भारत की स्वाधीनता में अमेरिका की भूमिका

‘मेरा दृढ़ विश्वास है कि स्थायी शांति की स्थापना तभी हो सकती है जब पिछड़े हुए देशों और पिछड़े हुए लोगों का विकास हो। 20वीं सदी के तरीकों का मतलब है इन उपनिवेशों में उद्योगों की स्थापना

जिन इतिहासविदें ने भारत की स्वाधीनता की ‘कहानी’ सबसे पहले लिखी, उन्होंने स्वहित की खातिर, इसका श्रेय गांधी और उनकी पार्टी को दिया। वामपंथी इतिहासकारों को यह नहीं भाया परंतु वे पूंजीवादी अमेरिका को श्रेय देने के लिए भी तैयार नहीं थे। हिंदुत्ववादी इतिहासविद्, कांग्रेस के ‘मिथक’ का खंडन करना चाहते थे परंतु उनका स्वदेशी प्रेम, उन्हें ऐतिहासिक तथ्यों के प्रति ईमानदार नहीं रहने दे रहा था।

इतिहास का हर विद्यार्थी जानता है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के साथ ही, यूरोपीय देशों के उपनिवेशवाद का भी अंत हो गया। न केवल भारत, वरन् लगभग सभी उपनिवेशों को सन् 1945 के बाद स्वतंत्रता हासिल हो गई-उन्हें भी, जिन्हें यह नहीं पता था कि वे स्वयं अपना शासन कैसे चलाएंगे। इतिहासकार यह भी जानते हैं कि 14 अगस्त, 1941 के अटलांटिक चार्टर के कारण, इंग्लैण्ड के साम्राज्यवादी प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल, नैतिक दबाव के चलते अपने देश के उपनिवेशों को आजाद करने पर मजबूर हो गए।

अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रेंकलिन डी रूजवेल्ट के पुत्र व सहायक इलियट रूजवेल्ट, द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, रूजवेल्ट व चर्चिल की 11 में से 8 मुलाकातों के साक्षी थे।

अपनी पुस्तक ‘एज ही सॉ इट’ (1946) में वे उनके पिता व चर्चिल के बीच साम्राज्यवाद से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के अंतिम दौर के बारे में लिखते हुए कहते हैं :

‘चर्चिल कमरे में चहलकदमी कर रहे थे। काफी लंबे समय तक, खूब जोशो-खरोश से अपनी बात कहने के बाद, वे क्षण भर के लिए रुके, मेरे पिता की ओर देखा और फिर अपनी मोटी उंगली उनके चेहरे की ओर करके बोले : ‘राष्ट्रपति महोदय, मेरा यह विश्वास है कि आप ब्रिटिश साम्राज्य को समाप्त कर देना चाहते हैं। युद्ध के बाद की दुनिया के ढांचे के बारे में आपकी हर सोच इसी ओर इशारा कर रही है। परंतु इसके बाद भी’-और उनकी उंगली थोड़ी हिली-‘इसके बाद भी, हम जानते हैं कि आप ही हमारी एकमात्र आशा हैं।’ और फि र, उन्होंने अपनी आवाज नाटकीय रूप से नीची कर कहा, ‘आप जानते हैं कि हम यह जानते हैं कि अमेरिका के बिना ब्रिटिश साम्राज्य खड़ा नहीं रह सके गा।’
चर्चिल ने उसी क्षण यह स्वीकार कर लिया था कि वे जानते थे कि शांति केवल अमेरिका द्वारा निर्धारित सिद्धांतों का पालन कर हासिल की जा सकती है। वे जब यह कह रहे थे तब वे स्वीकार कर रहे थे कि युद्ध के बाद, ब्रिटेन की औपनिवेशिक नीति के लिए दुनिया में कोई स्थान नहीं होगा, वैश्विक व्यापार पर प्रभुत्व स्थापित करने का ब्रिटेन का स्वप्न चकनाचूर हो जाएगा और ब्रिटेन, अमेरिका और सोवियत संघ को लड़ाकर खुद मलाई खाने का अपना इरादा पूरा न कर सकेगा।

आठ-सूत्रीय अटलांटिक चार्टर ने यह सुनिश्चित किया कि युद्ध के बाद, विजेता देशों ने संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन किया न कि ‘संयुक्त साम्राज्य संघ’ का। चार्टर के आठ बिंदुओं में से तीसरा यह था कि अमेरिका और इंग्लैण्ड, हर उपनिवेश के अपने भविष्य का स्वयं निर्धारण करने के अधिकार का सम्मान करते हैं। चार्टर को अपनी स्वीकृति प्रदान करने के बाद भी, चर्चिल चाहते थे कि यह अधिकार केवल जर्मन उपनिवेशों के नागरिकों को मिले, ब्रिटिश उपनिवेशों को नहींं। परंतु रूजवेल्ट के दृढ़ रुख के कारण, चार्टर ने एक ऐसी लहर पैदा की जो जल्दी ही सुनामी में बदल गई और उसने चर्चिल जैसे ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की आपत्तियों को दरकिनार कर दिया।

रूजवेल्ट ने उपनिवेशवाद का विरोध क्यों किया?

