क्या उपनिवेशवाद ने भारत को विकासशील देश बनाया?

सैम हिग्गिनबॉटम को यह समझ में आया कि भारत को आधुनिक आर्थिक सिद्धांतों से कुछ अधिक चाहिए। इसलिए वे अमेरिका वापस गए जहां उन्होंने कृषि विज्ञान का अध्ययन किया और फिर खेती किसानी के शिक्षक के रूप में भारत वापस आए। उन्होंने अपना संदेश अपनी पुस्तक ‘द गोस्पेल एण्ड द ह्रश्वलाव’ में दिया है

कुछ भारतीय, जिनमें कतिपय दलित विचारक भी शामिल हैं, मानते हैं कि आधुनिक भारत की समस्या यह है कि अंग्रेज यहां देर से आए और जल्दी चले गए। अंग्रेजों को हमारे भाग्यवादी दृष्टिकोण, हमारे भ्रष्ट चरित्र व हमारी दमनकारी संस्कृति को बदलने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिला। ये विचारक यह मानकर चलते हैं कि हमारे देश को विकास के पथ पर गतिमान करने का श्रेय अंग्रेजों को है। 19वीं सदी के ब्रिटेन के महानतम इतिहासविदें में से एक लार्ड थामस बैबिंग्टन मैकाले इससे सहमत नहीं दिखते। राबर्ट क्लाईव, जिसने बंगाल का उपनिवेशीकरण शुरू किया था, पर अपने विलक्षण लेख में वे कहते हैं कि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ‘लुटेरों की गैंग थी, जिसने बंगाल के पूरे मैदानी इलाके में आतंक मचा दिया था।’

मैकाले कहते हैं कि अंग्रेज शासकों की कुटिलता, मनुष्य की कुटिलता नहीं थी। वह दानवों की कुटिलता थी। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन ‘मानव तानाशाहों का शासन नहीं था। वह तो दुष्ट जिन्नात का शासन था।’ घनघोर निराशा भी नर्म स्वभाव के बंगालियों को अंग्रेज नस्ल से लोहा लेने की प्रेरणा नहीं दे सकी…उन दुखियारों ने तो विरोध करने का प्रयास भी नहीं किया। या तो उन्होंने चुपचाप आत्मसमर्पण कर दिया और या फि र उसी तरह भागकर अपनी जान बचाई, जिस तरह उनके पूर्वज मराठों से बचाते थे। अंग्रेज यात्रियों की पालकी सुनसान गांवों से गुजरती थी क्योंकि उनके आने की सूचना सुनते ही गांववाले अपने घरबार छोड़कर भाग जाते थे। ब्रिटिश शासन तो उन लोगों को, जिन्होंने खजुराहो, ताजमहल और लालकिला बनाया, पाषाण युग में धकेल देता। ब्रिटेन ने नहीं बल्कि बाइबिल ने भारत को एक विकासशील राष्ट्र बनाया।

ब्रिटिश-पूर्व भारत क्या गतिहीन राष्टट् था? दिल्ली में महरौली में कुतुब प्रांगण में स्थित लौह स्तंभ, भारतीय तकनीकी और निर्माण कला का उत्कृष्टतम नमूना है। चौथी सदी में निर्मित इस 26 फीट ऊंचे स्तंभ में 1500 साल बाद भी जंग नहीं लगी है। इस स्तंभ से यह साबित होता है कि प्राचीन भारत की टेक्नोलोजी, प्राचीन पश्चिम से कहीं आगे थी। इतिहासविद् आरएस शर्मा कहते हैं, ‘पश्चिम के किसी भी लौह ढलाई संयंत्र में, एक सदी पहले तक, इस तरह के स्तंभ का निर्माण संभव नहीं था। यह शोचनीय है कि आने वाले समय में, भारतीय कारीगर इस तकनीकी को और विकसित नहीं कर सके।’ (इंडियाज एनशिएंट पास्ट, पृ. 248) शर्मा यह नहीं बताते कि ‘इस तकनीकी’ को आगे विकसित क्यों नहीं किया गया यद्यपि वे यह लिखते हैं कि जिस समय यूरोप में लकड़ी के हल इस्तेमाल हो रहे थे, उस समय भारत में लोहे के हल आम थे।

