फॉरवर्ड विचार : फरवरी 2015

यह भी स्पष्ट है कि मोदी और भाजपा – दोनों की पतंगें आसमान चूम रही हैं। परंतु जो बात अधिकांश लोगों को पता नहीं हैं – फारवर्ड प्रेस के पाठकों को छोड़कर-और ना ही जिसका प्रचार हुआ है, वह यह है कि मोदी-भाजपा की पतंग के आसमान छूने में दलित-बहुजन मतों का भारी योगदान है

भारतीय राजनीति आज भी जाति और नक्षत्रों के आसपास घूम रही है। भाजपा ने दिल्ली के अपने उम्मीदवारों की सूची और जनता दल परिवार ने विलय की अपनी घोषणा जनवरी के मध्य के बाद तक टाल दी, क्योंकि 14 जनवरी को मकर सक्रांति पर खरमास, जो किसी भी शुभ कार्य की शुरूआत के लिए ठीक नहीं माना जाता, समाप्त हो रहा था। दक्षिण और पश्चिम भारत के कई राज्यों में मकर सक्रांति पर पतंग उड़ाई जातीं हैं। मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने इसे अंतरराष्ट्रीय महोत्सव में बदल दिया था, जिसमें वे हर साल सक्रिय भागीदारी करते थे। कभी वे पतंगों की लडिय़ां उड़ाते थे तो कभी एक बहुत बड़ी पतंग। उनके हाथो में होती थी एक जम्बो चरखी। हमें नहीं मालूम उन्होंने कभी पेंच लड़ाए हैं या नहीं।

यह खेल केवल दक्षिण एशिया में होता है। परंतु यह साफ है कि पिछले कई वर्षों से, पहले गुजरात और फिर लोकसभा चुनाव में, मोदी ने कई पतंगे उड़ायीं, जिसका चरम था सन् 2014। उनकी सबसे ताजा पतंग है ओबामा को गणतंत्र दिवस समारोह का मुख्य अतिथि बनाना, विशेषकर तब, जबकि दिल्ली में चुनाव होने ही वाले हैं।

यह भी स्पष्ट है कि मोदी और भाजपा – दोनों की पतंगें आसमान चूम रही हैं। परंतु जो बात अधिकांश लोगों को पता नहीं हैं – फारवर्ड प्रेस के पाठकों को छोड़कर-और ना ही जिसका प्रचार हुआ है, वह यह है कि मोदी-भाजपा की पतंग के आसमान छूने में दलित-बहुजन मतों का भारी योगदान है। चुनाव जीतने के लिए जातिगत जोड़तोड़ अत्यंत चतुराई से किया गया और इसके लिए कई दलित-ओबीसी नेताओं और कुछ मामलों में, उनकी पार्टियों को उनके मतदाताओं सहित, भाजपा में मिला लिया गया। पिछले लोकसभा चुनाव में इन नेताओं ने अपने वोट भाजपा को दिलवाए। परंतु जैसा कि हमारी आवरण कथा बताती है, जब उनका ऋण चुकाने का वक्त आया तब एनडीए के दलित-बहुजन नेताओं को अहसास हुआ कि वे ठग लिए गए हैं। उनमें से अधिकांश कटी पतंग बन गये हैं-कुछ हवा में तैर रहे हैं तो कुछ धरती पर आ गिरे हैं। एफपी के घुमंतू संवाददाता संजीव चंदन हमारे पाठकों के लिए अनजान नहीं हैं, परंतु इस बार हम उनका आवरणकथा लेखक के रूप में स्वागत कर रहे हैं।

एफपी के पाठकों के लिए अश्विनी कुमार पंकज भी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वे अपने आलेख दिकुओं की पसंद में झारखण्ड में भाजपा की जीत पर आदिवासी परिप्रेक्ष्य से नजर डाल रहे हैं। ग्लेडसन डुंगडुंग, झारखण्ड,  छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और गुजरात में आदिवासियों हितों के संदर्भ में भाजपा की चाल, चरित्र और चेहरे में अंतर को रेखांकित कर रहे हैं। भाजपा के चुनावी वादों और आदिवासियों के वोट प्राप्त करने के बाद उसकी चाल के बीच गहरी खाई है। यह ठगे जाने से भी बुरा है। इन सबसे गरीब लोगों की खनिज और अन्य संपदा को माफियाओं के हवाले किया जा रहा है, जो कि दिनदहाड़े लूट के अलावा कुछ नहीं है।

जो लोग एफपी के चुनाव-पूर्व विश्लेषणों और भविष्यवाणियों को पढ़कर इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि एफपी भाजपा या मोदी समर्थक है, वे कृपया ध्यान दें: एफपी भाजपा सहित किसी पार्टी की विरोधी या समर्थक नहीं है। हम सभी का मूल्यांकन केवल दलित-बहुजन परिप्रेक्ष्य से करते हैं और यही भारत के अधिकांश निवासियों के हित में है। जो भी पार्टी सुशासन और सभी के लिए विकास का वायदा करेगी और उसे पूरा करेगी व देश में सांप्रदायिक सौहार्द बनाये रखेगी, हम उसके साथ हैं।

अभी-अभी यह खबर आई है कि भारतीय राजनीतिशास्त्र के अग्रदूत रजनी कोठारी नहीं रहे। उनकी कई अभिनव पुस्तकों में से एक थी ‘कास्ट इन इंडियन पॉलिटिक्स’ (1970)। कोठारी ने हमें सिखाया कि राजनीति में जाति हमें एक भी कर सकती है और बांट भी सकती है। एफपी एकता की बात करती है-जाति जोड़ो, मनुवाद तोड़ो।

(फारवर्ड प्रेस के फरवरी, 2015 अंक में प्रकाशित )


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