• रूजवेल्ट उपनिवेशवाद के विरोधी क्यों थे?
• वे ब्रिटेन पर नैतिक दबाव लाने में क्यों सफ ल हुए?
• क्या साम्राज्य और उपनिवेशवाद, नैतिक दृष्टि से गलत हैं?
• क्या ‘राष्ट्र’ आध्यात्मिक इकाई है जिन्हें ‘स्वनिर्णय’ (स्वतंत्रता) पाने का ईश्वरीय अधिकार है और जिनकी यह जिम्मेदारी भी है कि वे इस स्वतंत्रता का इस्तेमाल नैतिकतापूर्वक करें?

इन मुद्दों पर अमेरिका की राय का आधार थे वे उग्र धर्मशास्त्रीय तर्क-वितर्क जिनकी परिणति सन् 1555 की शांति संधि (ल्यूथेरन व रोमन कैथोलिकों के बीच) व 1638 की वेस्टफेलिया शांति संधि (कालविनिस्टों, लूथेरनो व कैथालिकों के बीच) में हुई। राष्ट्रीय स्वतंत्रता की अमेरिका की धर्मशास्त्रीय समझ ने रूजवेल्ट को ब्रिटिश साम्राज्य का अंत करने में सक्षम बनाया। इस छोटे से लेख में हम विस्तार से यह नहीं बता सकते कि किस तरह बाइबिल के धर्मशास्त्र ने भारत को स्वाधीन करने में मदद की। इस ऐतिहासिक तथ्य को आसान तरीके से समझाने के लिए मैं साहित्यिक अनुज्ञा का सहारा लेते हुए, रूजवेल्ट व चर्चिल के बीच निम्नांकित काल्पनिक वार्तालाप का वर्णन कर रहा हूं : ‘अगस्त 1941 में चर्चिल जब एचएमएस प्रिंस ऑफ वेल्स से उतरकर, रूजवेल्ट की ‘मछली मारनेे की नौका’ यूएसएस अॅगस्टा में पहुंचे, तब वे दुनिया के इतिहास के सबसे बड़े साम्राज्य के मुखिया थे और स्वतंत्र दुनिया के सबसे बड़े नेता भी। दूसरी ओर, रूजवेल्ट मात्र एक ऐसे देश के राष्ट्रपति थे जो वैश्विक भू-राजनीति के हाशिए पर था और युद्ध में शामिल होने में हिचकिचा रहा था। यद्यपि दोनों नेताओं के बीच सन् 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध की शुरुआत के समय से ही अमेरिका को इस युद्ध में शामिल करने के बारे में बातचीत चल रही थी, परंतु उनकी आमने-सामने मुलाकात तब तक नहीं हुई थी। चर्चिल बहुत बेचैन थे क्योंकि उन्हें डर था कि जर्मनी, ब्रिटेन पर कब्जा कर लेगा।
रूजवेल्ट : तो, श्रीमान प्रधानमंत्री, आप चाहते हैं कि हम युद्ध में शामिल हों?

चर्चिल : जी हां, राष्ट्रपति महोदय।
रूजवेल्ट : आप यह बताइए कि हम अपना खून और पैसा एक ऐसे युद्ध में क्यों बहाएंं जो हमारा नहीं है? क्या हमने पिछले युद्ध में आपको बचाने के लिए अमेरिका के सैनिकों का काफी खून नहीं बहाया था? अभी हमारी अर्थव्यवस्था की हालत अच्छी नहीं है। हम मंदी के प्रभाव से उबर नहीं सके हैं।

चर्चिल : आपको युद्ध में इसलिए शामिल होना चाहिए क्योंकि अगर नाजियों ने यूरोप पर कब्जा कर लिया और जापान का एशिया पर शासन स्थापित हो गया तो असहाय अमेरिका दो महाशक्तियों के बीच फंस जाएगा।

रूजवेल्ट : मेरे देश के लोग अलग-थलग रहना चाहते हैं। वे नहीं चाहते कि उन्हें एक ऐसे युद्ध में घसीटा जाए जो हमारा नहीं है।
चर्चिल : अलग-थलग रहने की बात सोचना बेकार है। दोनों क्रूर महाशक्तियों की नजर जल्दी ही आपकी संपदा पर पड़ेगी। वे आपको एक ऐसे खतरे के रूप में देखेंगे जिसे समाप्त किया जाना आवश्यक है।

रूजवेल्ट : मान लीजिए हम आपकी इस युद्ध को जीतने में मदद कर भी दें तो उसके बाद क्या होगा? क्या आप जर्मनी या जापान को अपना उपनिवेश बनाएंगे? क्या दुनिया की एकमात्र महाशक्ति के रूप में ब्रिटेन, अमेरिकी उपनिवेशों को एक बार फि र अपने साम्राज्य में शामिल करना चाहेगा?