तकनीकी में इतने आगे होने के बावजूद हम महान राष्ट्र क्यों नहीं बन सके? अपने उपन्यास ‘अंटचेबिल’ में मुल्कराज आनंद यह भोली आशा व्यक्त करते हैं कि टेक्नोलोजी, भारत के शहरों और गांवों की सामाजिक-सांस्कृतिक गंदगी को साफ कर देगी। निस्संदेह टेक्नोलोजी बहुत प्रभावकारी है परंतु हमारी संस्कृति, टेक्नोलोजी को चारों खाने चित्त करने की क्षमता रखती है और कर रही है। हमें विनम्रतापूर्वक यह स्वीकार करना चाहिए कि हमारी संस्कृति-जिसे हमारे धार्मिक विचारों ने आकार दिया-ने टेक्नोलोजी को हमारे राष्ट्र में परिवर्तन का वाहक बनने से रोक दिया है। जहां बैठकर मैं यह लेख लिख रहा हूं, मुझे खिड़की से यमुना नदी दिखलाई दे रही है। मेरे डीम्ड विश्वविद्यालय, सैम हिग्गिनबॉटम इंस्टिट्यूट ऑफ एग्रीकल्चर, टेक्नोलॉजी एंड सांइसेज, इलाहाबाद में है। इलाहाबाद, भारत की दो सबसे बड़ी, बारहमासी ‘पवित्र’ नदियों गंगा और यमुना के बीच स्थित है। इतनी तकनीकी तो हमारे पास उपलब्ध है ही कि हम यह सुनिश्चित कर सकें कि शहर के हर घर में पर्याप्त पानी पहुंचे। इन नदियों में इतना पानी है कि हम इलाहाबाद की सड़कें तक धो सकते हैं परंतु फिर भी इलाहाबाद में हमेशा पानी की किल्लत बनी रहती है और चारों ओर गंदगी का साम्राज्य रहता है।

कई लोगों को तब बहुत धक्का लगा था जब भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने गुजरात काडर के आईएएस अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा था कि साफ-सफाई  के काम को एक जाति विशेष की ईश्वरीय जिम्मेदारी/मिशन माना जाना चाहिए। ये लोग मोदी के प्रति सहानुभूति रखते अगर वे यह याद करते कि आश्रम के शौचालय साफ करने का मुद्दा, महात्मा गांधी के लिए किस तरह रोजाना के घरेलू झगड़ों का सबब बन गया था। भारत यदि इतना गंदा है तो उसका कारण हमारी आंतरिक संस्कृति है।

सन् 1976 में खजुराहो की मेरी पहली यात्रा में ही मुझे यह समझ में आ गया था कि टेक्नोलोजी और तकनीकी कौशल अपने आप में विकास नहीं लाते। खजुराहो की कामोत्तेजक मूर्तियों की प्रेरक आध्यात्मिकता के बारे में आपके चाहे जो विचार हों परंतु आपको यह तो स्वीकार करना ही होगा कि ये मंदिर वास्तुकला, इंजीनियरिंग व सौंदर्यशास्त्र के उत्कृष्ट नमूने हैं। धार्मिक अश्लीलता से कहीं अधिक जिस चीज ने मुझमें वितृष्णा का भाव जगाया वह यह थी कि सन् 1970 के दशक के मध्य तक, वे ग्रामीण, जिनके पूर्वजों ने पत्थर के इन भव्य मंदिरों का निर्माण किया था, मिट्टी के झोपड़ों में रह रहे थे। हवाई जहाजों में लदकर हर रोज हजारों पर्यटक वहां पहुंचते थे। समय वहां पांच सितारा होटलों का निर्माण चल रहा था। परंतु आम आदमी उन्हीं मिट्टी के झोपड़ों में रह रहा था, जो कम से कम एक हजार साल से उसका आशियाना थे। यह इस बात का अटूट प्रमाण था कि हिन्दू धर्म ने रचनात्मकता का गला घोंटा। उसने हमारी सत्यता और हमारी तथाकथित ‘महान जीवनशैली’ को ठहरे हुए पानी का तालाब बना दिया, उसकी प्रगति रोक दी।

