क्या शेर कभी मेमने की हिफाज़त कर सकता है?

झारखंड, छत्तीसगढ़ और गुजरात की सरकारों ने विगत एक दशक में लगभग 500 देशी और विदेशी निजी कंपनियों के साथ औद्योगिक परियोजनाएं लगाने के लिए समझौते किए हैं। इनमें टाटा, जिंदल, मित्तल, एस्सार, भूषण इत्यादि समूह शामिल हैं। स्थिति की गंभीरता इससे समझी जा सकती है कि छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में ही लगभग 500 निजी कम्पनियों का प्रवेश हो रहा है

विगत लोकसभा चुनाव में झारखंड केसंथाल परगना क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी ज्यादा सेंधमारी नहीं कर सकी और झारखंड मुक्ति मोर्चा अपनी परंपरागत दुमका एवं राजमहल लोकसभा सीटें बचाने में कामयाब रहा। केन्द्रीय विधि आयोग की संथाल परगना एक्ट, 1855 को समाप्त करने की हालिया सिफारिश ने संथाल परगना में भूचाल सा ला दिया था, जिसने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी डरा दिया क्योंकि झारखंड में सरकार बनाने के लिए भाजपा को छोटानागपुर के साथ-साथ संथाल परगना को भी अपने कब्जें में करना जरूरी था, जो कि संथाल आदिवासियों के समर्थन के बगैर असंभव था। 15 दिसंबर, 2014 को संथालों का विश्वास जीतने के लिए दुमका और पतना में चुनावी सभाओं को संबोधित करते हुए नरेन्द्र मोदी ने तीन बातें कहीं। 1. भाजपा के शासन में आदिवासियों की जमीन कोई माई का लाल उनसे नहीं छीन सकता, 2. आदिवासियों के कल्याण के बगैर देश आगे नहीं बढ़ सकता, 3.जहां-जहां खासी आदिवासी आबादी है, वहां-वहां भाजपा की सरकारें हैं। क्या मोदी सचमुच गंभीर हैं? क्या उनके भाषणों और जमीनी हकीकत में कोई तालमेल है? क्या भाजपा शासित राज्यों में आदिवासी सुरक्षित हैं? या वे सिर्फ चुनाव में मतदाताओं का दिल जीतकर सत्ता हासिल करने के लिए ये बड़ी-बड़ी बातें करते हैं?

अब तक का अनुभव तो यही रहा है कि नरेन्द्र मोदी और भाजपा सरकारों ने आदिवासियों के लिए कुछ नहीं किया है। प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठते ही नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार ने नर्मदा नदी पर स्थित सरदर सरोवर बांध की ऊंचाई 121.92 मीटर से बढ़ाकर 138.68 मीटर करनेे का निर्णय लिया, जो गुजरात सरकार की पुरानी मांग थी। इस बांध से महाराष्ट्र, गुुजरात और मध्यप्रदेश के लगभग 2.5 लाख लोग प्रभावित हैं, जिनके पुनर्वास का काम अधूरा है। बांध की ऊंचाई और 17 मीटर बढ़ाने से आदिवासियों के घर, खेत-खलिहान डूब में आ जायेंगें। जब नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने कहा था कि गुजरात के चार लाख किसानों की खुशहली के लिए 10 हजार आदिवासियों को विस्थापित करने में कोई हर्ज नहीं है। गौर करने वाली बात यह है कि जहां एक ओर सरदर सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाने से आदिवासी उजड़ रहे हैं वहीं दूसरी ओर सौराष्ट्र में आदिवासियों को सिंचाई के लिए सरदार सरोवर का पानी मुहैया नहीं कराया जा रहा है।

