अछूत की शिकायत

बभने के लेखे हम भिखिया न मांगबजा, ठकुरे के लेखे नाहि लउरि चलाइबि। सहुआ के लेखे नाहि डांडी हम मारबजां,अहिरा के लेखे नहि गैया चोराइबि

हमनी के राति दिन दुखवा भोगत बानी,
हमनी के सहेबे से मिनति सुनाइबि।
हमनी के दुख भगवनओं न देखताजे
हमनी के कबले कलेसबा उठाइबि।
पदरी सहेब के कचहरी में जाइबिजां
बेधरम होके रंगरेज बनिजाइबि।
हाय राम! धरम न छोडत बनत बाजे,
बेधरम होके कैसे मुंहवा देखाइबि

खम्भवा के फारि पह्लाद के बचवले जां,
ग्राह के मुंहे से गजराज के बचवले
धोती जुरजोधना कै भइआ छोरत रहै
परगट होके तहां कपडा बढवले।
मरले रवनवां के पलले भभिखना के
कानी अंगुरी पै धैके पथरा उठवले
कहंवा सुतल बाटे सुनत न बाटे अब
डोम ज़ानि हमनी के छुए से डेरइले

हमनी के राति दिन मेहनत करीलेजां,
दुईगो रूपयवा दरमाह में पाइबि।
ठकुरे के सुखसेत घर में सुतल बानीं,
हमनी के जोति जोति खेतिया कमाइबि।
हकीमे के लसकरी उतरल बानि,
जेत उंहवो बेगरिया में पकरल जाइबि।
मुंह बान्हि ऐसन नोकरिया करत बानीं,

इ कुलि खबरि सरकार के सुनाइबि

बभने के लेखे हम भिखिया न मांगबजा,
ठकुरे के लेखे नाहि लउरि चलाइबि।
सहुआ के लेखे नाहि डांडी हम मारबजां,
अहिरा के लेखे नहि गैया चोराइबि।
भटउ के लेखे न कवित्त हम जोरबजां,
पगड़ी न बान्हि के कचहरी में जाइबि।
अपने पसीनवां कै पइसा कमाइबजां
घर भर मिलि जुली बांटी चोटी खाइबि।

हडवा मसुइया के देहइया है हमनी कै,
ओकरे के देहिया बभनो के बानि।
ओकरा के घरे-घरे पुजवा होखत बाजे,
सगरे इलकवा भईले जजमानी।
हमनी के इनरवा के निगिचे न जाइले जा,
पांके में से भरि भरि पिअतानी पानी
पनही से पिटी पिटी हाथ गोड तुडि दैलें
हमनी के इतनी काहे के हलकानि!

यह कविता महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा संपादित ‘सरस्वती’ (सितंबर1914, भाग 15, खंड 2, पृष्ठ संख्या 512-513) में प्रकाशित हुई थी।

(फारवर्ड प्रेस के नवम्बर 2014 अंक में प्रकाशित)


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