नेहरू की बहुलतावादी विरासत का मोदीकरण

नेहरू ने भारतीय गणराज्य के शुरूआती वर्षोंं में, राज्य की धर्म के प्रति नीति को आकार दिया। भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष था परंतु देश की जनता अत्यंत धार्मिक थी और उस पर सांप्रदायिक राजनीति का गहरा असर भी था। जाहिर है, इस पृष्ठभूमि में नेहरू का कार्य अत्यंत चुनौतीपूर्ण था

यद्यपि यह तर्क दिया जा सकता है कि चार महीने का वक्त, प्रधानमंत्री बतौर, नरेन्द्र मोदी की राजनीति का आंकलन करने के लिए बहुत कम है परंतु यह भी सही है कि उनकी सरकार ने अब तक जो कदम उठाये हैं, संघ परिवार के अन्य संगठन जो कुछ कर रहे हैं और गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर उनका जो ट्रेक रिकार्ड रहा है, उनसे हम मोदी की वर्तमान राजनीति को काफी हद तक समझ सकते हैं। इस लेख में हम केवल बहुलतावाद, धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति राज्य की नीति के संदर्भ में मोदी की राजनैतिक विचारधारा के आंकलन तक स्वयं को सीमित रखेंगे।

नेहरू ने भारतीय गणराज्य के शुरूआती वर्षों में, राज्य की धर्म के प्रति नीति को आकार दिया। भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष था परंतु देश की जनता अत्यंत धार्मिक थी और उस पर सांप्रदायिक राजनीति का गहरा असर भी था। जाहिर है, इस पृष्ठभूमि में नेहरू का कार्य अत्यंत चुनौतीपूर्ण था। एक ओर उन्हें अपने ही राष्ट्रपति से चुनौती मिल रही थी जो अपनी आधिकारिक हैसियत में सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन करना चाहते थे। नेहरू ने इसका कड़ा विरोध किया और जोर देकर कहा कि सरकारी पदों पर विराजमान व्यक्ति अपनी आधिकारिक हैसियत से धार्मिक कार्यक्रमों में भाग नहीं ले सकते। इसके बाद, जब हिंदुत्ववादी तत्वों ने बाबरी मस्जिद में रामलला की मूर्तियां रख दीं तब उनकी कोशिश यह थी कि उन मूर्तियों को जल्द से जल्द वहां से हटा दिया जाये। परंतु उत्तरप्रदेश की राज्य सरकार और फैजाबाद के तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट के.के. नैय्यर की चालबाजियों के कारण वे ऐसा नहीं कर सके। बाद में नैय्यर ने भाजपा के तत्कालीन राजनैतिक अवतार भारतीय जनसंघ की सदस्यता ले ली।

जब, सन् 1961 में, जबलपुर में स्वाधीन भारत का पहला सांप्रदायिक दंगा हुआ तब नेहरू ने यह सुनिश्चित किया कि हिंसा पर तुरंत नियंत्रण पाया जाए। उन्होंने अपने मित्रों को हिंसा के दावानल को शांत करने के लिए भेजा। उन्होंने राष्ट्रीय एकता समिति की नींव डाली ताकि देश में सांप्रदायिक सद्भाव सुनिश्चित किया जा सके। यह दिलचस्प है कि भाजपा के नेतृत्व वाली पूर्व एनडीए सरकार ने राष्ट्रीय एकता समिति का पुनर्गठन नहीं किया।

नेहरू वैज्ञानिक सोच पर बहुत जोर देते थे। वैज्ञानिक सोच हमारे संविधान के प्रमुख मूल्यों में से एक है। वे हमारे संविधान में निहित उदारवादी मूल्यों के प्रति पूर्णत: प्रतिबद्ध थे-उन मूल्यों के प्रति जिन्हें स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के तीन शब्दों में समाहित किया जा सकता है। इस संविधान पर इसके निर्माता आम्बेडकर की छाप स्पष्ट थी।

मोदी राज के मूल्य

जहां तक मोदी का सवाल है, उनके राज के पिछले चंद महीनों में हमने यह देखा है कि किस तरह उदारवादी मूल्यों को रौंद कर उन लोगों को आतंकित करने का प्रयास किया गया जो उनकी सरकार के आलोचक थे। जून 2014 में केन्द्रीय फिल्म प्रमाणीकरण बोर्ड ने पत्रकार और फिल्म निर्माता शुभ्रदीप चक्रवर्ती की डाक्यूमेंट्री ‘एन दिनो मुजफ्फरनगर’ के प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी। यह फिल्म मुजफ्फरनगर (उत्तरप्रदेश) में हुई एकतरफा हिंसा पर आधारित थी।

संघ का अनुषांगिक संगठन, ‘शिक्षा बचाओ आंदोलन’, प्रकाशकों पर दबाव डालकर ऐसी पुस्तकों को बाज़ार में आने से रोकने का प्रयास लगातार कर रहा है, जो संघ परिवार की सांप्रदायिक राजनीति के विरूद्ध हैं। इसी संगठन के दीनानाथ बत्रा ने जून 2014 में वेंडी डोनीगर की पुस्तक ‘द हिन्दूज : एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री’ का प्रकाशन रूकवाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इसी माह, शिक्षा बचाओ आंदोलन के एक कानूनी नोटिस से घबराकर प्रकाशक ओरिएंट ब्लेकस्वान ने कई पुस्तकों का प्रकाशन रोक दिया। इनमें से एक थी अनुसंधानकर्ता व रोड्ज अध्येता मेघा कुमार की पुस्तक ‘कम्युनलिज्म एण्ड सेक्सुअल वायलेंस: अहमदाबाद सिंस 1969’ (सांप्रदायिक व सेक्स हिंसा : अहमदाबाद 1969 से अब तक)।

