया
था। वह उनको चूमने पुचकारने लगा था।

कुत्ते ने पूंछ हिलाई। बकरी थोड़ी मिमियाई। उसके बच्चों को लडिय़ाने पर वह लखीनाथ को दुआएं दे रही थी। लखीनाथ ने बच्चों को टाबर की तरह हिला-हिलाकर गोदी में खेलाया और फिर उनको खटौले पर छोड़कर मढ़ी की ओर हाथ जोड़कर सेठ जी से कहा -‘पाप कर दिया। घायल नाहर क्रोध के मारे खुद को लहूलुहान कर लेता है। पूंछड़ी कटा नाग गुस्सा से बेकाबू हो जाता है और खुद को फन मारने लगता है।”

सेठ जी थर्राये कंठ बोले – ‘पकडऩा है ना उसे।’
‘पकड़ दूंगा।’
‘चलो मेरे साथ।’
‘थोड़ा टेम लूंगा।’
‘लखीनाथ बात सुन।’
‘हूं।’
‘मुहूर्त  है ना, लोगबाग आ गए हैं। मेरा स्कूटर बंजारा टी स्टाल पर खड़ा हुआ है चलो, बैठा कर ले चलता हूं तुम्हे। हां, टोकरी साथ ले
लो अपनी।’
‘ना-ना, थोड़ा टेम लगेगा अभी।’
‘मगर कितना ?’
‘अपने बच्चे को स्कूल छोड़कर आऊंगा पहले। उसकी मां उसे तैयार कर रही है, झोपड़ी में।’

चिंता ने सेठ जी को फि र आ घेरा था। चेहरे पर चुप बैठी हवाइयों के पंख फि र फ डफ़ ड़ाने लगे थे। अगर मुहूर्त का वक्त निकल गया तो हजारों रुपये बर्बाद हो जाएंगे। रिश्तेदार आएं हैं। आगंतुकों का भोजनहै। पण्डित की दान दक्षिणा। ठेकेदार-मजदूरों की दिहाड़ी।

लखीनाथ ने पेहण्ड़ी के पास जाकर मटके से पानी का लोटा लिया और बकरी के सामने रखे पात्र में डाल दिया था। उसने कुत्ते के पास रखे मिट्टी के कटोरे और नेवले के पास रखी कटोरी में भी पानी डाल दिया था। लौटा मटके पर रख वह सांप की हिलती टोकरी पर अपनी कोहनी रखकर खड़ा हो गया था। कहा, शांत हो जाओ नाग देवता। सेठ जी को भय की धांस जाते जाते रुकी। मन-मन विचारा, हम बिल में घुसा सांप पकड़वाने के लिए मारे-मारे फि र रहे हैं और यह है कि सांप की टोकरी पर कोहनी टेक कर खड़ा हो गया है। आदमी की जात-जात में कितना अंतर है, इस धरा पर। हम जिसे मौत मानते हैं, वही मौत उनकी रोजी-रोटी का जरिया है। हम मौत के नाम कांपते हैं और ये लोग मौत को गले में डाले घूमते हैं।

लखीनाथ ने ऊपर उठते सूरज की ओर देखा। वह अंदर झोपड़ी में गया और मूढ़ी उठा लाया। वह मूढ़ी डालकर सेठ जी के सामने बैठ गया
था। सेठ जी को चिकौटी-सी कटी। खड़ा ही ठीक था, सपेरा। लखीनाथ लूंगी संगवा कर बोला -‘इंतजार में हूं लड़का अभी तैयार नहीं हुआ है।’

सेठ जी के दिलो-दिमाग से एक जिज्ञासा पानी भरी बदली की तरह उमड़-घुमड़ रही थी। वह विलंब का नाम ले पूछ बैठे ‘लखीनाथ तुम्हारे कानों में इतने मोटे-मोटे छेद?’

लखीनाथ ने मढ़ी की ओर हाथ जोड़े। आसमान की ओर देखा। दोनों कान छुए और कंधे उचकाकर कहने लगा – ‘सेठ जी ये छेद नहीं हैं, छिदें
हैं। जैसे उपनयन की जनेऊ को धागा नहीं बोला जाता, नाथ संप्रदाय की रीत इन्हें छेद नहीं, छिदें बोलते हैं।’ ‘हम बाबा गोरखनाथ के चेले हैं ना।’
‘हूं’।

मेरे यह छिदे कान तो पहलां की रीत निशान हैं। अब मैंने तो अपने टाबर
का कान नहीं छिदवाये।