विस्थापन की मूर्ति

गुजरात के नर्मदा जिले में साधुटेकरी में 2,979 करोड़ रूपये की लागत से सरदार वल्लभभाई पटेल की 182 मीटर ऊंची ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ मोदी का ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ है। इसका निर्माण जारी है। इस क्षेत्र में बाढ़ रोकने के लिए नर्मदा नदी में ‘वियर डैम’ के निर्माण से आदिवासी विस्थापित हो रहे हैं एवं पर्यटन स्थलों के निर्माण के लिए भी आदिवासियों की जमीन ली जा रही है। कुल मिलाकर 70 गांव प्रभावित हो रहे हैं। आदिवासी इस योजना का विरोध कर रहे हैं। विस्थापितों को जबरदस्ती मुआवजा दिया जा रहा और जो लोग मुआवजा नहीं ले रहे हैं, उन्हें पुलिसए बल का प्रयोग कर हटा रही है। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते मोदी ने गत वर्ष इस परियोजना की नींव रखी थी। वहां के आदिवासी कह रहे हैं कि गुजरात सरकार ने ‘वियर डैम’ बनाने के पहले उनसे पूछा तक नहीं। इस क्षेत्र के आदिवासियों ने स्थानीय निकाय से लेकर लोकसभा तक भाजपा को जीत दिलवाई है। बावजूद इसके उनकी जमीनें छीनी जा रहीं हैं। फिर मोदी किस तरह कहते फिर रहे हैं कि भाजपा के राज में कोई माई का लाल आदिवासियों की जमीन उनसे नहीं छिन सकता?

झारखंड, छत्तीसगढ़ और गुजरात की सरकारों ने विगत एक दशक में लगभग 500 देशी और विदेशी निजी कंपनियों के साथ औद्योगिक परियोजनाएं लगाने के लिए समझौते किए हैं। इनमें टाटा, जिंदल, मित्तल, एस्सार, भूषण इत्यादि समूह शामिल हैं। स्थिति की गंभीरता इससे समझी जा सकती है कि छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में ही लगभग 500 निजी कम्पनियों का प्रवेश हो रहा है। इन इलाकों के आदिवासियों से कहा जा रहा है कि वे मुआवजा और नौकरी लेकर अपनी जमीन इन कंपनियों कों सौंप दें। इससे वहां के बहुसंख्यक आदिवासी डरे-सहमे हुए हैं। वे अगर इन कंपनियों का विरोध करते हैं तो उन्हें नक्सली, विकास विरोधी और राष्ट्रद्रोही बताकर उनके खिलाफ फर्जी मुकदमा दर्ज कर उन्हें जेलों में डाल दिया जायेगा। अगर वे इस तथाकथित विकास के लिए अपनी जमीन इन कंपनियों को सौंप देते हैं तो उनकी अगली पीढी शायद भीख मांगने के कगार पर पहुंच जायेगी।

योजनाओं की बंदरबाँट

नरेन्द्र मोदी ने अपने चुनावी सभाओं में कहा कि आदिवासियों के कल्याण के बगैर देश आगे नहीं बढ़ सकता। 31 अगस्त, 2010 को राज्यसभा में तत्कालीन विपक्ष के नेता अरूण जेटली ने आदिवासी उप-योजना के धन का उपयोग राष्ट्रमंडल खेलों में करने पर केन्द्र सरकार की जमकर खिंचाई की थी। लेकिन सत्ता में आते ही वे स्वयं बदल गये। वित्तीय वर्ष 2014-15 के केन्द्रीय बजट में अरूण जेटली ने आदिवासियों के हक के 25,490 करोड़ रूपये का प्रावधान करने से साफ इंकार कर दिया।

भाजपा शासित कुछ राज्यों की तस्वीर देखने से यह साफ हो जाता है कि भाजपा की कथनी और करनी में कितना फर्क है। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली गुजरात सरकार ने वित्तीय वर्ष 2012-13 में आदिवासियों के विकास एवं कल्याण हेतु ‘अनुसूचित जनजाति उप-योजना’ के तहत आवंटित राशि में से 37.02 करोड़ रूपये जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी विकास योजना के तहत आधारभूत सरंचना निर्माण में खर्च किए, 115 करोड़ रूपये स्वर्णजयंती मुख्यमंत्री शहरी विकास योजना के तहत नगर निगमों को अनुदान दिया, 124.27 करोड़ रूपये नगर निगमों को दिए एवं 700 करोड़ रूपये सरदार सरोवर बांध के निर्माण में खर्च किए। यानी आदिवासियों के विकास एवं कल्याण के पैसे से उनकी ही जमीन लेकर उन्हें विस्थापित किया गया। वित्तीय वर्ष 2013-14 में 5 करोड़ रूपये स्वामी विवेकानंन्द की 150वीं वर्षगांठ मनाने, 72 करोड़ रूपये सरकारी अस्पतालों के लिऐ वाहन एवं मेडिकल उपकरण खरीदने एवं 200 करोड़ रूपये सरदार सरोवर बांध के निर्माण के लिए खर्च किये गए। मध्यप्रदेश में वितीय वर्ष 2014-15 में 78 लाख रूपये जेलों पर खर्च किए गए एवं छत्तीसगढ़ में 2 करोड़ रूपये एसपीओ पर, जिन्हें नक्सलियों से मुकाबला करने के लिए प्रशिक्षित किया गया था। यानी आदिवासियों के पैसे से उनकी ही हत्या! किस अधिकार के तहत भाजपा सरकारों ने आदिवासियों के विकास एवं कल्याण के लिए आवंटित राशि की बंदरबाँट की या इसी कड़वी सच्चाई पर परदा डालने के लिए मोदी बड़ी-बड़ी बाते करते हैं?