मोदी सरकार ने संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्रों में हस्तक्षेप की शुरूआत भी कर दी है। प्रोफेसर वाई. एस. राव को ‘भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद’ का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। प्रोफेसर राव जातिप्रथा का गुणगान करते हैं और उनका कहना है कि जातिप्रथा से किसी को कोई शिकायत रही हो, ऐसा इतिहास में कहीं दर्ज नहीं है। राव का मुख्य मिशन ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ जैसे महाकाव्यों की ऐतिहासिकता सिद्ध करना है। राव, ‘अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना’ केअध्यक्ष भी हैं, जो आरएसएस का एजेण्डा लागू करने के लिए बनायी गई संस्था है।

मोदी खांटी संघी हैं, यह उनके भाषणों से स्पष्ट है। संसद में दिये गये अपने भाषण में उन्होंने ‘भारत की 1200 वर्ष की गुलामी’ की चर्चा की। स्पष्टत: वे उस सांप्रदायिक इतिहास लेखन के हामी हैं जो आरएसएस के ‘हिंदू भारत’ की राजनैतिक परियोजना के मूल में है। उनके कहने का अर्थं यह है कि भारतीय उपमहाद्वीप के कुछ हिस्सों पर 600 सालों तक चले मुस्लिम राजाओं के विभिन्न वंशों के राज को वे देश की गुलामी का युग मानते हैं। यह इस तथ्य के बावजूद कि इन राजाओं की प्रशासनिक मशीनरी में बड़ी संख्या में हिंदू भी शामिल थे, ये राजा देश की संपदा को कहीं बाहर नहीं ले गए और हिंदू और मुस्लिम राजाओं के बीच जो युद्ध होते थे, उनका एकमात्र लक्ष्य सत्ता हासिल करना था। ऐसी बातें कहने के पीछे मोदी का उद्देश्य हिंदुत्ववादियों के इस मत को मजबूती देना है कि मुसलमान बाहरी और हिंसक हैं।

जहां मोदी सांप्रदायिक हिंसा पर रोक की बात कर रहे हैं वहीं उनके राजनीतिक सहयोगी लव जिहाद और गौहत्या जैसे मुद्दों को उछालकर विघटनकारी राजनीति का कुत्सित खेल खेल रहे हैं। मोदी की आरएसएस और उसकी हिंदू राष्ट्र की विचारधारा के प्रति कितनी वफादारी है, यह इससे स्पष्ट है कि दूरदर्शन ने आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत के वार्षिंक विजयादशमी संबोधन का लाईव प्रसारण किया। ऐसा स्वाधीन भारत के इतिहास में पहली बार हुआ।

कुछ समय पहले उत्तरप्रदेश के अलीगढ़ में धर्म जागरण मंच ने वाल्मीकि समाज के कुछ सदस्यों, जिन्होंने ईसाई धर्मं अपना लिया था, को ‘घर वापसी’ के कर्मंकांड से गुजरने पर मजबूर किया। घर वापसी की यह प्रक्रिया, संघ परिवार ने इजाद की है और उसका उद्देश्य परिवार के इस दावे को सही ठहराना है कि गरीब हिंदुओं को मुगल आक्रांताओं ने मुसलमान बनने पर मजबूर किया और ‘विदेशों से वित्त पोषित’ ईसाई मिशनरियों ने जोर जबरदस्ती और धोखाधड़ी से उन्हें ईसाई बनाया। इसलिए अब उन्हें ‘घर वापस’ लाया जाना है। स्पष्टत: यह सब भारतीय संविधान के प्रावधानों के विरूद्ध है, जो हर व्यक्ति को अपनी पसंद के धर्म का पालन करने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता की गारंटी देता है।

जमीन-आसमान का फर्क

भारत के पहले और वर्तमान प्रधानमंत्री के बीच जमीन-आसमान का फर्क है। नेहरू का भारत की विविधता में गहरा विश्वास था और वे इस देश को बहुलतावादी, विविधधर्मी राष्ट्र के रूप में देखते थे। मोदी सरकार के अब तक के छोटे से कार्यकाल में ही यह साफ हो गया है कि आगे आने वाले दिनों में क्या होने वाला है। गोधरा के बाद हुई हिंसा में मोदी की भूमिका, उनके ‘हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है’ व ‘शरणार्थी शिविर बच्चों के उत्पादन की फैक्ट्रियां हैं’ जैसे वक्तव्य और उनकी सरकार द्वारा प्रशासनिक व शैक्षणिक-सांस्कृतिक संस्थाओं में की गई नियुक्तियां-ये सभी नेहरू की धर्मनिरपेक्ष विरासत को कमजोर करने की साजिश है।

नेहरू का दर्शन धर्मनिरपेक्षता-बहुवाद, समावेशी राजनीति और वैज्ञानिक सोच पर आधारित था। मोदी की नीतियां इसकी धुरविरोधी हैं। नेहरू की भारतीय बहुवाद में आस्था ने देश को एक बनाये रखा। प्रजातंत्र के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और प्रजातांत्रिक संस्थाओं के निर्माण में उनकी गहन रूचि ने यह सुनिश्चित किया कि हमारे देश में कभी तानाशाही कायम नहीं हो सकी, जिसने कई नवस्वतंत्र राष्ट्रों को अपने पंजे में जकड़ लिया। इस नई सरकार से हमारी समावेशी विरासत और नेहरु के शासनकाल में हमने जो कुछ भी हासिल किया, वह खतरे में है।

 

(फारवर्ड प्रेस के नवम्बर 2014 अंक में प्रकाशित)


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