भाग्यवाद से आशा की ओर

विकास के लिए ज्ञान और टेक्नोलोजी की जरूरत तो होती ही है परंतु इससे अधिक जरूरी होता है एक ऐसा आर्थिक-सामाजिक वातावरण, जो प्रगतिशील और सुरक्षित हो। मिस्र में यहूदी गुलाम थे। परंतु ईश्वर के शब्दों ने उनके दिलों को आशा से भर दिया। एक बेहतर कल, गुलामी से मुक्ति और एक ऐसी धरती का उत्तराधिकार, जहां दूध और शहद की नदियां बहती हों, की आशा उन्हें एक ऐसे जीवित ईश्वर ने दी जो कि इतिहास में उन सभी को बचाने आगे आता रहा है जिन्होंने भी उसका आह्वान किया। मोसेस यदि यह आशा कर रहे थे कि वो गुलामों को मुक्ति दिलाएंगे तो उनकी यह आशा ईश्वर के वायदे पर निर्भर थी-एक ऐसा वायदा जिसे वे विश्वसनीय मान सकते थे।

बाइबिल में ईश्वर का यह वायदा कि वे अब्राहम के आध्यात्मिक उत्तराधिकारियों के जरिए सभी राष्ट्रों को अपना आशीर्वाद देंगे, ने यमुना नदी के उस पार स्थित ईविंग क्रिश्चियन कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक (1903-09) सैम हिग्गिनबॉटम का प्रेरणास्त्रोत बना। उनका पेशा तो आधुनिक अर्थशास्त्र पढ़ाना था परंतु उन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था को परिवर्तित करने को अपना मिशन बना लिया। जब उनका साबका हमारी संस्कृति से पड़ा तो वे इस नतीजे पर पहुंचे कि अमेरिकी आर्थिक सिद्धांत, भारत की गहन सांस्कृतिक आवश्यकताओं को पूरी करने के लिए अपर्याप्त हैं।

‘परंतु नए ढंग से खेती करने से हमें क्या लाभ होगा (इलाहाबाद के गरीब किसानों ने जानना चाहा)। जितना अधिक उनका उत्पादन होगा, उन्हें जमींदार और उसके कारिंदे को उतना ही अधिक देना पड़ेगा। फि र उन्हें लूटने के लिए पटवारी भी तैयार रहता था। पटवारी वह कुख्यात सरकारी मुलाजिम है जो जमीन के मालिकाना हक और पट्टे पर दी गई भूमि का रिकार्ड रखता है। वह यह हिसाब भी रखता है कि विभिन्न फ सलें कितने क्षेत्र में बोई गईं और उनका कितना उत्पादन हुआ। वो गांव के पेड़ों, कुंओं और खेतों के संबंध में अपनी रपट ऊपर के अधिकारियों को भेजता है। अक्सर, मोटी रकम के बदले में रिकार्ड में जमीन पट्टेदार के हाथ से खिसककर जमींदार के हाथ में पहुंच जाती थी। फि र पुलिस थी, राजस्व विभाग था जो टैक्स इकट्ठे करता था और साहूकार था, जो अपने देनदारों के पास इतना भर छोड़ता था कि वे जिंदा रह सकें और कभी-कभी इतना भी नहीं।’ (सैम हिग्गिनबॉटम, फार्मर : एन ऑटोबायोग्राफी, पृष्ठ 71)