चर्चिल : ईमानदारी की बात तो यह है राष्ट्रपति महोदय कि मैंने इस प्रश्न पर अधिक विचार नहीं किया है कि अगर हम जीत गए तो क्या होगा। मेरी सोच तो इस आशंका के इर्द-गिर्द घूमती रही है कि अगर हम हार गए तो हमारा और हमारे साम्राज्य का क्या होगा। मैं कतई यह नहीं चाहूंगा कि भारत और नाजी, आर्यश्रेष्ठता के सिद्धांत में अपने विश्वास के चलते, एक हो जाएं।
रूजवेल्ट: परंतु…आपमें और हिटलर में फ र्क ही क्या है? उसने यूरोप के एक हिस्से पर कब्जा किया है। आपका एक-चौथाई दुनिया पर नियंत्रण है।

चर्चिल : क्या आप सचमुच मेरी तुलना हिटलर से कर रहे हैं?
रूजवेल्ट : आप बहुत अच्छी तरह से जानते हैं, प्रधानमंत्री जी, कि अमेरिका अत्यंत धार्मिक राष्ट्र है। मैं अपने नागरिकों को, सैनिकों को मरने के लिए युद्ध में झोंकने के लिए तभी राजी कर सकता हूं जब आप इस युद्ध को नैतिकता का युद्ध बना दें। सन् 1776 में हमारे पूर्वजों ने ब्रिटेन के खिलाफ युद्ध इसलिए लड़ा था क्योंकि वे यह मानते थे कि ईश्वर स्वतंत्र है और उसकी छवि-स्वरूप मानव भी स्वतंत्र है। ईश्वर ने बेबिल के शाही शहर को इसलिए नष्ट किया था (जेनेसिस 11) ताकि वह स्वतंत्र राष्ट्रों का निर्माण कर सके। अत:, यदि आप यह युद्ध हार जाते हैं तो हमारे धर्मशास्त्री यही कहेंगे कि ईश्वर ने एक और साम्राज्य को नष्ट कर दिया। अगर आप यह युद्ध ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा करने के लिए लड़ रहे हैं तो आपको इसे अकेले ही लडऩा होगा। अगर आप चाहते हैं कि अमेरिका युद्ध में आपका साथ दे तो आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि मैं अपने देशवासियों को यह समझा सकूं कि यह युद्ध, दरअसल, तानाशाही और साम्राज्यवाद के खिलाफ और स्वतंत्रता के पक्ष में नैतिक युद्ध है।

चर्चिल : यह कोई बड़ी समस्या नहीं है। सन् 1931 के वेस्टमिंस्टर विधान के अंतर्गत, हमने कनाडा, न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका जैसे अपने उपनिवेशों को पहले ही स्वतंत्रता दे दी है। आस्ट्रेलिया को यह अधिकार दे दिया गया है कि वह जब चाहे स्वतंत्र हो सकता है।
रूजवेल्ट : मुझे पता है। यह अच्छा है परंतु काफी नहीं। भारत को तुरंत डामिनियन का दर्जा दे दिया जाना चाहिए और जितनी जल्दी संभव हो-पांच वर्ष या अधिक से अधिक दस में-उसे आस्ट्रेलिया की तरह स्वनिर्णय का अधिकार दे दिया जाना चाहिए।
नैतिकता के तर्क का बल  इसके साथ ही, हम रूजवेल्ट-चर्चिल के मेरे काल्पनिक व सरलीकृत वार्तालाप से हटकर, एक बार फि र, रूजवेल्ट व चर्चिल के बीच बातचीत के इलियट रूजवेल्ट के वर्णन पर वापस आते हैं। इलियट लिखते हैं कि उनके पिता ने कहा :
‘…युद्ध के बाद दीर्घकालिक शांति की स्थापना की एक आवश्यक शर्त यह होगी कि व्यापारिक गतिविधियों पर कम से कम रोकटोक हो।’
वे रुके। प्रधानमंत्री का सिर झुका हुआ था। उनकी नजर मेरे पिता पर थी।