वादा खिलाफी का तंत्र

नरेन्द्र मोदी अपनी चुनाव सभाओं में कहते रहे हैं कि जहां-जहां आदिवासी अधिक हैं, वहां-वहां भाजपा की सरकारें हैं, लेकिन वे इस बात को भूल गये कि भाजपा शासित राज्यों में आदिवासियों की हत्या, बलात्कार और उनपर अत्याचार बड़े पैमाने पर हो रहे हैं। झारखंड में शुरू से ही भाजपा का शासन रहा है। विगत 13 में से नौ वर्षों में वहां भाजपा सत्ता में थी। भाजपा शासन के दौरान 2 फरवरी 2001 को खूंटी जिले स्थित तपकारा के पास कोईलकारो डैम का विरोध कर रहे आदिवासियों पर पुलिस ने गोली चलायी, जिसमें 8 लोग मारे गये। फर्जी मुठभेड़ों  में 557 लोग मारे गये एवं 6000 आदिवासी जेलों में है। 5000 आंदोलनकारियों पर फर्जी मुकदमें दायर किये गए हैं। छत्तीसगढ़ में भाजपा लंबे समय से डा. रमन सिंह के नेतृत्व में सरकार चला रही है। वहांं सलवा जुड़ूम द्वारा आदिवासियों को 644 गांवों से खदेड़ दिया गया, सैकड़ों आदिवासियों को फर्जी मुठभेड़ों में मारा गया, आदिवासी महिलाओं के साथ सुरक्षां कर्मियों ने बलात्कार किए, सरकारी विद्यालय में 11 आदिवासी लड़कियों के साथ बलात्कार हुआ, 17,000 आदिवासियों को नक्सली होने के आरोप में जेलों में डाला गया एवं बैगा, कोरवा एवं अन्य आदिम जनजातियों के 500 सदस्यों को डरा-धमाकर उनका बंध्याकरण किया गया।

भाजपा का चाल, चरित्र और चेहरा बिल्कुल अलग-अलग हैं। इसलिए नरेद्र मोदी और भाजपा के झूठे वादों पर विश्वास कर उनके साथ चलने वाले आदिवासियों को अपना अस्तित्व बचाना है तो इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का जवाब तलाशना होगा। क्या शेर, मेमने को सुरक्षित रखेगा? क्या मुर्गे, धान की हिफाजत करेंगें? क्या कसाई, बकरी की रक्षा करेगा? क्या भेडिय़ा, खरगोश का पहरेदार बनेगा? और क्या बाघ, हिरण की रखवाली करेगा? यह कौन नहीं जानता कि नरेन्द्र मोदी और भाजपा देश के पूंजीपतियों, व्यापारियों और स्वार्थी मध्यम वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये वर्ग आदिवासी-विरोधी हैं क्योंकि इनका भविष्य ही आदिवासियों की जमीन, जंगल, नदी, पहाड़ और खनिज पर टका हुआ है। देश में आज आदिवासियों के साथ खड़े होने का सीधा मतलब सत्ता से बाहर होना है क्योंकि देश की सत्ता पर कौन काबिज होगा, इसका निर्णय पूंजीपति, व्यापारी और स्वार्थी मध्यमवर्ग ही करते हैं।

(फारवर्ड प्रेस के फरवरी, 2015 अंक में प्रकाशित )


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