छोटे स्तर के सरकारी कर्मचारियों का भ्रष्टाचार तो समस्या थी ही। इससे भी बड़ी समस्या यह थी कि ये सभी कर्मचारी भारतीय थे और उन्हें अपने ही देशवासियों का शोषण करने और उन्हें लूटने में कोई संकोच नहीं था। परंतु इस समस्या से निपटना आसान था। इससे कहीं अधिक कठिन था धनलोलुप, लुटेरे साहूकारों से जूझना और जो शोषित हैं, उनकी भाग्यवादी मानसिकता को बदलना।

‘जब मैंने कुंओं और खेतों पर जाकर ग्रामीणों से बातचीत की तो मैं उनकी गरीबी को देखकर अंदर तक हिल गया। पैदा होने से लेकर मरने तक, उनमें से कई हमेशा आधा पेट भोजन ही कर पाते थे। उन्हें यह पता ही नहीं था कि पेटभर अच्छा खाना क्या होता है। हमने उनसे जानना चाहा कि उनके दुखों का इलाज क्या है। परंतु उनमें से अधिकांश घोर भाग्यवादी थे। वे बार-बार यह कहते थे कि उन्हें पिछले किसी जन्म में किए गए पाप की सजा मिल रही है। वे यह भी मानते थे कि उनके साथ जो कुछ भी हो रहा है वह उनकी किस्मत है और उसे बदलने के लिए वे कुछ नहीं कर सकते। वे यह मानते थे कि ऊपरवाले की मर्जी सर्वोपरि है और वही होगा जो वह चाहेगा। किसान भाग्यवादी थे और मनुष्य की प्रगति के लिए कोई चीज इतनी घातक नहीं होती जितना की भाग्यवाद, क्योंकि वह कोशिश करने की इच्छा को ही समाप्त कर देता है।’ (पूर्वोक्त पृष्ठ 75)

अगर आपको ऐसा लगता है कि उत्तर भारत के हालात का यह विवरण, एक अमेरिकी मिशनरी का हमारी संस्कृति को बदनाम करने का
प्रयास है तो उन्हीं के समकालीन प्रेमचंद के प्रसिद्ध उपन्यास ‘गोदान’ को पढि़ए। प्रेमचंद ने हिग्गिनबॉटम की तुलना में किसानों की व्यथा और उसके कष्टों का कहीं अधिक विस्तृत और दिल को छू लेने वाला विवरण किया है-‘वे हर तरह के कष्ट भोगते थे। किसान चलता-फिरता था, काम करता था, रोता था और अपना दमन इतने चुपचाप सहता था मानो कष्ट भोगना उसकी नियति हो। उसके पास न आशा थी न खुशी। उसकी जिंदगी पूरी तरह शुष्क थी। उसे अपना कोई भविष्य नजर नहीं आता था। उसकी संवेदनाएं मर चुकी थीं। उसके घर के दरवाजे पर बदबू मारता कचरे का ढेर पड़ा रहता था परंतु वह न तो उसकी तरफ देखता था और ना उससे प्रभावित होता था। वह बिना स्वाद लिए खाना खाता था मानो कोई मशीन कोयला निगल रही हो। पेट भरने के लिए जो कुछ मिल जाए वह उसके लिए काफी था। वह एक पैसे के लिए बेईमानी करने को तैयार था और मुट्ठी भर अनाज के लिए लडऩे को। वह इतना पतित हो चुका था कि उसके लिए शर्म और सम्मान में कोई अंतर ही नहीं था।’

सैम हिग्गिनबॉटम को यह समझ में आया कि भारत को आधुनिक आर्थिक सिद्धांतों से कुछ अधिक चाहिए। इसलिए वे अमेरिका वापस गए जहां उन्होंने कृषि विज्ञान का अध्ययन किया और फिर खेती किसानी के शिक्षक के रूप में भारत वापस आए। उन्होंने अपना संदेश अपनी पुस्तक ‘द गोस्पेल एण्ड द ह्रश्वलाव’ में दिया है।

 

(फारवर्ड प्रेस के जून, 2014 अंक में प्रकाशित)


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