सेठ मुकुंददास ने दुबले-पतले से लबे कद, लंबी गर्दन और बड़े-बड़े बालों वाले तीसेक साल के इस युवक को निगाह रोक कर देखा। उसके
बाल कंधों पर गिरते थे। कमीज कंधों मैली हो रही थी।

उन्होंने हमदर्दी जताई – ‘भाई लखीनाथ कुछ भी कहो। आप लोगों का सांप पकडऩे का ये पेशा तो मौत को काबू करना है। ना जाने कब क्या हो
जाए।’

लखीनाथ ने झोपड़ी के भीतर झांका। लड़का बाल बाह रहा था। वह एकघटना का स्मरण कर बरबर शोकार्त हो गया था। आंखों की भोंहों पर पानी की बूंदें झूलने लगी थीं। थर्राए कंठ सेठ जी से कहने लगा – ‘हां कई बार समय भी जिन्न बनकर सिर पर सवार हो जाया करता है। अच्छे-अच्छे सईस घोड़ा साधते गिर कर मर जाते हैं। गोताखोरों को पानी लील जाता है। सर्कस के रिंग मास्टर जानवरों की चपेट में आ जाते हैं। सांप पकडऩे में लाखों में मीर मेरा बड़ा भाई रुक्कानाथ सांप पकड़ते, सर्पदंश से चल बसा।’

‘अरे! अरे!’ सेठ जी एकाएक सहानुभूत हो गए थे। ‘हां साब, हां। सांप तो काबू कर लिया था उसने। बिष भरा फ न लकड़ी से दबा, उसका मुंह खोलकर बिष की थैली नोच रहा था। केंचुल उतरे चितकोबरा का फ न फि सल गया और क्रोध से आग-बबूला हुए सांप ने मेरे भाई को जगह-जगह डस लिया। हम पहुंचे उसकी समूची देह नीली पड़ गई थी। नीलम सरीखी नीली।’ लखीनाथ ने आंखों में झूलते आंसू उंगली की पोर से पोंछ लिए थे। उंगली पर लगी आंसू की बूंद को वह ऐसे निहारने लगा था, मानो वह बूंद उस मनहूस घड़ी की इबारत हो। उसने अपने भाई
को याद कर उस बूंद को टकटकाते कबीर का एक दोहा गाया –

पानी केरा बुदबुदा अस मानस की जात।
देखत ही छुप जाएगा ज्यों तारा प्रभात।।

वह थोड़ी देर गमगीन रहा और संयमित होकर कहने लगा -‘सेठ जी पानी के बुदबुदे की तरह है, आदमी की जिनगानी। वह समुद्र लांघ कर, किला जीत कर मौत से हार जाता है।’ सेठ जी ने भाव विह्वल कंठ पूछा -‘उसकी पत्नी विधवा हो गई बेचारी?’

लखीनाथ ने बात संभाली – ‘ना-ना-ना। हम बड़ी जात थोड़े ना हैं, जो विधवा रहे। अब वह मेरी औरत है और मैं उसका आदमी हूं। मांग का सिंदूर और गले का मंगलसूत्र।’

सेठ जी आश्चर्य से हिले -‘अच्छा।’
‘हां-हां। पहले मैं उसका देवर था। कपड़ा ओढ़ा मेरी चूडिय़ां पहना दीं उसको। उसका वह लड़का अब मेरा बेटा है। लड़के की मां उसे तैयार कर रही है भीतर। दूसरी में पढ़ता है। उसी को छोडऩे स्कूल जाना है मुझे।’ ‘हमारे यहां तो देवर को पुत्र बराबर मानते हैं।’
‘तभी तो बड़े घरों में विधवाओं की तादाद ज्यादा है। वृदांवन में…………………….।’

वह कहता-कहता रुक गया और फि र लंबी सांस मारी -‘बेचारी बेवा। जिंदगी भर माथा पीटो, रंडापा काटो।’

सेठ जी ने गहरे पैठ पूंजी की कूत अपने अंतस को समझाया – ‘आज प्रजातंत्र का राज है। एक एक वोट ताज है। गरज मेरी है। मरजी सपेरा की है। मरजी की दवा मुद्रा मानी गई है। छोटी जात है ना, पैसा लुभाती है।’

लखीनाथ को पोसाने के लिहाज सेठ जी ने अपने मस्तक पर हाथ फेरा और लखीनाथ की ओर एक सांस देखते कहा – ‘सुनो लखीनाथ।’