‘कोई कृत्रिम रोक-टोक नहीं होनी चाहिए। किसी देश को विशेष व्यापारिक दर्जा देने वाले जितने कम समझौते हों उतना अच्छा। सभी देशों को उनका व्यवसाय बढ़ाने के पूरे अवसर उपलब्ध हों और बाजार, स्वस्थ्य प्रतियोगिता के लिये खुला हो।’ उनकी आंखें पूरे कमरे का मानो सर्वेक्षण कर रही थीं।

चर्चिल अपनी कुर्सी पर थोड़ा खिसके और फि र बोले, ‘ब्रिटिश साम्राज्य के व्यापारिक समझौते…।’
मेरे पिता ने उनकी बातचीत को बीच में ही काटकर कहा ‘हां, ये व्यापारिक समझौते, मेरे तर्क की पुष्टि करते हैं। इन्हीं समझौतों के कारण भारत और अफ्रीका, बल्कि सुदूरपूर्व और निकटपूर्व के सभी देश, इतने पिछड़े बने हुए हैं।’
चर्चिल के गले का रंग लाल हो गया और उन्होंने आगे झुककर कहा ‘राष्ट्रपति महोदय, इंग्लैण्ड अपने उपनिवेशों में सबसे पसंदीदा राष्ट्र का दर्जा कतई नहीं खोना चाहेगा। जिस व्यापार ने इंग्लैण्ड को महान बनाया है वह जारी रहेगा और वह भी उन्हीं शर्तों पर, जिनका निर्धारण इंग्लैण्ड के मंत्री करेंगे।’

मेरे पिता ने कहा ‘यही वह मुद्दा है जिस पर मेरे और आपके बीच मतभेद हो सकते हैं।
”मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि स्थायी शांति की स्थापना तभी हो सकती है जब पिछड़े हुए देशों और पिछड़े हुए लोगों का विकास हो। यह कैसे होगा? स्पष्टत: यह 18वीं सदी के तरीकों से नहीं हो सकता। अब…’
”18वीं सदी के तरीकों की बात कौन कर रहा है?’

‘आपका वह मंत्री, जो ऐसी नीति की सिफारिस करता है जिसके अंतर्गत औपनिवेशिक देशों से कच्चा माल बाहर ले जाया जाता है और उन्हें उसके बदले कुछ नहीं दिया जाता। 20वीं सदी के तरीकों का मतलब है इन उपनिवेशों में उद्योगों की स्थापना। 20वीं सदी के तरीकों का मतलब है लोगों के जीवनयापन के स्तर को बढ़ाकर, उनकी संपत्ति में वृद्धि करना, उन्हें शिक्षित करना, उन्हें साफ-सफाई  से रहना सिखाना-कुल मिलाकर, यह सुनिश्चित करना कि उन्हें उनके समुदाय के कच्चे माल की पूरी कीमत मिले।’
कमरे में हम सब ध्यानपूर्वक उनकी बातें सुन रहे थे। (रूजवेल्ट के सबसे नजदीकी सलाहकारों में से एक हैरी लायड) हापकिंग्स मुस्कुरा रहे थे। चर्चिल के सहायक कमांडर थॉमसन सशंकित और निराश लग रहे थे। प्रधानमंत्री को देखकर तो ऐसा लग रहा था मानो उन्हें लकवा मार गया हो।

‘आपने भारत की बात की,’ उन्होंने गुर्राते हुए कहा।
‘हां, मैं यह नहीं मान सकता कि हम एक ओर फांसीवादी गुलामी के विरुद्ध युद्ध लड़ें और दूसरी ओर दुनिया के देशों के लोगों को पिछड़ी औपनिवेशिक नीति के चंगुल से निकालने के लिए कुछ न करें।’

किसी भी सुधि पाठक के लिए यह समझना मुश्किल नहीं होगा कि कांग्रेस, वामपंथी, समाजवादी और हिंदुत्ववादी इतिहासविदें ने हमें कभी भारत की स्वाधीनता में अमेरिका की भूमिका के बारे में क्यों नहीं बताया। हममें से कई के लिए यह स्वीकार करना बेहद मुश्किल है कि अमेरिका-जो कि तब एक ईसाई पूंजीवादी देश था-की रुचि अंग्रेजी भाषा-भाषी पंूजीवादी साम्राज्य के साथ हाथ मिलाकर, दुनिया को अपना गुलाम बनाने और उसे लूटने में नहीं थी। यद्यपि हर पक्ष के अपने स्वार्थ और अपने समीकरण थे तथापि अंतत:, नैतिक कारणों से, ब्रिटिश साम्राज्य का अंत हुआ और उसकी शुरुआत हुई इंग्लैण्ड के मुकुट के सबसे बड़े हीरे-भारत-को स्वतंत्र करने के साथ।

 

(फारवर्ड प्रेस के अगस्त 2014 अंक में प्रकाशित)


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