मंडल ही कमंडल की एकमात्र काट

लालू ने मंडलवादी राजनीति को हवा देने के लिए सरकार से, सरकारी ठेकों और निजी क्षेत्र सहित तमाम विकास योजनाओं में दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों, अतिपिछड़ों और अकलियतों को 60 प्रतिशत आरक्षण के साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को सरकारी संसाधन और तकनीकी जानकारी सुलभ कराने की मांग की है। इसके लिए उन्होंने अपने समर्थकों से सड़कों पर उतरने का आह्वान भी कर डाला

सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में सामाजिक न्याय की राजनीति जिस तरह लगभग जमींदोज हो गई है, उससे बहुजन समाज का जागरूक वर्ग अचंभित है। उसे समझ में नहीं आ रहा है कि यह पटरी पर कैसे आएगी। ऐसे निराशाजनक माहौल में, बिहार में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और जद (यू) के नीतीश कुमार के बीच जो राजनीतिक खिचड़ी पक रही है, उससे सम्पूर्ण भारत में सामाजिक न्याय के समर्थकों में नए उत्साह का संचार हुआ है। इसमें मुख्य भूमिका रही लालू प्रसाद यादव की, जो नीतीश के संकटमोचक बनकर सामाजिक न्याय की राजनीति को पुनर्जीवित करने के काम में जुट गए हैं।

जिस नीतीश ने 20 साल पहले, लालू की खिलाफत करते हुए अपने राजनीतिक करियर को बुलंदी पर पहुंचाया था, वही सोलहवीं लोकसभा चुनाव के बाद, बदले राजनीतिक परिदृश्य में, लालू के समक्ष झुकने को बाध्य हुए। मौके की नजाकत को देखते हुए लालू ने भी उन्हें निराश नहीं किया और गत् 18 जून को उनकी पार्टी के 21 विधायकों ने जद (यू) के दो उम्मीदवारों को अपना समर्थन दिया, जिससे राज्य की मांझी सरकार पर आया संकट फिलहाल टल गया। लालू की संकटमोचक भूमिका के आभार तले दबी मांझी सरकार ने प्रतिदानस्वरूप, 19 जून से 1 जुलाई के बीच भारी प्रशासनिक फेरबदल करने के साथ ही बिहार के सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों को 6 निजी सहायक रखने की सुविधा दे दी। इससे सर्वाधिक लाभ लालू प्रसाद यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी को हुआ।

दरअसल, हालिया आमचुनाव में जिस तरह लालू-नीतीश की पार्टियां मोदी की सुनामी में उड़ी हैं, उससे एक दूसरे के निकट आना दोनों की मजबूरी बन गई है। दोनों को इस बात का इल्म है कि चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए 39 प्रतिशत अर्थात् 1.& करोड़ वोट ही हासिल किए, जबकि राजद-कांग्रेस को 1.2 करोड़ और जद (यू) को 61 लाख वोट मिले, जो कुल वोटों का 47 प्रतिशत था। अगर राजद-जद (यू) और कांग्रेस-एनसीपी साथ मिलकर चुनाव लड़ते तो बिहार में गैर-एनडीए सीटें 9 की बजाय 28 होतीं। इस चुनावी गणित को ध्यान में रखकर ही लालू-नीतीश चुनावी तालमेल की ओर बढ़ रहे हैं। उनका यह तालमेल दम तोड़ती सामाजिक न्याय की राजनीति के लिए कितना प्रभावी होता है, इसका परीक्षण बिहार में निकट भविष्य में होने जा रहे 10 विधानसभा उप-चुनावों में हो जाएगा।

लालू-नीतीश की निकटता से बहुजन समाज का जागरूक वर्ग दूरगामी परिणामों का सपना देखने लगा है। उसका मानना है कि दोनों की एकता यदि बिहार में सामाजिक न्याय की राजनीति में नई जान फूंकती है, तो उसका असर उत्तरप्रदेश पर भी पड़ेगा, जिससे सामाजिक न्याय की राजनीति के अ’छे दिन आएंगे। सामाजिक न्याय की राजनीति को लालू प्रसाद यादव ने यह कहकर और बल दिया है कि कमंडल की काट मंडल ही हो सकता है। लालू ने मंडलवादी राजनीति को हवा देने के लिए सरकार से सरकारी ठेकों और निजी क्षेत्र सहित तमाम विकास योजनाओं में दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों, अतिपिछड़ों और अकलियतों को 60 प्रतिशत आरक्षण के साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को सरकारी संसाधन और तकनीकी जानकारी सुलभ कराने की मांग की है। इसके लिए उन्होंने अपने समर्थकों से सड़कों पर उतरने का आह्वान भी कर डाला।

गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव-2009 में हार के बाद, बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी 25 जून, 2009 को इसी तरह की एक घोषणा में सरकारी ठेकों में 2& प्रतिशत आरक्षण लागू करने की बात कही थी लेकिन उनसे गलती यह हुई कि उन्होंने वह आरक्षण सिर्फ अनुसूचित जातियों/जनजातियों के लिए घोषित किया। गनीमत है कि लालू प्रसाद यादव ने मायावती वाली गलती नहीं दोहराई। बिहार में लालू प्रसाद यादव ने जो पहल की है, उसे राजनीतिक विश्लेषक जातिवादी राजनीति के नए उभार के रूप में भी देख रहे हैं। बहरहाल, यूपी-बिहार में लालू प्रसाद यादव की यह पहलकदमी क्या रंग लाएगी यह भविष्य के गर्भ में छुपा हुआ है।

मंडल आयोग की रपट लागू होने से दलित-बहुजन में जिस ‘जाति चेतना’ का विकास हुआ, ‘धार्मिक चेतना’ द्वारा उसकी काट के लिए ही संघ परिवार व उसके राजनीतिक संगठन भाजपा ने रामजन्मभूमि मुक्ति आंदोलन की शुरुआत की। इस आंदोलन की दिग्गज भाजपाई नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने स्वाधीनता संग्राम के बाद का सबसे बड़ा आंदोलन कहकर प्रशंसा की थी। राम-जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के जरिए देश की हजारों करोड़ की सम्पदा और असंख्य लोगों की प्राण-हानि कराकर ही संघ की राजनीति एकाधिक बार केंद्र की सत्ता पर काबिज हो सकी है। महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि जाति चेतना के राजनीतिकरण की काट के मद्देनजर, भाजपा ने धार्मिक चेतना के राजनीतिकरण का जो अभियान चलाया, उसने उसे कभी मंद नहीं पडऩे दिया। इसका परिणाम यह हुआ है कि बहुजन नायक/नायिका इस देश के सर्वोच्च पद पर आसीन होने के लालच में जाति चेतना के अभियान से दूर हटते गए। अगर संघ के धार्मिक-चेतना अभियान से सबक लेते हुए बहुजन नायक/नायिका जाति चेतना के राजनीतिकरण को मजबूती प्रदान करने का निरंतर प्रयास करते तो आज सत्ता की बागडोर किसी आंबेडकरवादी या लोहियावादी के हाथों में होती। लेकिन देर आयद, दुरुस्त आयद की नीति का अनुसरण करते हुए, यदि अभी से ही लालू-नीतीश-माया-मुलायम जाति चेतना के राजनीतिकरण में सर्वशक्ति लगाते हैं तो सदियों के विशेषाधिकारयुक्त और सुविधाभोगी कमंडलवादियों के लिए राज-सत्ता मृग-मरीचिका बनकर रह जाएगी।

(फारवर्ड प्रेस के सितम्बर 2014 अंक में प्रकाशित)


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