‘लखीनाथ हूं’ कहो, इतनी ही देर में झोपड़ी से आवाज आ गई थी -‘नाथ जी छोरो तियार कर मेलो है, स्कूल ले जाओ इने।’ लखीनाथ ने मूढ़ी से उठते हुए हाथ में सिमटी लूंगी छोड़ी -‘बस
आयो।’

दरवाजे की ओर बढ़ता लखीनाथ वहीं ठिठककर रह गया था। कनखियों से उनकी ओर देखा -‘कहो सेठ जी अब मैं जा रहा
हूं।’

‘नींव की जड़ में बैठा सांप पकड़वाना घना जरूरी है। मुहूर्त का टेम निकल जाए कहीं।’ सेठ जी ने अपने लहजे अनुनय की। ‘तो।’ लखीनाथ ने चढ़ते सूरज की ओर देखा। ‘बात सुन लो, लाभ की है।’ ‘बताएं।’ ‘काम का दाम कूत लो। बच्चे के एक दिन स्कूल जाने से कोई
फर्क नहीं पड़ेगा।’

मुकुंददास की लुभावनी बात लखीनाथ को बुरी चुभी। बदन में भी और हृदय में भी। उसके मिशन का सरेराह सौदा। क्षुब्ध लखीनाथ ने अपने दोनों कानों की छिदें अंगुलियों से छुई मानो संप्रदाय का ईमान-धर्म साक्ष्य हो। उनके नजदीक आकर खड़ा हो गया और चेहरे पर ताव लाता तुनक पड़ा-‘साब, कितना दोगे आप? एक हजार। दो हजार। तीन हजार। पांच हजार। दस हजार। मेरे बेटे की एक दिन की पढ़ाई की नागा के सामे (सामने) सब धन धूल बरोबर है। बहौत (बहुत) तावल है ना आपने, यहां से दो तीन मील दूर सपेरा का दो-तीन डेरा और बसे।

‘लखीनाथ की बेबाकी। सेठ जी के कान पर जैसे लितरा धर दिया हो किसी ने। कुत्ते ने अपनी लंबी पूंछ को पतली कमर पर रखा और आगे के दोनों पंजे उठाकर पिछले पैरों पर खड़ा हो गया था, ‘जी शिक्षा ही गरीब की सबसे बड़ी पूंजी है।’

बनी बात का सूत टूट नहीं जाए। आत्मीयता का इजहार करते सेठ जी ने अपनी बात खुद मोड़ ली-‘पर यह तो बताओ लखीनाथ कितनी देर में लौट पड़ोगे तुम?’
‘बस यही कोई बीस-पच्चीस मिनट में।’
‘जरा जल्दी करना।’

वे घड़ी की टिकटिक करती गति की ओर निगाह बांधकर देखने
लगे थे। अभी सवा नौ बजे हैं। सवा ग्यारह की मुहूर्त की टेम-घड़ी
है।

झोपड़ी के अंदर से फि र आवाज आई -‘अजी नाथ जी, छोरो तियार कर मेली है, खड़ो छै बाट में थारी।’

‘आयो।’ अपने बालों की लटों को झटकता, लूंगी समेटता लखीनाथ झोपड़ी में गया। लौटा। नीली नेकर, सफेद बुशर्ट पर टाई लगाए, बूट जुर्राबें पहने, बगल में बस्ता लटकाए सातेक साल का एक सलोना सा लड़का लखीनाथ की अंगुली पकड़े बाहर निकला। गेहुंआ रंग। मां जैसा निकलता कद। मासूमियत की प्रतिमूर्ति।

लड़के को नजर भर देखते ही नि:संतान सेठ मुकुंददास का मुंह खुला का खुला रह गया था, कोटर सा। ‘अरे-अरे, कीचड़ में
गुलाब।’

सामने के डेरे से एक लड़की वैसी ही स्कूल ड्रेस पहने, बगल में बस्तालटकाए आ खड़ी हुई थी। सीधी मांग निकले उसके बालों में दाएं-बाएं गुलाबी रंग के दो रिबन गुंथे थे। वह लड़के की हमउम्र थी और उसी की क्लास में पढ़ती थी।

लखीनाथ ने लड़की की ओर हाथ का संकेत कर सेठ जी को बताया, ‘सेठ जी, यह लड़की अपनी ही जात-बिरादरी की है। सपेरा-कालबेलिया। मां-बाप कालबेलिया नाच सिखा रहा था, इसे। मैंने उनको समझाया, बुझाया, हड़काया और अपने लड़के के साथ इसे स्कूल में डाल दिया। दूसरी क्लास में है आज।’

सेठ मुकुंददास ने डेरा की ओर देखा। लखीनाथ के जीव जानवरों की ओर स्नेहसिक्त नेत्रों से निहारा। उन्होंने माथे पर हाथ रखकर नभ की ओर नजर मारी, मानो कुछ बूझ रहे हों, खुद से। जिस अभिजात दुनिया को हम मखमली देखते हैं ना, वह छल-कपट, मोह-माया, दंभ-द्वेष, दाम-साम के पैबंदों ढ़की है। असली दुनिया तो ये सर्वहारा है। बिना दंभ-द्वेष लोभ-लालच, हाय-हाय, निर्लेप है। गरीबी आत्मीयता है। गरीबी आत्मसुख। सचमुच दो दुनियाएं हैं यहां। गरीब दुनिया। अमीर दुनिया। गरीब की दुनिया खरबूजे की तरह है। वह बाहर से अलग-अलग धारियों में दिख कर भी भीतर से एक है। अमीर दुनिया नांरगी की तरह से है। वह बाहर से एक जैसी दिखकर भी भीतर से फांक-फांक है।

लखीनाथ ने अपने बच्चे को साइकिल के डंडे पर बैठाया और खुद गद्दी पर बैठ गया था। लड़की रोज की तरह लपककर साइकिल के केरियर पर बैठ गई थी। लखीनाथ ने लूंगी गोड़ों तक समेट ली और पैडिल मारते राह पकड़ ली थी। वह दोनों बच्चों को साइकिल पर बैठाए, पैडिल मारता। साइकिल की घंटी बजाता, बस्ती के बीचों-बीच जा रहा था, बस्ती मेरी तरह जाग जाए।

साइकिल पर स्कूल ले जाते इन दोनों बच्चों को टक-टक टुकुरते सेठ जी का मन मयूर स्वह्रश्वनलोक में विचरने लगा था। अगर यह दोनों बच्चे उनके घर-आंगन होते, गाड़ी स्कूल छोडऩे जाती, गाड़ी स्कूल से घर लाती। उन्होंने लंबी सांस मारी-‘कुदरत तेरी माया, कहीं धूप कहीं छाया। जहां दौलत है, वहां औलाद नहीं, जहां औलाद है, वहां दौलत नहीं।’

मुरली! जैसा नाम, वैसी चाम। लंबे कद की पतली सी औरत थी, वह। उसके हाथ-पांव भौंहें, चिबुक और कपोल खिने (गोदना) थे। वह गोट लगा घाघरा, किनारी निकला नीचा सा कमीज पहने थी। सिर पर सितारों जड़ी नीली लूगड़ी थी। बचपन में निकली मोटी माता उसका रूप ले गई थी। उसका चेहरा चेचकारू था। वह किसी अनजान के सम्मुख कम ही आती थी। ढोड़ी तक घूंघट रखती थी। हां, थी भली। सौ नेक की एक नेक।

सेठ मुकुंददास को मालूम नहीं, लखीनाथ की पत्नी मुरली थाली में बकरी का दूध भरा गिलास रखे झोपड़ी से निकल, कब उनके सामने आ खड़ी हुई थी।

उसने सेठ जी की ओर थाली बढ़ाकर पावणा (मेहमान) की तरह मनुहार की-‘लो जी साब जी, दूध आरोगो। नाथ जी बोल गया है।’

सेठ जी की भौंहें फैलकर सिकुड़ीं और यथावत् हो गई थीं। सपेरे की जात और औकात का आकलन कर उन्हें जमीन- आसमान का भेद दिखाई दिया। संकुचाते हुए संयम से बोले’आज दुकान का मुहूर्त है ना, होंठ चाय, दूध, रोटी ना छुवे।’

वे गोड़ों पर हाथ रखकर उठ खड़े हुए थे। मूरली से कहा’ल खीनाथ को कहना मैं बंजारा टी स्टाल पर बैठा हूं। हां, एक बात और याद करके कहना उसको।’
‘जी’।
‘नाग पकडऩो है, खाली टोकरी जरूर साथ लावे।’ ‘सेठ मुकुंददास उठकर उसी राह चल दिए थे, जिस राह आए थे। मुरली ने सिर नवां कर उनको नमस्कार की। कुत्ते ने भूंक कर पूंछ हिलाई। बकरी थूथन उठाकर धीमे से मिमियायी। नेवला आगे के दोनों पंजे मोड़कर पिछले दोनों पंजों पर खड़ा हो गया था। पेहण्डी पर धरी सांप की टोकरी हिली। पधारो!

 

(फारवर्ड प्रेस, बहुजन साहित्य वार्षिक, मई  2014 अंक में प्रकाशित)


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